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Embroidered artwork for दस शील (दस-सील): श्रामणेर प्रशिक्षण नियम: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

दस शील (दस-सील)

श्रामणेर प्रशिक्षण नियम

दस शील (दस-सील)

श्रामणेर प्रशिक्षण नियम

दस शील, खुद्दकपाठ २: श्रामणेर-श्रामणेरियों के दस पालि प्रशिक्षण नियम, प्रत्येक 'विरत रहने का शिक्षापद ग्रहण करता हूँ' शब्दों के साथ।

श्लोक

थेसे त्रैनिन्ग् रुलेस् अरे ओब्सेर्वेद् ब्य् नोविचे मोन्क्स् अन्द् नुन्स्। थेय् अरे देरिवेद् फ़्रोम् थे एइघ्त् प्रेचेप्त्स् ब्य् स्प्लित्तिन्ग् थे प्रेचेप्त् चोन्चेर्निन्ग् एन्तेर्तैन्मेन्त्स् इन्तो त्wओ पर्त्स् अन्द् ब्य् अद्दिन्ग् ओने रुले प्रोहिबितिन्ग् थे हन्द्लिन्ग् ओफ़् मोनेय्। अ फ़ुल्ल्य्-ओर्दैनेद् मोन्क् (भिक्खु) ओब्सेर्वेस् थे २२७ रुलेस् ओफ़् थे भिक्खु पतिमोक्ख ; अ फ़ुल्ल्य् ओर्दैनेद् नुन् (भिक्खुनि) wओउल्द् ओब्सेर्वे थे ३११ रुलेस् ओफ़् थे भिक्खुनि पतिमोक्ख ।
These training rules are observed by novice monks and nuns. They are derived from the Eight Precepts by splitting the precept concerning entertainments into two parts and by adding one rule prohibiting the handling of money. A fully-ordained monk (bhikkhu) observes the 227 rules of the bhikkhu Patimokkha; a fully ordained nun (bhikkhuni) would observe the 311 rules of the bhikkhuni Patimokkha.

श्लोक 1

थे तेन् प्रेचेप्त्स्:
The Ten Precepts:

श्लोक 2

१। पनतिपत वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् देस्त्रोयिन्ग् लिविन्ग् च्रेअतुरेस्।
Paanatipata Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 3

२। अदिन्नदन वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् तकिन्ग् थत् wहिछ् इस् नोत् गिवेन्।
Adinnadaana Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 4

३। अब्रह्मचरिय वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् सेxउअल् अच्तिवित्य्।
Abrahmachariya Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 5

४। मुसवद वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् इन्चोर्रेच्त् स्पेएछ् ।
Musavaada Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 6

५। सुरमेरयमज्ज पमदत्थन वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् इन्तोxइचतिन्ग् द्रिन्क्स् अन्द् द्रुग्स् wहिछ् लेअद् तो चरेलेस्स्नेस्स्।
Suramerayamajja Pamaadatthana Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 7

६। विकलभोजन वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् एअतिन्ग् अत् थे फ़ोर्बिद्देन् तिमे (इ।ए।, अफ़्तेर् नोओन्)।
Vikaalabhojana Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 8

७। नच्च-गित-वदित-विसुक-दस्सन वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् दन्चिन्ग्,सिन्गिन्ग्, मुसिच्, गोइन्ग् तो सेए एन्तेर्तैन्मेन्त्स् ।
Nachcha Geeta Vaadita Visuka Dassana Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 9

८। मल-गन्ध-विलेपन-धरन-मन्दन-विभुसनत्थन वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् wएअरिन्ग् गर्लन्द्स्, उसिन्ग् पेर्फ़ुमेस्, अन्द् बेऔतिफ़्यिन्ग् थे बोद्य् wइथ् चोस्मेतिच्स् ।
Maala Gandha Vilepana Dhaarana Mandana Vibhoosanatthana Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 10

९। उच्चसयन-महसयन वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् ल्यिन्ग् ओन् अ हिघ् ओर् लुxउरिओउस् स्लेएपिन्ग् प्लचे ।
Uchchaasayana Mahaasayana Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 11

१०। जतरुप-रजत-पतिग्गहन वेरमनि सिक्खपदम् समदियमि इ उन्देर्तके थे प्रेचेप्त् तो रेफ़्रैन् फ़्रोम् अच्चेप्तिन्ग् गोल्द् अन्द् सिल्वेर् (मोनेय्)।
Jaataroopa Rajata Patiggahana Veramani Sikkhapadam Samadiyami

श्लोक 12

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

दस शील, पालि में दसशिक्खापद या दस-सील, थेरवाद परम्परा में श्रामणेर (नवदीक्षित भिक्षु) और श्रामणेरी (नवदीक्षित भिक्षुणी) द्वारा ग्रहण किए जाने वाले प्रशिक्षण नियम हैं। पालि त्रिपिटक के खुद्दक निकाय में ये खुद्दकपाठ के पाठ सं. २ के रूप में दर्ज हैं, और प्रत्येक 'वेरमणि सिक्खापदं समादियामि', अर्थात् विरत रहने का शिक्षापद ग्रहण करता हूँ, शब्दों से लिया जाता है। ये उन आठ शीलों से बने हैं जिन्हें गृहस्थ उपोसथ के दिनों में पालते हैं। मनोरंजन का नियम दो में बाँटा गया है, इसलिए शील ७ और ८ तमाशों और शृंगार के अलग नियम बन जाते हैं, और सोना-चाँदी ग्रहण करने के विरुद्ध एक दसवाँ जोड़ा गया है। पूर्ण दीक्षित भिक्षु पातिमोक्ख के २२७ नियम पालता है, और पूर्ण दीक्षित भिक्षुणी अपने पातिमोक्ख के ३११ नियम। दस शील वह सरल अनुशासन है जो पहले आता है।

क्या आप जानते हैं?

पाँच से दस

गृहस्थ बौद्ध पाँच शील पालते हैं। दस शील में तीसरा अब्रह्मचर्य, अर्थात् पूर्ण ब्रह्मचर्य, बन जाता है, और पाँच और जुड़ते हैं: विकाल भोजन, तमाशे, शृंगार, ऊँचे शयन और सोना-चाँदी ग्रहण करना।

अष्ट शील से विभाजन

उपोसथ के अष्ट शील अपने सातवें नियम में तमाशे और शृंगार को मिला देते हैं। दस शील उन्हें बाँटते हैं: शील ७ नाच, गाना, बजाना और तमाशे देखने से विरत रहना है, और शील ८ माला, गन्ध और प्रसाधन से।

चौथा शील क्या कहता है

शील ४ 'मुसावाद', अर्थात् असत्य वचन, है, और पालि पाठ में यह अन्य शीलों जितना ही संक्षिप्त है। सम्यक् वाणी की व्यापक शिक्षा, जिसमें कठोर वचन, चुगली और व्यर्थ बातचीत भी हैं, बुद्ध के उपदेश के अन्य भागों से आती है।

भोजन का समय

शील ६, 'विकालभोजन', अकाल में भोजन से विरति है, जो भिक्षुओं के लिए दोपहर के बाद अगली भोर तक है। यह सरल जीवन की उस लय का अंग है जिसमें दिन भिक्षाटन, भोजन, अध्ययन और ध्यान के चारों ओर ढला है।

सोना-चाँदी

शील १० 'जातरूप-रजत-पटिग्गहण' है, अर्थात् सोना-चाँदी ग्रहण करने से विरति, जिसे मठीय अनुशासन धन से विरति समझता है। आज अनेक विहार धन का प्रबन्ध गृहस्थ व्यवस्थापकों के माध्यम से करते हैं।

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