भक्तामर स्तोत्र
यह एक प्रसिद्ध जैन स्तोत्र है जो भगवान आदिनाथ (पहले तीर्थंकर) की स्तुति में रचा गया है। इसमें 48 श्लोक हैं जो भक्ति, शरणागति और प्रभु के गुणों का वर्णन करते हैं।
श्लोक
हे प्रभो! आपके चरणों को नमस्कार करता हूँ, जो भक्तों और देवों के मुकुटों के मणियों की प्रभा से प्रकाशित हैं, पापरूपी अंधकार के समूह को नष्ट करने वाले हैं, और संसार-सागर में गिरने वाले प्राणियों के लिए आदि काल से ही आश्रय हैं।
श्लोक 1
जिन्हें समस्त वाणी और तत्त्वों के ज्ञान से उत्पन्न बुद्धि से कुशल देवराजों ने तीनों लोकों के मन को हरने वाले स्तोत्रों द्वारा स्तुति की है, उस प्रथम जिनेन्द्र की मैं भी स्तुति करूँगा।
श्लोक 2
हे देवों द्वारा पूजित चरणपीठ वाले प्रभो! बुद्धि के बिना भी, मैं लज्जा रहित होकर आपकी स्तुति करने का उद्यत हूँ। जल में स्थित चन्द्रबिम्ब को छोड़कर, उसे पकड़ने की इच्छा दूसरा कौन करेगा?
श्लोक 3
हे गुणों के समुद्र! चन्द्रमा के समान शीतल गुणों को कहने में, बुद्धि से देवगुरु के समान भी कोई समर्थ नहीं है। क्या कोई प्रलयकाल की वायु से उद्धत मगरों के समूह वाले समुद्र को भुजाओं से पार कर सकता है?
श्लोक 4
हे मुनियों के स्वामी! फिर भी मैं आपकी भक्ति के वशीभूत होकर, शक्तिहीन होते हुए भी स्तवन करने को प्रवृत्त हूँ। क्या मृग, प्रीति से अपने बल पर विचार किए बिना, अपने बच्चे की रक्षा के लिए सिंह के पास नहीं जाता?
श्लोक 5
हे प्रभो! अल्प श्रुत होने पर भी, जो विद्वानों के उपहास का पात्र है, मुझे आपकी भक्ति ही बलपूर्वक मुखर करती है। जैसे कोकिल मधुमास में मधुर बोलता है, उसका एकमात्र कारण आम की सुन्दर कलियों का समूह है।
श्लोक 6
हे प्रभो! आपके स्तवन से शरीर धारण करने वालों का, संसार-संतति में बँधा हुआ पाप क्षण भर में नष्ट हो जाता है, जैसे सूर्य की किरणों से फैला हुआ रात्रि का अंधकार तुरंत नष्ट हो जाता है।
श्लोक 7
हे नाथ! यह जानकर, मैंने आपका यह स्तवन आरम्भ किया है, यद्यपि मैं अल्पबुद्धि हूँ, फिर भी आपके प्रभाव से यह सत्पुरुषों के चित्त को हर लेगा, जैसे कमल के पत्तों पर पड़ा हुआ जल-बिन्दु मोती की सी चमक प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 8
हे प्रभो! आपका स्तवन तो समस्त दोषों को नष्ट करने वाला है ही, आपकी कथा भी संसार के पापों का नाश करती है। दूर स्थित सूर्य अपनी प्रभा से ही कमलों के समूहों में कमलों को विकसित करता है।
श्लोक 9
हे भूतनाथ! हे भुवनभूषण! आपके गुणों से भूमण्डल पर आपकी स्तुति करने वाले आपके समान हो जाते हैं, इसमें आश्चर्य नहीं है। क्योंकि जो अपने आश्रित को अपने समान नहीं करता, वह क्या करेगा?
श्लोक 10
हे प्रभो! आपको, जो अनिमेष दृष्टि से देखने योग्य हैं, देखकर जनता का नेत्र कहीं और तुष्ट नहीं होता। जैसे चन्द्रमा की किरणों के समान दुग्ध-समुद्र का जल पीकर, कोई खारे समुद्र का जल पीना क्यों चाहेगा?
