चलती चक्की
कबीर का नश्वरता-दोहा
चलती चक्की को देखकर कबीर रो पड़े: संसार के दो पाटों के बीच कोई साबुत नहीं बचता। नश्वरता पर कबीर दोहावली का एक दोहा।
श्लोक
चक्की को चलते देखकर कबीर रो पड़े। दो पाटों के बीच में कोई भी साबुत नहीं बचता।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह दोहा कबीर दोहावली में दोहा 187 के रूप में दर्ज है (कविताकोश, पृष्ठ 2); दोहावली में दूसरी पंक्ति 'दुइ पट भीतर आइके, साबित बचा न कोय' मिलती है, जो यहाँ दिए प्रचलित पाठ का निकट रूपांतर है। कबीर (15वीं शताब्दी) बनारस के जुलाहे-संत और निर्गुण संत परंपरा के स्वर थे; उनके दोहे सत्संगों में और कबीर पंथ के अनुयायियों द्वारा गाए जाते हैं। चक्की घर-घर की वह उपमा है जिसमें संसार के द्वंद्वरूपी दो पाट हर प्राणी को पीस देते हैं, और यह दोहा उस ओर मुड़ने का निमंत्रण है जो घिसता नहीं। कबीर की साखियों और पदों के मानक संग्रह, जैसे बीजक और कबीर ग्रंथावली, इस परंपरा का व्यापक पाठ-आधार हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी
वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।
क्या आप जानते हैं?
प्रसंग
कबीर जी एक चलती चक्की को देखकर भावुक हो गए और यह दोहा कहा। चक्की के दो पाटों के बीच अन्न पिसता है, उसी प्रकार संसार के द्वंद्वों में जीवात्मा पिसती रहती है। इस दृश्य ने उन्हें संसार की व्यर्थता का स्मरण कराया।
प्रतीक
'दुइ पाटन' का अर्थ है जीवन और मृत्यु, या सुख-दुख जैसे द्वंद्व। इनके बीच में कोई भी प्राणी सुरक्षित नहीं बचता। यह संसार को एक पीसने वाली चक्की के रूप में दर्शाता है, जहाँ हर कोई पिसता है।
संदेश
कबीर जी इस दोहे के माध्यम से मानव को माया के मोह से ऊपर उठने का आह्वान करते हैं। जब तक मनुष्य इन द्वंद्वों में फंसा रहेगा, वह पिसता रहेगा। एकमात्र राम-नाम ही इस चक्की से बचा सकता है।
शैली
कबीर की कविता की विशेषता है कि वे साधारण दैनिक जीवन की वस्तुओं से गूढ़ आध्यात्मिक सत्य को प्रकट करते हैं। चक्की जैसी सामान्य चीज़ को लेकर उन्होंने अद्वैत और वैराग्य का अद्भुत उपदेश दिया।
महत्व
यह दोहा कबीर के सबसे प्रसिद्ध दोहों में से एक है और कबीर दोहावली में दोहा 187 के रूप में मिलता है। यह जीवन की नश्वरता और भक्ति की आवश्यकता को सरल शब्दों में समझाता है।
Sant Kabir
कबीर पंथ से और
सभी देखेंसंबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
