बाल वर्ग में 16 सारगर्भित गाथाएँ (60–75) संकलित हैं, जिनमें अज्ञानी और मूर्ख (बाल) के दोषों, अहंकार और आत्मघाती प्रवृत्तियों का मार्मिक उद्घाटन किया गया है। भगवान बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि जो मूर्ख अपनी मूर्खता को पहचानता है, वह उस सीमा तक ज्ञानी है; किंतु जो मूर्ख स्वयं को पंडित समझता है, वही सच्चा मूर्ख है। चमचे और जीभ के भोजन-रस चखने के दृष्टांत द्वारा वे समझाते हैं कि सांसारिक लाभ का मार्ग अलग है और निर्वाण का मार्ग सर्वथा भिन्न है।
श्लोक
जागते रहने वाले के लिए रात लंबी होती है; थके हुए यात्री के लिए योजन भर का मार्ग लंबा होता है; और सत्य धर्म को न जानने वाले मूर्खों के लिए यह संसार (जन्म-मरण चक्र) अत्यंत लंबा होता है।
श्लोक 1
यदि यात्रा करते हुए अपने से श्रेष्ठ या समान गुणवान साथी न मिले, तो अकेले ही दृढ़तापूर्वक चलना श्रेयस्कर है; मूर्ख के साथ कोई मित्रता या साहचर्य संभव नहीं है।
श्लोक 2
'मेरे पास पुत्र हैं, मेरे पास धन है' — ऐसा सोचकर मूर्ख संताप करता रहता है। जब वह स्वयं अपना नहीं है, तब पुत्र किसके और धन किसका?
श्लोक 3
जो मूर्ख अपनी मूर्खता को जानता है, वह कम से कम उस कारण से पंडित (बुद्धिमान) है; परंतु जो मूर्ख स्वयं को बुद्धिमान मानता है, वास्तव में वही परम मूर्ख कहलाता है।
श्लोक 4
मूर्ख व्यक्ति भले ही जीवन भर किसी प्रज्ञावान के सान्निध्य में रहे, वह धर्म को कभी नहीं समझ पाता, जैसे चमचा दाल या सूप के स्वाद को कभी नहीं जान पाता।
श्लोक 5
परंतु बुद्धिमान व्यक्ति यदि पल भर के लिए भी किसी प्रज्ञावान के संपर्क में आता है, तो वह शीघ्र ही धर्म को हृदयंगम कर लेता है, जैसे जीभ तुरंत सूप के स्वाद को पहचान लेती है।
श्लोक 6
मन्दबुद्धि मूर्ख लोग अपने ही शत्रु बनकर विचरण करते हैं; वे ऐसे पाप कर्म करते हैं जिनका फल अत्यंत कड़वा और दुःखदायी होता है।
श्लोक 7
वह कर्म कभी भला नहीं कहा जा सकता जिसे करने के बाद मनुष्य को पछताना पड़े, और जिसका फल उसे रोते हुए अश्रुपूर्ण नेत्रों से भोगना पड़े।
श्लोक 8
किंतु वह कर्म भली-भाँति किया हुआ है जिसे करने के बाद मनुष्य को कोई पश्चात्ताप नहीं होता, और जिसके मधुर विपाक को वह प्रसन्नचित्त और आनंदित होकर भोगता है।
श्लोक 9
जब तक पाप कर्म पकता (फलित) नहीं होता, तब तक मूर्ख उसे शहद के समान मीठा समझता है; परंतु जब वह पाप पक जाता है, तब मूर्ख घोर दुःख में डूब जाता है।
श्लोक 10
मूर्ख व्यक्ति भले ही कठोर तप करते हुए महीने-दर-महीने कुशा घास की नोक से थोड़ा-सा अन्न खाए; फिर भी वह सत्य धर्म को जान लेने वाले ज्ञानी के सोलहवें भाग के बराबर भी मूल्यवान नहीं है।
श्लोक 11
किया गया पाप कर्म तुरंत ताजे निकाले हुए दूध की भाँति नहीं फटता; बल्कि वह राख से ढकी आग की तरह भीतर ही भीतर सुलगता हुआ मूर्ख का पीछा करता है और उसे जला देता है।
श्लोक 12
