Bharat Devotion
Embroidered artwork for अंगुलिमाल परित्ता: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

अंगुलिमाल परित्ता

अंगुलिमाल परित्ता

मज्झिम निकाय 86 का बौद्ध रक्षा-पाठ, जिसमें अर्हत अंगुलिमाल प्रसव-पीड़ा से जूझती माता और उसके शिशु की कुशलता की कामना करते हैं।

श्लोक

अङ्गुलिमाल परित्त यतो’हं भगिनि अरियाय जातिया जातो, नाभिजानामि सञ्चिच्च पाणं जीविता वोरोपेता। तेन सच्चेन सोत्थि ते होतु सोत्थि गब्भस्स।
Angulimala Paritta Yatoham bhagini ariyaya jatiya jato, Nabhijanami sanchicca panam jivita voropeta. Tena saccena sotthi te hotu sotthi gabbhassa.

श्लोक 1

सिस्तेर्, सिन्चे बेइन्ग् बोर्न् इन् थे नोब्ले बिर्थ्, इ अम् नोत् अwअरे थत् इ हवे इन्तेन्तिओनल्ल्य् देप्रिवेद् अ बेइन्ग् ओफ़् लिफ़े। ब्य् थिस् त्रुथ् मय् योउ बे wएल्ल्, अन्द् सो मय् थे छिल्द् इन् योउर् wओम्ब्।
Sister, since being born in the Noble Birth, I am not aware that I have intentionally deprived a being of life. By this truth may you be well, And so may the child in your womb.

श्लोक 2

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह परित्ता (रक्षा-पाठ) बौद्ध परंपरा का एक प्रसिद्ध संरक्षण-सूत्र है, जो थेरवाद बौद्ध धर्म में प्रचलित है। इसे पारंपरिक रूप से गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा और प्रसव में सुगमता के लिए पढ़ा जाता है। इसकी उत्पत्ति अंगुलिमाल नामक भिक्षु की कथा से जुड़ी है, जो पहले एक डाकू थे, पर बुद्ध के उपदेश से साधु बने। यह पाठ उनके द्वारा कहे गए सत्य-वचन पर आधारित है, जिसे बौद्ध भिक्षु आज भी गर्भवती माताओं के कल्याण हेतु सुनाते हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Arahant Angulimala

क्या आप जानते हैं?

पृष्ठभूमि

यह पाठ अंगुलिमाल सुत्त (मज्झिम निकाय ८६) से लिया गया है। अंगुलिमाल एक कुख्यात हत्यारा था, जो भगवान बुद्ध से मिलने के बाद अर्हत (पूर्ण ज्ञानी) बन गया। यह उसी अर्हत अंगुलिमाल द्वारा कहा गया सत्य-क्रिया (सच्चाई की घोषणा) है।

"आर्य जाति" का अर्थ

यहाँ "आर्य जाति" का तात्पर्य शारीरिक जन्म से नहीं, बल्कि अर्हतत्व प्राप्त करने के बाद के आध्यात्मिक पुनर्जन्म से है। इसीलिए वे कहते हैं कि इस जन्म के बाद से उन्होंने जानबूझकर किसी प्राणी की हत्या नहीं की।

सत्य-क्रिया का सिद्धांत

यह पाठ "सत्य-क्रिया" (Act of Truth) का उत्कृष्ट उदाहरण है। भारतीय परंपरा में यह माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन के किसी अटल सत्य का उच्चारण करता है, तो उस सत्य की शक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

परंपरा में प्रयोग

थेरवाद बौद्ध देशों (श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार) में गर्भवती महिलाओं के लिए यह पाठ विशेष रूप से किया जाता है। इसे प्रायः पानी पर पढ़ा जाता है, और उस पानी को पीने से प्रसव सुखद और सुरक्षित होता है, ऐसी मान्यता है।

करुणा का प्रतीक

यह पाठ उस समय कहा गया था जब अंगुलिमाल ने एक प्रसव पीड़ा से जूझती महिला को देखा। अपने पूर्व क्रूर जीवन के बावजूद, उनके हृदय में करुणा उत्पन्न हुई, जो बुद्धत्व की परिवर्तनकारी शक्ति को दर्शाती है।

परित्त (सुरक्षा-पाठ) परंपरा

यह "परित्त" (Paritta) नामक सुरक्षात्मक मंत्रों की श्रेणी में आता है। बौद्ध परंपरा में इन पाठों को विपत्ति, भय और बीमारी से रक्षा के लिए विधिवत रूप से गाया जाता है।

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