श्लोक 11
हे तीनों लोकों के एकमात्र आभूषण! जिन शान्त राग-रुचि वाले परमाणुओं से आपका यह रूप निर्मित हुआ है, वे ही परमाणु पृथ्वी पर हैं, क्योंकि आपके समान दूसरा कोई रूप नहीं है।
श्लोक 12
हे प्रभो! आपका मुख, जो देवों, मनुष्यों और नागों के नेत्रों को हरने वाला है और तीनों लोकों की उपमाओं को निर्जित करने वाला है, और कलंक से मलिन चन्द्रमा का बिम्ब, जो दिन में पीले पत्ते के समान हो जाता है, इनमें कहाँ तुलना?
श्लोक 13
हे तीनों लोकों के स्वामी! आपके सम्पूर्ण मण्डल वाले चन्द्रमा की कलाओं के समान शुभ्र गुण तीनों लोकों में व्याप्त हैं। जो एकमात्र नाथ का आश्रय लेते हैं, उन्हें इच्छानुसार विचरने से कौन रोक सकता है?
श्लोक 14
हे प्रभो! इसमें आश्चर्य क्या है कि देवांगनाओं का मन भी आपके प्रति तनिक भी विकार-मार्ग को प्राप्त नहीं होता? क्या प्रलयकाल की वायु से हिले हुए मन्दराचल की चोटी कभी हिल सकती है?
श्लोक 15
हे नाथ! आप धूम्रहीन, बाती और तेल से रहित दीपक के समान इस तीनों लोकों को प्रकट करते हैं। हे जगत के प्रकाश! आप दूसरे दीपक हैं, जो चलित पर्वतों की वायु से भी कभी गम्य नहीं होते।
श्लोक 16
हे मुनीन्द्र! आप कभी अस्त नहीं होते, राहु के द्वारा ग्रहण नहीं किए जाते, एक साथ ही सब जगत को प्रकाशित करते हैं, और बादलों के गर्भ से आपका महाप्रभाव रुकता नहीं। संसार में आप सूर्य से भी अधिक महिमा वाले हैं।
श्लोक 17
हे प्रभो! आपका मुख-कमल, जो सदा उदय रहने वाला, मोहरूपी महान अंधकार को नष्ट करने वाला, राहु के मुख और बादलों के लिए अगम्य है, और अपूर्व चन्द्रबिम्ब के समान जगत को प्रकाशित करता हुआ शोभित होता है।
श्लोक 18
हे नाथ! जब आपके मुखरूपी चन्द्रमा ने अंधकार को नष्ट कर दिया है, तब रात्रि में चन्द्रमा और दिन में सूर्य का क्या प्रयोजन? जब धान के खेतों से युक्त संसार में अन्न उत्पन्न हो गया, तब जल के भार से नम्र बादलों का क्या कार्य?
श्लोक 19
हे प्रभो! जैसे आपमें ज्ञान प्रकट होता है, वैसे हरि, हर आदि नायकों में नहीं। जैसे मणियों में चमकता हुआ तेज महत्व को प्राप्त होता है, वैसे किरणों से युक्त काँच के टुकड़े में नहीं।
श्लोक 20
हे नाथ! मैं मानता हूँ कि हरि-हर आदि को देखना ही अच्छा है, क्योंकि उन्हें देखने पर हृदय आपमें ही तुष्ट होता है। आपको देखकर संसार में दूसरा कौन मन को हर सकता है, भवान्तर में भी?
