Bharat Devotion
Embroidered artwork for त्रिशरण (तीन शरणों का मंत्र): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

त्रिशरण (तीन शरणों का मंत्र)

त्रिशरण (तीन शरणों का मंत्र)

यह बौद्ध धर्म का सबसे प्रमुख शरण-मंत्र है, जिसमें व्यक्ति बुद्ध, उनकी शिक्षा (धम्म) और उनके संघ (समुदाय) की शरण लेता है। इसे तीन बार दोहराकर अपनी आस्था और समर्पण व्यक्त किया जाता है।

श्लोक

बुद्धं सरणं गच्छामि। धम्मं सरणं गच्छामि। सङ्घं सरणं गच्छामि।
Buddham Sharanam Gacchami Dhammam Sharanam Gacchami Sangham Sharanam Gacchami

श्लोक 1

दुतियम्पि बुद्धं सरणं गच्छामि। दुतियम्पि धम्मं सरणं गच्छामि। दुतियम्पि सङ्घं सरणं गच्छामि।
Dutiyampi Buddham Sharanam Gacchami Dutiyampi Dhammam Sharanam Gacchami Dutiyampi Sangham Sharanam Gacchami

श्लोक 2

ततियम्पि बुद्धं सरणं गच्छामि। ततियम्पि धम्मं सरणं गच्छामि। ततियम्पि सङ्घं सरणं गच्छामि।
Tatiyampi Buddham Sharanam Gacchami Tatiyampi Dhammam Sharanam Gacchami Tatiyampi Sangham Sharanam Gacchami

श्लोक 3

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह गाथा बौद्ध परंपरा का सबसे बुनियादी और पवित्र मंत्र है, जिसे 'त्रिशरण' या 'तीन शरण' कहा जाता है। यह पालि भाषा में लिखी गई है और बौद्ध धर्म के आरंभिक ग्रंथों (त्रिपिटक) में खुद्दकपाठ 1 के रूप में मिलती है। विनय के महावग्ग के पहले अध्याय में बुद्ध भिक्षुओं को अनुमति देते हैं कि वे उम्मीदवार से यही तीन शरण पहली, दूसरी और तीसरी बार कहलवाकर प्रव्रज्या और उपसम्पदा दें (सुत्तसेंट्रल pli-tv-kd1, खंड 9)। परंपरागत रूप से इसे किसी भी बौद्ध अनुष्ठान, ध्यान या दैनिक प्रार्थना की शुरुआत में तीन बार दोहराया जाता है — यह बुद्ध, उनकी शिक्षा (धम्म) और उनके अनुयायियों के समुदाय (संघ) के प्रति समर्पण और शरणागति का प्रतीक है। इसका उपयोग बिना किसी विवाद के सभी बौद्ध परंपराओं में होता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

अर्थ

यह 'तीन रत्नों' की शरण लेने का मंत्र है — बुद्ध (ज्ञानी), धर्म (उनकी शिक्षा), और संघ (शिष्य समुदाय)। इसे बौद्ध धर्म का मूल आधार माना जाता है।

उच्चारण विधि

इसे तीन बार दोहराया जाता है (प्रथम, द्वितीय, तृतीय)। यह दृढ़ संकल्प और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। नए बौद्ध बनने वाले व्यक्ति इसे गुरु के सामने दोहराते हैं।

भाषा

यह मंत्र पालि भाषा में है, जो प्राचीन भारतीय भाषा है। बुद्ध ने अपने उपदेश इसी भाषा में दिए थे। 'सरणं गच्छामि' का अर्थ है 'शरण जाता हूँ'।

महत्व

'शरणागमन' या 'Taking Refuge' बौद्ध बनने की औपचारिक घोषणा है। यह केवल मौखिक नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से स्वीकार करने का प्रतीक है।

प्रतीकात्मकता

तीन रत्न तीन सुरक्षा प्रदान करते हैं — बुद्ध मार्गदर्शन, धर्म सही आचरण, और संघ सहयोग। यह त्रिशरण बौद्ध अनुयायी का जीवन-मंत्र है।

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