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जैन धर्म

स्तवन

तीर्थंकरों और चौबीस जिनों की स्तुति में रचित प्रामाणिक जैन स्तवन — मूल पाठ, उच्चारण और अर्थ सहित 28 भाषाओं में।

व्युत्पत्ति एवं आध्यात्मिक अर्थ
स्तवन (स्तुति, गुण-कीर्तन)प्राकृत, संस्कृत एवं प्राचीन गुजराती

तीर्थंकरों की वीतरागता का वंदन-गीत — २४ तीर्थंकरों के वीतराग (राग-द्वेष से परे) स्वरूप की वंदना। यह किसी सांसारिक वरदान की याचना के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर अहिंसा, संयम और केवलज्ञान जाग्रत करने हेतु गाया जाता है।

छंद एवं शास्त्रीय संरचना
पारंपरिक ढाल, छंद एवं पद

तीर्थंकरों के त्याग, कषाय-मुक्ति (क्रोध, मान, माया, लोभ का नाश) और आगमों के सत्य का गुणगान।

वैश्विक साहित्यिक तुलना
स्टोइक दर्शन का आदर्श-ऋषि वंदन

विजेता वीतराग की वंदना

प्राचीन स्टोइक (Stoic) दार्शनिकों के उस स्तुति-काव्य के समान, जो सांसारिक इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर चुके पूर्ण शांत और निष्काम महापुरुष की वंदना करता है।

साधना एवं व्यावहारिक पाठ:जैन उपाश्रयों और घरों में प्रतिक्रमण, पर्युषण महापर्व और नित्य नवकार आराधना के समय कर्म-निर्जरा हेतु।

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