ब्राह्मण वर्ग धम्मपद का मुकुटमणि, सर्वाधिक विस्तृत (41 गाथाएँ, 383–423) और चरम शिखर है। इस महान उपदेश में तथागत ने 'ब्राह्मण' शब्द को जन्म, कुल, जटा, मृगचर्म और बाह्य यज्ञ-हवन की संकीर्ण परिधियों से मुक्त करके आंतरिक विशुद्धि, शील और परम अर्हत्व का सर्वोच्च आध्यात्मिक पद घोषित किया। 'तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं' (उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ) के पावन और अनुनादी उद्घोष के साथ बुद्ध उस पूर्ण मुक्त महामानव का चित्रण करते हैं: जो समस्त प्राणियों के प्रति पूर्णतः अहिंसक है, जो कीचड़ में कमल और सूई की नोक पर सरसों के दाने की तरह सांसारिक भोगों में सर्वथा निर्लेप रहता है, जिसके सारे राग, द्वेष और अविद्या नष्ट हो चुके हैं, और जो स्वयं भव-सागर को पार कर अमर निर्वाण में प्रतिष्ठित है।
श्लोक
383. पराक्रम करो और तृष्णा के प्रवाह को काट डालो, काम-वासनाओं को दूर भगा दो, हे ब्राह्मण! समस्त संस्कारों के विनाश (अनित्यता) को जानकर, तुम असंस्कृत (अविनाशी निर्वाण) के ज्ञाता बन जाओगे!
श्लोक 1
384. जब ब्राह्मण (साधक) दो धर्मों—शमथ (चित्त की एकाग्रता) और विपश्यना (तत्व-ज्ञान)—में पारंगत हो जाता है, तब उस ज्ञानी के समस्त बंधन समूल नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 2
385. जिसके लिए न पार का किनारा है (बाह्य विषय), न इस पार का किनारा (आंतरिक इंद्रियाँ), और न दोनों का कोई बंधन; जो संताप-रहित और सर्वथा आसक्ति-मुक्त है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 3
386. जो ध्यानस्थ है, रज (मल) से रहित है, शांत भाव से आसीन है, जिसने समस्त कर्तव्य पूर्ण कर लिए हैं (कृतकृत्य), जो आस्रव-शून्य है, और जिसने परम लक्ष्य (निर्वाण) को प्राप्त कर लिया है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 4
387. सूर्य दिन में तपता है; चंद्रमा रात में प्रकाशित होता है; कवच धारण किए हुए क्षत्रिय राजा चमकता है; और ध्यानी ब्राह्मण समाधि में तपता है; किंतु तथागत बुद्ध दिन-रात निरंतर अपने असीम पुण्य-तेज से प्रकाशित रहते हैं।
श्लोक 5
388. पापों को बाहर निकाल देने (बहा देने) के कारण वह 'ब्राह्मण' कहलाता है; समतापूर्ण शांत आचरण के कारण वह 'श्रमण' कहलाता है; और अपने मलों को दूर भगा देने के कारण वह 'प्रव्रजित' (संन्यासी) कहलाता है।
श्लोक 6
389. किसी सच्चे ब्राह्मण (पवित्र साधक) पर कभी प्रहार नहीं करना चाहिए, और न ही ब्राह्मण को प्रहार करने वाले पर क्रोध छोड़ना चाहिए। धिक्कार है ब्राह्मण को मारने वाले पर, और उससे भी बड़ा धिक्कार है उस पर जो क्रोध के बदले क्रोध प्रकट करता है!
