Bharat Devotion
Embroidered artwork for श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम्: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम्

ब्रह्मांड पुराणात हयग्रीवांनी अगस्त्यांना उपदेशिलेली देवी ललिता त्रिपुरसुंदरीची १००० नामे; श्रीविद्या उपासनेचे १८२ श्लोक.

श्लोक

श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता देवकार्य-समुद्यता

श्लोक 1

उद्यद्भानु-सहस्राभा चतुर्बाहु-समन्विता रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला

श्लोक 2

मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला

श्लोक 3

चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिक-लसत्कचा कुरुविन्दमणि-श्रेणी-कनत्कोटीर-मण्डिता

श्लोक 4

अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका

श्लोक 5

वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना

श्लोक 6

नवचम्पक-पुष्पाभ-नासादण्ड-विराजिता ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा

श्लोक 7

कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला

श्लोक 8

पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा

श्लोक 9

(दशनच्छदा) शुद्ध-विद्याङ्कुराकार-द्विजपङ्क्ति-द्वयोज्ज्वला कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्षि-दिगन्तरा

श्लोक 10

निज-सल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी (निज-संलाप) मन्दस्मित-प्रभापूर-मज्जत्कामेश-मानसा

श्लोक 11

अनाकलित-सादृश्य-चिबुकश्री-विराजिता (चुबुकश्री) कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा

श्लोक 12

कनकाङ्गद-केयूर-कमनीय-भुजान्विता रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ता-फलान्विता

श्लोक 13

कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी

श्लोक 14

लक्ष्यरोम-लताधारता-समुन्नेय-मध्यमा स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया

श्लोक 15

अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटीतटी रत्न-किङ्किणिका-रम्य-रशना-दाम-भूषिता

श्लोक 16

कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता माणिक्य-मुकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता

श्लोक 17

इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता

श्लोक 18

नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा

श्लोक 19

सिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा (शिञ्जान) मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः

श्लोक 20

सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण-भूषिता शिव-कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन-वल्लभा

श्लोक 21

सुमेरु-मध्य-श‍ृङ्गस्था श्रीमन्नगर-नायिका चिन्तामणि-गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता

श्लोक 22

महापद्माटवी-संस्था कदम्बवन-वासिनी सुधासागर-मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी

श्लोक 23

देवर्षि-गण-संघात-स्तूयमानात्म-वैभवा भण्डासुर-वधोद्युक्त-शक्तिसेना-समन्विता

श्लोक 24

सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता

श्लोक 25

चक्रराज-रथारूढ-सर्वायुध-परिष्कृता गेयचक्र-रथारूढ-मन्त्रिणी-परिसेविता

श्लोक 26

किरिचक्र-रथारूढ-दण्डनाथा-पुरस्कृता ज्वाला-मालिनिकाक्षिप्त-वह्निप्राकार-मध्यगा

श्लोक 27

भण्डसैन्य-वधोद्युक्त-शक्ति-विक्रम-हर्षिता नित्या-पराक्रमाटोप-निरीक्षण-समुत्सुका

श्लोक 28

भण्डपुत्र-वधोद्युक्त-बाला-विक्रम-नन्दिता मन्त्रिण्यम्बा-विरचित-विषङ्ग-वध-तोषिता

श्लोक 29

विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा

श्लोक 30

महागणेश-निर्भिन्न-विघ्नयन्त्र-प्रहर्षिता भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी

श्लोक 31

कराङ्गुलि-नखोत्पन्न-नारायण-दशाकृतिः महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका

श्लोक 32

कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका ब्रह्मोपेन्द्र-महेन्द्रादि-देव-संस्तुत-वैभवा

श्लोक 33

हर-नेत्राग्नि-संदग्ध-काम-सञ्जीवनौषधिः श्रीमद्वाग्भव-कूटैक-स्वरूप-मुख-पङ्कजा

श्लोक 34

कण्ठाधः-कटि-पर्यन्त-मध्यकूट-स्वरूपिणी शक्ति-कूटैकतापन्न-कट्यधोभाग-धारिणी

श्लोक 35

मूल-मन्त्रात्मिका मूलकूटत्रय-कलेवरा कुलामृतैक-रसिका कुलसंकेत-पालिनी

श्लोक 36

कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी अकुला समयान्तस्था समयाचार-तत्परा

