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Embroidered artwork for रतन सुत्त (बौद्ध रत्न सूत्र): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

रतन सुत्त (बौद्ध रत्न सूत्र)

रतन सुत्त (बौद्ध रत्न सूत्र)

रतन सुत्त (खु.पा. ६, सु.नि. २.१): वैशाली में महामारी और भय के समय बुद्ध द्वारा त्रिरत्नों पर दिया गया रक्षा-सूत्र।

श्लोक

यानीध भूतानि समागतानि भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खॆ सब्बॆव भूता सुमना भवन्तु अथॊपि सक्कच्च सुणन्तु भासितं
Yanidha bhutani samagatani Bhummani va yani va antalikkhe Sabbeva bhuta sumana bhavantu Athopi sakkacca sunantu bhasitam

श्लोक 1

तस्मा हि भूता निसामॆथ सब्बॆ मॆत्तं करॊथ मानुसिया पजाय दिवा च रत्तॊ च हरन्ति यॆ बलिं तस्मा हि नॆ रक्खथ अप्पमत्ता
Tasma hi bhuta nisametha sabbe Mettam karotha manusiya pajaya Diva ca ratto ca haranti ye balim Tasma hi ne rakkhatha appamatta

श्लोक 2

यं किञ्चि वित्तं इध वा हुरं वा सग्गॆसु वा यं रतनं पणीतं न नॊ समं अत्थि तथागतॆन इदम्पि बुद्धॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Yam kinci vittam idha va huram va Saggesu va yam ratanam panitam Na no samam atthi tathagatena Idampi buddhe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 3

खयं विरागं अमतं पणीतं यदज्झगा सक्यमुनी समाहितॊ न तॆन धम्मॆन समत्थि किञ्चि इदम्पि धम्मॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Khayam viragam amatam panitam Yadajjhaga sakyamuni samahito Na tena dhammena samatthi kinci Idampi dhamme ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 4

यं बुद्धसॆट्ठॊ परिवण्णयी सुचिं समाधिमानन्तरिकञ्ञमाहु समाधिना तॆन समॊ न विज्जति इदम्पि धम्मॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Yam buddhasettho parivannayi sucim Samadhimanantarikannamahu Samadhina tena samo na vijjati Idampi dhamme ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 5

यॆ पुग्गला अट्ठ सतं पसत्था चत्तारि ऎतानि युगानि हॊन्ति तॆ दक्खिणॆय्या सुगतस्स सावका ऎतॆसु दिन्नानि महप्फलानि इदम्पि सङ्घॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Ye puggala attha satam pasattha Cattari etani yugani honti Te dakkhineyya sugatassa savaka Etesu dinnani mahapphalani Idampi sanghe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 6

यॆ सुप्पयुत्ता मनसा दळ्हॆन निक्कामिनॊ गॊतमसासनम्हि तॆ पत्तपत्ता अमतं विगय्ह लद्धा मुधा निब्बुतिं भुञ्जमाना इदम्पि सङ्घॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Ye suppayutta manasa dalhena Nikkamino gotamasasanamhi Te pattapatta amatam vigayha Laddha mudha nibbutim bhunjamana Idampi sanghe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 7

यथिन्दखीलॊ पठविं सितॊ सिया चतुब्भि वातॆहि असम्पकम्पियॊ तथूपमं सप्पुरिसं वदामि यॊ अरियसच्चानि अवॆच्च पस्सति इदम्पि सङ्घॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Yathindakhilo pathavim sito siya Catubbhi vatehi asampakampiyo Tathupamam sappurisam vadami Yo ariyasaccani avecca passati Idampi sanghe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 8

यॆ अरियसच्चानि विभावयन्ति गम्भीरपञ्ञॆन सुदॆसितानि किञ्चापि तॆ हॊन्ति भुसं पमत्ता न तॆ भवं अट्ठमं आदियन्ति इदम्पि सङ्घॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Ye ariyasaccani vibhavayanti Gambhirapannena sudesitani Kincapi te honti bhusam pamatta Na te bhavam atthamam adiyanti Idampi sanghe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 9

सहावस्स दस्सनसम्पदाय तयस्सु धम्मा जहिता भवन्ति सक्कायदिट्ठि विचिकिच्छितञ्च सीलब्बतं वापि यदत्थि किञ्चि चतूहपायॆहि च विप्पमुत्तॊ छच्चाभिठानानि अभब्ब कातुं इदम्पि सङ्घॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Sahavassa dassanasampadaya Tayassu dhamma jahita bhavanti Sakkayaditthi vicikicchitanca Silabbatam vapi yadatthi kinci Catuhapayehi ca vippamutto Chaccabhitthanani abhabba katum Idampi sanghe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 10