श्लोक 7
390. ब्राह्मण के लिए यह कोई छोटा लाभ नहीं है जब वह अपने मन को प्रिय भोगों से रोक लेता है। जहाँ-जहाँ से हिंसा की भावना हटती जाती है, वहीं-वहीं से दुःख शांत होता जाता है।
श्लोक 8
391. जिसके द्वारा काया से, वाणी से और मन से कोई बुरा कर्म नहीं होता; जो इन तीनों द्वारों से पूर्णतः संयत है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 9
392. जिससे सम्यक सम्बुद्ध द्वारा उपदेशित पावन धर्म का ज्ञान प्राप्त हो, उस गुरु की परम श्रद्धा और आदर के साथ वंदना करे, ठीक वैसे ही जैसे अग्निहोत्री ब्राह्मण पावन अग्नि की उपासना करता है।
श्लोक 10
393. न जटाओं से, न कुल-गोत्र से, और न जातिगत जन्म से कोई ब्राह्मण होता है। जिसमें सत्य और धर्म विद्यमान हैं, वही पवित्र है और वही सच्चा ब्राह्मण है!
श्लोक 11
394. हे दुर्बुद्धि! तेरी इन सिर की जटाओं से क्या प्रयोजन? और तेरे इस मृगचर्म के वस्त्र से क्या लाभ? तेरे भीतर तो विकारों का घना जंगल भरा पड़ा है, और तू केवल अपने बाहर को माँज रहा है!
श्लोक 12
395. जो पांसुकूल (कचरे से उठाए गए चिथड़ों का) चीवर धारण करता है, जो कृशकाय है और जिसके शरीर की नसें बाहर दिखाई दे रही हैं, तथा जो वन में अकेला ध्यानस्थ रहता है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 13
396. केवल ब्राह्मण माता की योनि से जन्म लेने के कारण ही मैं किसी को ब्राह्मण नहीं कहता। यदि वह परिग्रह और आसक्ति से युक्त है, तो वह केवल घमंडी 'भो-वादी' (औपचारिक संबोधन करने वाला) है। जिसके पास कोई परिग्रह नहीं है और जो किसी वस्तु में आसक्त नहीं होता—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 14
397. जिसने समस्त बंधनों (संयोजनों) को काट दिया है, जो कभी भय से कांपता नहीं; जो समस्त आसक्तियों के पार उतर चुका है और पूर्ण विमुक्त है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 15
398. जिसने चमड़े की पट्टी (द्वेष), लगाम (तृष्णा), रस्सी (मिथ्या दृष्टियाँ) और उसकी नकेल (सुप्त विकार) को काट दिया है, और जिसने अविद्या की अर्गला (फाटक की कुंडी) को उखाड़ फेंका है—उस प्रबुद्ध पुरुष को ही मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 16
399. जो मन में बिना किसी द्वेष के गाली, मार-पीट और कारागार के बंधनों को धैर्यपूर्वक सहन करता है; जिसकी सहनशीलता ही उसकी सेना है और क्षमा ही जिसका बल है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 17
400. जो क्रोध-रहित है, व्रती है, शीलवान है, तृष्णा-शून्य है, अपने मन को साध चुका है, और अपने अंतिम शरीर को धारण किए हुए है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 18
401. जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूँद नहीं चिपकती, और जैसे सूई (आर) की तीखी नोक पर सरसों का दाना नहीं टिकता, वैसे ही जो काम-भोगों में कभी लिप्त नहीं होता—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 19
402. जो इसी जीवन में अपने समस्त दुःखों के अंत (क्षय) को साक्षात जान लेता है, जिसने संसार के भारी बोझ को नीचे उतार दिया है और जो सर्वथा बंधन-मुक्त है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 20
403. जो गंभीर प्रज्ञा वाला है, मेधावी है, सन्मार्ग और कुमार्ग के भेद का मर्मज्ञ है, और जिसने परम लक्ष्य (निर्वाण) को प्राप्त कर लिया है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 21
404. जो न गृहस्थों के साथ अत्यधिक घुलता-मिलता है और न संन्यासियों के साथ; जो गृहहीन होकर विचरण करता है और अत्यंत अल्पेच्छ (संतोषी) है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 22