श्लोक 37

मूलाधारैक-निलया ब्रह्मग्रन्थि-विभेदिनी मणि-पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी

श्लोक 38

आज्ञा-चक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि-विभेदिनी सहस्राराम्बुजारूढा सुधा-साराभिवर्षिणी

श्लोक 39

तडिल्लता-समरुचिः षट्चक्रोपरि-संस्थिता महासक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तु-तनीयसी

श्लोक 40

भवानी भावनागम्या भवारण्य-कुठारिका भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर्भक्त-सौभाग्यदायिनी

श्लोक 41

भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी

श्लोक 42

शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्र-निभानना शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना

श्लोक 43

निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा

श्लोक 44

नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा

श्लोक 45

निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर्निरीश्वरा नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी

श्लोक 46

निश्चिन्ता निरहंकारा निर्मोहा मोहनाशिनी निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी

श्लोक 47

निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी

श्लोक 48

(निस्संशया) निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा

श्लोक 49

निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा

श्लोक 50

दुष्टदूरा दुराचार-शमनी दोषवर्जिता सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक-वर्जिता

श्लोक 51

सर्वशक्तिमयी सर्व-मङ्गला सद्गतिप्रदा सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र-स्वरूपिणी

श्लोक 52

सर्व-यन्त्रात्मिका सर्व-तन्त्ररूपा मनोन्मनी माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर्मृडप्रिया

श्लोक 53

महारूपा महापूज्या महापातक-नाशिनी महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर्महारतिः

श्लोक 54

महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महायोगेश्वरेश्वरी

श्लोक 55

महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना महायाग-क्रमाराध्या महाभैरव-पूजिता

श्लोक 56

महेश्वर-महाकल्प-महाताण्डव-साक्षिणी महाकामेश-महिषी महात्रिपुर-सुन्दरी

श्लोक 57

चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी महाचतुः-षष्टिकोटि-योगिनी-गणसेविता

श्लोक 58

मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डल-मध्यगा चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्र-कलाधरा

श्लोक 59

चराचर-जगन्नाथा चक्रराज-निकेतना पार्वती पद्मनयना पद्मराग-समप्रभा

श्लोक 60

पञ्च-प्रेतासनासीना पञ्चब्रह्म-स्वरूपिणी चिन्मयी परमानन्दा विज्ञान-घनरूपिणी

श्लोक 61

ध्यान-ध्यातृ-ध्येयरूपा धर्माधर्म-विवर्जिता विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका

श्लोक 62

सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्था-विवर्जिता सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी

श्लोक 63

संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधान-करीश्वरी सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्य-परायणा

श्लोक 64

भानुमण्डल-मध्यस्था भैरवी भगमालिनी पद्मासना भगवती पद्मनाभ-सहोदरी

श्लोक 65

उन्मेष-निमिषोत्पन्न-विपन्न-भुवनावली सहस्र-शीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात्

श्लोक 66

आब्रह्म-कीट-जननी वर्णाश्रम-विधायिनी निजाज्ञारूप-निगमा पुण्यापुण्य-फलप्रदा

श्लोक 67

श्रुति-सीमन्त-सिन्दूरी-कृत-पादाब्ज-धूलिका सकलागम-सन्दोह-शुक्ति-सम्पुट-मौक्तिका

श्लोक 68

पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी अम्बिकाऽनादि-निधना हरिब्रह्मेन्द्र-सेविता

श्लोक 69

नारायणी नादरूपा नामरूप-विवर्जिता ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेय-वर्जिता

श्लोक 70

राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणि-मेखला

श्लोक 71

रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा

श्लोक 72

काम्या कामकलारूपा कदम्ब-कुसुम-प्रिया कल्याणी जगतीकन्दा करुणा-रस-सागरा

श्लोक 73

कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया वरदा वामनयना वारुणी-मद-विह्वला

श्लोक 74

विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचल-निवासिनी विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी

श्लोक 75

क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-पालिनी क्षयवृद्धि-विनिर्मुक्ता क्षेत्रपाल-समर्चिता

श्लोक 76

विजया विमला वन्द्या वन्दारु-जन-वत्सला वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डल-वासिनी

