Bharat Devotion
Embroidered artwork for दण्ड वर्ग: अहिंसा और करुणा (गाथा 129–145): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

दण्ड वर्ग

अहिंसा और करुणा (गाथा 129–145)

धम्मपद का दण्ड वर्ग (गाथा 129–145): सभी प्राणी हिंसा से डरते हैं और जीवन को प्रिय मानते हैं, इसलिए साधक दूसरों के स्थान पर स्वयं को रखकर किसी को कष्ट नहीं देता।

श्लोक

१२९। सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्चुनो; अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये।

श्लोक 1

१३०। सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं; अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये।

श्लोक 2

१३१। सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति; अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो न लभते सुखं।

श्लोक 3

१३२। सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति; अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो लभते सुखं।

श्लोक 4

१३३। मावोच फरुसं कञ्चि, वुत्ता पटिवदेय्यु तं; दुक्खा हि सारम्भकथा, पटिदण्डा फुसेय्यु तं।

श्लोक 5

१३४। सचे नेरेसि अत्तानं, कंसो उपहतो यथा; एस पत्तोसि निब्बानं, सारम्भो ते न विज्जति।

श्लोक 6

१३५। यथा दण्डेन गोपालो, गावो पाजेति गोचरं; एवं जरा च मच्चु च, आयुं पाजेन्ति पाणिनं।

श्लोक 7

१३६। अथ पापानि कम्मानि, करं बालो न बुज्झति; सेहेहि कम्मेहि दुम्मेधो, अग्गिदड्ढो व तप्पति।

श्लोक 8

१३७। यो दण्डेन अदण्डेसु, अप्पदुट्ठेसु दुस्सति; दसन्नमञ्ञतरं ठानं, खिप्पमेव निगच्छति।

श्लोक 9

१३८। वेदनं फरुसं जानिं, सरीरस्स व भेदनं; गरुवं वापि आबाधं, चित्तक्खेपं व पापुणे।

श्लोक 10

१३९। राजतो वा उपसग्गं, अब्भक्खानं व दारुणं; परिक्खयं व ञातीनं, भोगानं व पभङ्गुरं।

श्लोक 11

१४०। अथ वास्स अगारानि, अग्गि डहति पावको; कायस्स भेदा दुप्पञ्ञो, निरयं सोपपज्जति।

श्लोक 12

१४१। न नग्गचरिया न जटा न पङ्का, नानासका थण्डिलसायिका वा; रजो च जल्लम् उक्कुटिकप्पधानं, सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकङ्खं।

श्लोक 13

१४२। अलङ्कतो चेपि समं चरेय्य, सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी; सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं, सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्खु।

श्लोक 14

१४३। हिरीनिसेधो पुरिसो, कोचि लोकस्मि विज्जति; यो निन्दं अपबोधेति, अवस्सो भद्रो कसामिव।

श्लोक 15

१४४। अस्सो यथा भद्रो कसानिविट्ठो, आतापिनो संवेगिनो भवाथ; सद्धाय सीलेन च वीरियेन च, समाधिना धम्मविनिच्छयेन च; सम्पन्नविज्जाचरणा पतिस्सता, जहिस्सथ दुक्खमिदं अनप्पकं।

श्लोक 16

१४५। उदकञ्हि नयन्ति नेत्तिका, उसुकारा नमयन्ति तेजनं; दारुं नमयन्ति तच्छका, अत्तानं दमयन्ति सुब्बता।

श्लोक 17

पृष्ठभूमि

यह अध्याय पालि धम्मपद (खुद्दक निकाय, पालि त्रिपिटक) का दण्डवग्ग है, गाथा 129–145। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार श्रावस्ती में जब बालकों का एक समूह लाठियों से एक निर्दोष साँप को पीट रहा था, तब भगवान बुद्ध ने गाथा 129–130 द्वारा करुणा का अमर संदेश दिया। इसी प्रकार जब महामोग्गल्लान पर पूर्वजन्म के कर्मों के कारण डाकुओं ने प्राणघातक हमला किया, तब बुद्ध ने गाथा 137–140 में निर्दोष पर प्रहार करने के दस भयानक दुष्परिणाम बताए। गाथा 142 में राजा के महामात्य सन्तति के प्रसंग में यह स्पष्ट किया गया कि वस्त्राभूषणों से नहीं, मन की अहिंसा और पवित्रता से ही मनुष्य सच्चा साधु बनता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

अहिंसा का स्वर्णिम सूत्र (गाथा 129–130)

सभी प्राणी दण्ड (लाठी/हिंसा) से काँपते हैं, सबको मृत्यु का भय है, और सबको अपना जीवन अत्यंत प्रिय है। अपने को दूसरों के स्थान पर रखकर (आत्मौपम्य भाव से) न किसी को मारें और न किसी की हत्या करवाएँ।

जरा और मृत्यु रूपी चरवाहा (गाथा 135)

जिस प्रकार एक चरवाहा लाठी लेकर अपनी गायों को चरागाह की ओर हाँकता है, उसी प्रकार बुढ़ापा (जरा) और मृत्यु (मच्चु) जीवित प्राणियों की आयु को निरंतर मौत की ओर हाँकते रहते हैं।

निर्दोष पर प्रहार के दस भयंकर फल (गाथा 137–140)

जो व्यक्ति निर्दोष और अहिंसक संतों पर दण्ड चलाता है, वह शीघ्र ही दस अनिष्टों में से किसी एक को प्राप्त होता है: असह्य शारीरिक वेदना, अंग-भंग, गंभीर रोग, पागलपन, राज-कोप, कलंक, परिजनों का नाश, धन की हानि, घर में आग लगना, और मृत्यु के बाद नरक की प्राप्ति।

बाह्य आडंबर बनाम आंतरिक शुद्धि (गाथा 141)

न नंगे घूमना, न जटाएँ रखना, न मिट्टी लपेटना, न उपवास रखना और न राख में लेटना उस मनुष्य को शुद्ध कर सकता है जिसके मन के संशय और विकार शांत नहीं हुए हैं।

उत्तम अश्व और चाबुक (गाथा 143–144)

संसार में ऐसा लज्जाशील और विवेकवान पुरुष बहुत दुर्लभ है जो निंदा और पाप से ऐसे बचता है जैसे एक उत्तम जाति का घोड़ा चाबुक के स्पर्श से पहले ही सजग हो जाता है।

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