श्री अघोरमूर्ति सहस्रनाम स्तोत्रम्
यह एक पवित्र स्तोत्र है जिसमें भगवान भैरव के अघोर स्वरूप के एक हजार नामों का वर्णन है। यह संवाद देवी भैरवी और भगवान भैरव के बीच हुआ है।
श्लोक
अब अघोरमूर्ति सहस्रनाम लिखा जा रहा है। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं सौः क्ष्मीं घोर घोराय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल अघोरास्त्राय फट् स्वाहा। यह मूल मन्त्र है। श्री भैरवी ने कहा: हे भगवान्! सभी धर्मों के ज्ञाता, संसार को अभय और वरदान देने वाले, सर्वेश्वर, सभी शास्त्रों के ज्ञाता, सर्वातीत और सनातन! (१)
श्लोक 1
आप ही परम तत्त्व हैं, आप ही परम पद हैं। आपके अतिरिक्त मुझे कोई अन्य सार या सर्वोत्तम तत्त्व दिखाई नहीं देता। (२)
श्लोक 2
पूर्व काल में देवताओं और दानवों के युद्ध के समय हमें एक वरदान दिया गया था। इसलिए हे शम्भो, हे नाथ! आज कृपा करके मुझे वह वरदान प्रदान कीजिए। (३)
श्लोक 3
श्री भैरव ने कहा: हे भैरवी, मेरी प्रिय! मैंने सचमुच तुम्हें वरदान दिया था। आज तुम्हारे मन में जो भी इच्छा है, वह माँगो, मैं प्रदान करूँगा। (४)
श्लोक 4
श्री देवी ने कहा: परमात्मा श्री शिव, जो भैरव और अघोर नाम से जाने जाते हैं, वे त्रिगुणात्मक महारुद्र हैं और तीनों लोकों का उद्धार करने में समर्थ हैं। (५)
श्लोक 5
हे कृपानिधि! उनके सहस्र नाम मुझे शीघ्र बताइए। हे महादेव! मेरी इसी अभिलाषा को वरदान के रूप में प्रदान कीजिए। यदि मुझ पर आपकी कृपा है, तो मैं इसके अलावा कोई अन्य वर नहीं माँगती, यही प्रदान कीजिए। (६)
श्लोक 6
श्री भैरव ने कहा: कैलाश पर्वत के शिखर पर एक एकान्त स्थान में सुनो। देव और दानव के युद्ध में मैंने जो वरदान देने की प्रतिज्ञा की थी, मैं तुम्हें वह वरदान देता हूँ, और इसके अतिरिक्त एक अन्य वर भी माँगो। (७)
श्लोक 7
श्री देवी ने कहा: हे महेश्वर! इसके अलावा मैं कोई अन्य वरदान नहीं माँगती। हे करुणामय, देवताओं द्वारा पूजित, कृपा करके शीघ्र कहिए। (८)
श्लोक 8
श्री भैरव ने कहा: आपकी भक्ति के कारण आज मैं महात्मा अघोर के उन परम हज़ार नामों को कह रहा हूँ, जो तीनों लोकों का उद्धार कर सकते हैं। (९)
श्लोक 9
इससे बढ़कर कोई विद्या नहीं है, इससे बड़ी कोई स्तुति नहीं है और इससे श्रेष्ठ कोई स्तोत्र नहीं है, हे पार्वती! यह मेरा सर्वस्व है। (१०)
श्लोक 10
'अ' से 'क्ष' तक के अक्षरों से युक्त यह अनुपम विद्या का भण्डार है। बीज मन्त्रों से भरी यह विद्या अत्यंत गोपनीय है और इसे पशु-बुद्धि वाले अज्ञानियों से दूर रखा जाना चाहिए। (११)
श्लोक 11