श्लोक 77

भक्तिमत्-कल्पलतिका पशुपाश-विमोचिनी संहृताशेष-पाषण्डा सदाचार-प्रवर्तिका

श्लोक 78

(पाखण्डा) तापत्रयाग्नि-सन्तप्त-समाह्लादन-चन्द्रिका तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा

श्लोक 79

चितिस्तत्पद-लक्ष्यार्था चिदेकरस-रूपिणी स्वात्मानन्द-लवीभूत-ब्रह्माद्यानन्द-सन्ततिः

श्लोक 80

परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता मध्यमा वैखरीरूपा भक्त-मानस-हंसिका

श्लोक 81

कामेश्वर-प्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता श‍ृङ्गार-रस-सम्पूर्णा जया जालन्धर-स्थिता

श्लोक 82

ओड्याणपीठ-निलया बिन्दु-मण्डलवासिनी रहोयाग-क्रमाराध्या रहस्तर्पण-तर्पिता

श्लोक 83

सद्यःप्रसादिनी विश्व-साक्षिणी साक्षिवर्जिता षडङ्गदेवता-युक्ता षाड्गुण्य-परिपूरिता

श्लोक 84

नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाण-सुख-दायिनी नित्या-षोडशिका-रूपा श्रीकण्ठार्ध-शरीरिणी

श्लोक 85

प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी मूलप्रकृतिरव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त-स्वरूपिणी

श्लोक 86

व्यापिनी विविधाकारा विद्याविद्या-स्वरूपिणी महाकामेश-नयन-कुमुदाह्लाद-कौमुदी

श्लोक 87

भक्त-हार्द-तमोभेद-भानुमद्भानु-सन्ततिः शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी

श्लोक 88

शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा

श्लोक 89

चिच्छक्तिश् चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजवृन्द-निषेविता

श्लोक 90

तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्च-कोशान्तर-स्थिता निःसीम-महिमा नित्य-यौवना मदशालिनी

श्लोक 91

(निस्सीम) मदघूर्णित-रक्ताक्षी मदपाटल-गण्डभूः चन्दन-द्रव-दिग्धाङ्गी चाम्पेय-कुसुम-प्रिया

श्लोक 92

कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी कुलकुण्डालया कौल-मार्ग-तत्पर-सेविता

श्लोक 93

कुमार-गणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर्मतिर्धृतिः शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर्नन्दिनी विघ्ननाशिनी

श्लोक 94

तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षी-कामरूपिणी मालिनी हंसिनी माता मलयाचल-वासिनी

श्लोक 95

सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी

श्लोक 96

वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्था-विवर्जिता सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी

श्लोक 97

विशुद्धिचक्र-निलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना खट्वाङ्गादि-प्रहरणा वदनैक-समन्विता

श्लोक 98

पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोक-भयङ्करी अमृतादि-महाशक्ति-संवृता डाकिनीश्वरी

श्लोक 99

अनाहताब्ज-निलया श्यामाभा वदनद्वया दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्ष-मालादि-धरा रुधिरसंस्थिता

श्लोक 100

कालरात्र्यादि-शक्त्यौघ-वृता स्निग्धौदनप्रिया महावीरेन्द्र-वरदा राकिण्यम्बा-स्वरूपिणी

श्लोक 101

मणिपूराब्ज-निलया वदनत्रय-संयुता वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता

श्लोक 102

रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्न-प्रीत-मानसा समस्तभक्त-सुखदा लाकिन्यम्बा-स्वरूपिणी

श्लोक 103

स्वाधिष्ठानाम्बुज-गता चतुर्वक्त्र-मनोहरा शूलाद्यायुध-सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता

श्लोक 104

मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादि-समन्विता दध्यन्नासक्त-हृदया काकिनी-रूप-धारिणी

श्लोक 105

मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्च-वक्त्राऽस्थि-संस्थिता अङ्कुशादि-प्रहरणा वरदादि-निषेविता

श्लोक 106

मुद्गौदनासक्त-चित्ता साकिन्यम्बा-स्वरूपिणी आज्ञा-चक्राब्ज-निलया शुक्लवर्णा षडानना

श्लोक 107

मज्जासंस्था हंसवती-मुख्य-शक्ति-समन्विता हरिद्रान्नैक-रसिका हाकिनी-रूप-धारिणी

श्लोक 108

सहस्रदल-पद्मस्था सर्व-वर्णोप-शोभिता सर्वायुधधरा शुक्ल-संस्थिता सर्वतोमुखी

श्लोक 109

सर्वौदन-प्रीतचित्ता याकिन्यम्बा-स्वरूपिणी स्वाहा स्वधाऽमतिर्मेधा श्रुतिः स्मृतिरनुत्तमा

