जैन धर्म की क्षमा और अहिंसा की प्रतिज्ञा की प्रार्थना
जैन सामायिक की प्रतिज्ञा: साधक मन, वचन और काया से पापयुक्त प्रवृत्ति का त्याग कर निश्चित समय तक समभाव में रहने का संकल्प लेता है।
श्लोक
हे भगवन्! मैं सामायिक (समता का भाव) धारण करता हूँ, सभी पापमय क्रियाओं का त्याग करता हूँ। जब तक नियमों का पालन करूँ, मन, वचन और काया से तीन प्रकार से न तो स्वयं पाप करता हूँ, न दूसरों से करवाता हूँ। उसके लिए, हे भगवन्! मैं प्रतिक्रमण (पश्चाताप) करता हूँ, निंदा करता हूँ, गर्हणा करता हूँ, और अपने अहंकार का त्याग करता हूँ।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
करेमि भंते सामायिक की प्रतिज्ञा है, जो जैन परंपरा के आवश्यक सूत्र में बताए छह दैनिक आवश्यकों में पहला (आवश्यक क्रमांक 1) है। श्वेतांबर जैन इसे सामायिक में बैठने से पहले, जिसमें 48 मिनट तक समभाव का अभ्यास किया जाता है, और प्रतिक्रमण की विधि के भीतर भी पढ़ते हैं, चाहे प्रातः हो, संध्या हो या आठ दिवसीय पर्युषण पर्व। साधक मन, वचन और काया से पापयुक्त प्रवृत्ति (सावज्जं जोगं) का त्याग करता है, उसे न करता है न कराता है, और फिर पूर्व दोषों की निंदा व गर्हा करके उन्हें छोड़ता है। पाठ अर्धमागधी में है, जो जैन आगमों की एक प्राचीन प्राकृत भाषा है।
क्या आप जानते हैं?
भाषा
यह प्रार्थना प्राकृत भाषा में है, जो पालि के समान एक प्राचीन भारतीय भाषा है और जैन धर्म के मूल ग्रंथों में प्रयुक्त होती है।
अर्थ
यह जैन समभाव (सामायिक) की प्रतिज्ञा है, जिसमें साधक मन, वचन और काया से पापयुक्त प्रवृत्ति का त्याग करता है, फिर पूर्व दोषों से पीछे हटता (प्रतिक्रमण), उनकी निंदा करता और उन्हें छोड़ता है।
संरचना
पाठ में 'दुविहं, ति-विहेणं' का अर्थ है दो प्रकार से (न करना, न कराना) और तीन प्रकार से (मन, वचन, काया) पाप का त्याग।
उपयोग
यह पाठ सामायिक में बैठने से पहले उच्चारित किया जाता है और प्रतिक्रमण की विधि में भी आता है। सामायिक आवश्यक सूत्र के छह आवश्यकों में पहला है।
महत्व
'अप्पाणं वोसिरामि' का अर्थ है 'मैं अपने आपको (पापों से) मुक्त करता हूं' — यह आत्म-निरीक्षण और क्षमा याचना की गहरी भावना को दर्शाता है।
Mahavira
जैन धर्म से और
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