Bharat Devotion
Embroidered artwork for मन का अध्याय (चित्त वग्ग): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

मन का अध्याय (चित्त वग्ग)

मन का अध्याय (चित्त वग्ग)

यह बुद्ध के वचनों का एक संग्रह है, जो मन की चंचलता, उसे वश में करने के महत्व और इससे मिलने वाले सुख तथा मुक्ति के बारे में बताता है।

श्लोक

३३। फन्दनं चपलं चित्तं, दूरक्खं दुन्निवारयं; उजुं करोति मेधावी, उसुकारोव तेजनं।
33. Phandanam chapalam chittam, Doorakkham dunnivaarayam; Ujum karoti medhaavee, Usukaarova tejanam.

श्लोक 1

३४। वारिजोव थले खित्तो, ओकमोकतौब्भतो; परिफन्दतिदं चित्तं, मारधेय्यं पहातवे।
34. Vaarijova thale khitto, Okamokataubbhato; Pariphandatidam chittam, Maaradheyyam pahaatave.

श्लोक 2

३५। दुन्निग्गहस्स लहुनो, यत्थकामनिपातिनो; चित्तस्स दमथो साधु, चित्तं दन्तं सुखावहं।
35. Dunniggahassa lahuno, Yatthakaamanipaatino; Chittassa damatho saadhu, Chittam dantam sukhaavaham.

श्लोक 3

३६। सुदुद्दसं सुनिपुणं, यत्थकामनिपातिनं; चित्तं रक्खेथ मेधावी, चित्तं गुत्तं सुखावहं।
36. Sududdasam sunipunam, Yatthakaamanipaatinam; Chittam rakkhetha medhaavee, Chittam guttam sukhaavaham.

श्लोक 4

३७। दूरङ्गमं एकचरं, असरीरं गुहासयं; ये चित्तं संयमिस्सन्ति, मोक्खन्ति मारबन्धना।
37. Doorangamam ekacharam, Asareeram guhaasayam; Ye chittam samyamissanti, Mokkhanti maarabandhanaa.

श्लोक 5

३८। अनवट्ठितचित्तस्स, सद्धम्मं अविजानतो; परिप्लवपसादस्स, पञ्ञा न परिपूरति।
38. Anavatthitachittassa, Saddhammam avijaanato; Pariplavapasaadassa, Pannaa na paripoorati.

श्लोक 6

३९। अनवस्सुतचित्तस्स, अनन्वाहतचेतसो; पुञ्ञपापपहीनस्स, नत्थि जागरतो भयं।
39. Anavassutachittassa, Ananvaahatachetaso; Punyapaapapaheenassa, Natthi jaagarato bhayam.

श्लोक 7

४०। कुम्भूपमं कायमिमं विदित्वा, नगरूपमं चित्तमिदं ठपेत्वा; योधेथ मारं पञ्ञावुधेन, जितञ्च रक्खे अनिवेसनो सिया।
40. Kumbhoopamam kaayamimam viditvaa, Nagaroopamam chittamidam thapetvaa; Yodhetha maaram pannaavudhena, Jitancha rakkhe anivesano siyaa.

श्लोक 8

४१। अचिरं वतयं कायो, पथविं अधिसेस्सति; छुद्धो अपेतविञ्ञाणो, निरत्थंव कलिङ्गरं।
41. Achiram vatayam kaayo, Pathavim adhisessati; Chuddho apetavinnaano, Niratthamva kalingaram.

श्लोक 9

४२। दिसो दिसं यं तं कयिरा, वेरी वा पन वेरिनं; मिच्छापणिहितं चित्तं, पापियो नं ततो करे।
42. Diso disam yam tam kayiraa, Veree vaa pana verinam; Michchhaapanihitam chittam, Paapiyo nam tato kare.

श्लोक 10

४३। न तं माता पिता कयिरा, अञ्ञे वापि च ञातका; सम्मापणिहितं चित्तं, सेय्यसो नं ततो करे। चित्तवग्गो ततियो।
43. Na tam maataa pitaa kayiraa, Annye vaapi cha nyaatakaa; Sammaapanihitam chittam, Seyyaso nam tato kare. Chittavaggo tatiyo.

श्लोक 11

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह अध्याय पालि धम्मपद (खुद्दक निकाय, पालि त्रिपिटक) का चित्त वग्ग (मन का अध्याय), गाथा 33–43 है। धम्मपद बुद्ध के उपदेशों का एक संग्रह है, जिसे पारंपरिक रूप से उन्हीं के शब्द माना जाता है। इसका प्रयोग ध्यान और नैतिक शिक्षा के लिए किया जाता है, ताकि मन को समझा और वश में किया जा सके। यह ग्रंथ बौद्ध परंपरा में सबसे प्रसिद्ध और प्रिय ग्रंथों में से एक है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

स्रोत

ये गाथाएँ बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ धम्मपद के चित्त वर्ग (मन के अध्याय) से हैं। धम्मपद में बुद्ध के 423 उपदेश संगृहीत हैं, जो त्रिपिटक के खुद्दक निकाय का हिस्सा हैं।

तीरंदाज और बाण का दृष्टांत (गाथा 33)

जैसे तीर बनाने वाला कारीगर आग में तपाकर टेढ़े बाण को सीधा करता है, वैसे ही बुद्धिमान साधक अपने चंचल, अस्थिर और भटकते हुए चित्त को साधना से सीधा और स्थिर करता है।

जल से बाहर मछली का रूपक (गाथा 34)

जैसे पानी से बाहर थल पर फेंकी गई मछली छटपटाती और तड़पती है, वैसे ही मार (काम-वासनाओं) के जाल से छूटने का प्रयास करते समय यह चित्त भी पुरानी आदतों के कारण तड़पता और कांपता है।

मिट्टी का घड़ा और मन का किला (गाथा 40)

शरीर को मिट्टी के कच्चे घड़े के समान क्षणभंगुर जानकर और चित्त को सुरक्षित किले की तरह बनाकर, प्रज्ञा के अस्त्र से मार से युद्ध करना चाहिए और जीती हुई आंतरिक शांति को बिना आसक्ति के सुरक्षित रखना चाहिए।

सर्वश्रेष्ठ हितैषी और सबसे बड़ा शत्रु (गाथा 42–43)

कोई शत्रु किसी शत्रु का उतना अनिष्ट नहीं कर सकता जितना कि सन्मार्ग से भटका हुआ दुर्विनीत मन करता है; और कोई माता-पिता या सगे-संबंधी भी उतना परम हित नहीं कर सकते जितना कि सन्मार्ग में लगा हुआ सधा हुआ मन करता है।

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