405. जिसने त्रस (भयभीत होने वाले निर्बल) और स्थावर (दृढ़) समस्त प्राणियों के प्रति दंड (हिंसा) को त्याग दिया है; जो न स्वयं किसी की हत्या करता है और न दूसरों से करवाता है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 23
406. जो वैरियों के बीच वैर-रहित है, लाठी-डंडे उठाने वाले हिंसक लोगों के बीच शांत और निर्विकार है, और भोगों में चिपटने वालों के बीच सर्वथा अनासक्त है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 24
407. जिसके भीतर से राग, द्वेष, अहंकार और कपट (मक्ख) वैसे ही गिर चुके हैं जैसे सूई की तीखी नोक से सरसों का दाना फिसलकर गिर जाता है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 25
408. जो ऐसी वाणी बोलता है जो कोमल (अकर्कश), ज्ञानवर्धक और सत्य हो, तथा जिससे किसी को भी कष्ट या ठेस न पहुँचे—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 26
409. जो इस संसार में बिना दी हुई किसी भी वस्तु को नहीं लेता—चाहे वह लंबी हो या छोटी, सूक्ष्म हो या स्थूल, सुंदर हो या असुंदर—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 27
410. जिसके भीतर न इस लोक के लिए कोई तृष्णा है और न परलोक के लिए; जो समस्त आशाओं से रहित (निराश) और पूर्णतः विमुक्त है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 28
411. जिसके भीतर कोई आसक्ति (आलय) नहीं बची है, जो तत्व-ज्ञान के कारण समस्त संशयों से सर्वथा मुक्त हो चुका है, और जो अमृत-पद (निर्वाण) में अवगाहन कर चुका है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 29
412. जिसने इस संसार में पुण्य और पाप दोनों के आसक्ति-युक्त बंधनों को पार कर लिया है; जो शोक-रहित, रज (मैल) से रहित और परम शुद्ध है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 30
413. चंद्रमा के समान जो विमल, शुद्ध, परम प्रसन्न और क्षोभ-रहित है, तथा जिसके भीतर पुनर्जन्म (भव) का नंदी-राग (आनंद/तृष्णा) सर्वथा क्षीण हो चुका है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 31
414. जो इस दुर्गम दलदल (संसार और मोह) को पार कर गया है; जो भव-सागर के उस पार पहुँच चुका है, ध्यानी है, निष्कंप (अडिग) है, संशय-रहित है, और अनासक्त होकर परम शांत (निर्वाण-प्राप्त) हो चुका है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 32
415. जिसने इस संसार में काम-भोगों का त्याग कर दिया है और जो गृहहीन होकर संन्यास में विचरण करता है; जिसकी काम-तृष्णा और भव-बंधन सर्वथा क्षीण हो चुके हैं—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 33
416. जिसने इस संसार में समस्त तृष्णा का परित्याग कर दिया है और जो गृहहीन होकर संन्यास में विचरण करता है; जिसकी तृष्णा और भव-भ्रमण सर्वथा क्षीण हो चुके हैं—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 34
417. जिसने मानुषी बंधनों (सांसारिक मोह) को त्याग दिया है और जो दिव्य (देवलोक के) बंधनों के भी पार निकल चुका है; जो सब प्रकार के बंधनों से सर्वथा विमुक्त है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 35
418. जिसने सांसारिक रति (राग) और अरति (उदासीनता/द्वेष) दोनों को छोड़ दिया है; जो शीतल-शांत और उपाधि-रहित हो चुका है; समस्त लोकों का विजेता वह वीर पुरुष ही—सच्चा ब्राह्मण कहलाता है।
श्लोक 36
419. जो समस्त प्राणियों की च्युति (मृत्यु) और उत्पत्ति (पुनर्जन्म) को सर्वथा प्रत्यक्ष जानता है; जो अनासक्त, सुगत और प्रबुद्ध (बुद्ध) है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 37
