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Embroidered artwork for गुरु गोविंद दोऊ खड़े: Sant Kabir seated at his weaving loom with an ektara, in an embroidered riverside scene

गुरु गोविंद दोऊ खड़े

गुरु गोविंद दोऊ खड़े

यह एक प्रसिद्ध भक्ति दोहा है जो गुरु की महिमा को गोविंद (भगवान) से भी ऊपर बताता है।

श्लोक

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय
Guru Govind Dou Khade, Kake Lagoon Paay. Balihari Guru Aapne, Govind Diyo Batay.

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति

पृष्ठभूमि

यह दोहा भक्ति काल की संत परंपरा से जुड़ा है, जिसमें गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना गया है। इसे प्रायः संत कबीर या उनके समकालीन संतों से जोड़ा जाता है। इसका उपयोग गुरु पूर्णिमा या गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने के अवसरों पर किया जाता है। यह दोहा कबीर दोहावली (दोहा 1) में संकलित है और भक्ति परंपरा में गुरु ग्रंथ साहिब के साथ भी जुड़ा माना जाता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Sant Kabir · मध्यकालीन निर्गुण भक्ति कवि-संत · 15वीं शताब्दी, वाराणसी

वाराणसी के एक रहस्यवादी कवि एवं पेशे से जुलाहे, जिनके स्पष्ट एवं बिंबयुक्त दोहों ने कर्मकांड एवं जातिगत भेदों को नकारते हुए प्रत्यक्ष, निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया। उनकी वाणी हिंदू, सिख (जिनमें से कई गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं), एवं सूफी-प्रभावित परंपराओं में समान रूप से आदरणीय है।

क्या आप जानते हैं?

दोहे का स्वरूप

यह एक दोहा है, जो हिंदी साहित्य का प्राचीन छंद है। इसमें 24 मात्राएँ होती हैं और यह उपदेशात्मक या भक्तिपूर्ण विचारों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है।

अर्थ और संदेश

कवि कहते हैं कि गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों सामने खड़े हैं, तो मैं किसके पैर छूऊँ? वे गुरु को श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि गुरु ने ही गोविंद को दिखाया। यह गुरु की महिमा को रेखांकित करता है।

भक्ति परंपरा में महत्व

यह दोहा गुरु-शिष्य परंपरा के केंद्रीय सिद्धांत को व्यक्त करता है कि गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं। इसे अक्सर गुरु पूर्णिमा या शिक्षक दिवस पर उद्धृत किया जाता है।

प्रचलन और स्रोत

यह दोहा भारतीय लोकमानस में इतना रचा-बसा है कि इसका मूल स्रोत निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। यह संत कबीर, रहीम या अन्य भक्त कवियों की रचनाओं में मिलता है, और सिख धर्म के गुरु वाणी में भी इसी भाव के दोहे हैं।

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