अप्रमाद वग्ग — सावधानी और जागरूकता का अध्याय
यह धम्मपद का दूसरा अध्याय है, जिसमें भगवान बुद्ध सिखाते हैं कि सजगता और सावधानी (अप्रमाद) ही अमृत पद अर्थात् निर्वाण का मार्ग है, जबकि लापरवाही (प्रमाद) मृत्यु और दुःख का द्वार है।
श्लोक
21. सावधानी अमृतत्व का मार्ग है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है। सावधान लोग नहीं मरते, जो प्रमादी हैं वे मृत्यु के समान हैं।
श्लोक 1
22. इसको विेशेष रूप से जानकर पण्डित लोग सावधानी में आनन्द पाते हैं, आर्यों के विषय में रत रहते हैं।
श्लोक 2
23. वे धीर, सतत ध्यान में लगे रहने वाले, सदा दृढ़ पराक्रम वाले, परम योगक्षेम (निर्वाण) को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 3
24. जो उद्योग सम्पन्न, स्मृति युक्त, काय-वचन-मन से संयत, धर्म में रत, सावधान और यशस्वी है, उसके यश की वृद्धि होती है, स्मृतिमान को सुख प्राप्त होता है।
श्लोक 4
25. उद्योग, सावधानी, संयम और दम के द्वारा बुद्धिमान व्यक्ति अपने लिए ऐसा द्वीप (शरण) बनाए जो बाढ़ से न डूबे।
श्लोक 5
26. मूर्ख और पृथग्जन प्रमाद (लोक-धर्म) का अनुसरण करते हैं, परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति सावधानी की सबसे उत्तम धन की तरह रक्षा करता है।
श्लोक 6
27. प्रमाद का सेवन मत करो, काम-सुख के संसर्ग में मत पड़ो; क्योंकि सावधान ध्यान करने वाला विपुल सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 7
28. जब पण्डित प्रमाद को सावधानी से मार देता है, तब वह प्रज्ञा के महल (प्रज्ञा-रूप पर्वत) पर चढ़कर अशोक (शोक-रहित) होकर शोकाकुल जनता को, पर्वत पर खड़े व्यक्ति की भाँति धरा पर खड़े मूर्खों को देखता है, ऐसे धीर मूर्खों को ऊपर से देखता है।
श्लोक 8
29. जो प्रमादियों में सावधान, सोते हुए दूसरों में जाग्रत है, वह बुद्धिमान शीघ्र घोड़े के समान दुर्बल घोड़े (प्रमाद) को छोड़कर आगे निकल जाता है।
श्लोक 9
30. सावधानी से मघवा (इनद्र) देवताओं में श्रेष्ठ पद को पहुंचे। सावधानी की सभी प्रशंसा करते हैं, प्रमाद की सदा निन्दा होती है।
श्लोक 10
31. जो भिक्षु अप्रमाद में रमण करता है और प्रमाद में भय देखता है, वह सूक्ष्म और स्थूल सभी संयोजनों (बंधनों) को अग्नि की तरह जलाता हुआ आगे बढ़ता है।
श्लोक 11
32. जो भिक्षु सावधानी में रत है और प्रमाद में भय देखता है, वह हानि के योग्य नहीं होता, वह निर्वाण के निकट है।
श्लोक 12
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
ये श्लोक धम्मपद (भगवान बुद्ध के वचनों का संग्रह) से लिए गए हैं, जो पालि त्रिपिटक — बौद्ध धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ — के सुत्तपिटक के अंतर्गत खुद्दक निकाय (लघु संग्रह) का एक प्रमुख भाग है। यह अध्याय (अप्रमाद वग्ग) धम्मपद का दूसरा अध्याय है और परंपरागत रूप से स्वयं भगवान बुद्ध की वाणी मानी जाती है। थेरवाद बौद्ध परंपरा में, विशेषकर श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड में, इन श्लोकों का नियमित पाठ और मनन किया जाता है, क्योंकि ये भिक्षुओं और गृहस्थों दोनों को सिखाते हैं कि जीवन के हर क्षण में सजग रहना ही आध्यात्मिक उन्नति का आधार है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Gautama Buddha · बौद्ध धर्म के संस्थापक · लगभग 5वीं–6वीं शताब्दी ईसा पूर्व, उत्तर भारत/नेपाल
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम के रूप में जन्मे, उन्होंने बोधि प्राप्त की तथा अपना शेष जीवन उत्तर भारत भर में धम्म की शिक्षा देने में व्यतीत किया। उनके प्रवचन (सुत्त), जो पाली त्रिपिटक में लिखित रूप दिए जाने से पूर्व पीढ़ियों तक मौखिक रूप से संरक्षित रहे, बौद्ध धर्म का सैद्धांतिक आधार हैं।
क्या आप जानते हैं?
प्रसंग
ये गाथाएँ धम्मपद के 'अप्पमाद वग्ग' (सावधानी का अध्याय) से ली गई हैं। इस वर्ग में कुल 12 गाथाएँ हैं, जिनमें भगवान बुद्ध ने प्रमाद (लापरवाही) और अप्पमाद (सावधानी) के विपरीत परिणामों को स्पष्ट किया है।
केंद्रीय संदेश
'अप्पमादो अमतपदं' – सावधानी अमृत (निर्वाण) का मार्ग है, जबकि प्रमाद मृत्यु का मार्ग। यह सीधा और सशक्त उपदेश बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों में से एक है, और पूरे अध्याय में इसी विषय की पुनरावृत्ति होती है।
विशेष संदर्भ
गाथा 9 (यहाँ क्रमांक 9) में 'मघवा' (देवराज इंद्र) का उल्लेख है। बुद्ध कहते हैं कि इंद्र ने सावधानी के बल पर देवताओं में श्रेष्ठ पद प्राप्त किया। यह धम्मपद में एकमात्र स्थान है जहाँ किसी देवता का सीधा उदाहरण दिया गया है।
संरचनात्मक विशेषता
प्रत्येक गाथा में 'अप्पमाद' शब्द की पुनरावृत्ति से अध्याय की एकता और मुख्य विषय पर जोर दिया गया है। यह शैली बौद्ध साहित्य में उपदेशात्मक प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रयोग की जाती है।
व्याख्यात्मक बिंदु
'योगक्खेम' शब्द का अर्थ 'सुरक्षित आश्रय' या 'बंधनों से मुक्ति' है। बुद्ध ने निर्वाण के लिए इस शब्द का प्रयोग किया है, जो संसार के भवसागर से पार जाने का एक स्थिर द्वीप है। इसे धीर (स्थिरबुद्धि) व्यक्ति ही प्राप्त करते हैं।
Buddha
बौद्ध धर्म से और
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