सिख पंथ के पंज तख्त
आध्यात्मिक एवं सामाजिक संप्रभुता के पाँच पावन तख्त
सिख परंपरा में पंज तख्त आध्यात्मिक चेतना (पीरी) और सामाजिक-सांस्कृतिक संप्रभुता (मीरी) के पाँच सर्वोच्च पावन सिंहासन हैं। छठे पातशाह गुरु हरगोबिंद साहिब द्वारा स्थापित श्री अकाल तख्त साहिब से लेकर गुरु गोबिंद सिंह जी के पावन चरणों से जुड़े ये पाँचों गुरुद्वारे न्याय, समरसता और अखंड भक्ति के प्रेरणा केंद्र हैं।
मीरी और पीरी का पावन सिद्धांत
सिख पंथ में तख्त का सिद्धांत मीरी (सामाजिक न्याय, धर्म रक्षा व संप्रभुता) और पीरी (आध्यात्मिक ज्ञान व भक्ति) के सुंदर समन्वय का प्रतीक है। सन् १६०६ में छठे पातशाह गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने अमृतसर में श्री हरिमंदिर साहिब के समक्ष श्री अकाल तख्त साहिब की नींव रखी थी।
श्री हरिमंदिर साहिब जहाँ अंतर्मुखी साधना, कीर्तन और विनम्रता का केंद्र है, वहीं अकाल तख्त सत्य, न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा का सर्वोच्च प्रेरणा स्थल है। कालांतर में अन्य चार ऐतिहासिक पावन गुरुद्वारों को भी तख्त की मान्यता प्राप्त हुई।
सिख परंपरा के पंज तख्त
सेवा व सिमरन की अखंड परंपरा
पाँचों तख्तों पर प्रतिदिन मर्यादापूर्वक गुरु-सेवा संचालित होती है:
- •अमृत वेले से लेकर रात्रि सुखासन तक निरंतर गुरबाणी कीर्तन का गायन।
- •बिना किसी भेद-भाव के सभी के लिए चौबीसों घंटे चलने वाला अटूट गुरु का लंगर।
- •गुरु साहिबानों के पावन ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्रों और हस्तलिखित पोथियों का संरक्षण।
पावन मूल मंतर
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रथम उद्घोष:
ੴ सतिनामु
करता पुरखु निरभउ निरवैरु
अकाल मूरति अजूनी सैभं
गुर प्रसादि॥
जपु॥
आदि सचु जुगादि सचु
है भी सचु नानक होसी भी सचु॥
क्या आप जानते हैं?
शाश्वत गुरुपद प्रदान
नांदेड़ स्थित तख्त श्री हजूर साहिब में १७०८ में गुरु गोबिंद सिंह जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को शाश्वत गुरु घोषित किया।
खालसा पंथ की स्थापना
वैशाखी १६९९ को तख्त श्री केसगढ़ साहिब, आनंदपुर में दशम पातशाह ने पंज प्यारों को अमृत छकाकर खालसा पंथ की नींव रखी।
गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन
तख्त श्री दमदमा साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी ने भाई मनी सिंह जी के सहयोग से संपूर्ण ग्रंथ साहिब की प्रामाणिक बीड़ तैयार कराई।
अटूट लंगर सेवा
पाँचों तख्तों पर जाति, धर्म या वर्ग के भेद के बिना प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं को निःशुल्क ताजा लंगर परोसा जाता है।
Guru Nanak Dev Ji
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