श्लोक 110

पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवण-कीर्तना पुलोमजार्चिता बन्ध-मोचनी बन्धुरालका

श्लोक 111

(मोचनी बर्बरालका) विमर्शरूपिणी विद्या वियदादि-जगत्प्रसूः सर्वव्याधि-प्रशमनी सर्वमृत्यु-निवारिणी

श्लोक 112

अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मष-नाशिनी कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष-निषेविता

श्लोक 113

ताम्बूल-पूरित-मुखी दाडिमी-कुसुम-प्रभा मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी

श्लोक 114

नित्यतृप्ता भक्तनिधिर्नियन्त्री निखिलेश्वरी मैत्र्यादि-वासनालभ्या महाप्रलय-साक्षिणी

श्लोक 115

परा शक्तिः परा निष्ठा प्रज्ञानघन-रूपिणी माध्वीपानालसा मत्ता मातृका-वर्ण-रूपिणी

श्लोक 116

महाकैलास-निलया मृणाल-मृदु-दोर्लता महनीया दयामूर्तिर्महासाम्राज्य-शालिनी

श्लोक 117

आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता श्री-षोडशाक्षरी-विद्या त्रिकूटा कामकोटिका

श्लोक 118

कटाक्ष-किङ्करी-भूत-कमला-कोटि-सेविता शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्र-धनुःप्रभा

श्लोक 119

हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तर-दीपिका दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञ-विनाशिनी

श्लोक 120

दरान्दोलित-दीर्घाक्षी दर-हासोज्ज्वलन्-मुखी गुरुमूर्तिर्गुणनिधिर्गोमाता गुहजन्मभूः

श्लोक 121

देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाश-रूपिणी प्रतिपन्मुख्य-राकान्त-तिथि-मण्डल-पूजिता

श्लोक 122

कलात्मिका कलानाथा काव्यालाप-विनोदिनी (विमोदिनी) सचामर-रमा-वाणी-सव्य-दक्षिण-सेविता

श्लोक 123

आदिशक्तिरमेयाऽऽत्मा परमा पावनाकृतिः अनेककोटि-ब्रह्माण्ड-जननी दिव्यविग्रहा

श्लोक 124

क्लींकारी केवला गुह्या कैवल्य-पददायिनी त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस्त्रिदशेश्वरी

श्लोक 125

त्र्यक्षरी दिव्य-गन्धाढ्या सिन्दूर-तिलकाञ्चिता उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व-सेविता

श्लोक 126

विश्वगर्भा स्वर्णगर्भाऽवरदा वागधीश्वरी ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा

श्लोक 127

सर्ववेदान्त-संवेद्या सत्यानन्द-स्वरूपिणी लोपामुद्रार्चिता लीला-कॢप्त-ब्रह्माण्ड-मण्डला

श्लोक 128

अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा

श्लोक 129

इच्छाशक्ति-ज्ञानशक्ति-क्रियाशक्ति-स्वरूपिणी सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप-धारिणी

श्लोक 130

अष्टमूर्तिरजाजैत्री लोकयात्रा-विधायिनी (अजाजेत्री) एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता

श्लोक 131

अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्य-स्वरूपिणी बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया

श्लोक 132

भाषारूपा बृहत्सेना भावाभाव-विवर्जिता सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः

श्लोक 133

राज-राजेश्वरी राज्य-दायिनी राज्य-वल्लभा राजत्कृपा राजपीठ-निवेशित-निजाश्रिता

श्लोक 134

राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्ग-बलेश्वरी साम्राज्य-दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला

श्लोक 135

दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोक-वशङ्करी सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द-रूपिणी

श्लोक 136

देश-कालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी

श्लोक 137

सर्वोपाधि-विनिर्मुक्ता सदाशिव-पतिव्रता सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल-रूपिणी

श्लोक 138

कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया

श्लोक 139

स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्ति-रूपिणी सनकादि-समाराध्या शिवज्ञान-प्रदायिनी

श्लोक 140

चित्कलाऽऽनन्द-कलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी नामपारायण-प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी

