शब्द गुरु
सुरति और शब्द का पावन मिलन
सिख परंपरा में गुरु केवल देह नहीं बल्कि 'शब्द' है। जब सुरति शब्द से मिलती है, तब पूर्ण जागृति होती है।
बाणी गुरु गुरु है बाणी — बाणी का ध्यान करने से ही गुरु की उपस्थिति का अनुभव होता है।
क्या आप जानते हैं?
मूल स्रोत
यह वाक्य "बाणी गुरु गुरु है बाणी" गुरु रामदास जी की बाणी से लिया गया है, जो गुरु ग्रंथ साहिब के अंग ९८२ पर अंकित है। यह सिख धर्म के मूल सिद्धांत को स्थापित करता है कि गुरु का स्वरूप शब्द या बाणी में ही निवास करता है, न कि किसी व्यक्ति विशेष में।
शब्द गुरु की अवधारणा
सिख परंपरा में गुरु कोई मानव शरीर नहीं, बल्कि दिव्य शब्द (ध्वनि) है। जब सुरति (चेतना) इस शब्द से एकाकार हो जाती है, तब आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही 'गुरुमुख' होने का अर्थ है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गुरु गोबिंद सिंह जी ने १७०८ में गुरु परंपरा को समाप्त करते हुए गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु घोषित किया। इसके बाद से सिखों के लिए गुरु का अर्थ केवल शब्द और बाणी ही रह गया, जिसका ध्यान और पाठ ही सच्ची गुरु-भक्ति है।
सुरति और शब्द का मिलन
'सुरति' का अर्थ है चेतना का शब्द में लीन होना। यह ध्यान की वह अवस्था है जिसमें मन की सारी वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं और केवल शब्द की अनुभूति रह जाती है। इसे 'नाम सिमरन' या 'शबद कीर्तन' के अभ्यास से प्राप्त किया जाता है।
व्यावहारिक महत्व
सिख धर्म में गुरु की उपस्थिति का अनुभव बाणी के पाठ और ध्यान से ही होता है। इसलिए गुरुद्वारे में कीर्तन और पाठ को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। यह सिखाता है कि गुरु से जुड़ने का एकमात्र मार्ग शब्द का मनन और आत्मसात करना है।
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