ॐ। इस श्री अघोरमूर्ति सहस्रनाम के लिए श्री महाकालभैरव ऋषि हैं, पंक्ति छन्द है, और अघोरमूर्ति परमात्मा देवता हैं। ॐ बीज है, ह्रीं शक्ति है, कुरु कुरु कीलक है। अघोर विद्या की सिद्धि के लिए इसके पाठ और जप में विनियोग किया जाता है। अब करन्यास और अङ्गन्यास: ह्रां अँगूठों को नमस्कार। ह्रीं तर्जनी उँगलियों को नमस्कार। ह्रूं मध्यमा उँगलियों को नमस्कार। ह्रैं अनामिका उँगलियों को नमस्कार। ह्रौं कनिष्ठिका उँगलियों को नमस्कार। ह्रः करतल और करपृष्ठ को नमस्कार। इस प्रकार हृदय आदि षडङ्गन्यास किया जाता है। और अतिरिक्त मन्त्र: ॐ त्रिशूलधारी अघोर भगवान् को नमस्कार, हृदय में नमस्कार। अमृतस्वरूप रुद्र को, मुझे पुनर्जीवित करें, मस्तक में नमस्कार। नीलकण्ठ, चन्द्रधारी जटावाले को, शिखा में वषट्। त्रिपुरासुर-विनाशक को, कवच में हुम्। तीन नेत्रों वाले, ऋग्, यजुः और सामवेद स्वरूप को, नेत्रों में वौषट्। तीन अग्नियों के स्वरूप रुद्र को, प्रज्वलित होइए, मेरी रक्षा कीजिए, अघोरास्त्र के लिए हुं फट् स्वाहा। अस्त्र के लिए फट्। इस प्रकार हृदय आदि षडङ्गन्यास और करन्यास सम्पन्न हुआ।
श्लोक 12
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
सोमवार एवं प्रदोष काल
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला
बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प
- आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र तांत्रिक परंपरा से जुड़ा हुआ है और इसे प्रायः साधना में पढ़ा या जपा जाता है। इसमें बीज मंत्रों और न्यास विधि का उल्लेख है, जो इसे एक विशेष तांत्रिक ग्रंथ बनाते हैं। पारंपरिक रूप से इसे सुरक्षा, सिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उपयोग किया जाता है।
क्या आप जानते हैं?
रचना और संवाद
यह स्तोत्र भैरवी (देवी पार्वती) और भैरव (भगवान शिव के उग्र रूप) के बीच संवाद के रूप में है। देवी ने भगवान से अघोर मूर्ति के एक हज़ार नामों का वर्णन करने का वरदान माँगा, जो उन्हें देवासुर संग्राम में दिए गए वरदान की स्मृति में है।
महत्व और दुर्लभता
भैरव स्वयं इसे 'परमा विद्या' (सर्वोच्च ज्ञान) और अपना 'सर्वस्व' (सब कुछ) कहते हैं। उनके अनुसार, इससे बड़ा कोई स्तव या स्तोत्र नहीं है, और यह तीनों लोकों के उद्धार में समर्थ है।
बीज मंत्र और संरचना
इस सहस्रनाम में 'अकार' से 'क्षकार' तक के अक्षरों को बीज मंत्रों के रूप में गूँथा गया है। इसे गोपनीय रखने का निर्देश है, विशेषकर 'पशु' (साधारण जीवों) की संगति में, क्योंकि इसमें शक्तिशाली बीज और मंत्रों का प्रयोग हुआ है।
देवता और ऋषि
इस स्तोत्र के ऋषि (द्रष्टा) स्वयं महाकाल भैरव हैं, छंद 'पंक्ति' है, और देवता 'अघोरमूर्ति परमात्मा' हैं। इसके न्यास और कीलक में 'ह्रीं', 'ह्रां' आदि बीज शामिल हैं, जो तंत्र साधना में सामान्य हैं।
आध्यात्मिक संदेश
अघोर मूर्ति, जो शिव का भयानक और अभय प्रदान करने वाला रूप है, का स्मरण साधक को मोक्ष और आध्यात्मिक सिद्धि प्रदान करता है। देवी का यह अनुरोध कि वे इस हज़ार नामों को सुनना चाहती हैं, यह दर्शाता है कि यह ज्ञान केवल शिव-शक्ति के सम्बन्ध से ही प्रकट हुआ।
Shiva
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