श्लोक 21
हे प्रभो! स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं, पर कोई माता आपके समान पुत्र को जन्म नहीं देती। सब दिशाएँ सूर्य को धारण करती हैं, पर केवल पूर्व दिशा ही चमकती किरणों के समूह को जन्म देती है।
श्लोक 22
हे मुनीन्द्र! मुनि आपको परम पुरुष, सूर्य के समान वर्ण वाला, निर्मल और अंधकार से परे कहते हैं। आपको सम्यक् प्रकार से प्राप्त करके ही मृत्यु पर विजय पाते हैं। शिवपद का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
श्लोक 23
हे प्रभो! सन्त आपको अव्यय, विभु, अचिन्त्य, असंख्य, आदि, ब्रह्म, ईश्वर, अनन्त, अनंगकेतु, योगीश्वर, विदितयोग, अनेक और एक, ज्ञानस्वरूप और अमल कहते हैं।
श्लोक 24
हे विबुधों द्वारा पूजित! बुद्धि के बोध से आप ही बुद्ध हैं। तीनों लोकों का कल्याण करने के कारण आप शंकर हैं। हे धीर! शिवमार्ग की विधि के विधान से आप धाता हैं। हे भगवन! स्पष्ट रूप से आप ही पुरुषोत्तम हैं।
श्लोक 25
हे नाथ! तीनों लोकों की पीड़ा हरने वाले आपको नमस्कार। हे पृथ्वीतल के निर्मल भूषण! आपको नमस्कार। हे तीनों लोकों के परमेश्वर! आपको नमस्कार। हे जिन! संसार-सागर को सुखाने वाले आपको नमस्कार।
श्लोक 26
हे मुनीश! इसमें आश्चर्य क्या है कि आप समस्त गुणों से निरवकाश रूप से युक्त हैं? और दोष, जो विविध आश्रयों को प्राप्त कर गर्वित हुए हैं, आपने स्वप्न में भी कभी नहीं देखे।
श्लोक 27
हे प्रभो! अशोक वृक्ष के आश्रित आपका निर्मल रूप अत्यन्त शोभित होता है, जैसे बादलों के पार्श्व में स्थित सूर्य का बिम्ब, जिसकी स्पष्ट चमकती किरणें अंधकार के समूह को नष्ट करती हैं, शोभित होता है।
श्लोक 28
हे प्रभो! मणियों की किरणों से विचित्र सिंहासन पर आपका स्वर्ण के समान उज्ज्वल शरीर शोभित होता है, जैसे ऊँचे उदयाचल पर्वत के शिखर पर सूर्य का बिम्ब, जिसकी आकाश में चमकती किरणों की लताएँ फैली हुई हैं।
श्लोक 29
हे प्रभो! कुन्द के फूल के समान उज्ज्वल चलते हुए चँवरों से सुन्दर शोभा वाला, स्वर्ण के समान कान्ति वाला आपका शरीर शोभित होता है, जैसे उदय होते चन्द्रमा की पवित्र धारा वाले झरने के जल के साथ सुमेरु पर्वत का स्वर्णिम तट।
श्लोक 30
हे प्रभो! आपके तीन छत्र चन्द्रमा के समान कान्ति वाले, ऊँचे स्थित, सूर्य की किरणों के प्रताप को ढकने वाले, मोतियों के समूहों से बढ़ी हुई शोभा वाले, तीनों लोकों के परमेश्वरत्व का प्रकाश करते हुए शोभित होते हैं।
श्लोक 31
हे प्रभो! आपके यश का प्रचार करने वाला दुन्दुभि आकाश में गम्भीर तार स्वरों से दिशाओं के विभागों को भरता हुआ, तीनों लोकों के प्राणियों के शुभ संगम की भूति में दक्ष, सद्धर्मराज की जयघोषणा का घोषक होकर बजता है।
श्लोक 32
हे प्रभो! मन्दार, सुन्दर नमेरु, सुपारिजात, सन्तानक आदि पुष्पों की वर्षा से रुकी हुई, गन्धोदक बिन्दुओं और शुभ मन्द मारुत के प्रपात से युक्त, दिव्य वाणियों की श्रेणी आपके लिए स्वर्ग से गिरती है।
श्लोक 33
हे प्रभो! आपकी शोभायमान प्रभा के विस्तार की विशाल कान्ति तीनों लोकों में चमकने वालों की द्युति का अपहरण करती है। वह उदय होते सूर्य की निरन्तर विशाल संख्या वाली दीप्ति से भी, और चन्द्रमा की सौम्य रात्रि में भी विजय प्राप्त करती है।
श्लोक 34
हे प्रभो! स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग की खोज में इष्ट, तीनों लोकों को सद्धर्म के तत्त्वों के कथन में एकमात्र कुशल, आपकी दिव्यध्वनि, विशद अर्थ के सत्व, भाषा के स्वभाव और परिणाम के गुणों से प्रयुक्त होती है।
श्लोक 35
हे जिनेन्द्र! आपके चरण, जो विकसित स्वर्ण-कमलों के समूह के समान कान्ति वाले और चमकती नखों की किरणों से सुन्दर हैं, जहाँ पद रखते हैं, वहाँ देवता कमलों की कल्पना करते हैं।
श्लोक 36
हे जिनेन्द्र! धर्मोपदेश की विधि में आपकी विभूति जैसी है, वैसी दूसरे की नहीं है। जैसी सूर्य की प्रभा अंधकार को नष्ट करने वाली होती है, वैसी चमकने वाले ग्रहों के समूह की कहाँ?
