मंगल सूत्र (महामंगल सूत्र)
यह एक प्राचीन बौद्ध सूत्र है जिसमें भगवान बुद्ध ने एक देवता के प्रश्न पर जीवन के सबसे उत्तम मंगल (शुभ) कार्यों और गुणों को सरल शब्दों में समझाया है।
श्लोक
ऐसा मैंने सुना: एक समय भगवान श्रावस्ती में जेतवन के अनाथपिण्डिक के आराम में विराजमान थे। तब एक देवता रात्रि के अंतिम प्रहर में अत्यंत कांतिमयी होकर समस्त जेतवन को प्रकाशित करती हुई भगवान के पास आई, उन्हें प्रणाम कर एक ओर खड़ी हो गई। एक ओर खड़ी होकर उस देवता ने भगवान से गाथा में कहा:
श्लोक 1
बहुत से देवता और मनुष्यों ने कल्याणकारी बातों का चिंतन किया है; कल्याण की आकांक्षा करने वाले हमें उत्तम मंगल बताइए।
श्लोक 2
मूर्खों का संग न करना तथा विद्वानों का संग करना, और पूजनीय व्यक्तियों की पूजा करना—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 3
उपयुक्त देश में निवास करना, पूर्व जन्म का पुण्य होना, और आत्मा का सम्यक् अभिप्राय (अपने मन को सही दिशा में लगाना)—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 4
बहुश्रुतता और शिल्पकला में निपुणता, सुशिक्षित शील, तथा सुभाषित वाणी—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 5
माता-पिता की सेवा, पुत्र-पत्नी का संग्रह (पालन-पोषण), और बाधारहित कर्म (व्यवसाय) करना—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 6
दान देना, धर्माचरण करना, ज्ञातियों का संग्रह करना, और निर्दोष कर्म करना—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 7
पाप से विरति (दूर रहना), मद्यपान से संयम, और धर्मों में अप्रमाद (सावधानी) रखना—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 8
गौरव (आदर), विनम्रता, संतोष, कृतज्ञता, और समय पर धर्म का श्रवण करना—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 9
क्षमा शीलता, विनयपूर्ण स्वभाव, श्रमणों का दर्शन, और समय पर धर्म-साकच्छा (धर्म चर्चा) करना—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 10
तप और ब्रह्मचर्य का पालन, आर्य सत्यों का साक्षात्कार, और निर्वाण का साक्षात्कार—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 11
जिसे लोक-धर्मों (लाभ-हानि, मान-अपमान आदि) के स्पर्श करने पर भी चित्त विचलित नहीं होता, जो शोक-रहित, रज-रहित और क्षेम (कल्याणकारी) है—यह उत्तम मंगल है।
श्लोक 12
इस प्रकार के मंगलों को करके सर्वत्र अपराजित होते हुए वे सर्वत्र कल्याण को प्राप्त करते हैं; उनके लिए यही उत्तम मंगल है।
श्लोक 13
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह पाठ 'मंगल सूत्र' (Maṅgala Sutta) के नाम से जाना जाता है, जो बौद्ध धर्म के सबसे लोकप्रिय और प्रिय सूत्रों में से एक है। यह पालि भाषा के 'खुद्दक निकाय' (लघु संग्रह) के अंतर्गत आता है और पारंपरिक रूप से बौद्ध देशों जैसे श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार आदि में घरों, मंदिरों और धार्मिक समारोहों में शांति, समृद्धि और आशीर्वाद के लिए पढ़ा जाता है। इसकी रचना का श्रेय स्वयं भगवान बुद्ध को दिया जाता है, और यह सभी बौद्ध परंपराओं में समान रूप से पूजनीय है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Attributed to the Buddha
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क्या आप जानते हैं?
रचना का स्रोत
यह गाथा बौद्ध धर्म के सबसे प्रसिद्ध सूत्रों में से एक, 'मंगल सूत्र' (महामंगल सूत्र) का हिस्सा है। यह सूत्र भगवान बुद्ध द्वारा सावत्थी नगर के जेतवन विहार में एक देवता के प्रश्न के उत्तर में दिया गया था।
संरचना और शैली
इसमें 12 गाथाएँ हैं, जिनमें से पहली देवता का प्रश्न है और बाकी 11 बुद्ध के उत्तर। प्रत्येक गाथा में 'एतं मंगलमुत्तमं' (यह सर्वोच्च मंगल है) का समापन वाक्य है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को शुभ बताता है।
शिक्षा का क्रम
बुद्ध ने मंगल को बाहरी रीति-रिवाजों या पूजा में नहीं, बल्कि 38 आंतरिक और सामाजिक गुणों में बांटा है। इनमें मूर्खों का साथ न करना, विद्वानों का संग, आज्ञाकारिता, दान, धर्माचरण, शील, संयम, क्षमा, और अंत में निर्वाण की प्राप्ति शामिल हैं।
ऐतिहासिक महत्व
यह सूत्र थेरवाद बौद्ध धर्म में अत्यंत पूजनीय है और इसे अक्सर घरों, मंदिरों और समारोहों में पाठ किया जाता है। इसे 'रतन सूत्र' और 'मेत्ता सूत्र' के साथ तीन सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा सूत्रों (परित्त) में गिना जाता है।
अंतिम गाथा का सार
अंतिम गाथा बताती है कि जो इन मंगलों का पालन करता है, वह संसार की आठ अनिश्चितताओं (लाभ-हानि, यश-अपयश, निंदा-प्रशंसा, सुख-दुख) से विचलित नहीं होता और सर्वत्र निर्भय व कुशल रहता है। यही सर्वोच्च मंगल है।
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