श्लोक
पवित्र न्यास विधि: अष्टाक्षर मंत्र ('ॐ नमो नारायणाय'), द्वादशाक्षर मंत्र ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय') और षडक्षर मंत्र ('ॐ विष्णवे नमः') के बीजाक्षरों को शरीर के विभिन्न अंगों, उंगलियों और दिशाओं में स्थापित कर भगवान श्रीहरि की दिव्य शक्ति से देह को अभिमंत्रित करना। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 1
राजा परीक्षित ने पूछा: हे भगवन्! जिस कवच से सुरक्षित होकर सहस्रनेत्र देवराज इंद्र ने खेल-खेल में ही वाहनों सहित समस्त शत्रु-सेना को जीतकर तीनों लोकों के ऐश्वर्य का उपभोग किया था; (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 1
हे महात्मन्! आप मुझे वही नारायण-कवच विस्तारपूर्वक बतलाइए, जिससे सुरक्षित होकर इंद्र ने युद्धभूमि में आततायी असुरों पर विजय प्राप्त की थी। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 2
श्रीशुकदेव जी ने कहा: जब देवराज इंद्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप को अपना पुरोहित वरण करके उनसे यह प्रश्न पूछा, तब विश्वरूप ने 'नारायण-कवच' का उपदेश दिया। तुम एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 3
विश्वरूप ने कहा: संकट के समय हाथ-पैर धोकर, आचमन करके, हाथ में कुशा की पवित्री धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। मौन और पवित्र होकर दोनों मंत्रों से अंगन्यास और करन्यास करें; (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 4
भय उपस्थित होने पर नारायणमय कवच को धारण करना चाहिए। पैरों, घुटनों, जांघों, उदर, हृदय और वक्षःस्थल पर; (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 5
मुख और सिर पर क्रमशः 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र के अक्षरों का न्यास करें, अथवा इसके विपरीत क्रम (सिर से पैर) से न्यास करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 6
तत्पश्चात द्वादशाक्षर मंत्र ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय') से करन्यास करें, ओंकार से लेकर 'य' कार तक के अक्षरों को अंगूठे और उंगलियों के पोरों पर स्थापित करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 7
षडक्षर मंत्र के 'ॐ' को हृदय में, 'वि' को मस्तक पर, 'ष' को दोनों भौंहों के बीच में, 'ण' को शिखा में स्थापित करें; (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 8
'वे' को दोनों नेत्रों में, 'न' को शरीर के सभी जोड़ों में और 'मः' को अस्त्र मानकर दिशाओं में रक्षण करें। इस प्रकार ज्ञानी साधक स्वयं मंत्रमय हो जाता है। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 9
विसर्ग और 'फट्' जोड़कर 'ॐ विष्णवे नमः' का उच्चारण करते हुए दसों दिशाओं में सुरक्षा-घेरा बाँध देना चाहिए। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 10
षडैश्वर्य संपन्न, ज्ञान, तेज और तप की साक्षात् मूर्ति परमब्रह्म परमात्मा का अपने अंतःकरण में ध्यान करते हुए इस नारायण-कवच का पाठ प्रारंभ करें: (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 11
गरुड़ की पीठ पर चरण-कमल रखे हुए, आठ भुजाओं में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश धारण करने वाले तथा अणिमादि आठों सिद्धियों से युक्त भगवान श्रीहरि सब प्रकार से मेरी रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 12
जल में मत्स्य भगवान जलचरों और वरुण के पाश से मेरी रक्षा करें। स्थल पर माया-बटु वामन रूप मेरी रक्षा करें, और आकाश में तीनों लोकों को नापने वाले विश्वरूप त्रिविक्रम भगवान मेरी रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 13
दुर्गम स्थानों में, घने जंगलों में और युद्ध के मुख में, दैत्यों के संहारक भगवान नृसिंह मेरी रक्षा करें—जिनके भयंकर अट्टहास से दसों दिशाएं कांप उठी थीं और असुरों के गर्भ गिर गए थे। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 14