मूर्ख को जो भी ज्ञान या प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, वह केवल उसके अनिष्ट और विनाश के लिए ही होती है; वह उसके सद्गुणों को नष्ट कर देती है और उसके मस्तक (विवेक) को विदीर्ण कर देती है।
श्लोक 13
मूर्ख मनुष्य असत्य प्रशंसा और अयोग्य सम्मान की इच्छा करता है—भिक्षुओं के बीच अग्रस्थान, विहारों में आधिपत्य और गृहस्थ कुलों में विशेष आदर-सत्कार चाहता है।
श्लोक 14
'गृहस्थ और संन्यासी दोनों यही मानें कि यह कार्य केवल मैंने किया है; हर छोटे-बड़े काम में सब मेरे ही अधीन रहें' — मूर्ख का ऐसा मिथ्या विचार होता है, जिससे उसकी तृष्णा और अहंकार निरंतर बढ़ते हैं।
श्लोक 15
संसार में धन-लाभ व प्रतिष्ठा का मार्ग एक है, और परम निर्वाण तक जाने वाला मार्ग सर्वथा दूसरा है। इस सत्य को भली-भाँति जानकर तथागत बुद्ध का शिष्य भिक्षु सांसारिक सत्कार में लिप्त न हो, अपितु एकांत विवेक और आत्म-संयम का संवर्धन करे।
श्लोक 16
पृष्ठभूमि
बौद्ध वाङ्मय में 'बाल' शब्द किसी आयु का नहीं, अपितु आध्यात्मिक रूप से अबोध, अज्ञानी और मोहाविष्ट मन का प्रतीक है जो कर्म-विपाक के अकाट्य नियम से अनभिज्ञ है। धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार, कोसल नरेश प्रसेनजित जब दूसरे की सुंदर पत्नी को देखकर काम-वासना से व्याकुल हो रात भर सो नहीं सके, तब तथागत ने गाथा 60 उपदेशित की। इसी प्रकार कूट-तपस्या, पाखंड और सांसारिक लाभ में लिप्त भिक्षुओं को चेताने के लिए बुद्ध ने इन गाथाओं का उद्घोष किया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
जागते हुए की लंबी रात और संसार (गाथा 60)
जो रात भर जागता है उसके लिए रात बहुत लंबी होती है, जो थका हुआ है उसके लिए एक योजन की दूरी भी बहुत लंबी होती है; ठीक वैसे ही सत्य धर्म को न जानने वाले मूर्खों के लिए जन्म-मरण का संसार अत्यंत लंबा और कष्टकर होता है।
चमचे और जीभ का अनुपम दृष्टांत (गाथा 64–65)
मूर्ख व्यक्ति यदि जीवन भर किसी प्रज्ञावान के सान्निध्य में रहे, तब भी वह धर्म का मर्म नहीं जान पाता जैसे दाल का चमचा दाल के स्वाद को कभी नहीं चख पाता; किंतु बुद्धिमान व्यक्ति पल भर में धर्म को समझ लेता है जैसे जीभ तत्काल भोजन का स्वाद जान लेती है।
'पुत्र मेरे हैं, धन मेरा है' का भ्रम (गाथा 62)
मूर्ख मनुष्य यह सोचकर व्यर्थ संताप करता रहता है कि 'ये मेरे पुत्र हैं, यह मेरा धन है।' जब वह स्वयं अपना नहीं है, तो फिर पुत्र और धन उसके कैसे हो सकते हैं?
दूध और राख में ढकी आग (गाथा 71)
किया गया पाप कर्म ताजे दुहे दूध की तरह तुरंत नहीं फटता; बल्कि राख में ढकी आग की तरह अंदर ही अंदर सुलगता हुआ अंततः मूर्ख को जला देता है।
दो विपरीत मार्ग (गाथा 75)
सांसारिक लाभ व प्रतिष्ठा का मार्ग एक है, और परम निर्वाण को जाने वाला मार्ग सर्वथा दूसरा है। इस भेद को भली-भाँति जानकर साधक को सांसारिक सत्कार की कामना छोड़कर एकांत विवेक की साधना करनी चाहिए।
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