Bharat Devotion
Embroidered artwork for धम्मपद का यमक वर्ग (दोहा वर्ग): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

धम्मपद का यमक वर्ग (दोहा वर्ग)

धम्मपद का यमक वर्ग (दोहा वर्ग)

यह बौद्ध धर्म के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ 'धम्मपद' का पहला अध्याय है, जो सिखाता है कि हमारे मन की स्थिति ही हमारे सुख-दुख का कारण है। इसमें 20 छंद हैं जो मन की शुद्धता, क्षमा, और सच्चे आचरण के महत्व को समझाते हैं।

श्लोक

१। मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया; मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोति वा; ततो नं दुक्खं अन्वेति, चक्कं व वहतो पदं।
Manopubbangama dhamma, manosettha manomaya Manasa che padutthena, bhashati va karoti va Tato nam dukkham anveti, chakkam va vahato padam

श्लोक 1

२। मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया; मनसा चे पसन्नेन, भासति वा करोति वा; ततो नं सुखं अन्वेति, छाया व अनपायिनी।
Manopubbangama dhamma, manosettha manomaya Manasa che pasannena, bhashati va karoti va Tato nam sukham anveti, chhaya va anapayini

श्लोक 2

३। “अक्कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि मं अहासि मे”; ये तं उपनय्हन्ति, वेरं तेसं न सम्मति।
"Akkocchi mam avadhi mam, ajini mam ahasi me" Ye tam upanayhanti, veram tesam na sammati

श्लोक 3

४। “अक्कोच्छि मं अवधि मं, अजिनि मं अहासि मे”; ये तं न उपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति।
"Akkocchi mam avadhi mam, ajini mam ahasi me" Ye tam na upanayhanti, veram tesupasammathi

श्लोक 4

५। न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं; अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो।
Na hi verena verani, sammantidha kudachanam Averena cha sammanti, esa dhammo sanantano

श्लोक 5

६। परे च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे; ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा।
Pare cha na vijananti, mayamettha yamamase Ye cha tattha vijananti, tato sammanti medhaga

श्लोक 6

७। सुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु असंवुतं; भोजनम्हि चामत्तञ्ञुं, कुसीतं हीनवीरियं; तं वे पसहति मारो, वातो रुक्खं व दुब्बलं।
Subhanupassim viharantam, indriyesu asamvutam Bhojanamhi chamattanyum, kusitam hinaviriyam Tam ve pasahati maro, vato rukkham va dubbalam

श्लोक 7

८। असुभानुपस्सिं विहरन्तं, इन्द्रियेसु सुसंवुतं; भोजनम्हि च मत्तञ्ञुं, सद्धं आरद्धवीरियं; तं वे नप्पसहति मारो, वातो सेलं व पब्बतं।
Asubhanupassim viharantam, indriyesu susamvutam Bhojanamhi cha mattanyum, saddham araddhaviriyam Tam ve nappasahati maro, vato selam va pabbatam

श्लोक 8

९। अनिक्कसावो कासावं, यो वत्थं परिदहिस्सति; अपेतो दमसच्चेन, न सो कासावमारहति।
Anikkasavo kasavam, yo vattham paridahissati Apeto damasaccena, na so kasavam arahati

श्लोक 9

१०। यो च वन्तकसावस्स, सीलेसु सुसमाहितो; उपेतो दमसच्चेन, स वे कासावमारहति।
Yo cha vantakasavassa, silesu susamahito Upeto damasaccena, sa ve kasavam arahati

श्लोक 10

११। असारे सारमतिनो, सारे चासारदस्सिनो; ते सारं नाधिगच्छन्ति, मिच्छासङ्कप्पगोचरा।
Asare saramatino, sare chasara dassino Te saram nadhigacchanti, micchasankappa gochara

श्लोक 11

१२। सारञ्च सारतो ञत्वा, असारञ्च असारतो; ते सारं अधिगच्छन्ति, सम्मासङ्कप्पगोचरा।
Saran cha sarato nyatva, asaran cha asarato Te saram adhigacchanti, sammasankappa gochara

श्लोक 12

१३। यथा अगारं दुच्छन्नं, वुट्ठी समतिविज्झति; एवं अभावितं चित्तं, रागो समतिविज्झति।
Yatha agaram ducchannam, vutthi samativijjhati Evam abhavitam chittam, rago samativijjhati

श्लोक 13

१४। यथा अगारं सुच्छन्नं, वुट्ठी न समतिविज्झति; एवं सुभावितं चित्तं, रागो न समतिविज्झति।
Yatha agaram succhannam, vutthi na samativijjhati Evam subhavitam chittam, rago na samativijjhati

श्लोक 14

१५। इध सोचति पेच्च सोचति, पापकारी उभयत्थ सोचति; सो सोचति सो विहञ्ञति, दिस्वा कम्मकिलिट्ठमत्तनो।
Idha sochati pecca sochati, papakari ubhayattha sochati So sochati so vihanyati, disva kamma kilittham attano