किञ्चापि सॊ कम्मं करॊति पापकं कायॆन वाचा उद चॆतसा वा अभब्ब सॊ तस्स पटिच्छदाय अभब्बता दिट्ठपदस्स वुत्ता इदम्पि सङ्घॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Kincapi so kammam karoti papakam Kayena vaca uda cetasa va Abhabba so tassa paticchadaya Abhabbata ditthapadassa vutta Idampi sanghe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 11

वनप्पगुम्बॆ यथा फुस्सितग्गॆ गिम्हानमासॆ पठमस्मिं गिम्हॆ तथूपमं धम्मवरं अदॆसयी निब्बानगामीं परमं हिताय इदम्पि बुद्धॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Vanappagumbe yatha phussitagge Gimhanamase pathamasmim gimhe Tathupamam dhammavaram adesayi Nibbanagamim paramam hitaya Idampi buddhe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 12

वरॊ वरञ्ञू वरदॊ वराहरॊ अनुत्तरॊ धम्मवरं अदॆसयी इदम्पि बुद्धॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Varo varannu varado varaharo Anuttaro dhammavaram adesayi Idampi buddhe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 13

खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्भवं विरत्तचित्ता आयतिकॆ भवस्मिं तॆ खीणबीजा अविरूळ्हिच्छन्दा निब्बन्ति धीरा यथायं पदीपॊ इदम्पि सङ्घॆ रतनं पणीतं ऎतॆन सच्चॆन सुवत्थि हॊतु
Khinam puranam navam natthi sambhavam Virattacitta ayatike bhavasmim Te khinabija avirulhicchanda Nibbanti dhira yathayam padipo Idampi sanghe ratanam panitam Etena saccena suvatthi hotu

श्लोक 14

यानीध भूतानि समागतानि भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खॆ तथागतं दॆवमनुस्सपूजितं बुद्धं नमस्साम सुवत्थि हॊतु
Yanidha bhutani samagatani Bhummani va yani va antalikkhe Tathagatam devamanussapujitam Buddham namassama suvatthi hotu

श्लोक 15

यानीध भूतानि समागतानि भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खॆ तथागतं दॆवमनुस्सपूजितं धम्मं नमस्साम सुवत्थि हॊतु
Yanidha bhutani samagatani Bhummani va yani va antalikkhe Tathagatam devamanussapujitam Dhammam namassama suvatthi hotu

श्लोक 16

यानीध भूतानि समागतानि भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खॆ तथागतं दॆवमनुस्सपूजितं सङ्घं नमस्साम सुवत्थि हॊतु
Yanidha bhutani samagatani Bhummani va yani va antalikkhe Tathagatam devamanussapujitam Sangham namassama suvatthi hotu

श्लोक 17

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह पाठ बौद्ध धर्म के प्राचीन ग्रंथों में से एक है, जो खुद्दक निकाय के अंतर्गत आता है। परंपरा के अनुसार, इसे स्वयं भगवान बुद्ध ने सुनाया था। इसका प्रयोग आशीर्वाद, रक्षा और शांति के लिए किया जाता है, विशेषकर विपत्ति के समय। इसे 'रतन सुत्त' (रत्न सूत्र) कहा जाता है, जिसमें बुद्ध, धम्म और संघ—तीन रत्नों—की महिमा का गुणगान है। स्थान-निर्देश: खुद्दकपाठ ६ और सुत्तनिपात २.१, १७ गाथाओं में। गाथा १–२ में एकत्र प्राणियों को सम्बोधन है, गाथा ३–१४ में बुद्ध, धम्म और संघ की स्तुति है, और गाथा १५–१७ समापन-वन्दना हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

रचना का ऐतिहासिक संदर्भ

यह सूत्र भगवान बुद्ध ने वैशाली नगर में फैली महामारी, अकाल और दुष्ट आत्माओं के संकट से निवारण के लिए दिया था। आनंद को इस सूत्र का उच्चारण करते हुए शहर में जल छिड़कने का निर्देश दिया गया, जिसके बाद सभी विपत्तियाँ शांत हुईं।

तीन रत्नों की महिमा

इस सूत्र में बुद्ध, धम्म और संघ — इन तीन रत्नों की स्तुति की गई है। प्रत्येक रत्न के गुणों का वर्णन करते हुए 'इदम्पि बुद्धे रतनं पणीतं' (यह बुद्ध रत्न उत्तम है) जैसे पद बार-बार आते हैं।

सूत्र का स्थान

यह सूत्र पालि त्रिपिटक के खुद्दकनिकाय के अंतर्गत खुद्दकपाठ और सुत्तनिपात दोनों में संकलित है। यह बौद्ध धर्म के सबसे प्रसिद्ध परित्राण (रक्षा) सूत्रों में से एक है।

अंतिम तीन श्लोकों का विशेष महत्व

सूत्र के अंत में तीन श्लोकों में भूत-प्रेतों से आह्वान किया गया है कि वे तथागत (बुद्ध), धर्म और संघ को नमस्कार करें, और सबका कल्याण हो। यह सूत्र के मंगलमय समापन का प्रतीक है।

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