श्री महावीर चालीसा
यह चालीसा भगवान महावीर के जीवन, गुणों और उपदेशों का एक भक्तिपूर्ण गुणगान है, जिसे प्रतिदिन पढ़ने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
श्लोक
मंगलाचरण (दोहा)
चालीसा के पाठ से पूर्व गुरु चरणों की वन्दना एवं मंगलाचरण दोहा।
शीश झुकाकर अरिहंत को नमन करता हूँ, सिद्धों को प्रणाम करता हूँ। उपाध्याय और आचार्य का सुख देने वाला नाम लेता हूँ। सभी साधु, सरस्वती और जिनमंदिर सुखकारी हैं। महावीर भगवान को मन के मंदिर में धारण करता हूँ।
श्लोक दोहा
चालीसा (४० चौपाई)
प्रभु की अपार महिमा, बल, पराक्रम एवं कृपा का गुणगान करती पावन ४० चौपाइयाँ।
जय हो महावीर, दया के सागर! जय हो जिनेंद्र, गुणों के भंडार!
श्लोक 1
तुम कुंडलपुर के राजदुलारे हो, माता त्रिशला और पिता सिद्धार्थ के प्यारे बेटे हो।
श्लोक 2
प्रभु, तुम अत्यंत पुण्यवान हो, तीनों लोकों के स्वामी हो।
श्लोक 3
जब प्रभु तुम गर्भ में आए, तब छप्पन कोटि देवता हर्षित हुए।
श्लोक 4
धनपति ने धन की वर्षा की और सारे जगत में आनंद रस भिगो दिया।
श्लोक 5
चैत्र शुक्ल तेरस सुखकारी दिन, उस दिन जन्मे संसार को तारने वाले अवतारी।
श्लोक 6
सब इंद्र देव मिलकर आए और सुमेरु पर्वत पर तुम्हें स्नान कराया।
श्लोक 7
बालरूप में तुम अत्यंत सुंदर शोभित होते हो, देव, मनुष्य, मुनि तुम्हें देखकर ललचाते हैं।
श्लोक 8
संगम ने तुम्हारी परीक्षा ली, सर्प रूप धारण कर लीला की।
श्लोक 9
बालपन में प्रभु तुम जरा (नाग) से नहीं डरे, देवों ने तुम्हारा नाम 'महावीर' रखा।
श्लोक 10
तीस वर्ष तक गृहस्थाश्रम जानो, राजपाट को तृण के समान माना।
श्लोक 11
जब प्रभु ने तप का कल्याणक किया, तब अपने हाथों से केश लुंचन किया।
श्लोक 12
बारह वर्ष घोर तप किया, और सब उपसर्गों को सहन किया।
श्लोक 13
चंडकौशिक विषधर सर्प ने फुंकार मारी, पर तुमने अमृत दृष्टि से उसे उबारा।
श्लोक 14
संगम देव ने अपार कष्ट दिए, पर धैर्यवान प्रभु ने धीर नहीं छोड़ा।
श्लोक 15
जब अत्यंत महान केवलज्ञान हुआ, तब समवसरण की रचना विस्तृत हुई।
श्लोक 16
बारह सभाओं के बीच प्रभु विराजमान हुए, और मुखारविंद से दिव्य ध्वनि प्रकट हुई।
श्लोक 17
'अहिंसा परमोधर्म' सिखाया, 'जीओ और जीने दो' का उपदेश दिया।
श्लोक 18
स्याद्वाद और अनेकांत का सुहावना सिद्धांत, प्रभु की वाणी अत्यंत पवित्र है।
श्लोक 19
जो मनुष्य महावीर के गुण गाता है, वह ज्ञानी चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को प्राप्त करता है।
श्लोक 20
गौतम गणधर मुख्य कहे गए, उन्होंने प्रभु की देशना संसार में पहुंचाई।
श्लोक 21
पावापुरी में योग निरोध हुआ, कार्तिक वदी अमावस्या की संध्या वह पवित्र समय है।
श्लोक 22
वीर प्रभु मोक्ष में पधार गए, तीनों लोक में जयघोष हुआ।
श्लोक 23
देवों ने तब दीप जलाए और दिवाली का पर्व मनाया।
श्लोक 24
जो मनुष्य वीर चालीसा गाता है, वह सब संकटों से मुक्ति पाता है।
श्लोक 25
रोग, शोक और सभी व्याधियाँ नष्ट होती हैं, उसे कांचन सी देह और जग में सुयश प्राप्त होता है।
श्लोक 26
पुत्रहीन को पुत्र मिल जाता है, निर्धन को धन-दौलत और सुख प्राप्त होता है।
श्लोक 27
अंधा देखने लगता है, कोढ़ी स्वस्थ हो जाता है, जो प्रभु का नित्य स्मरण करता है।
श्लोक 28
जो चालीस दिन तक इसका पाठ करता है, वह भवसागर से पार लग जाता है।
श्लोक 29
जिन शासन की शोभा अत्यंत भारी है, जय हो महावीर प्रभु, सुख देने वाले।
श्लोक 30
तुम सब मनोरथों को पूरा करने वाले दाता हो, तीनों भुवन के तुम पिता और माता हो।
श्लोक 31
मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ स्वामी, अंतर्यामी रक्षा कीजिए।
श्लोक 32
कर्मों को काटकर प्रभु मुक्ति दीजिए, अपने पद का अधिकारी बनाइए।
श्लोक 33
जय-जय-जय महावीर स्वामी, संकट हरिए, दया के निधान!