श्लोक 15

१६। इध मोदति पेच्च मोदति, कतपुञ्ञो उभयत्थ मोदति; सो मोदति सो पमोदति, दिस्वा कम्मविसुद्धिमत्तनो।
Idha modati pecca modati, kata punyo ubhayattha modati So modati so pamodati, disva kamma visuddhim attano

श्लोक 16

१७। इध तप्पति पेच्च तप्पति, पापकारी उभयत्थ तप्पति; “पापं मे कतन्”ति तप्पति, भिय्यो तप्पति दुग्गतिं गतो।
Idha tappati pecca tappati, papakari ubhayattha tappati "Papam me katan" ti tappati, bhiyyo tappati duggatim gato

श्लोक 17

१८। इध नन्दति पेच्च नन्दति, कतपुञ्ञो उभयत्थ नन्दति; “पुञ्ञं मे कतन्”ति नन्दति, भिय्यो नन्दति सुग्गतिं गतो।
Idha nandati pecca nandati, kata punyo ubhayattha nandati "Punyam me katan" ti nandati, bhiyyo nandati suggatim gato

श्लोक 18

१९। बहुम्पि चे संहित भासमानो, न तक्करो होति नरो पमत्तो; गोपोव गावो गणयं परेसं, न भागवा सामञ्ञस्स होति।
Bahumpi che samhita bhasamano, na takkaro hoti naro pamatto Gopo va gavo ganayam paresam, na bhagava samanyassa hoti

श्लोक 19

२०। अप्पम्पि चे संहित भासमानो, धम्मस्स होति अनुधम्मचारी; रागञ्च दोसञ्च पहाय मोहं, सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो; अनुपादियानो इध वा हुरं वा, स भागवा सामञ्ञस्स होति।
Appampi che samhita bhasamano, dhammassa hoti anudhamma chari Ragan cha dosan cha pahaya moham, sammappajano suvimutta citto Anupadiyano idha va huram va, sa bhagava samanyassa hoti

श्लोक 20

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह पाठ बौद्ध धर्म के त्रिपिटक नामक प्राचीन ग्रंथ-संग्रह के 'खुद्दक निकाय' नामक भाग का हिस्सा है। धम्मपद में बुद्ध के 423 उपदेश छंदों में संग्रहित हैं, और इसका पहला अध्याय 'यमक वर्ग' (जुड़वां छंद) कहलाता है। पारंपरिक रूप से इसे बौद्ध भिक्षु और अनुयायी ध्यान और नैतिक शिक्षा के लिए पढ़ते हैं, और यह बौद्ध धर्म के सबसे लोकप्रिय ग्रंथों में से एक है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

धम्मपद का परिचय

यह बौद्ध धर्म का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है। 'यमक वग्ग' (दोहा वर्ग) इसका प्रथम अध्याय है, जो मन की प्रधानता और कर्म के नियम पर केंद्रित है। यह ग्रंथ त्रिपिटक के सुत्तपिटक का भाग है और भगवान बुद्ध के मौलिक उपदेशों का संकलन माना जाता है।

प्रथम दो गाथाओं का महत्व

'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' से शुरू होने वाली ये दोहरी गाथाएँ पूरे धम्मपद की नींव हैं। पहली में कहा गया कि अशुद्ध मन से किए गए वचन या कर्म दुख लाते हैं, जैसे बैल के पैर पर पहिया चलता है। दूसरी में प्रसन्न मन से किए गए कर्म सुख देते हैं, जैसे छाया कभी नहीं छूटती। यह 'यमक' (जोड़ी) का अर्थ स्पष्ट करती है।

प्रसिद्ध गाथा (क्र. 5) – अहिंसा का सार

'न हि वेरेण वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं' – अर्थात घृणा से घृणा कभी शांत नहीं होती, बल्कि अघृणा (प्रेम) से शांत होती है। यह बौद्ध धर्म का सबसे उद्धृत सिद्धांत है, जिसे महात्मा गांधी ने भी अपने अहिंसा आंदोलन में अपनाया।

गाथाओं की पारंपरिक कहानियाँ

प्रत्येक गाथा के पीछे बौद्ध टीकाओं (जैसे धम्मपद अट्ठकथा) में एक कथा है। उदाहरण के लिए, पहली गाथा भिक्षु चक्खुफल से जुड़ी है, जिसने अपने मन की अशुद्धता के कारण दुख भोगा। ये कथाएँ गाथाओं को व्यावहारिक जीवन से जोड़ती हैं।

संरचना और शैली

'यमक वग्ग' में 20 गाथाएँ हैं, जो अक्सर विपरीत युग्मों (जैसे दुख-सुख, पाप-पुण्य) में व्यवस्थित हैं। यह शैली श्रोता को तुरंत समझने में मदद करती है कि कर्म और मन की दशा के अनुसार परिणाम भिन्न होते हैं।

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