अच्युताष्टकम् (अच्युताच्युत हरे)
यह आठ श्लोकों का स्तोत्र है, जिसमें भगवान अच्युत (विष्णु) के विभिन्न नामों से गुणगान करते हुए दुःखों से मुक्ति की प्रार्थना की गई है।
श्लोक
हे अच्युत, हे अच्युत, हे हरि, हे परमात्मा, हे राम, हे कृष्ण, हे पुरुषोत्तम, हे विष्णु, हे वासुदेव, हे भगवान, हे अनिरुद्ध, हे श्रीपति, मेरे संपूर्ण दुःखों को शांत कीजिए।
श्लोक 1
हे विश्वमंगल, हे सर्वव्यापी, हे जगदीश, हे नन्दनंदन, हे नृसिंह, हे नरेन्द्र, हे मुक्तिदाता, हे मुकुंद, हे मुरारि, हे श्रीपति, मेरे संपूर्ण दुःखों को शांत कीजिए।
श्लोक 2
हे रामचंद्र, हे रघुनायक, हे देव, हे दीननाथ, हे पाप और दुःख का नाश करने वाले, हे यादवेंद्र, हे यदुभूषण, हे यज्ञस्वरूप, हे श्रीपति, मेरे संपूर्ण दुःखों को शांत कीजिए।
श्लोक 3
हे देवकी के पुत्र, हे दुःख रूपी वन को भस्म करने वाले दावानल, हे राधिका के प्रिय, हे सुंदर रूप वाले, हे दुःखों से मुक्ति देने वाले, हे दया के सागर, हे श्रीपति, मेरे संपूर्ण दुःखों को शांत कीजिए।
श्लोक 4
हे गोपियों के मुख-रूपी चंद्रमा की चंद्रकिरणों को पीने वाले चकोर पक्षी, हे नित्य, हे निर्गुण, हे निरंजन, हे विजयी, हे पूर्णरूप, हे कल्याणकारी प्रभु, हे सर्वव्यापी, हे श्रीपति, मेरे संपूर्ण दुःखों को शांत कीजिए।
श्लोक 5
हे गोकुल के स्वामी, हे गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले धैर्यवान, हे यमुना के स्वच्छ तट पर क्रीड़ा करने वाले वीर, हे नारद आदि मुनियों द्वारा वंदित चरणों वाले, हे श्रीपति, मेरे संपूर्ण दुःखों को शांत कीजिए।
श्लोक 6
हे द्वारका के राजा, हे अनंत गुणों के सागर, हे प्राणनाथ, हे परिपूर्ण, हे संसार-रूपी चक्र के शत्रु, हे ज्ञान द्वारा प्राप्त होने वाले, हे गुणों के सागर, हे ब्रह्म, हे श्रीपति, मेरे संपूर्ण दुःखों को शांत कीजिए।
श्लोक 7
हे दुष्टों का दमन करने वाले देव, हे दयालु, हे पद्मनाभ, हे पृथ्वी को धारण करने वाले शेषनाग को धारण करने वाले, हे रावण का अंत करने वाले, हे रमेश, हे मुरारि, हे श्रीपति, मेरे संपूर्ण दुःखों को शांत कीजिए।
श्लोक 8
संसार के भय का नाश करने के लिए रचे गए इस सुंदर अच्युताष्टक का जो पाठ करता है, वह सांसारिक विषय-वासनाओं से मुक्ति पाता है और जन्म के संपूर्ण दुःखों से छुटकारा प्राप्त करता है।
श्लोक 9
इस प्रकार श्री शंकराचार्य द्वारा रचित अच्युताष्टक समाप्त हुआ।
श्लोक 10
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला
तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन
- परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति
पृष्ठभूमि
इस स्तोत्र का परंपरागत श्रेय आदि शंकराचार्य को दिया जाता है। भक्त इसे प्रायः प्रातःकाल या ध्यान के समय पढ़ते हैं, ताकि मन को शांति मिले और जीवन के कष्ट दूर हों। अंतिम श्लोक के अनुसार, इसके नियमित पाठ से सांसारिक आसक्ति कम होती है और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Adi Shankaracharya · शास्त्रीय दार्शनिक-संत · 8वीं शताब्दी ईस्वी, कालडी (केरल)
केरल के कालडी में जन्मे दार्शनिक एवं संन्यासी, जिन्हें अद्वैत वेदांत (अद्वैत दर्शन) को व्यवस्थित करने तथा भारत भर में चार मठों की स्थापना करने का श्रेय दिया जाता है। उपनिषदों एवं ब्रह्मसूत्रों पर अपनी टीकाओं के साथ-साथ, उन्होंने विभिन्न देवताओं की स्तुति में शास्त्रीय संस्कृत में अनेक भक्ति स्तोत्र रचे।
क्या आप जानते हैं?
रचयिता और पृष्ठभूमि
परंपरा यह अच्युताष्टकम् आदि शंकराचार्य (आठवीं-नौवीं शताब्दी ई.) की रचना मानती है। वे अद्वैत वेदांत के महान आचार्य थे। इस आठ श्लोकों के स्तोत्र में भगवान विष्णु/कृष्ण को 'अच्युत' (जो कभी गिरता नहीं) के रूप में पुकारा गया है और समस्त दुखों के निवारण की प्रार्थना की गई है।
संरचना और आवृत्ति
प्रत्येक श्लोक के अंत में एक समान पंक्ति आती है – "श्रीपते शमय दुःखमशेषम्" अर्थात "हे लक्ष्मीपति, मेरे सारे दुखों को शांत करो"। यह पुनरावृत्ति भक्त की एकाग्रता और विनम्रता को दर्शाती है।
विभिन्न रूपों का आह्वान
इस स्तोत्र में भगवान के विभिन्न अवतारों और नामों का उल्लेख है – राम, कृष्ण, नृसिंह, गोकुलेश, द्वारकाधीश, रावणांतक आदि। यह सर्वव्यापकता और विभिन्न रूपों में भक्तों के प्रति उनके करुणामय स्वरूप को प्रकट करता है।
राधिकारमण नाम
चौथे श्लोक में भगवान को "राधिकारमण" (राधा के प्रिय) कहा गया है। अद्वैत के आचार्य द्वारा रचित माने जाने वाले इस स्तोत्र में यह नाम भक्ति और माधुर्य के भाव को प्रकट करता है।
फलश्रुति का संदेश
नौवें श्लोक (फलश्रुति) में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस रमणीय अच्युताष्टकम् का पाठ करता है, उसकी विषय-वासनाएं शांत हो जाती हैं और वह जन्म के सारे दुखों से मुक्त हो जाता है। यह स्तोत्र भवभय (संसार के भय) का नाश करने वाला बताया गया है।
Krishna
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