दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रम्
ऋषि वसिष्ठ को परम्परागत रूप से श्रेय दिया गया यह आठ श्लोकों का शिव स्तोत्र दरिद्रता और दुःख के नाश की प्रार्थना है; श्लोक 9 में फलश्रुति है।
श्लोक
यह दरिद्रता को भस्म करने वाले शिव का स्तोत्र है।
श्लोक 1
विश्व के स्वामी, नरक रूपी समुद्र से पार करने वाले, कानों के लिए अमृत समान, चंद्रमा को धारण करने वाले, कपूर के समान कांति वाले श्वेत वर्ण, जटाधारी, दरिद्रता और दुःख को जलाने वाले शिव को नमस्कार है।
श्लोक 2
गौरी को प्रिय, चंद्रमा के खंड को धारण करने वाले, काल का अंत करने वाले, सर्पराज को कंगन के रूप में धारण करने वाले, गंगा को धारण करने वाले, गजराज (हस्ती) का मर्दन करने वाले, दरिद्रता और दुःख को जलाने वाले शिव को नमस्कार है।
श्लोक 3
भक्ति को प्रिय, जन्म-मृत्यु रूपी रोग के भय को दूर करने वाले, उग्र स्वरूप, दुर्गम भवसागर से पार करने वाले, ज्योतिर्मय, गुणों और नामों के साथ नृत्य करने वाले, दरिद्रता और दुःख को जलाने वाले शिव को नमस्कार है।
श्लोक 4
चर्म (खाल) को वस्त्र रूप में धारण करने वाले, शव की भस्म का लेप करने वाले, ललाट पर नेत्र धारण करने वाले, मणियों के कुंडलों से मंडित, पैरों में मंजीर (पायल) धारण करने वाले, जटाधारी, दरिद्रता और दुःख को जलाने वाले शिव को नमस्कार है।
श्लोक 5
पंचमुखी, सर्पराज को आभूषण रूप में धारण करने वाले, स्वर्ण वस्त्र धारण करने वाले, तीनों लोकों में मंडित, आनंद की भूमि, वरदान देने वाले, तमोमय (अंधकार स्वरूप), दरिद्रता और दुःख को जलाने वाले शिव को नमस्कार है।
श्लोक 6
सूर्य को प्रिय, भवसागर से पार करने वाले, काल का अंत करने वाले, कमलासन (ब्रह्मा) द्वारा पूजित, तीन नेत्रों वाले, शुभ लक्षणों से लक्षित, दरिद्रता और दुःख को जलाने वाले शिव को नमस्कार है।
श्लोक 7
राम को प्रिय, रघुनाथ को वरदान देने वाले, नागों को प्रिय, नरक रूपी समुद्र से पार करने वाले, पुण्यों में पुण्य से भरित, देवताओं द्वारा पूजित, दरिद्रता और दुःख को जलाने वाले शिव को नमस्कार है।
श्लोक 8
मुक्ति के स्वामी, फल देने वाले, गणों के स्वामी, गीत को प्रिय, वृषभ (नंदी) पर सवारी करने वाले, हाथी की खाल को वस्त्र रूप में धारण करने वाले, महेश्वर, दरिद्रता और दुःख को जलाने वाले शिव को नमस्कार है।
श्लोक 9
वसिष्ठ ऋषि द्वारा रचित यह स्तोत्र सभी रोगों को दूर करने वाला, सभी संपत्तियों को देने वाला, शीघ्र ही पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि करने वाला है। जो प्रतिदिन तीनों संध्याओं में इसका पाठ करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त करता है।
श्लोक 10
इस प्रकार श्री वसिष्ठ द्वारा रचित दरिद्रता को जलाने वाला शिव स्तोत्र संपूर्ण हुआ।
श्लोक 11
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
सोमवार एवं प्रदोष काल
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला
बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प
- आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र शैव परम्परा से जुड़ा है। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के पाठ की पुष्पिका और श्लोक 9 ('वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रम्') के अनुसार इसे परम्परागत रूप से ऋषि वसिष्ठ की रचना माना जाता है। श्लोक 1 से 8 प्रत्येक 'दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय' पर समाप्त होते हैं और श्लोक 9 फलश्रुति है, जिसके अनुसार त्रिसन्ध्य (तीनों सन्ध्याओं) में नित्य पाठ करने से सब रोगों का निवारण, सम्पत्ति तथा पुत्र-पौत्रादि की वृद्धि होती है और अन्त में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sage Vashistha
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क्या आप जानते हैं?
रचयिता
परम्परा के अनुसार यह स्तोत्र महर्षि वसिष्ठ द्वारा रचित है, जो सप्तर्षियों में गिने जाते हैं और राजा दशरथ के राजगुरु थे। इसका उल्लेख श्लोक 9 में स्पष्ट है।
संरचना
इसमें आठ श्लोक हैं, प्रत्येक के अंत में 'दारिद्र्यदुःखदहनाय नमः शिवाय' पंक्ति आती है। यह एक विशिष्ट शैली है जो भगवान शिव को दारिद्र्य (गरीबी) और दुःख को जलाने वाले के रूप में संबोधित करती है।
फलश्रुति
अंतिम श्लोक (९) में बताया गया है कि इस स्तोत्र के नियमित पाठ से सभी रोग दूर होते हैं, संपत्ति बढ़ती है, और पुत्र-पौत्रादि की वृद्धि होती है। तीनों संध्या (त्रिसंध्या) में पाठ करने वाला स्वर्ग प्राप्त करता है।
विशेषता
इस स्तोत्र में शिव के अनेक नामों और गुणों का वर्णन है—जैसे विश्वेश्वर, गंगाधर, पंचानन, मुक्तेश्वर आदि। प्रत्येक श्लोक में शिव के किसी न किसी रूप या लीला का उल्लेख है, जो भक्तों को आश्वस्त करता है कि शिव सभी कष्टों का नाश कर सकते हैं।
प्रयोग
यह स्तोत्र विशेष रूप से आर्थिक कठिनाइयों और मानसिक पीड़ा से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। इसे 'दारिद्र्यदहन' (गरीबी को जलाने वाला) कहा जाता है, और भक्त इसे नियमित रूप से पढ़ते हैं।
Shiva
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