भिक्षु वर्ग: सच्चे भिक्षु के लक्षण, ध्यान और आत्मसंयम (गाथा 360–382)
भिक्षु वर्ग में 23 अत्यंत प्रेरणादायी गाथाएँ (360–382) संकलित हैं, जो संन्यासी के आदर्श चरित्र, षड-इंद्रिय संवर (संयम) और गहन ध्यान की अवस्थाओं का निरूपण करती हैं। अध्याय का शुभारंभ आँख, कान, नाक, जीभ, काया, वाणी और मन के पवित्र संयम से होता है। गाथा 369 में नाव का सुंदर रूपक है: 'हे भिक्षु! इस नाव (शरीर/चित्त) में भरे विकारों के पानी को उलीच दो! खाली होने पर यह तेजी से तैरेगी; राग और द्वेष को काटकर तुम सीधे निर्वाण को प्राप्त करोगे।' गाथा 372 में ध्यान (शमथ) और प्रज्ञा (विपश्यना) का अनिवार्य समन्वय प्रतिपादित है: 'बिना प्रज्ञा के ध्यान नहीं होता, और बिना ध्यान के प्रज्ञा नहीं होती; जिसमें ध्यान और प्रज्ञा दोनों हैं, वह निर्वाण के अत्यंत निकट है।' गाथा 380 आत्म-शरण का अमर उद्घोष करती है: 'मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी और रक्षक है; दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?'
23 verses