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Embroidered artwork for ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का महात्म्य: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का महात्म्य

ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का महात्म्य

शिव पार्वती को नर्मदा तट के ओंकार क्षेत्र, उसके पावन कुण्ड और रक्षक गणों की महिमा सुनाते हैं, और बताते हैं कि गणों ने इन्द्र को पराजित किया, जो लिंग की शरण में गया।

श्लोक

Onkareshvara Mahatmyam ॐकारेश्वरमहात्म्यम् पार्वती - महादेवमहानन्दकरुणामृतसागर श्रुतमुत्तममाख्यानं महाकालगणस्य च
Onkareshvara Mahatmyam omkaareshvaramahaatmyam paarvatee - mahaadevamahaanandakarunaamritasaagara shrutamuttamamaakhyaanam mahaakaalaganasya ca | 1 |

श्लोक 1

किं वान्यत् प्रीतिजनकं क्षेत्रमस्ति महेश्वर क्षेत्राणां त्वं पतिः शम्भो विशिष्टं वक्तुमर्हसि
kim vaanyat preetijanakam kshetramasti maheshvara kshetraanaam tvam patih shambho vishishtam vaktumarhasi | 2 |

श्लोक 2

ईश्वरः - क्षेत्रमस्त्येकमुत्कृष्टमुत्फुल्लकमलानने ओङ्कारं नाम विमलं कलिकल्मषनाशनम्
eeshvarah - kshetramastyekamutkrishtamutphullakamalaanane onkaaram naama vimalam kalikalmashanaashanam | 3 |

श्लोक 3

तत्र शैववरा नित्यं निवसन्ति सहस्रशः ते सर्वे मम लिङ्गार्चां कुर्वन्त्येव प्रतिक्षणम्
tatra shaivavaraa nityam nivasanti sahasrashah te sarve mama lingaarcaam kurvantyeva pratikshanam | 4 |

श्लोक 4

भासिताभासितैर्नित्यं शान्ता दान्ता जितेन्द्रियाः रुद्राक्षवरभूषाढ्या भालाक्षान्यस्तमानसाः
bhaasitaabhaasitairnityam shaantaa daantaa jitendriyaah rudraakshavarabhooshaadhyaa bhaalaakshaanyastamaanasaah | 5 |

श्लोक 5

तत्रास्ति सरितां श्रेष्ठा लिङ्गसङ्गतरङ्गिता नर्मदा शर्मदा नित्यं स्नानात्पानावगाहनात्
tatraasti saritaam shreshthaa lingasangatarangitaa narmadaa sharmadaa nityam snaanaatpaanaavagaahanaat | 6 |

श्लोक 6

पापौघसङ्घभङ्गाढ्या वातपोतसुशीतला तत्रास्ति कुण्डमुत्कृष्टमोङ्काराख्यं शुचिस्मिते
paapaughasanghabhangaadhyaa vaatapotasusheetalaa tatraasti kundamutkrishtamonkaaraakhyam shucismite | 7 |

श्लोक 7

तत्कुण्डदर्शनादेव मल्लोके निवसेच्चिरम् तत्कुण्डोदकपानेन हृदि लिङ्गं प्रजायते
tatkundadarshanaadeva malloke nivasecciram tatkundodakapaanena hridi lingam prajaayate | 8 |

श्लोक 8

भावाः पिबन्ति तत्कुण्डजलं शीतं विमुक्तये तृप्तिं प्रयान्ति पितरः तत्कुण्डजलतर्पिताः
bhaavaah pibanti tatkundajalam sheetam vimuktaye triptim prayaanti pitarah tatkundajalatarpitaah | 9 |

श्लोक 9

सदा तत्कुण्डरक्षार्थं गणाः संस्थापिता मया कुण्डधारप्रभृतयः शूलमुद्गरपाणयः
sadaa tatkundarakshaartham ganaah samsthaapitaa mayaa kundadhaaraprabhritayah shoolamudgarapaanayah | 10 |

श्लोक 10

गजेन्द्रचर्मवसना मृगेन्द्रसमविक्रमाः हरीन्द्रानपि ते हन्युर्गिरीन्द्रसमविग्रहाह
gajendracarmavasanaa mrigendrasamavikramaah hareendraanapi te hanyurgireendrasamavigrahaaha | 11 |

श्लोक 11

धनुःशरकराः सर्वे जटाशोभितमस्तकाः अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैर्भस्मोद्धूलितविग्रहा
dhanuhsharakaraah sarve jataashobhitamastakaah agnirityaadibhirmantrairbhasmoddhoolitavigrahaa | 12 |