मार्ग में अपनी दाढ़ पर पृथ्वी को उठाने वाले महायज्ञ स्वरूप उग्र वाराह भगवान मेरी रक्षा करें। पर्वत शिखरों पर और परदेश में प्रवास करते समय लक्ष्मण जी सहित भरत के बड़े भाई श्रीराम मेरी रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 15
नारायण मुझे घोर अभिमान और असावधानी से बचाएं; नर मुझे अहंकार और उपहास से बचाएं। योगेश्वर दत्तात्रेय मुझे योगभ्रष्ट होने से बचाएं, और सद्गुणों के स्वामी महर्षि कपिल मुझे कर्मबंधन से मुक्त रखें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 16
सनत्कुमार कामदेव के वेग से मेरी रक्षा करें; हयग्रीव मार्ग में देव-अपमान से बचाएं; देवर्षि नारद पूजा में होने वाले अपराधों से रक्षा करें; और कच्छप रूपी श्रीहरि मुझे समस्त नरकों से बचाएं। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 17
भगवान धन्वन्तरि कुपथ्य और रोगों से मेरी रक्षा करें; आत्मजयी ऋषभदेव शीत-उष्ण आदि द्वंद्वों के भय से रक्षा करें; यज्ञ भगवान अपयश और जन-निंदा से बचाएं; और शेषनाग स्वरूप भगवान बलराम क्रोधी सर्पों के झुंड से रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 18
भगवान कृष्णद्वैपायन व्यास मुझे अज्ञान से बचाएं; भगवान बुद्ध पाखंडियों के बहकावे और प्रमाद से रक्षा करें; और धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होने वाले कल्कि भगवान मुझे कलियुग के दोषों और पापों से बचाएं। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 19
प्रातःकाल भगवान केशव अपनी गदा से मेरी रक्षा करें; संगम वेला में बांसुरी बजाते गोविंद रक्षा करें; पूर्वान्ह में महाशक्तिशाली नारायण रक्षा करें; और दोपहर में चक्रधारी भगवान विष्णु मेरी रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 20
अपराह्न (तीसरे पहर) में भयंकर धनुष धारण किए मधुसूदन मेरी रक्षा करें; संध्या समय त्रिधामा माधव रक्षा करें; रात्रि के प्रथम प्रहर में हृषीकेश और मध्यरात्रि में अकेले पद्मनाभ मेरी रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 21
रात्रि के पिछले पहर में श्रीवत्सधारी भगवान मेरी रक्षा करें; उषाकाल में खड्गधारी जनार्दन रक्षा करें; और प्रभात काल में कालमूर्ति विश्वेश्वर भगवान दामोदर मेरी रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 22
हे सुदर्शन चक्र! प्रलयकाल की अग्नि के समान तुम्हारी धार अत्यंत तीव्र और दहकती हुई है। तुम भगवान की प्रेरणा से चारों ओर घूमकर शत्रु-सेना को शीघ्र भस्म कर दो, भस्म कर दो—जैसे वायु के संयोग से अग्नि सूखे तिनकों को जला डालती है! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 23
हे कौमोदकी गदा! तुम्हारी मार से वज्र के समान चिनगारियां फूटती हैं, तुम भगवान अजित की परम प्रिय हो। तुम हमारे शत्रुओं को कुचल डालो, कुचल डालो! और कुष्मांडा, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत-प्रेत आदि दुष्ट ग्रहों को चूर-चूर कर दो, चूर-चूर कर दो! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 24
हे पांचजन्य शंख! जब भगवान श्रीकृष्ण तुम्हें फूंकते हैं, तो तुम्हारी भयानक गर्जना से शत्रुओं के कलेजे कांप उठते हैं। तुम अपनी उस गूंज से राक्षसों, प्रेतों, पिशाचों, डाकिनियों और दुष्ट दृष्टि वाले ग्रहों को भगा दो, भगा दो! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 25
हे तीक्ष्ण धार वाली नंदक तलवार! भगवान की आज्ञा से तुम शत्रु-सेना को काट डालो, काट डालो! और हे सौ चंद्रमाओं से सुशोभित ढाल! तुम मुझे ढक लो और पापी शत्रुओं की आंखों को अंधा कर दो! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 26
ग्रहों से, धूमकेतुओं से, दुष्ट मनुष्यों से, विषैले साँपों से, हिंसक पशुओं से, भूत-प्रेतों से और हमारे पापों से जो-जो भय हमें हो सकते हैं; (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 27
वे सभी भय और हमारे कल्याण के मार्ग में आने वाली समस्त रुकावटें, भगवान के पावन नाम, रूप और आयुधों के कीर्तन से तुरंत समूल नष्ट हो जाएं! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 28
