यह एक जैन प्रार्थना है जो दो महान तीर्थंकरों—अजितनाथ और शांतिनाथ—की वंदना करती है। इसमें भक्त उनसे संसार रूपी समुद्र को पार करने की प्रार्थना करता है।
यह एक जैन भक्ति स्तोत्र है जिसमें चौबीस तीर्थंकरों (जैन धर्म के 24 पूर्ण ज्ञानी गुरुओं) की प्रार्थना की गई है। इसका उद्देश्य उनका आशीर्वाद पाकर मोक्ष, स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त करना है।
यह एक जैन भक्ति स्तोत्र है जो 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति करता है। इसमें वर्णन है कि कैसे उनकी दिव्य शक्ति ने एक भयानक राक्षस को पराजित किया, और ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का जाप भय को दूर करता है, दुखों से रक्षा करता है और अच्छे पुनर्जन्म की ओर ले जाता है।
यह जैन धर्म का एक प्रार्थना-स्तोत्र है, जिसे भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति में गाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य जीवन की बाधाओं (उवसग्ग) को दूर करने और आध्यात्मिक शांति पाने की प्रार्थना करना है।
जैन सामायिक की प्रतिज्ञा: साधक मन, वचन और काया से पापयुक्त प्रवृत्ति का त्याग कर निश्चित समय तक समभाव में रहने का संकल्प लेता है।
यह जैन धर्म का सबसे पवित्र और प्रमुख मंत्र है, जिसमें पाँच सर्वोच्च आत्माओं — अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु — को नमन किया जाता है।
गुरु और उपाध्याय को नमन करने वाला संक्षिप्त प्राकृत स्तोत्र, जो इन्द्रिय-संयम, जीवों की रक्षा और दशलक्षण धर्म में निष्ठा की स्तुति करता है।
तस्स उत्तरी सूत्र, जो सामायिक और प्रतिक्रमण में इरियावहिया के बाद पढ़ा जाता है, दोषों की शुद्धि और शल्य-निवारण के लिए कायोत्सर्ग के संकल्प का सूत्र है।
जैन साधुओं की दैनिक प्रार्थना जिसमें वे पृथ्वी, जल, बीज, पत्तों, कीड़े-मकोड़ों और अन्य एक-इंद्रिय से लेकर पाँच-इंद्रिय जीवों को चलते-फिरते अनजाने में हुई हिंसा के लिए क्षमा माँगते हैं।