धम्मपद का यमक वर्ग (दोहा वर्ग)
यह बौद्ध धर्म के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ 'धम्मपद' का पहला अध्याय है, जो सिखाता है कि हमारे मन की स्थिति ही हमारे सुख-दुख का कारण है। इसमें 20 छंद हैं जो मन की शुद्धता, क्षमा, और सच्चे आचरण के महत्व को समझाते हैं।
श्लोक
मन से पूर्व होते हैं धर्म, मन ही श्रेष्ठ है, मन से ही निर्मित हैं; यदि दूषित मन से बोलता या करता है, तो दुःख उसका अनुसरण करता है, जैसे पहिया बैल के पैर के पीछे चलता है।
श्लोक 1
मन से पूर्व होते हैं धर्म, मन ही श्रेष्ठ है, मन से ही निर्मित हैं; यदि प्रसन्न मन से बोलता या करता है, तो सुख उसका अनुसरण करता है, जैसे छाया कभी न छोड़ने वाली होती है।
श्लोक 2
"उसने मुझे गाली दी, मुझे मारा, मुझे हराया, मेरा अपहरण किया" – जो इस प्रकार द्वेष रखते हैं, उनका वैर शांत नहीं होता।
श्लोक 3
"उसने मुझे गाली दी, मुझे मारा, मुझे हराया, मेरा अपहरण किया" – जो इस प्रकार द्वेष नहीं रखते, उनका वैर शांत हो जाता है।
श्लोक 4
क्योंकि इस लोक में वैर से कभी वैर शांत नहीं होते, अवैर से ही शांत होते हैं – यही सनातन धर्म है।
श्लोक 5
परंतु दूसरे लोग यह नहीं जानते कि हम सब इस संसार में नष्ट हो रहे हैं; जो लोग यह जान लेते हैं, उनके झगड़े शांत हो जाते हैं।
श्लोक 6
जो सुंदरता के दर्शन में रमण करता है, इंद्रियों में असंयत है, भोजन में असंयमी है, आलसी और हीन वीर्य वाला है – उस व्यक्ति को मार (मृत्यु या क्लेश) वश में कर लेता है, जैसे हवा कमजोर वृक्ष को।
श्लोक 7
जो अशुभता (अशुभ भावना) के ध्यान में रमण करता है, इंद्रियों में सुसंयत है, भोजन में संयमी है, श्रद्धावान और आरंभिक वीर्य वाला है – उस व्यक्ति को मार वश में नहीं कर पाता, जैसे हवा पर्वत के चट्टान को।
श्लोक 8
जो व्यक्ति कषाय (राग-द्वेष-मोह) से रहित न होकर काषाय (भगवा) वस्त्र धारण करेगा, वह दम और सत्य से रहित होकर उस काषाय वस्त्र के योग्य नहीं है।
श्लोक 9
जो व्यक्ति कषायों को त्याग चुका है, शीलों में सुसमाहित है, दम और सत्य से युक्त है – वही सचमुच काषाय वस्त्र के योग्य है।
श्लोक 10
जो असार में सार समझते हैं और सार में असार देखते हैं, वे मिथ्या संकल्पों के विषय में रमण करके सार को प्राप्त नहीं करते।
श्लोक 11
जो सार को सार रूप और असार को असार रूप जानते हैं, वे सम्यक संकल्पों के विषय में रमण करके सार को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 12
जैसे खराब छाई हुई छत पर बारिश टपकती है, वैसे ही अभावित (अनुशासित न किए गए) मन में राग (काम) टपकता है।
श्लोक 13
जैसे अच्छी तरह छाई हुई छत पर बारिश नहीं टपकती, वैसे ही सुभावित (अच्छी तरह भावित) मन में राग नहीं टपकता।
श्लोक 14
यहाँ शोक करता है, परलोक में शोक करता है, पापी दोनों लोकों में शोक करता है; वह शोक करता है, वह खिन्न होता है, अपने अशुद्ध कर्मों को देखकर।
श्लोक 15
यहाँ आनंदित होता है, परलोक में आनंदित होता है, पुण्यकर्ता दोनों लोकों में आनंदित होता है; वह आनंदित होता है, वह अत्यंत प्रसन्न होता है, अपने शुद्ध कर्मों को देखकर।
श्लोक 16
