अरहंत वर्ग में 10 दिव्य गाथाएँ (90–99) संकलित हैं, जो सांसारिक तृष्णा और जन्म-मरण के बंधनों से पूर्णतः मुक्त वीतराग पुरुषों (अरहंतों) के परम शांत स्वरूप का गुणगान करती हैं। तथागत भगवान बुद्ध ने मुक्त पुरुषों की उपमा आकाश में उड़ने वाले पक्षियों से दी है जिनका कोई पदचिह्न नहीं बनता, और सरोवर से उड़ जाने वाले हंसों से दी है जो कभी जल से चिपके नहीं रहते। अरहंत का चित्त पृथ्वी के समान क्षमाशील और इन्द्रकील (अटल स्तम्भ) के समान अडिग होता है। वे जहाँ भी निवास करते हैं—चाहे वन हो या नगर—वह स्थान परम पवित्र और आनंददायक हो जाता है।
श्लोक
जिसने संसार-यात्रा पूरी कर ली है, जो शोक से रहित हो चुका है, जो सब प्रकार के बंधनों से पूर्णतः विमुक्त है और जिसने सब ग्रंथियों (गांठों) को काट दिया है—उसके भीतर वासना का कोई संताप (जलन) शेष नहीं रहता।
श्लोक 1
स्मृतिवान (जागरूक) पुरुष सदा साधना में उद्यत रहते हैं; वे किसी घर या वास-स्थान में आसक्त नहीं होते। जैसे हंस कीचड़युक्त सरोवर को छोड़कर उड़ जाते हैं, वैसे ही वे हर घर और आश्रय को छोड़ देते हैं।
श्लोक 2
जो किसी सांसारिक वस्तु का संग्रह नहीं करते, जो भोजन के यथार्थ स्वरूप को प्रज्ञा से जानते हैं, और जिनका क्षेत्र शून्यता तथा अनिमित्त विमुक्ति है—उनकी गति (मार्ग) को आकाश में उड़ने वाले पक्षियों के मार्ग की तरह जानना अत्यंत कठिन है।
श्लोक 3
जिसके समस्त आस्रव (मानसिक विकार) क्षीण हो चुके हैं, जो भोजन में तनिक भी आसक्त नहीं है, और शून्यता तथा अनिमित्त मुक्ति ही जिसका गोचर (ध्यान क्षेत्र) है—उसका पदचिह्न आकाश में उड़ते पक्षियों के समान अलभ्य और अगम्य होता है।
श्लोक 4
जिसकी इन्द्रियाँ परम शांत हो चुकी हैं, जैसे किसी कुशल सारथी द्वारा भली-भाँति वश में किए गए उत्तम घोड़े; जिसका सारा घमंड नष्ट हो चुका है और जो आस्रव-रहित (निष्पाप) है—ऐसे स्थिरचित्त महापुरुष की देवता भी स्तुति और चाहना करते हैं।
श्लोक 5
पृथ्वी के समान जो कभी कुपित नहीं होता, नगर के इंद्रकील (अटल स्तम्भ) के समान जो दृढ़ और सुव्रती है, और कीचड़-रहित स्वच्छ सरोवर के समान जो शांत है—ऐसे निष्कलंक महापुरुष के लिए पुनः संसार में जन्म-मरण नहीं होते।
श्लोक 6
जो सम्यक ज्ञान से पूर्णतः विमुक्त हो चुका है, जो परम शांत और समता में स्थित है—उसका मन शांत होता है, उसकी वाणी शांत होती है, और उसका कर्म भी शांत होता है।
श्लोक 7
जो किसी की सुनी-सुनाई बातों पर नहीं (प्रत्यक्षज्ञानी) है, जो 'अकृत' (अजन्मे निर्वाण) को जानता है, जिसने जन्म-मरण की संधि को काट दिया है, जिसने कर्म-संस्कारों के अवसर को नष्ट कर दिया है और सारी तृष्णाओं को उगल (त्याग) दिया है—वही वास्तव में सर्वोत्तम पुरुष है।
श्लोक 8
चाहे गाँव हो या जंगल, घाटी हो या समतल मैदान—जहाँ भी निष्पाप अरहंत महापुरुष निवास करते हैं, वह भूमि वास्तव में परम रमणीय और पवित्र होती है।
श्लोक 9
वे एकांत वन अत्यंत रमणीय हैं जहाँ साधारण संसारी लोग आनंद नहीं पाते; वहाँ वासना-रहित वीतराग पुरुष ही आनंद लेते हैं, क्योंकि वे काम-भोगों की खोज में नहीं होते।
श्लोक 10
पृष्ठभूमि
बौद्ध धर्म में 'अरहंत' उस परम पद को कहा जाता है जिन्होंने दसों संयोजनों को समूल नष्ट कर इसी जीवन में निर्वाण का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर लिया है। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, जब तथागत बुद्ध के चरणों में देवदत्त द्वारा फेंकी गई शिला से चोट आई थी और चिकित्सक जीवक ने उनकी सेवा की थी, तथा महाकाश्यप और सारिपुत्र के निष्काम विचरण के प्रसंग में ये गाथाएँ उच्चारित हुई थीं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
सरोवर छोड़ते राजहंस (गाथा 91)
स्मृतिवान साधक निरंतर अप्रमाद में लगे रहते हैं; वे किसी सांसारिक आश्रय में नहीं बंधते। जैसे राजहंस सरोवर को छोड़कर उड़ जाते हैं, वैसे ही वे हर सांसारिक घर और आसक्ति को पीछे छोड़ देते हैं।
आकाश में पक्षियों के मार्ग जैसा अदृश्य पदचिह्न (गाथा 92–93)
जो किसी भी सांसारिक वस्तु का संचय नहीं करते, जिनका आहार में कोई मोह नहीं है, और जिनका विहार शून्यता (अनिमित्त मुक्ति) में है, उनकी आध्यात्मिक गति को वैसे ही नहीं खोजा जा सकता जैसे आकाश में उड़ते पक्षियों के पदचिह्न नहीं मिलते।
इंद्रकील और सहनशील पृथ्वी (गाथा 95)
अरहंत पुरुष पृथ्वी के समान सहनशील होते हैं जिस पर अच्छी या बुरी वस्तु फेंकने पर भी वह क्रोधित नहीं होती; वे नगर के मुख्य द्वार पर गड़े विशाल इंद्रकील (अचल स्तम्भ) के समान अडिग होते हैं।
सर्वश्रेष्ठ पुरुष का अनूठा श्लेष (गाथा 97)
गाथा 97 में एक गहरा श्लेष है—'अश्रद्धालु' (दूसरों के कहे पर नहीं, अपितु स्वयं के प्रत्यक्ष ज्ञान पर चलने वाला), 'अकृतज्ञ' (अकृत अर्थात् निर्वाण को साक्षात जानने वाला), ऐसा पुरुष ही जगत् में सबसे महान है।
सूने वनों में परम आनंद (गाथा 98–99)
जहाँ साधारण संसारी लोगों को घने और निर्जन जंगलों में भय और उदासी लगती है, वहाँ वासना-रहित अरहंत परम आनंद में लीन रहते हैं क्योंकि वे सांसारिक भोगों की खोज में नहीं होते।
विषय के अनुसार खोजें
Buddha
बौद्ध धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
