Bharat Devotion
Embroidered artwork for बाल वर्ग: मूर्ख और अज्ञानी का स्वभाव (गाथा 60–75): Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

बाल वर्ग

मूर्ख और अज्ञानी का स्वभाव (गाथा 60–75)

बाल वर्ग में 16 सारगर्भित गाथाएँ (60–75) संकलित हैं, जिनमें अज्ञानी और मूर्ख (बाल) के दोषों, अहंकार और आत्मघाती प्रवृत्तियों का मार्मिक उद्घाटन किया गया है। भगवान बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि जो मूर्ख अपनी मूर्खता को पहचानता है, वह उस सीमा तक ज्ञानी है; किंतु जो मूर्ख स्वयं को पंडित समझता है, वही सच्चा मूर्ख है। चमचे और जीभ के भोजन-रस चखने के दृष्टांत द्वारा वे समझाते हैं कि सांसारिक लाभ का मार्ग अलग है और निर्वाण का मार्ग सर्वथा भिन्न है।

श्लोक

६०। दीघा जागरतो रत्ति, दीघं सन्तस्स योजनं; दीघो बालानं संसारो, सद्धम्मं अविजानतं।

श्लोक 1

६१। चरञ्चे नाधिगच्छेय्य, सेय्यं सदिसमत्तनो; एकचरियं दऌहं कयिरा, नत्थि बाले सहायता।

श्लोक 2

६२। पुत्ता म्ऽअत्थि धनम् म्ऽअत्थि, इति बालो विहञ्ञति; अत्ता हि अत्तनो नत्थि, कुतो पुत्ता कुतो धनं।

श्लोक 3

६३। यो बालो मञ्ञति बाल्यं, पण्डितो वापि तेन सो; बालो च पण्डितमानी, स वे ऽबालोऽति वुच्चति।

श्लोक 4

६४। यावजीवम्पि चे बालो, पण्डितं पयिरुपासति; न सो धम्मं विजानाति, दब्बी सूपरसं यथा।

श्लोक 5

६५। मुहुत्तमपि चे विञ्ञू, पण्डितं पयिरुपासति; खिप्पं धम्मं विजानाति, जिव्हा सूपरसं यथा।

श्लोक 6

६६। चरन्ति बाला दुम्मेधा, अमत्तेनेव सत्तुना; करोन्ता पापकं कम्मं, यं होति कटुकप्फलं।

श्लोक 7

६७। न तं कम्मं कतं साधु, यं कत्वा अनुतप्पति; यस्स अस्सुमुखो रोदं, विपाकं पटिसेवति।

श्लोक 8

६८। तञ्च कम्मं कतं साधु, यं कत्वा नानुतप्पति; यस्स पतीतो सुमनो, विपाकं पटिसेवति।

श्लोक 9

६९। मधुवा मञ्ञति बालो, याव पापं न पच्चति; यदा च पच्चति पापं, अथ बालो दुक्खं निगच्छति।

श्लोक 10

७०। मासे मासे कुसग्गेन, बालो भुञ्जेथ भोजनं; न सो सङ्खातधम्मानं, कलं अग्घति सोऌअसिं।

श्लोक 11

७१। न हि पापं कतं कम्मं, सज्जुखीरंव मुच्चति; डहन्तं बालमन्वेति, भस्मच्छन्नो व पावको।

श्लोक 12

७२। यावदेव अनत्थाय, ञत्तं बालस्स जायति; हन्ति बालस्स सुक्कंसं, मुद्धमस्स विपातयं।

श्लोक 13

७३। असन्तं भावनमिच्छेय्य, पुरेक्खारञ्च भिक्खुसु; आवासेसु च इस्सरियं, पूजा परकुलेसु च।

श्लोक 14

७४। ममेव कत मञ्ञन्तु, गिही पब्बजिता उभो; ममेव अतिवसा अस्सु, किच्चाकिच्चेसु किस्मिचि; इति बालस्स सङ्कप्पो, इच्छा मानो च वड्ढति।

श्लोक 15

७५। अञ्ञा हि लाभूपनिसा, अञ्ञा निब्बानगामिनी; एवमेतं अभिञ्ञाय, भिक्खु बुद्धस्स सावको; सक्कारं नाभिनन्देय्य, विवेकमनुब्रूहये।

श्लोक 16

पृष्ठभूमि

बौद्ध वाङ्मय में 'बाल' शब्द किसी आयु का नहीं, अपितु आध्यात्मिक रूप से अबोध, अज्ञानी और मोहाविष्ट मन का प्रतीक है जो कर्म-विपाक के अकाट्य नियम से अनभिज्ञ है। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, कोसल नरेश प्रसेनजित जब दूसरे की सुंदर पत्नी को देखकर काम-वासना से व्याकुल हो रात भर सो नहीं सके, तब तथागत ने गाथा 60 उपदेशित की। इसी प्रकार कूट-तपस्या, पाखंड और सांसारिक लाभ में लिप्त भिक्षुओं को चेताने के लिए बुद्ध ने इन गाथाओं का उद्घोष किया।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल

लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।

क्या आप जानते हैं?

जागते हुए की लंबी रात और संसार (गाथा 60)

जो रात भर जागता है उसके लिए रात बहुत लंबी होती है, जो थका हुआ है उसके लिए एक योजन की दूरी भी बहुत लंबी होती है; ठीक वैसे ही सत्य धर्म को न जानने वाले मूर्खों के लिए जन्म-मरण का संसार अत्यंत लंबा और कष्टकर होता है।

चमचे और जीभ का अनुपम दृष्टांत (गाथा 64–65)

मूर्ख व्यक्ति यदि जीवन भर किसी प्रज्ञावान के सान्निध्य में रहे, तब भी वह धर्म का मर्म नहीं जान पाता जैसे दाल का चमचा दाल के स्वाद को कभी नहीं चख पाता; किंतु बुद्धिमान व्यक्ति पल भर में धर्म को समझ लेता है जैसे जीभ तत्काल भोजन का स्वाद जान लेती है।

'पुत्र मेरे हैं, धन मेरा है' का भ्रम (गाथा 62)

मूर्ख मनुष्य यह सोचकर व्यर्थ संताप करता रहता है कि 'ये मेरे पुत्र हैं, यह मेरा धन है।' जब वह स्वयं अपना नहीं है, तो फिर पुत्र और धन उसके कैसे हो सकते हैं?

दूध और राख में ढकी आग (गाथा 71)

किया गया पाप कर्म ताजे दुहे दूध की तरह तुरंत नहीं फटता; बल्कि राख में ढकी आग की तरह अंदर ही अंदर सुलगता हुआ अंततः मूर्ख को जला देता है।

दो विपरीत मार्ग (गाथा 75)

सांसारिक लाभ व प्रतिष्ठा का मार्ग एक है, और परम निर्वाण को जाने वाला मार्ग सर्वथा दूसरा है। इस भेद को भली-भाँति जानकर साधक को सांसारिक सत्कार की कामना छोड़कर एकांत विवेक की साधना करनी चाहिए।

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