श्लोक 37
हे प्रभो! मद से च्युत, आविल, चंचल कपोलमूल वाले, मतवाले भ्रमरों के नाद से बढ़े हुए क्रोध वाले, ऐरावत के समान हाथी को उद्धत होकर आते देख, आपके आश्रितों को भय नहीं होता।
श्लोक 38
हे प्रभो! टूटे हुए हाथी के कुम्भ से गिरे हुए उज्ज्वल रक्त से लथपथ, मोतियों के समूहों से भूमिभाग को भूषित करने वाले, क्रम से बँधा हुआ सिंह भी आपके क्रमयुग (चरणों) के आश्रित पर आक्रमण नहीं करता।
श्लोक 39
हे प्रभो! प्रलयकाल की वायु से उद्धत अग्नि के समान, ज्वलित, उज्ज्वल, उत्स्फुलिंग वाली, सम्पूर्ण विश्व को निगलने की इच्छा से सम्मुख आती हुई दावानल को, आपके नाम का कीर्तनरूपी जल पूरी तरह शान्त कर देता है।
श्लोक 40
हे प्रभो! लाल नेत्र वाले, मतवाले कोकिल के कण्ठ के समान नीले, क्रोध से उद्धत, फण उठाए हुए सर्प को, जिस पुरुष के हृदय में आपका नामरूपी नागदमनी है, वह निर्भय होकर अपने चरणों से दबा लेता है।
श्लोक 41
हे प्रभो! युद्ध में घोड़ों की चाल और हाथियों की गर्जना से भीषण नाद वाला, बलवान राजाओं का भी बल, उदय होते सूर्य की किरणों से विदीर्ण अंधकार के समान, आपके कीर्तन से शीघ्र नष्ट हो जाता है।
श्लोक 42
हे प्रभो! भाले की नोक से विदीर्ण हाथी के रक्त की धारा के वेग से उतरने में आतुर योद्धाओं से भीषण युद्ध में, दुर्जय जय-पक्ष को जीतने वाले, आपके चरण-कमल-वन के आश्रित विजय प्राप्त करते हैं।
श्लोक 43
हे प्रभो! क्षुब्ध भीषण मगरों के समूह, बड़ी मछलियों के पीठ से भयदायक और उग्र बाड़वाग्नि वाले समुद्र में, ऊँची-ऊँची तरंगों के शिखर पर स्थित यान-पात्र वाले, आपके स्मरण से भय को छोड़कर पार चले जाते हैं।
श्लोक 44
हे प्रभो! उत्पन्न हुए भीषण जलोदर के भार से टूटे हुए, शोच्य दशा को प्राप्त, च्युत जीवित आशा वाले मनुष्य, आपके चरण-कमल की रजरूपी अमृत से लिप्त शरीर वाले, मकरध्वज (कामदेव) के समान रूप वाले हो जाते हैं।
श्लोक 45
हे प्रभो! पैर से गले तक लोहे की साँकलों से वेष्टित अंग वाले, बड़ी-बड़ी बेड़ियों की कोटियों से घिसी हुई जंघा वाले मनुष्य, आपके नामरूपी मन्त्र का अनिश्चय स्मरण करते हुए, तुरंत ही बन्धन के भय से रहित हो जाते हैं।
श्लोक 46
हे प्रभो! मतवाले हाथी, सिंह, दावानल, सर्प, संग्राम, समुद्र और महोदर (जलोदर) से उत्पन्न भय, उस बुद्धिमान पुरुष का शीघ्र नाश हो जाता है, जो आपके इस स्तवन को पढ़ता है।
श्लोक 47
हे जिनेन्द्र! गुणों से बँधी हुई, भक्ति से मेरे द्वारा विविध वर्णों के विचित्र पुष्पों से युक्त इस स्तोत्रमाला को, जो मनुष्य कण्ठ में धारण करता है, उसे मानतुंग (उच्च) लक्ष्मी स्वयं आकर प्राप्त होती है।
श्लोक 48
