जैन धर्म
पावन वर्ग एवं सम्पूर्ण संग्रह
| पावन वर्ग एवं संख्या | आध्यात्मिक उद्देश्य एवं भावार्थ | प्रमुख प्रतिनिधि पाठ | संग्रह देखें |
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आज के पावन पाठ दैनिक सामायिक व स्तवन पूजित देव: पंच परमेष्ठी एवं तीर्थंकर शुक्ल पक्ष अष्टमी | समता भाव, अहिंसा, कर्म-निर्जरा एवं पंच परमेष्ठी के पावन वंदन हेतु दैनिक स्तवन। | आज का प्रमुख पाठ णमोकार महामंत्रणमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं समता भाव, अहिंसा, कर्म-निर्जरा एवं पंच परमेष्ठी के पावन वंदन हेतु दैनिक स्तवन। | आज के 6 पाठ → |
महामंत्र (पंच परमेष्ठी की पावन वंदना)5 पावन रचनाएं | जैन धर्म का परम पावन मंत्र जो किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु के विशुद्ध गुणों को नमन करता है। | ⭐जैन धर्म का सर्वोपरि महामंत्र णमोकार महामंत्रणमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं समस्त पापों का नाश करने वाला और सभी मंगलों में प्रथम मंगल माना जाने वाला अनादि-निधन महामंत्र। | सभी देखें |
स्तवन एवं स्तोत्र (तीर्थंकरों की स्तुति)9 पावन रचनाएं | राग-द्वेष को जीतकर केवलज्ञान प्राप्त करने वाले २४ तीर्थंकरों के प्रति समर्पित भावपूर्ण काव्य एवं स्तुतियां। | ⭐जैन स्तुति साहित्य का शिरोमणि भक्तामर स्तोत्रभक्तामर प्रणत मौलि मणिप्रभाणां आचार्य मानतुंग द्वारा प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की भक्ति में रचित वह अनुपम स्तोत्र, जो समस्त भयों से मुक्ति दिलाता है। | सभी देखें |
सूत्र (प्रतिक्रमण एवं आत्म-शोधन)1 पावन रचनाएं | दैनिक प्रतिक्रमण और आत्म-निरीक्षण के पावन सूत्र, जो समस्त जीवों से क्षमा याचना (मिच्छामि दुक्कडम्) की भावना सुदृढ़ करते हैं। | ⭐चौबीस तीर्थंकर वंदना लोगस्स सूत्र (चउवीसत्यूण)लोगस्स उज्जोअगरे संसार में धर्म का प्रकाश फैलाने वाले २४ तीर्थंकरों का स्मरण कर आत्म-शुद्धि और आरोग्य की मंगल भावना। | सभी देखें |
आरती एवं चालीसा (दीप आराधना)7 पावन रचनाएं | जिनमंदिरों में पूजन के उपरांत भगवान महावीर और तीर्थंकरों के चरणों में दीप प्रज्ज्वलित कर गाई जाने वाली मंगल आरतियां। | ⭐भगवान महावीर की आरती श्री महावीर आरती (ॐ जय महावीर प्रभु)ॐ जय महावीर प्रभो अहिंसा और करुणा के साक्षात अवतार २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की पावन आरती। | सभी देखें |
जैन कथाएं (तीर्थंकर चरित्र एवं श्रावक गाथाएं)44 पावन रचनाएं | चौबीस तीर्थंकरों के दिव्य जीवन चरित्र, दीक्षा, केवलज्ञान और निष्ठावान श्रावक-श्राविकाओं की अमर गाथाएं जो त्याग और करुणा का मार्ग प्रशस्त करती हैं। | ⭐प्रथम तीर्थंकर (आदिनाथ) भगवान ऋषभदेव: प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ का जीवन चरित्रश्री ऋषभदेव भगवान चरित्र मानव सभ्यता, असि-मसि-कृषि के प्रणेता तथा मोक्ष मार्ग के प्रथम उद्गाता भगवान आदिनाथ ऋषभदेव की पावन जीवन गाथा। | सभी देखें |
पावन जैन तीर्थ (सिद्धक्षेत्र एवं कल्याणक भूमियां)10 पावन रचनाएं | सम्मेद शिखरजी, शत्रुंजय, गिरनार और पावापुरी जैसे वे परम पावन सिद्धक्षेत्र जहाँ से तीर्थंकरों एवं मुनिराजों ने शाश्वत मोक्ष प्राप्त किया। | ⭐पंच महातीर्थ जैन धर्म के पाँच पावन तीर्थ: मोक्ष और अहिंसा के महाशिखरसम्मेद शिखर, शत्रुंजय, गिरनार, चंपापुरी, पावापुरी तीर्थंकरों की तपोभूमि और निर्वाण स्थली के दर्शन, यात्रा का आध्यात्मिक महत्व और वंदना का शास्त्रोक्त विधान। | सभी देखें |
जैन संस्कार एवं पर्व (अहिंसा, व्रत एवं पर्यूषण)6 पावन रचनाएं | जैन धर्म के व्यावहारिक आचार: अहिंसा महाव्रत, पर्यूषण महापर्व की साधना, तप और समस्त चराचर जीवों से 'मिच्छामि दुक्कडम्' की पावन क्षमायाचना। | ⭐पर्वधिराज पर्यूषण पर्यूषण पर्व: आत्म-शुद्धि, तप और मिच्छामि दुक्कडम् क्षमायाचनाखामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे आत्मा के दस उत्तम धर्मों का चिंतन, संवत्सरी प्रतिक्रमण और बैर-विरोध त्याग कर मैत्री भाव स्थापित करने का पावन पर्व। | सभी देखें |
