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Embroidered artwork for समय की अनिश्चितता और कर्तव्य की तत्परता: Sant Kabir seated at his weaving loom with an ektara, in an embroidered riverside scene

समय की अनिश्चितता और कर्तव्य की तत्परता

समय की अनिश्चितता और कर्तव्य की तत्परता

यह एक प्रसिद्ध दोहा है जो हमें सिखाता है कि जो काम कल करना है, उसे आज करो, और जो आज करना है, उसे अभी करो। क्योंकि पल भर में प्रलय आ सकती है, फिर करने का समय नहीं मिलेगा।

श्लोक

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब
Kaal Kare So Aaj Kar, Aaj Kare So Ab Pal Mein Parlay Hoegi, Bahuri Karega Kab

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह दोहा संत कबीर की परंपरा से जुड़ा है, जो भारतीय भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख कवि और संत थे। इसे अक्सर प्रवचनों और आध्यात्मिक चर्चाओं में समय के सदुपयोग और कर्तव्य में तत्परता का संदेश देने के लिए सुनाया जाता है। कबीर के दोहे सरल भाषा में गहरी बातें कहते हैं और आज भी लोगों के जीवन में मार्गदर्शक की तरह उपयोग होते हैं। यह दोहा कविताकोश पर कबीर दोहावली के पहले पृष्ठ में दोहा 24 के रूप में कबीर के नाम से दर्ज है; दोहावली बाद का संकलन है, इसलिए कर्तृत्व इसी मुद्रित परंपरा पर टिका है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी

वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।

क्या आप जानते हैं?

रचनाकार

यह दोहा संत कबीरदास का है, जो 15वीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन के प्रमुख कवि थे। उनकी रचनाएँ सीधी-सादी भाषा में गहरे जीवन-सत्य को उजागर करती हैं।

दोहा छंद

यह पद 'दोहा' नामक मात्रिक छंद में रचा गया है, जिसमें पहली और तीसरी पंक्ति में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरी और चौथी में 11-11 मात्राएँ होती हैं। यह छंद हिंदी-साहित्य में नीति और भक्ति के लिए सर्वाधिक प्रचलित है।

काल का तात्पर्य

'काल' शब्द यहाँ दो अर्थों में प्रयुक्त है – एक ओर समय का बोध, दूसरी ओर मृत्यु के देवता यमराज का संकेत। कबीर कहते हैं कि मृत्यु क्षणिक है, इसलिए सत्कर्म में देर न करो।

प्रलय का संदर्भ

'पल में प्रलय होएगी' पंक्ति में 'प्रलय' का अर्थ केवल ब्रह्मांडीय विनाश नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन का अचानक अंत भी है। यह बौद्ध और हिंदू दोनों परंपराओं में अनित्यता (अनिच्चा) के सिद्धांत को दर्शाता है।

व्यावहारिक नीति

यह दोहा केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में कार्य-कुशलता की सीख देता है – 'आज का काम कल पर मत टालो'। कबीर ने इसे धार्मिक अनुष्ठानों से ऊपर उठाकर सार्वभौमिक मानवीय मूल्य बना दिया।

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