गणेश पञ्चरत्नम् — श्लोक १
यह एक प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान गणेश (विनायक) की वंदना करता है। इसमें उनके मोदक प्रियता, विघ्नहर्ता, और एकमात्र नायक होने जैसे गुणों का वर्णन है, और यह भक्तों द्वारा उनकी कृपा पाने के लिए गाया जाता है।
श्लोक
मैं उन विनायक को प्रणाम करता हूँ, जो प्रसन्नतापूर्वक मोदक धारण करते हैं, जो सदा मोक्ष का साधन हैं, जो आभूषण के रूप में बालचंद्र को धारण करते हैं, इस लीलापूर्ण ब्रह्मांड के रक्षक हैं — जो निराश्रितों के एकमात्र स्वामी हैं, गजासुर का विनाश करने वाले हैं, और जो अपने आगे झुकने वालों के अमंगल को दूर करते हैं।
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र हिंदू धर्म की गणेश उपासना परंपरा से जुड़ा है। परंपरागत रूप से इसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है, हालांकि रचयिता पर विद्वानों में मतभेद है। इसका प्रयोग प्रायः गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी, और दैनिक पूजा के दौरान किया जाता है। यह एक संक्षिप्त किंतु शक्तिशाली स्तोत्र है जो भगवान गणेश के विभिन्न गुणों की स्तुति करता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Adi Shankaracharya · शास्त्रीय दार्शनिक-संत · 8वीं शताब्दी ईस्वी, कालडी (केरल)
केरल के कालडी में जन्मे दार्शनिक एवं संन्यासी, जिन्हें अद्वैत वेदांत (अद्वैत दर्शन) को व्यवस्थित करने तथा भारत भर में चार मठों की स्थापना करने का श्रेय दिया जाता है। उपनिषदों एवं ब्रह्मसूत्रों पर अपनी टीकाओं के साथ-साथ, उन्होंने विभिन्न देवताओं की स्तुति में शास्त्रीय संस्कृत में अनेक भक्ति स्तोत्र रचे।
क्या आप जानते हैं?
प्रसिद्ध स्तोत्र
यह श्लोक 'मुदाकरात्तमोदकम्' नामक प्रसिद्ध गणेश स्तोत्र का हिस्सा है, जो शास्त्रों में वर्णित है और बुद्धि तथा विघ्न-निवारण के लिए नियमित रूप से पढ़ा जाता है।
छंद संरचना
यह 'शार्दूलविक्रीडित' छंद में रचित है, जिसमें प्रति पंक्ति 19 अक्षर होते हैं। इस छंद में ताल और लय का विशेष ध्यान रखा गया है, जिससे इसका पाठ अत्यंत मधुर और ध्यान केंद्रित करने वाला बनता है।
गणेश के रूप
इस श्लोक में गणेश जी को 'मुदाकरात्तमोदकम्' (जो मोदक धारण करते हैं और आनंद देते हैं) और 'विमुक्तिसाधकम्' (मोक्ष के साधक) कहा गया है। ये दोनों नाम भक्तों के लिए सुख और मुक्ति दोनों की इच्छा को दर्शाते हैं।
चंद्र धारण की कथा
'कलाधरावतंसकम्' का अर्थ है गणेश जी चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। यह उस कथा की ओर संकेत करता है जब गणेश जी ने चंद्रमा के अभिमान को तोड़कर उसे अपने सिर पर स्थान दिया।
गजासुर वध
'विनाशितेभदैत्यकम्' उस घटना को याद करता है जब गणेश जी ने गजासुर (हाथी दानव) का वध किया और उसकी सूंड तथा दाँतों को अपने आभूषण बना लिया। यह शक्ति और न्याय का प्रतीक है।
Ganesh
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