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Embroidered artwork for सिख धर्मका पञ्ज तख्त: आध्यात्मिक र सामाजिक अधिकारका पाँच पावन पीठ: Embroidered Khanda emblem with a saffron Nishan Sahib flag and marigolds at sunrise

सिख धर्मका पञ्ज तख्त

आध्यात्मिक र सामाजिक अधिकारका पाँच पावन पीठ

सिख धर्मका पञ्ज तख्त

आध्यात्मिक र सामाजिक अधिकारका पाँच पावन पीठ

सिख परम्पराका पाँच पावन तख्तहरू जसले आध्यात्मिक र सामाजिक न्यायको प्रतिनिधित्व गर्दछन्।

मीरी और पीरी का पावन सिद्धांत

सिख पंथ में तख्त का सिद्धांत मीरी (सामाजिक न्याय, धर्म रक्षा व संप्रभुता) और पीरी (आध्यात्मिक ज्ञान व भक्ति) के सुंदर समन्वय का प्रतीक है। सन् १६०६ में छठे पातशाह गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने अमृतसर में श्री हरिमंदिर साहिब के समक्ष श्री अकाल तख्त साहिब की नींव रखी थी।

श्री हरिमंदिर साहिब जहाँ अंतर्मुखी साधना, कीर्तन और विनम्रता का केंद्र है, वहीं अकाल तख्त सत्य, न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा का सर्वोच्च प्रेरणा स्थल है। कालांतर में अन्य चार ऐतिहासिक पावन गुरुद्वारों को भी तख्त की मान्यता प्राप्त हुई।

सिख परंपरा के पंज तख्त

१
श्री अकाल तख्त साहिब
अमृतसर, पंजाब
गुरु हरगोबिंद साहिब (१६०६)
अकाल पुरख का सर्वोच्च सिंहासन, सिख पंथ का केंद्रीय धार्मिक मार्गदर्शन केंद्र।
२
तख्त श्री दमदमा साहिब
तलवंडी साबो, बठिंडा, पंजाब
गुरु गोबिंद सिंह जी (१७०५)
गुरु की काशी, जहाँ दशम पातशाह ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संपूर्ण स्वरूप संकलित किया।
३
तख्त श्री केसगढ़ साहिब
आनंदपुर साहिब, रूपनगर, पंजाब
गुरु गोबिंद सिंह जी (१६९९)
खालसा पंथ का प्राकट्य स्थल, जहाँ वैशाखी १६९९ को खंडे बाटे की पाहुल प्रारंभ हुई।
४
तख्त श्री पटना साहिब
पटना, बिहार
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्मस्थल (१६६६)
गंगा तट पर स्थित पावन धाम, दशम पातशाह की बाल्यकालीन स्मृतियों व अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित।
५
तख्त श्री हजूर साहिब
नांदेड़, महाराष्ट्र
गुरु गोबिंद सिंह जी (१७०८)
गोदावरी तट पर स्थित सचखंड धाम, जहाँ गुरु जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को शाश्वत गुरुपद प्रदान किया।

सेवा व सिमरन की अखंड परंपरा

पाँचों तख्तों पर प्रतिदिन मर्यादापूर्वक गुरु-सेवा संचालित होती है:

  • •
    अमृत वेले से लेकर रात्रि सुखासन तक निरंतर गुरबाणी कीर्तन का गायन।
  • •
    बिना किसी भेद-भाव के सभी के लिए चौबीसों घंटे चलने वाला अटूट गुरु का लंगर।
  • •
    गुरु साहिबानों के पावन ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्रों और हस्तलिखित पोथियों का संरक्षण।

पावन मूल मंतर

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रथम उद्घोष:

ੴ सतिनामु

करता पुरखु निरभउ निरवैरु

अकाल मूरति अजूनी सैभं

गुर प्रसादि॥

जपु॥

आदि सचु जुगादि सचु

है भी सचु नानक होसी भी सचु॥

के तपाईं जान्नुहुन्छ?

Two swords at one installation

Guru Hargobind wore two swords when he took up the Guruship, one for miri (temporal authority) and one for piri (spiritual authority), the principle the Akal Takht was built to embody.

Guru Ki Kashi

Damdama Sahib earned the name Guru Ki Kashi, the Guru's own Kashi, after Guru Gobind Singh recited the entire Guru Granth Sahib there from memory for Bhai Mani Singh to transcribe.

Recognized centuries later

Although Guru Gobind Singh's stay at Damdama Sahib took place in 1705, it was only formally recognized as the fifth takht in 1966.

The last human Guru

At Hazur Sahib in 1708, Guru Gobind Singh ended the line of living Gurus and placed the eternal Guruship in the Guru Granth Sahib itself.

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Guru Nanak Dev Ji

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