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र आचार्य मानतुंग द्वारा रचित माना जाता है और जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर दोनों परंपराओं में अत्यंत पूजनीय है। इसे प्रातःकाल या ध्यान के समय पढ़ने की परंपरा है, और ऐसा माना जाता है कि इसके पाठ से भय, रोग और बाधाएँ दूर होती हैं। यह स्तोत्र अपनी सरल भाषा और गहन भक्ति भावना के लिए जाना जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Acharya Manatunga · जैन आचार्य · परंपरागत रूप से 6वीं–7वीं शताब्दी ईस्वी
एक जैन मुनि, जिन्हें प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ की स्तुति में 48 श्लोकों वाले भक्तामर स्तोत्र की रचना का श्रेय दिया जाता है। परंपरा के अनुसार, उन्होंने इसे बंदी अवस्था में रचा, जहाँ प्रत्येक पूर्ण होते श्लोक के साथ चमत्कारिक रूप से उनकी एक बेड़ी टूट जाती थी — यह एक भक्ति-गाथा है, ऐतिहासिक रूप से सिद्ध घटना नहीं, परंतु आज इस स्तोत्र के प्रति श्रद्धा के केंद्र में यही कथा है।
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रचनाकार
यह स्तोत्र आचार्य मानतुंग द्वारा रचित है। 'भक्तामर' शब्द का अर्थ है 'भक्तों के राजा' या 'भक्तों द्वारा पूजित', जो भगवान आदिनाथ (प्रथम तीर्थंकर) की ओर संकेत करता है।
प्रसिद्धि और प्रभाव
भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म के सबसे लोकप्रिय स्तोत्रों में से एक है। माना जाता है कि इसे पढ़ने से भय, रोग और कष्ट दूर होते हैं तथा भक्त को सुरक्षा और समृद्धि प्राप्त होती है।
रचना की कथा
परंपरा के अनुसार, आचार्य मानतुंग को एक राजा ने जंजीरों में बंधवाकर कारागार में डाल दिया था। वहाँ उन्होंने भगवान आदिनाथ की स्तुति में यह स्तोत्र रचा। प्रत्येक श्लोक के पाठ के साथ उनकी एक जंजीर स्वतः टूट गई, और अंतिम श्लोक तक वे पूर्णतः मुक्त हो गए।
भाषा और शैली
यह स्तोत्र संस्कृत में रचित है और इसमें 48 श्लोक हैं। प्रत्येक श्लोक में भगवान आदिनाथ के गुणों, रूप, ज्ञान और शक्ति का अद्भुत वर्णन है। कवि ने अपनी विनम्रता और भक्ति को भी इस स्तोत्र में व्यक्त किया है।
संरक्षण का वचन
अंतिम श्लोक (48वें) में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस स्तोत्र को गले में धारण करता है या नियमित रूप से पढ़ता है, उसे देवी लक्ष्मी स्वयं आकर वरदान देती हैं। यह स्तोत्र सभी प्रकार के भय और बाधाओं से रक्षा करने वाला माना जाता है।
सार्वभौमिक अपील
भक्तामर स्तोत्र न केवल जैन समुदाय में, बल्कि अन्य धर्मों के लोगों में भी श्रद्धा और भक्ति का केंद्र है। इसकी काव्यात्मक सुंदरता और गहरा आध्यात्मिक संदेश इसे सभी संतों और भक्तों के लिए प्रिय बनाता है।
Rishabhanatha
जैन धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
