आठ शील (उपोसथ शील) – एक दिवसीय धार्मिक व्रत
ये आठ नियम बौद्ध परंपरा में एक दिन या एक रात के लिए लिए जाने वाले व्रत के संकल्प हैं, जिन्हें 'उपोसथ शील' कहा जाता है। इनका पालन आत्म-अनुशासन, ध्यान और पवित्रता को बढ़ाने के लिए किया जाता है।
श्लोक
मैं प्राणियों की हिंसा से विरत रहने का प्रशिक्षण-नियम ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 1
मैं अदत्त वस्तु ग्रहण करने से विरत रहने का प्रशिक्षण-नियम ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 2
मैं ब्रह्मचर्य का पालन न करने से विरत रहने का प्रशिक्षण-नियम ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 3
मैं झूठ बोलने से विरत रहने का प्रशिक्षण-नियम ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 4
मैं मद्य, मेरय तथा प्रमाद के कारण बनने वाले नशीले पदार्थों से विरत रहने का प्रशिक्षण-नियम ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 5
मैं अनुचित समय पर भोजन करने से विरत रहने का प्रशिक्षण-नियम ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 6
मैं नृत्य, गीत, वाद्य और तमाशों के दर्शन से तथा माला, सुगंध, विलेपन, धारण, मंडन और विभूषण से विरत रहने का प्रशिक्षण-नियम ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 7
मैं ऊँचे और आलीशान शयनासनों से विरत रहने का प्रशिक्षण-नियम ग्रहण करता हूँ।
श्लोक 8
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह पाठ बौद्ध धर्म के उपोसथ (दीक्षा दिवस) अनुष्ठान से जुड़ा है, जिसमें भिक्षु और उपासक पूर्णिमा, अमावस्या या अन्य पवित्र दिनों पर आठ शीलों का पालन करते हैं। ये नियम पाँच शीलों से अधिक सख्त हैं और इनमें रात में भोजन न करना, सजावट-गहने न पहनना, तथा ऊँची-आलीशान शय्या पर न सोना शामिल है। इनका उद्देश्य संसारिक भोगों से दूर रहकर मन को शांति और साधना में लगाना है।
क्या आप जानते हैं?
यह क्या है?
यह बौद्ध धर्म के 'आठ शील' (अट्ठसील) का पाठ है – एक नैतिक प्रशिक्षण नियम, जिसे उपासक-उपासिका पूर्णिमा या अष्टमी जैसे उपोसथ दिनों पर ग्रहण करते हैं। प्रत्येक पंक्ति में एक नियम का पालन करने का संकल्प लिया जाता है।
भाषा
यह पाठ पालि भाषा में है, जो बौद्ध त्रिपिटक की भाषा है और संस्कृत से निकटता से संबंधित है। पालि को सरल और लोकभाषा माना जाता है, जिसे बुद्ध ने आम लोगों तक धर्म पहुँचाने के लिए चुना था।
संरचना
हर पंक्ति में एक ही वाक्यांश 'वेरमणी सिक्खापदं समादियामि' दोहराया गया है, जिसका अर्थ है 'मैं प्रशिक्षण नियम का पालन करने का व्रत लेता/लेती हूँ'। इससे पता चलता है कि यह एक स्वैच्छिक और सचेत संकल्प है, दंड का डर नहीं।
नियमों का क्रम
पहले पाँच शील (पाँच शील) स्थायी नैतिक आचरण हैं – हिंसा, चोरी, व्यभिचार, झूठ, नशे से दूर रहना। फिर तीन अतिरिक्त शील (छठा से आठवां) उपोसथ पर विशेष संयम के लिए हैं – दोपहर के बाद भोजन न करना, सजावट-नृत्य-गीत से दूर रहना, और ऊँची/शानदार शय्या का त्याग।
उद्देश्य
यह व्रत मन को शांत और ध्यान के लिए अनुकूल बनाने में सहायक है। अंतिम तीन नियम विशेष रूप से इंद्रिय-संयम और सादगी पर जोर देते हैं, ताकि व्यक्ति सांसारिक भोगों से हटकर आध्यात्मिक अभ्यास पर ध्यान केंद्रित कर सके।
Buddha
बौद्ध धर्म से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
