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Embroidered artwork for अरहंत वर्ग: मुक्त पुरुष की महिमा (गाथा 90–99): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

अरहंत वर्ग

मुक्त पुरुष की महिमा (गाथा 90–99)

अरहंत वर्ग में 10 दिव्य गाथाएँ (90–99) संकलित हैं, जो सांसारिक तृष्णा और जन्म-मरण के बंधनों से पूर्णतः मुक्त वीतराग पुरुषों (अरहंतों) के परम शांत स्वरूप का गुणगान करती हैं। तथागत भगवान बुद्ध ने मुक्त पुरुषों की उपमा आकाश में उड़ने वाले पक्षियों से दी है जिनका कोई पदचिह्न नहीं बनता, और सरोवर से उड़ जाने वाले हंसों से दी है जो कभी जल से चिपके नहीं रहते। अरहंत का चित्त पृथ्वी के समान क्षमाशील और इन्द्रकील (अटल स्तम्भ) के समान अडिग होता है। वे जहाँ भी निवास करते हैं—चाहे वन हो या नगर—वह स्थान परम पवित्र और आनंददायक हो जाता है।

श्लोक

९०। गतद्धिनो विसोकस्स, विप्पमुत्तस्स सब्बधि; सब्बगन्थप्पहीनस्स, परिऌआहो न विज्जति।

श्लोक 1

९१। उय्युञ्जन्ति सतीमन्तो, न निकेते रमन्ति ते; हंसाव पल्ललं हित्वा, ओकमोकं जहन्ति ते।

श्लोक 2

९२। येसं सन्निचयो नत्थि, ये परिञ्ञातभोजना; सुञ्ञतो अनिमित्तो च, विमोक्खो येसं गोचरो; आकासे व सकुन्तानं, गति तेसं दुरन्नया।

श्लोक 3

९३। यस्सासवा परिक्खीणा, आहारे च अनिस्सितो; सुञ्ञतो अनिमित्तो च, विमोक्खो यस्स गोचरो; आकासे व सकुन्तानं, पदं तस्स दुरन्नयं।

श्लोक 4

९४। यस्सिन्द्रियानि समथं गतानि, अस्सा यथा सारथिना सुदन्ता; पहीनमानस्स अनासवस्स, देवापि तस्स पिहयन्ति तादिनो।

श्लोक 5

९५। पथविसमो नो विरुज्झति, इन्दखीलूपमो तादि सुब्बतो; रहदो व अपेतकद्दमो, संसारा न भवन्ति तादिनो।

श्लोक 6

९६। सन्तं तस्स मनं होति, सन्ता वाचा च कम्म च; सम्मदञ्ञाविमुत्तस्स, उपसन्तस्स तादिनो।

श्लोक 7

९७। अस्सद्धो अकतञ्ञू च, सन्धिच्छेदो च यो नरो; हतावकासो वन्तासो, स वे उत्तमपोरिसो।

श्लोक 8

९८। गामे वा यदि वारञ्ञे, निन्ने वा यदि वा थले; यत्थारहन्तो विहरन्ति, तं भूमिरामणेय्यकं।

श्लोक 9

९९। रमणीयानि अरञ्ञानि, यत्थ न रमती जनो; वीतरागा रमिस्सन्ति, न ते कामगवेसिनो।

श्लोक 10

पृष्ठभूमि

बौद्ध धर्म में 'अरहंत' उस परम पद को कहा जाता है जिन्होंने दसों संयोजनों को समूल नष्ट कर इसी जीवन में निर्वाण का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर लिया है। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, जब तथागत बुद्ध के चरणों में देवदत्त द्वारा फेंकी गई शिला से चोट आई थी और चिकित्सक जीवक ने उनकी सेवा की थी, तथा महाकाश्यप और सारिपुत्र के निष्काम विचरण के प्रसंग में ये गाथाएँ उच्चारित हुई थीं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

सरोवर छोड़ते राजहंस (गाथा 91)

स्मृतिवान साधक निरंतर अप्रमाद में लगे रहते हैं; वे किसी सांसारिक आश्रय में नहीं बंधते। जैसे राजहंस सरोवर को छोड़कर उड़ जाते हैं, वैसे ही वे हर सांसारिक घर और आसक्ति को पीछे छोड़ देते हैं।

आकाश में पक्षियों के मार्ग जैसा अदृश्य पदचिह्न (गाथा 92–93)

जो किसी भी सांसारिक वस्तु का संचय नहीं करते, जिनका आहार में कोई मोह नहीं है, और जिनका विहार शून्यता (अनिमित्त मुक्ति) में है, उनकी आध्यात्मिक गति को वैसे ही नहीं खोजा जा सकता जैसे आकाश में उड़ते पक्षियों के पदचिह्न नहीं मिलते।

इंद्रकील और सहनशील पृथ्वी (गाथा 95)

अरहंत पुरुष पृथ्वी के समान सहनशील होते हैं जिस पर अच्छी या बुरी वस्तु फेंकने पर भी वह क्रोधित नहीं होती; वे नगर के मुख्य द्वार पर गड़े विशाल इंद्रकील (अचल स्तम्भ) के समान अडिग होते हैं।

सर्वश्रेष्ठ पुरुष का अनूठा श्लेष (गाथा 97)

गाथा 97 में एक गहरा श्लेष है—'अश्रद्धालु' (दूसरों के कहे पर नहीं, अपितु स्वयं के प्रत्यक्ष ज्ञान पर चलने वाला), 'अकृतज्ञ' (अकृत अर्थात् निर्वाण को साक्षात जानने वाला), ऐसा पुरुष ही जगत् में सबसे महान है।

सूने वनों में परम आनंद (गाथा 98–99)

जहाँ साधारण संसारी लोगों को घने और निर्जन जंगलों में भय और उदासी लगती है, वहाँ वासना-रहित अरहंत परम आनंद में लीन रहते हैं क्योंकि वे सांसारिक भोगों की खोज में नहीं होते।

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