उवसग्गहरं स्तोत्र (पार्श्वनाथ विघ्नहर्ता स्तोत्र)
यह जैन धर्म का एक प्रार्थना-स्तोत्र है, जिसे भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति में गाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य जीवन की बाधाओं (उवसग्ग) को दूर करने और आध्यात्मिक शांति पाने की प्रार्थना करना है।
श्लोक
मैं उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ की वंदना करता हूँ, जो सर्वश्रेष्ठ अर्हंत हैं। उन्हें नमस्कार करके वे सब पापकर्मों का नाश करते हैं।
श्लोक 1
प्रशंसापूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 2
श्रद्धापूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 3
सुधर्मपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 4
पुण्यपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 5
वीरतापूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 6
सम्यक्पूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 7
चारित्रपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 8
तपपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 9
संयमपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 10
समाधिपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 11
शुद्ध हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 12
मुक्त हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 13
वीर हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 14
जिन हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 15
ज्ञानपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 16
दर्शनपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 17
चारित्रपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 18
तपपूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 19
वीर हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, वे सिद्धि को प्राप्त हुए, सुखी हुए, और सिद्धों के साथ मोक्ष का लाभ पाया।
श्लोक 20
श्रद्धापूर्ण हृदय से उपसर्गहर भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार करके, आप मेरे सब पापकर्मों का नाश कीजिए।
श्लोक 21
ॐ ह्रीं, भगवान पार्श्वनाथ को नमस्कार। ॐ ह्रीं, उपसर्गहर (विघ्ननाशक) को नमस्कार। ॐ ह्रीं, भद्रबाहु स्वामी को नमस्कार।
श्लोक 22
इस प्रकार उपसर्गहर स्तोत्र समाप्त हुआ।
श्लोक 23
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र जैन परंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है और प्रायः संकट या कठिनाई के समय पढ़ा जाता है। 'उवसग्गहरं' का अर्थ 'बाधाओं को हरने वाला' है, और यह भगवान पार्श्वनाथ को संबोधित है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भक्त की सभी मुश्किलें दूर होती हैं। इसके रचयिता के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह प्राचीन जैन ग्रंथों का हिस्सा है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Acharya Bhadrabahu
क्या आप जानते हैं?
रचयिता और भाषा
यह स्तोत्र जैन धर्म के प्रसिद्ध आचार्य भद्रबाहु स्वामी द्वारा रचित है। इसे प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में लिखा गया है, जो प्राचीन जैन ग्रंथों की मुख्य भाषा है, और सरल होने के कारण आम जनता द्वारा समझी जा सकती थी।
नाम का अर्थ
'उवसग्गहरं' का अर्थ है 'उपसर्गों (बाधाओं) को हरने वाला' और 'पासं' भगवान पार्श्वनाथ (जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर) को संबोधित करता है। इस प्रकार यह स्तोत्र उन सभी प्रकार के कष्टों, रोगों और विपत्तियों को दूर करने के लिए प्रसिद्ध है।
स्तोत्र की संरचना
इसमें कुल 21 श्लोक (पद्य) हैं, जिनमें से अधिकांश में एक ही ढाँचा दोहराया जाता है – 'उवसग्गहरं पासं' से शुरू होकर भिन्न-भिन्न गुणों (जैसे श्रद्धा, पुण्य, ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप आदि) के साथ हृदय से नमन करने का वर्णन है। यह पुनरावृत्ति ध्यान और भक्ति को गहरा करने में सहायक है।
दैनिक जीवन में महत्व
यह स्तोत्र जैन समुदाय में अत्यंत लोकप्रिय है, विशेषकर सुबह-शाम या किसी कार्य आरंभ करने से पहले पढ़ा जाता है। माना जाता है कि इसके नियमित पाठ से मानसिक शांति, आत्मविश्वास और सभी बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
मंत्र और समाप्ति
अंत में तीन मंत्र दिए गए हैं – 'ॐ ह्रीं पार्श्वनाथाय नमः', 'ॐ ह्रीं उवसग्गहराय नमः', और 'ॐ ह्रीं भद्रबाहुस्वामिने नमः'। यह स्पष्ट करता है कि भक्त सीधे भगवान पार्श्वनाथ, उनके उपसर्गहारी स्वरूप और स्तोत्र के रचयिता भद्रबाहु स्वामी की शरण में जाता है।
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