यहाँ तपता है, परलोक में तपता है, पापी दोनों लोकों में तपता है; "मैंने पाप किया" सोचकर तपता है, और दुर्गति में जाने पर और भी अधिक तपता है।
श्लोक 17
यहाँ नंदन करता है, परलोक में नंदन करता है, पुण्यकर्ता दोनों लोकों में नंदन करता है; "मैंने पुण्य किया" सोचकर नंदन करता है, और सुगति में जाने पर और भी अधिक नंदन करता है।
श्लोक 18
यद्यपि बहुत से शास्त्रों को बोलने वाला हो, परंतु प्रमादी मनुष्य उनके अनुसार आचरण नहीं करता – वह दूसरे की गायें गिनने वाले ग्वाले के समान (स्वयं को) श्रमणत्व (संन्यास के फल) का भागी नहीं होता।
श्लोक 19
यद्यपि थोड़े से शास्त्रों को बोलने वाला हो, परंतु धर्म के अनुसार धर्म का आचरण करने वाला हो, राग-द्वेष-मोह का त्याग करके, सम्यक प्रज्ञा से युक्त, सुपरिमुक्त चित्त वाला, यहाँ और परलोक में अनुपादान (आसक्ति रहित) हो – वही श्रमणत्व का भागी होता है।
श्लोक 20
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह पाठ बौद्ध धर्म के त्रिपिटक नामक प्राचीन ग्रंथ-संग्रह के 'खुद्दक निकाय' नामक भाग का हिस्सा है। धम्मपद में बुद्ध के 423 उपदेश छंदों में संग्रहित हैं, और इसका पहला अध्याय 'यमक वर्ग' (जुड़वां छंद) कहलाता है। पारंपरिक रूप से इसे बौद्ध भिक्षु और अनुयायी ध्यान और नैतिक शिक्षा के लिए पढ़ते हैं, और यह बौद्ध धर्म के सबसे लोकप्रिय ग्रंथों में से एक है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
धम्मपद का परिचय
यह बौद्ध धर्म का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है। 'यमक वग्ग' (दोहा वर्ग) इसका प्रथम अध्याय है, जो मन की प्रधानता और कर्म के नियम पर केंद्रित है। यह ग्रंथ त्रिपिटक के सुत्तपिटक का भाग है और भगवान बुद्ध के मौलिक उपदेशों का संकलन माना जाता है।
प्रथम दो गाथाओं का महत्व
'मनोपुब्बङ्गमा धम्मा' से शुरू होने वाली ये दोहरी गाथाएँ पूरे धम्मपद की नींव हैं। पहली में कहा गया कि अशुद्ध मन से किए गए वचन या कर्म दुख लाते हैं, जैसे बैल के पैर पर पहिया चलता है। दूसरी में प्रसन्न मन से किए गए कर्म सुख देते हैं, जैसे छाया कभी नहीं छूटती। यह 'यमक' (जोड़ी) का अर्थ स्पष्ट करती है।
प्रसिद्ध गाथा (क्र. 5) – अहिंसा का सार
'न हि वेरेण वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं' – अर्थात घृणा से घृणा कभी शांत नहीं होती, बल्कि अघृणा (प्रेम) से शांत होती है। यह बौद्ध धर्म का सबसे उद्धृत सिद्धांत है, जिसे महात्मा गांधी ने भी अपने अहिंसा आंदोलन में अपनाया।
गाथाओं की पारंपरिक कहानियाँ
प्रत्येक गाथा के पीछे बौद्ध टीकाओं (जैसे धम्मपद अट्ठकथा) में एक कथा है। उदाहरण के लिए, पहली गाथा भिक्षु चक्खुफल से जुड़ी है, जिसने अपने मन की अशुद्धता के कारण दुख भोगा। ये कथाएँ गाथाओं को व्यावहारिक जीवन से जोड़ती हैं।
संरचना और शैली
'यमक वग्ग' में 20 गाथाएँ हैं, जो अक्सर विपरीत युग्मों (जैसे दुख-सुख, पाप-पुण्य) में व्यवस्थित हैं। यह शैली श्रोता को तुरंत समझने में मदद करती है कि कर्म और मन की दशा के अनुसार परिणाम भिन्न होते हैं।
Buddha
बौद्ध धर्म से और
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एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