जैन दर्शन के कालजयी सिद्धांत: सत्य के बहुआयामी स्वरूप का दर्शन (अनेकांतवाद), स्याद्वाद, जीव-अजीव तत्त्व और कर्म-बंधन से मोक्ष की वैज्ञानिक प्रक्रिया। | ⭐सापेक्षता और सत्य का समन्वय अनेकांतवाद: बहुआयामी सत्य, बौद्धिक सहिष्णुता और समन्वय का दर्शनअनेकान्तवाद एवं स्याद्वाद सत्य के अनंत धर्मों को स्वीकार कर हठवादिता को मिटाने और विश्व में वैचारिक शांति स्थापित करने वाला जैन दर्शन का अनुपम सिद्धांत। | सभी देखें | |
जिनालय में जिनेंद्र देव की आराधना का शास्त्रोक्त क्रम: स्नात्र पूजा, अष्टप्रकारी पूजा (जल, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, फल) और आरती विधान। | ⭐पावन स्नात्र महोत्सव स्नात्र पूजा: तीर्थंकर जन्माभिषेक की पावन विधि और माहात्म्यअथ श्री स्नात्र पूजा विधान मेरु पर्वत पर देवराज इंद्र द्वारा किए गए तीर्थंकर के जन्माभिषेक का स्मरण और जिन-भक्ति से आत्म-शुद्धि का अनुपम अनुष्ठान। | सभी देखें |
दैनिक सामायिक व स्तवन
पूजित देव: पंच परमेष्ठी एवं तीर्थंकर · शुक्ल पक्ष अष्टमी
समता भाव, अहिंसा, कर्म-निर्जरा एवं पंच परमेष्ठी के पावन वंदन हेतु दैनिक स्तवन।
समता भाव, अहिंसा, कर्म-निर्जरा एवं पंच परमेष्ठी के पावन वंदन हेतु दैनिक स्तवन।
जैन धर्म का परम पावन मंत्र जो किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु के विशुद्ध गुणों को नमन करता है।
समस्त पापों का नाश करने वाला और सभी मंगलों में प्रथम मंगल माना जाने वाला अनादि-निधन महामंत्र।
राग-द्वेष को जीतकर केवलज्ञान प्राप्त करने वाले २४ तीर्थंकरों के प्रति समर्पित भावपूर्ण काव्य एवं स्तुतियां।
आचार्य मानतुंग द्वारा प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की भक्ति में रचित वह अनुपम स्तोत्र, जो समस्त भयों से मुक्ति दिलाता है।
दैनिक प्रतिक्रमण और आत्म-निरीक्षण के पावन सूत्र, जो समस्त जीवों से क्षमा याचना (मिच्छामि दुक्कडम्) की भावना सुदृढ़ करते हैं।
संसार में धर्म का प्रकाश फैलाने वाले २४ तीर्थंकरों का स्मरण कर आत्म-शुद्धि और आरोग्य की मंगल भावना।
जिनमंदिरों में पूजन के उपरांत भगवान महावीर और तीर्थंकरों के चरणों में दीप प्रज्ज्वलित कर गाई जाने वाली मंगल आरतियां।
अहिंसा और करुणा के साक्षात अवतार २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की पावन आरती।
चौबीस तीर्थंकरों के दिव्य जीवन चरित्र, दीक्षा, केवलज्ञान और निष्ठावान श्रावक-श्राविकाओं की अमर गाथाएं जो त्याग और करुणा का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
मानव सभ्यता, असि-मसि-कृषि के प्रणेता तथा मोक्ष मार्ग के प्रथम उद्गाता भगवान आदिनाथ ऋषभदेव की पावन जीवन गाथा।
सम्मेद शिखरजी, शत्रुंजय, गिरनार और पावापुरी जैसे वे परम पावन सिद्धक्षेत्र जहाँ से तीर्थंकरों एवं मुनिराजों ने शाश्वत मोक्ष प्राप्त किया।
तीर्थंकरों की तपोभूमि और निर्वाण स्थली के दर्शन, यात्रा का आध्यात्मिक महत्व और वंदना का शास्त्रोक्त विधान।
जैन धर्म के व्यावहारिक आचार: अहिंसा महाव्रत, पर्यूषण महापर्व की साधना, तप और समस्त चराचर जीवों से 'मिच्छामि दुक्कडम्' की पावन क्षमायाचना।
आत्मा के दस उत्तम धर्मों का चिंतन, संवत्सरी प्रतिक्रमण और बैर-विरोध त्याग कर मैत्री भाव स्थापित करने का पावन पर्व।
जैन दर्शन के कालजयी सिद्धांत: सत्य के बहुआयामी स्वरूप का दर्शन (अनेकांतवाद), स्याद्वाद, जीव-अजीव तत्त्व और कर्म-बंधन से मोक्ष की वैज्ञानिक प्रक्रिया।
सत्य के अनंत धर्मों को स्वीकार कर हठवादिता को मिटाने और विश्व में वैचारिक शांति स्थापित करने वाला जैन दर्शन का अनुपम सिद्धांत।
जिनालय में जिनेंद्र देव की आराधना का शास्त्रोक्त क्रम: स्नात्र पूजा, अष्टप्रकारी पूजा (जल, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, फल) और आरती विधान।
मेरु पर्वत पर देवराज इंद्र द्वारा किए गए तीर्थंकर के जन्माभिषेक का स्मरण और जिन-भक्ति से आत्म-शुद्धि का अनुपम अनुष्ठान।