श्लोक 141

मिथ्या-जगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता

श्लोक 142

भवदाव-सुधावृष्टिः पापारण्य-दवानला दौर्भाग्य-तूलवातूला जराध्वान्त-रविप्रभा

श्लोक 143

भाग्याब्धि-चन्द्रिका भक्त-चित्तकेकि-घनाघना रोगपर्वत-दम्भोलिर्मृत्युदारु-कुठारिका

श्लोक 144

महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर-निषूदिनी

श्लोक 145

क्षराक्षरात्मिका सर्व-लोकेशी विश्वधारिणी त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका

श्लोक 146

स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्प-निभाकृतिः ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता

श्लोक 147

दुराराध्या दुराधर्षा पाटली-कुसुम-प्रिया महती मेरुनिलया मन्दार-कुसुम-प्रिया

श्लोक 148

वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी

श्लोक 149

मार्ताण्ड-भैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्त-राज्यधूः (मार्तण्ड) त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा

श्लोक 150

सत्य-ज्ञानानन्द-रूपा सामरस्य-परायणा कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी

श्लोक 151

कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा

श्लोक 152

परंज्योतिः परंधाम परमाणुः परात्परा पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्र-विभेदिनी

श्लोक 153

मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानस-हंसिका सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती

श्लोक 154

ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः

श्लोक 155

प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठ-रूपिणी विश‍ृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः

श्लोक 156

मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रह-रूपिणी भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र-प्रवर्तिनी

श्लोक 157

छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी उदारकीर्तिरुद्दामवैभवा वर्णरूपिणी

श्लोक 158

जन्ममृत्यु-जरातप्त-जनविश्रान्ति-दायिनी सर्वोपनिष-दुद्-घुष्टा शान्त्यतीत-कलात्मिका

श्लोक 159

गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा कल्पना-रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध-विग्रहा

श्लोक 160

कार्यकारण-निर्मुक्ता कामकेलि-तरङ्गिता कनत्कनकता-टङ्का लीला-विग्रह-धारिणी

श्लोक 161

अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्र-प्रसादिनी अन्तर्मुख-समाराध्या बहिर्मुख-सुदुर्लभा

श्लोक 162

त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः

श्लोक 163

(सुधास्रुतिः) संसारपङ्क-निर्मग्न-समुद्धरण-पण्डिता यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान-स्वरूपिणी

श्लोक 164

धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्य-विवर्धिनी विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमण-कारिणी

श्लोक 165

विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी अयोनिर्योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी

श्लोक 166

वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना

श्लोक 167

तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थ-स्वरूपिणी सामगानप्रिया सौम्या सदाशिव-कुटुम्बिनी

श्लोक 168

(सोम्या) सव्यापसव्य-मार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता

श्लोक 169

चैतन्यार्घ्य-समाराध्या चैतन्य-कुसुमप्रिया सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य-पाटला

श्लोक 170

दक्षिणा-दक्षिणाराध्या दरस्मेर-मुखाम्बुजा कौलिनी-केवलाऽनर्घ्य-कैवल्य-पददायिनी

श्लोक 171

स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुति-संस्तुत-वैभवा मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः

श्लोक 172

विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी

श्लोक 173

व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी पञ्चयज्ञ-प्रिया पञ्च-प्रेत-मञ्चाधिशायिनी

श्लोक 174

पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्च-संख्योपचारिणी शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी

श्लोक 175

धराधरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका

श्लोक 176

बन्धूक-कुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी

श्लोक 177

सुवासिन्यर्चन-प्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा बिन्दु-तर्पण-सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका

श्लोक 178

दशमुद्रा-समाराध्या त्रिपुराश्री-वशङ्करी ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेय-स्वरूपिणी

श्लोक 179

योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा अनघाऽद्भुत-चारित्रा वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी

श्लोक 180

अभ्यासातिशय-ज्ञाता षडध्वातीत-रूपिणी अव्याज-करुणा-मूर्तिरज्ञान-ध्वान्त-दीपिका

श्लोक 181

आबाल-गोप-विदिता सर्वानुल्लङ्घ्य-शासना श्रीचक्रराज-निलया श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी

श्लोक 182

पूजा मार्गदर्शक आणि पाठ लाभ (फलश्रुती)

