सार्वभौमिक करुणा एवं आत्म-शुद्धि का सर्वोच्च मार्ग
जैन धर्म में अहिंसा का परम मार्ग
अनेक पक्षीय सत्य का पवित्र सामंजस्य
जैन मुनि-प्रतिज्ञाएं
जैन सिद्धांत का हृदय
23वें तीर्थंकर की करुणा
जैन धर्म में आत्म-चिंतन और पश्चाताप का अनुष्ठान
1,444 संगमरमरी स्तंभों का चमत्कार
पशु-बलि से मुक्ति नहीं मिलती
वह कौवा जिसने एक हंस से ईर्ष्या की
तपस्वी का मोह और पशुबलि का परित्याग
सत्य-क्रिया से वर्षा कराने वाले मत्स्य-राज
हँसता और रोता बकरा
पं. जुगलकिशोर मुख्तार 'युगवीर' की 1916 की जैन प्रार्थना: सबसे मैत्री, करुणा, समभाव और सदाचार में दृढ़ता का संकल्प।
जैन परंपरा की यह आरती भगवान महावीर के कुण्डलपुर में जन्म, उनकी दया-अहिंसा और नाम-स्मरण से कष्ट-मुक्ति का गुणगान करती है।
यह चालीसा भगवान महावीर के जीवन, गुणों और उपदेशों का एक भक्तिपूर्ण गुणगान है, जिसे प्रतिदिन पढ़ने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
धम्मपद का दण्ड वर्ग (गाथा 129–145): सभी प्राणी हिंसा से डरते हैं और जीवन को प्रिय मानते हैं, इसलिए साधक दूसरों के स्थान पर स्वयं को रखकर किसी को कष्ट नहीं देता।
जैन सामायिक की प्रतिज्ञा: साधक मन, वचन और काया से पापयुक्त प्रवृत्ति का त्याग कर निश्चित समय तक समभाव में रहने का संकल्प लेता है।
जैन साधुओं की दैनिक प्रार्थना जिसमें वे पृथ्वी, जल, बीज, पत्तों, कीड़े-मकोड़ों और अन्य एक-इंद्रिय से लेकर पाँच-इंद्रिय जीवों को चलते-फिरते अनजाने में हुई हिंसा के लिए क्षमा माँगते हैं।