प्रज्ञापारमिताहृदय सूत्र (हृदय सूत्र)
हृदय सूत्र: अवलोकितेश्वर शारिपुत्र से कहते हैं कि रूप शून्यता है और शून्यता रूप है, और सूत्र 'गते गते पारगते' मन्त्र पर समाप्त होता है।
श्लोक
ॐ, भगवती आर्य प्रज्ञापारमिता को नमस्कार। यह प्रज्ञापारमितासूत्र अर्थात् प्रज्ञापारमिताहृदय है।
श्लोक 1
आर्य अवलोकितेश्वर बोधिसत्त्व गम्भीर प्रज्ञापारमिता के आचरण में लीन होते हुए पाँच स्कन्धों का अवलोकन करते थे और उन्हें स्वभाव से शून्य देखते थे।
श्लोक 2
हे शारिपुत्र, यहाँ रूप शून्यता है, शून्यता ही रूप है। रूप से शून्यता पृथक् नहीं, शून्यता से रूप पृथक् नहीं। जो रूप है वह शून्यता है, जो शून्यता है वह रूप है। इसी प्रकार वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान भी हैं।
श्लोक 3
हे शारिपुत्र, यहाँ सभी धर्म शून्यता-लक्षण वाले हैं। वे न उत्पन्न होते हैं, न नष्ट होते हैं, न मलिन हैं, न विमल, न न्यून हैं, न पूर्ण।
श्लोक 4
इसलिए, हे शारिपुत्र, शून्यता में न रूप है, न वेदना, न संज्ञा, न संस्कार, न विज्ञान। न चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय, मन हैं। न रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श, धर्म हैं। न चक्षु-धातु से लेकर मनोविज्ञान-धातु तक कुछ है। न अविद्या है, न अविद्या-क्षय, यहाँ तक कि न जरा-मरण है, न जरा-मरण-क्षय। न दुःख, समुदय, निरोध, मार्ग हैं। न ज्ञान है, न प्राप्ति, न अप्राप्ति।
श्लोक 5
इसलिए, हे शारिपुत्र, प्राप्ति के अभाव से बोधिसत्त्व प्रज्ञापारमिता का आश्रय लेकर चित्तावरण-रहित विहार करते हैं। चित्तावरण का अभाव होने से वे निर्भय होते हैं, विपर्यासों को पार करके अन्त में निर्वाण को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 6
तीनों कालों में स्थित सभी बुद्ध प्रज्ञापारमिता का आश्रय लेकर अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि को प्राप्त हुए हैं।
श्लोक 7
इसलिए जानना चाहिए कि प्रज्ञापारमिता महामन्त्र है, महाविद्यामन्त्र है, अनुत्तर मन्त्र है, समसम मन्त्र है। यह सब दुखों का शमन करने वाला है, सत्य है क्योंकि असत्य नहीं है।
श्लोक 8
प्रज्ञापारमिता में कहा गया मन्त्र इस प्रकार है: गते गते पारगते पारसंगते बोधि स्वाहा।
श्लोक 9
इस प्रकार प्रज्ञापारमिताहृदय समाप्त हुआ।
श्लोक 10
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
हृदय सूत्र, संस्कृत में प्रज्ञापारमिताहृदय, महायान बौद्ध धर्म के प्रज्ञापारमिता, अर्थात् प्रज्ञा की पूर्णता, साहित्य के सबसे छोटे ग्रन्थों में से एक है। इसका पाठ ज़ेन, तिब्बती और अन्य महायान परम्पराओं में होता है, प्रायः साधना के आरम्भ या अन्त में। इस संक्षिप्त संस्कृत पाठ में बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर, गम्भीर प्रज्ञापारमिता का अभ्यास करते हुए, देखते हैं कि पाँच स्कन्ध स्वभाव से शून्य हैं, और फिर शारिपुत्र से बोलते हैं। वे कहते हैं कि रूप शून्यता है, शून्यता रूप से भिन्न नहीं, और शून्यता में न दुःख है, न समुदय, न निरोध, न मार्ग। सूत्र प्रज्ञापारमिता के मन्त्र पर समाप्त होता है, 'गते गते पारगते पारसंगते बोधि स्वाहा', जो इस पाठ के श्लोक ९ में है। यह पाठ संस्कृत में और कई चीनी अनुवादों में मिलता है, जिनमें सबसे प्रसिद्ध सातवीं शताब्दी में ह्वेनसांग (श्वानज़ांग) के नाम से जुड़ा है। विद्वान इसकी ठीक उत्पत्ति पर अब भी विचार करते हैं, इसलिए यहाँ कोई तिथि नहीं दी गई।
क्या आप जानते हैं?
अवलोकितेश्वर का उपदेश
सूत्र का आरम्भ आर्य अवलोकितेश्वर से होता है, जो करुणा के बोधिसत्त्व हैं और पाँच स्कन्धों, अर्थात् रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान, का अवलोकन करते हैं। वे उन्हें स्वभावशून्य देखते हैं। फिर वे शारिपुत्र से कहते हैं: 'इह शारिपुत्र', यहाँ, शारिपुत्र।
रूप ही शून्यता
प्रसिद्ध पंक्तियाँ कहती हैं कि रूप शून्यता है और शून्यता ही रूप है। शून्यता रूप से पृथक् नहीं, और रूप शून्यता से पृथक् नहीं। यही वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान के विषय में कहा गया है। यहाँ शून्यता का अर्थ है कि वस्तुओं का कोई पृथक्, स्थिर अपना स्वभाव नहीं है और वे आश्रित होकर उत्पन्न होती हैं।
न यह, न वह
शून्यता में न चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय या मन है, न अविद्या या उसका क्षय, यहाँ तक कि न जरा-मरण। न दुःख, समुदय, निरोध या मार्ग है, न ज्ञान और न प्राप्ति। सूत्र बौद्ध उपदेश की मूल श्रेणियों से गुज़रकर दिखाता है कि इनमें से किसी से चिपकना नहीं है।
निर्भयता
बोधिसत्त्व के पास पकड़ने के लिए कोई प्राप्ति नहीं है, इसलिए वह प्रज्ञापारमिता का आश्रय लेता है। उसका चित्त आवरण-रहित है, वह निर्भय है, और विपर्यास को पार कर निर्वाण को पाता है। सूत्र जोड़ता है कि तीनों कालों के सभी बुद्ध इसी पारमिता से सम्बोधि को प्राप्त हुए।
श्लोक ९ का मन्त्र
अन्तिम मन्त्र है 'गते गते पारगते पारसंगते बोधि स्वाहा'। इसका अर्थ है: गए, गए, पार गए, पूरी तरह पार गए, बोधि, स्वाहा। सूत्र स्वयं प्रज्ञापारमिता को महामन्त्र, अनुत्तर मन्त्र कहता है, जो सब दुःखों का शमन करता है।
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