वेदों के सामगान और छंदों से संपन्न भगवान गरुड़ हमें संपूर्ण संकटों से बचाएं; और भगवान विष्वक्सेन अपने पावन नामों के प्रभाव से हमारी सर्वथा रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 29
भगवान श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और पार्षदगण हमारे मन, बुद्धि, इंद्रियों और प्राणों की समस्त विपत्तियों से नित्य रक्षा करें। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 30
संसार में जो कुछ भी कार्य और कारण रूप सत्य या असत्य वस्तु है, वह सब वास्तव में साक्षात् भगवान ही हैं—इस परम सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जाएं! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 31
जैसे एकात्मभाव का अनुभव करने वाले ज्ञानियों के लिए भगवान स्वयं निर्विकल्प और अद्वितीय हैं, फिर भी वे अपनी माया शक्ति से आभूषण, अस्त्र-शस्त्र और नाम-रूप धारण करते हैं; (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 32
उसी अटल सत्य के प्रभाव से सर्वज्ञ और सर्वव्यापी भगवान श्रीहरि अपने समस्त स्वरूपों द्वारा सदा और सर्वत्र हमारी रक्षा करें! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 33
दसों दिशाओं में, विदिशाओं में, ऊपर, नीचे, बाहर और भीतर—भगवान नृसिंह अपनी भीषण गर्जना से समस्त लोकों के भय को भगाते हुए और शत्रुओं के तेज को निगलते हुए हमारी रक्षा करें! (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 34
विश्वरूप ने कहा: हे इंद्र! मैंने तुम्हें यह नारायणमय कवच बतला दिया है। इस कवच से भलीभांति सुरक्षित होकर तुम युद्ध में दैत्य सेनापतियों को सहज ही जीत लोगे। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 35
जो पुरुष इस कवच को धारण करता है, वह अपनी दृष्टि से जिसे भी देख लेता है अथवा पैर से स्पर्श कर लेता है, वह व्यक्ति भी तुरंत समस्त भयों से मुक्त हो जाता है। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 36
इस दिव्य विद्या को धारण करने वाले को राजा, डाकू, दुष्ट ग्रह अथवा हिंसक व्याघ्र आदि किसी से भी कभी कोई भय नहीं रहता। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 37
प्राचीन काल में इस विद्या को धारण करने वाले कौशिक नामक एक ब्राह्मण ने मरुभूमि (रेगिस्तान) में योग-साधना द्वारा अपने शरीर का त्याग किया था। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 38
एक बार गंधर्वराज चित्ररथ सुंदर अप्सराओं से घिरे हुए अपने दिव्य विमान पर सवार होकर आकाश में उस स्थान के ऊपर से गुजरे, जहाँ उस ब्राह्मण की अस्थियां पड़ी थीं। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 39
अचानक उनका विमान आकाश से सिर के बल नीचे आ गिरा! तब विस्मित हुए चित्ररथ ने बालखिल्य ऋषियों के कहने पर उस ब्राह्मण की अस्थियों को पूर्ववाहिनी सरस्वती में विसर्जित किया, स्नान किया और पुनः अपने दिव्य धाम को चले गए। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 40
जो पुरुष संकट के समय इसे सुनता है और जो श्रद्धापूर्वक इसे धारण करता है, समस्त प्राणी उसे नमन करते हैं और वह सब प्रकार के भयों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 41
इस दिव्य विद्या को विश्वरूप से प्राप्त करके शतक्रतु इंद्र ने युद्धभूमि में असुरों को पराजित किया और तीनों लोकों के परम ऐश्वर्य का उपभोग किया। इस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण के छठे स्कंध में वर्णित 'नारायण कवच' संपूर्ण हुआ। (श्रीमद्भागवतको नारायणकवच)।
श्लोक 42
पूजा मार्गदर्शन र पाठ लाभ (फलश्रुति)
PhalashrutiDaily or auspicious lunar days (Ekadashi, Purnima, Pradosham)
Brahma Muhurta (4:00 AM – 6:00 AM) or Evening Dusk (Sandhya)
Ghee lamp (Deepa), Incense (Dhoopa), Fresh flowers & Water offering
- Peace of mind, spiritual upliftment, and harmonious energy in the home
पृष्ठभूमि
श्रीमद्भागवतमा उल्लिखित यो कवच कौशिक मुनिको अस्थिले समेत विमान खसाल्न सक्ने सामर्थ्य राख्दथ्यो। यसको पाठले जीवनमा कुनै भय रहँदैन।
के तपाईं जान्नुहुन्छ?