420. जिसकी परलोक-गति को न देव, न गंधर्व और न मनुष्य जान सकते हैं; जिसके समस्त आस्रव (विकार) क्षीण हो चुके हैं, उस पूज्य अर्हंत को ही मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 38
421. जिसके लिए न पहले (अतीत में), न पीछे (भविष्य में), और न बीच (वर्तमान) में कुछ भी अपना है; जो सर्वथा परिग्रह-शून्य और आसक्ति-रहित है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 39
422. जो वृषभ (ऋषभ) के समान श्रेष्ठ, वीर, महर्षि, विजेता, निष्कंप (तृष्णा-रहित), विकारों के मैल से स्नानातक (धुला हुआ), और प्रबुद्ध बुद्ध है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 40
423. जो अपने पूर्वजन्मों को जानता है, जो स्वर्ग और नरक (दुर्गति) को साक्षात देखता है, जिसने पुनर्जन्म के चक्र का सर्वथा क्षय कर दिया है, जो अभिज्ञाओं (परा-विद्याओं) में पारंगत मुनि है, और जिसने आध्यात्मिक साधना की चरम पूर्णाहुति प्राप्त कर ली है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
श्लोक 41
पृष्ठभूमि
धम्मपद-अट्ठकथा के अनुसार यह वर्ग तथागत द्वारा श्रावस्ती और राजगृह में उन प्रसंगों पर कहा गया जहाँ जन्मना ब्राह्मण अपने कुल और जाति का अहंकार करते थे। गाथा 383 एक श्रद्धालु ब्राह्मण के प्रश्न पर कही गई। गाथा 387 उस समय कही गई जब सूर्यास्त के समय राजा प्रसेनजित अपने राजकीय वस्त्रों में चमक रहे थे, और स्थविर कालुदायी समाधि में लीन होकर ध्यान के तेज से प्रकाशित थे; तब बुद्ध ने उद्घोष किया कि सूर्य दिन में तपता है, चंद्रमा रात में चमकता है, राजा सेना के साथ चमकता है, और ध्यानी मुनि ध्यान में तपता है—किंतु बुद्ध अपने असीम पुण्य-तेज से दिन-रात अखंड प्रकाशित रहते हैं। गाथा 393–394 में जटा और मृगचर्म धारण करने वाले दंभी संन्यासियों को फटकार लगाई गई कि बाहर तो तुम काया को माँजते हो, किंतु भीतर विकारों का बीहड़ जंगल भरा पड़ा है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
जन्म या कुल से ब्राह्मण नहीं (गाथा 393)
न जटाओं से, न कुल-गोत्र से, और न माता के गर्भ से जन्म लेने से कोई ब्राह्मण होता है। जिसमें सत्य और धर्म विद्यमान हैं—वही पवित्र है और वही सच्चा ब्राह्मण है!
भीतर का जंगल और बाहर की सफाई (गाथा 394)
हे मूर्ख! तेरी इन जटाओं से क्या लाभ? और तेरे इस मृगचर्म के वस्त्र से क्या लाभ? तेरे भीतर तो विकारों का घना जंगल भरा हुआ है, और तू केवल बाहर से अपने शरीर को माँज रहा है!
सूर्य, चंद्र और बुद्ध का तेज (गाथा 387)
सूर्य दिन में चमकता है, चंद्रमा रात में प्रकाशित होता है, क्षत्रिय योद्धा अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर चमकता है, और ध्यानी मुनि समाधि में तपता है—किंतु तथागत बुद्ध अपने आध्यात्मिक तेज से दिन और रात निरंतर अखंड प्रकाशित रहते हैं।
सूई की नोक पर सरसों (गाथा 401 व 407)
जैसे कमल के पत्ते पर पानी की बूँद नहीं ठहरती, जैसे सूई की तीखी नोक पर सरसों का दाना नहीं टिकता—वैसे ही जो काम-भोगों में लिप्त नहीं होता, जिसके राग, द्वेष और अहंकार नष्ट हो चुके हैं, उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ।
धम्मपद की चरम पूर्णाहुति (गाथा 422–423)
जो श्रेष्ठ, वीर, महर्षि, विजेता, निष्कंप, पापनाशक और बुद्ध है; जो अपने पूर्व जन्मों को जानता है, स्वर्ग और नरक को प्रत्यक्ष देखता है, जिसने जन्म-मरण का सर्वथा क्षय कर लिया है और जो परम प्रज्ञा से संपन्न मुनि है—उसी को मैं सच्चा ब्राह्मण कहता हूँ!
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