श्लोक 34
नमो-नमो प्रभु त्रिशला नंदन, बार-बार आपको वंदन करता हूँ।
श्लोक 35
जय जिनेंद्र, जय वीतराग, तुम जागत जीव का निर्मल भाग हो।
श्लोक 36
तुम्हारी महिमा जगत में फैली हुई है, जय महावीर, दया के भंडार।
श्लोक 37
मुझे अपने चरणों की शरण में रखो, भवबंधन से मुझे तारो।
श्लोक 38
जय हो, जय हो महावीर दयालु, मेरी लाज रखो और पालन करो।
श्लोक 39
जो इस चालीसा का नित्य ध्यान करता है, वह निश्चय ही निर्वाण प्राप्त करता है।
श्लोक 40
समापन दोहा
प्रभु से हृदय में सदा निवास करने की पावन प्रार्थना एवं चालीसा की पूर्णाहुति।
जो वीर चालीसा को पढ़ता है, मन में भक्ति धारण करता है, उसके सब अमंगल दूर होते हैं और उसे अपार सुख प्राप्त होता है।
श्लोक दोहा 1
हे प्रभु वीर, कृपा कीजिए, मेरी लाज रखिए। हाथ जोड़कर वंदन करता हूँ, मेरे काज को पूरा कीजिए।
श्लोक दोहा 2
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह चालीसा जैन धर्म की परंपरा में भगवान महावीर की स्तुति के लिए रचा गया एक लोकप्रिय भक्ति पाठ है। इसका प्रचलन विशेषकर महावीर जयंती और पर्यूषण पर्व के दौरान होता है, और इसे प्रायः भक्तजन नियमित रूप से पढ़ते हैं। रचयिता का नाम स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है, परंतु यह चालीसा जैन समाज में गहरी श्रद्धा से स्वीकार किया जाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Pandit Jugal Kishore
क्या आप जानते हैं?
लेखक और रचना
यह चालीसा 40 चौपाइयों और 2 दोहों से मिलकर बनी है, जो कुल 42 पद्य हैं। यह जैन भक्ति साहित्य का एक लोकप्रिय ग्रंथ है, जो भगवान महावीर के जीवन और उपदेशों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है।
प्रमुख जीवन घटनाएँ
चालीसा में महावीर के जन्म (कुण्डलपुर, चैत्र शुक्ल तेरस), 30 वर्ष के गृहस्थ जीवन, 12 वर्ष के कठोर तप, केवलज्ञान की प्राप्ति और पावापुरी में मोक्ष (कार्तिक अमावस्या) का उल्लेख है।
दिवाली का संबंध
भगवान महावीर के मोक्ष के दिन देवताओं ने दीप जलाए, जिससे दीपावली का पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई। यह जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसका सीधा संबंध इस चालीसा में वर्णित घटना से है।
बाल्यकाल की विशेष घटनाएँ
चालीसा में बताया गया है कि बचपन में संगम सुर ने सर्प बनकर महावीर की परीक्षा ली, और बाद में चण्डकौशिक नाग के विष को उन्होंने अमृत बना दिया। इससे उनके धैर्य और करुणा का पता चलता है।
उपदेश और दर्शन
इस चालीसा में अहिंसा परमो धर्म, स्याद्वाद और अनेकांतवाद के सिद्धांतों को स्पष्ट किया गया है। ये जैन धर्म के मूलभूत सिद्धांत हैं, जो सत्य के अनेक पहलुओं को स्वीकार करते हैं।
पाठ के लाभ
अंतिम छंदों में कहा गया है कि इस चालीसा के नियमित पाठ से रोग, शोक, संतानहीनता और दरिद्रता दूर होती है, और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से 40 दिनों तक पाठ करने का महत्व बताया गया है।
Mahavira
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