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Embroidered artwork for वाहगुरु: निरंकार परमात्मा का ध्यान और स्वरूप: Embroidered Khanda emblem with a saffron Nishan Sahib flag and marigolds at sunrise

वाहगुरु

निरंकार परमात्मा का ध्यान और स्वरूप

वाहगुरु

निरंकार परमात्मा का ध्यान और स्वरूप

सिख चिंतन एक ओंकार और निरंकार ईश्वर की उपासना करता है जो अकाल, निर्भय और सर्वव्यापी हैं।

ईश्वर हर जीव के भीतर विद्यमान हैं और उन्हें केवल प्रेम और गुरु कृपा से ही पाया जा सकता है।

क्या आप जानते हैं?

वाहगुरु का अर्थ

'वाह' (प्रशंसा) और 'गुरु' (अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला) से मिलकर बना यह शब्द सिख धर्म में परमात्मा का सबसे प्रचलित नाम है। यह ईश्वर की अद्भुत महिमा और उनके ज्ञानदाता स्वरूप को एक साथ दर्शाता है।

निरंकार का स्वरूप

सिख चिंतन में ईश्वर को 'निरंकार' कहा गया है, जिसका अर्थ है निराकार – बिना किसी रूप, रंग या आकार के। वह अकाल (कालातीत), निर्भय और सर्वव्यापी हैं, और किसी मूर्ति या चित्र में सीमित नहीं किए जा सकते।

ध्यान की विधि

वाहगुरु का ध्यान 'नाम सिमरन' के रूप में किया जाता है, जिसमें मन से वाहगुरु मंत्र का जप किया जाता है। यह ध्यान बाहरी साधनों या मूर्तियों के बिना, केवल आंतरिक एकाग्रता और प्रेम से किया जाता है।

गुरु कृपा का महत्व

सिख मत में ईश्वर को केवल अपने प्रयासों से नहीं, बल्कि गुरु की कृपा से ही पाया जा सकता है। गुरु ही सच्चा मार्गदर्शक है जो जीव को परमात्मा के साथ जोड़ता है।

सर्वव्यापकता का बोध

वाहगुरु हर जीव के भीतर विद्यमान हैं, लेकिन अज्ञानता के कारण वे दिखाई नहीं देते। गुरु की कृपा और प्रेम से यह बोध होता है कि ईश्वर हर जगह और हर कण में मौजूद है।

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