फलश्रुती
शुभ दिवस

दररोज किंवा शुभ तिथींवर

उत्तम वेळ (मुहूर्त)

ब्राह्ममुहूर्त (पहाटे 4 ते 6) किंवा संध्याकाळ

पावन नैवेद्य

तुपाचा दिवा, अगरबत्ती, ताजी फुले व नैवेद्य

आध्यात्मिक लाभ (फलश्रुती)फलश्रुती
  • मानसिक शांती, आत्मिक उन्नती व सकारात्मक ऊर्जा

पृष्ठभूमि

प्रकटीकरणाची पार्श्वभूमी: ललितासहस्रनाम ब्रह्माण्ड पुराणाच्या (उत्तरखण्ड) हयग्रीव-अगस्त्य संवादात येते, आणि त्याची समाप्तीची पुष्पिका त्याला ‘श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रकथन’ म्हणते. विष्णूंचे अश्वमुख ज्ञानरूप असलेले भगवान हयग्रीव कांची येथे महर्षी अगस्त्यांना ते उपदेशतात. ते सांगतात की स्वतः भगवती ललितेने वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयिनी, सर्वेश्वरी आणि कौलिनी या आठ वाग्देवतांना आपल्या सहस्र नामांचे स्तोत्र रचण्याची आज्ञा केली होती. येथे मूळ स्तोत्र श्लोक 1-182 पर्यंत आहे, आणि नामे 1 ते 1000 अशी क्रमांकित आहेत. टीकाकार हे अनेक स्तरांवर वाचतात, ज्यात कुण्डलिनी योग (मूलाधारापासून सहस्रारापर्यंत), अद्वैत वेदान्त आणि श्रीयन्त्र उपासना यांचा समावेश आहे. सावधानतेची सूचना: संस्कृत डॉक्युमेंट्सच्या आवृत्तीत नमूद आहे की हे सहस्रनाम त्या आवृत्तीने पाहिलेल्या मुद्रित ब्रह्माण्ड पुराणाच्या खंडात सहज आढळत नाही आणि ते पुराणाच्या नंतरच्या परिशिष्टांचा (खिल) भाग असू शकते.

तुम्हाला माहीत आहे का?

आठ दिव्य वाणी-देवता

इतर सामान्य मानवी कवींनी रचलेल्या स्तोत्रांपेक्षा वेगळे, ललिता सहस्रनाम स्वतः भगवती ललितेच्या थेट आज्ञेने आठ वाग्देवतांनी (वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयिनी, सर्वेश्वरी आणि कौलिनी) रचले आहे.

१,००० नामांत पुनरावृत्ती नाही

परंपरेनुसार या १,००० पवित्र नामांपैकी एकही नाम पुनरावृत्त होत नाही. प्रत्येक नाम मातेच्या विश्वात्मक प्रकटीकरणाचे, तात्त्विक सत्याचे किंवा सूक्ष्म योगिक शक्तीचे एक वेगळे पैलू उलगडते.

कुंडलिनी जागृतीचा संपूर्ण प्रवास

स्तोत्र कुंडलिनी शक्तीच्या सहा चक्रांमधील आरोहणाचे क्रमबद्ध चित्रण करते — मूलाधार-चक्रारूढा (मूल चक्रात वास करणारी) पासून सहस्राराम्बुजारूढा (सहस्रदल मुकुट-कमळात विकसित होणारी) पर्यंत.

भास्कररायांचे सौभाग्यभास्कर भाष्य

१८व्या शतकात महान विद्वान-दीक्षित भास्करराय मखी यांनी सौभाग्यभास्कर नामक निर्णायक भाष्य लिहिले, ज्याने प्रत्येक श्लोकातील व्याकरणिक, गूढ आणि वेदांती खोलीचा अपूर्व उलगडा केला.

शिव आणि शक्तीचे ऐक्य

स्तोत्राचा अंतिम उत्कर्ष शिव-शक्त्यैक्य-रूपिणी (नाम ९९९) मध्ये प्रकट होतो, जे शुद्ध, अपरिवर्तनीय चेतना (शिव) आणि आदिम विश्वशक्ती (शक्ती) यांच्या अविभाज्य, अद्वैत ऐक्याचा उत्सव साजरा करते.

विषयानुसार ब्राउझ करा

Devi ची संपूर्ण स्तुती व पाठ

Devi

Devi चे सर्व पाठ पहा →

हिंदू धर्म से और

सभी देखें