कौशिक मुनिको हाडको कथा (श्लोक ३८–४०)
कौशिक नामका एक ब्राह्मणले नारायण कवचलाई कण्ठस्थ गरी आत्मसात् गरेका थिए; उनी मरुभूमिमा देह त्याग गरे। सदियौंपछि गन्धर्वराज चित्ररथ आकाशीय रथमा उडिरहँदा उनका सुकेका हाडहरूमाथिबाट गुज्रिँदा रथ तत्काल आफ्नो दिव्य शक्ति गुमाएर पृथ्वीमा खस्यो; यसले साधकको भौतिक शरीरमा सुरक्षित रहने अमिट आध्यात्मिक शक्तिलाई प्रमाणित गर्छ।
सर्वदिशा सुरक्षा (श्लोक १२–१५)
श्लोक १२ देखि १५ सम्मले सबै भूभागको व्यवस्थित रक्षा गर्छन्: जल (मत्स्य), पृथ्वी (वामन), आकाश (त्रिविक्रम), पर्वतका शिखर (लक्ष्मणसहित श्रीराम) र सुनसान वन (वराह र नृसिंह)।
चौबीस घण्टाको अटूट सुरक्षा चक्र (श्लोक २०–२२)
यो स्तोत्रले निरन्तर २४ घण्टाको रक्षा स्थापित गर्छ: प्रातःकाल केशव, बिहान गोविन्द, मध्याह्नअघि नारायण, मध्याह्नमा विष्णु, अपराह्नमा मधुसूदन, साँझमा माधव, रातको प्रारम्भमा हृषीकेश, मध्यरातमा पद्मनाभ र भोरको उज्यालोमा दामोदर।
दिव्य आयुधहरूको आह्वान (श्लोक २३–२६)
श्लोक २३ देखि २६ सम्ममा भगवान् विष्णुका सचेत दिव्य आयुधहरूलाई प्रत्यक्ष सम्बोधन गरिएको छ: ज्वालामय सुदर्शन चक्र, चिनगारी छर्ने कौमोदकी गदा, गर्जनशील पाञ्चजन्य शङ्ख, र सय चन्द्रमाले सुशोभित ढालसहित नन्दक तरबार।
अद्वैत तत्त्वज्ञानमा आधार (श्लोक ३१–३३)
यो कवच केवल अन्धविश्वासमा टेकेको छैन; यो वेदान्तको परम सत्यमा आधारित छ, जसअनुसार भगवान् श्रीहरि नै व्यक्त र अव्यक्त दुवै जगत्को एकमात्र आधार हुनुहुन्छ ('सदसच्च यत्')। अतः जब सबै कुरा प्रभुमय छ, तब सबै भय र भ्रम उहाँको प्रकाशमा विलीन हुन्छन्।
विषय अनुसार हेर्नुहोस्
Vishnu
हिन्दु धर्म बाट थप
सबै हेर्नुहोस्सम्बन्धित शिक्षाहरू
उही शिक्षा, विभिन्न परम्पराहरूमा प्रतिध्वनित