श्लोक 12

सङ्ग्राममुखराः सर्वे गणा मेदुरविग्रहाः कदाचिदननुज्ञाप्त तान् गणान् मददर्पितः
sangraamamukharaah sarve ganaa meduravigrahaah kadaacidananujnaapta taan ganaan madadarpitah | 13 |

श्लोक 13

अप्सरोभिः परिवृतो मरुतां पतिरुद्धतः आरुह्याभ्रमुनाथं तं क्रीडितुं नर्मदाजले
apsarobhih parivrito marutaam patiruddhatah aaruhyaabhramunaatham tam kreeditum narmadaajale | 14 |

श्लोक 14

समाजगाम त्वरितः शच्या साकं शिवे तदा तदा तं गणपाः क्रुद्धाः सर्वे ते ह्यतिमन्यवः
samaajagaama tvaritah shacyaa saakam shive tadaa tadaa tam ganapaah kruddhaah sarve te hyatimanyavah | 15 |

श्लोक 15

सगजं पातयन्नब्धौ शच्या साकं सुरेश्वरम् सुरांस्तदा सवरुणान् बिभिदुः पवनानलान्
sagajam paatayannabdhau shacyaa saakam sureshvaram suraamstadaa savarunaan bibhiduh pavanaanalaan | 16 |

श्लोक 16

निस्त्रिंशवरधाराभिः सुतीक्ष्णाग्रैः शिलीमुखैः मुद्गरैर्बिभिदुश्चान्ये सवाहायुधभूषणान्
nistrimshavaradhaaraabhih suteekshnaagraih shileemukhaih mudgarairbibhidushcaanye savaahaayudhabhooshanaan | 17 |

श्लोक 17

विवाहनांस्तदा देवान् स्रवद्रक्तान् स्खलत्पदान् कान्दिशीकान् मुक्तकेशान् क्षणाच्चक्रुर्गणेश्वराः
vivaahanaamstadaa devaan sravadraktaan skhalatpadaan kaandisheekaan muktakeshaan kshanaaccakrurganeshvaraah | 18 |

श्लोक 18

अप्सरास्ता विकन्नराः रुदन्त्यो मुक्तमूर्धजाः हाहा बतेति क्रन्दन्त्यः स्रवद्रक्तार्द्रवाससः
apsaraastaa vikannaraah rudantyo muktamoordhajaah haahaa bateti krandantyah sravadraktaardravaasasah | 19 |

श्लोक 19

तथा देवगणाः सर्वे शक्राद्या भयकम्पिताः ओङ्कारं तत्र तल्लिङ्गं शरणं जग्मुरीश्वरम्
tathaa devaganaah sarve shakraadyaa bhayakampitaah onkaaram tatra tallingam sharanam jagmureeshvaram | 20 |

श्लोक 20

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

सोमवार एवं प्रदोष काल

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्याकालीन प्रदोष वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

बिल्वपत्र, गंगाजल, भस्म, धतूरा एवं श्वेत पुष्प

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • आत्मिक शांति, समस्त पापों का नाश एवं अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति

पृष्ठभूमि

यह ओंकारेश्वर माहात्म्य शिवरहस्य (शैव ग्रंथ) के भर्गाख्य पञ्चम अंश के अध्याय 7, श्लोक 2-21 से लिया गया अंश है (संस्कृत डॉक्यूमेंट्स की श्लोक-संख्या के अनुसार)। देवी पार्वती के साथ संवाद में भगवान शिव नर्मदा तट पर मध्य प्रदेश में स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा बताते हैं, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसमें नर्मदा और ओंकार कुण्ड की प्रशंसा है, फिर वह कथा है कि बिना अनुमति नर्मदा में क्रीड़ा करने आए देवराज इन्द्र को कुण्ड के रक्षक गणों ने पराजित किया और देवता लिंग की शरण में गए।

क्या आप जानते हैं?

स्रोत और संदर्भ

यह अंश शिवरहस्य (भर्गाख्य पञ्चम अंश, अध्याय 7, श्लोक 2-21) से है, जो शिव की कथाओं का विस्तार करने वाला संस्कृत ग्रंथ है। यह शिव और पार्वती का संवाद है, जिसमें शिव बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर की महिमा बताते हैं।

नर्मदा नदी का विशेष गुण

नर्मदा को सरिताओं में श्रेष्ठ कहा गया है। इसका जल स्नान, पान और अवगाहन से सदा कल्याण प्रदान करता है। ओंकार नामक कुण्ड इस क्षेत्र की शक्ति का केंद्र है.

कुण्ड का प्रभाव

ओंकारेश्वर में स्थित कुण्ड के दर्शन मात्र से शिवलोक की प्राप्ति होती है। कुण्ड का जल पीने से हृदय में लिंग का प्राकट्य होता है और पितरों को तृप्ति मिलती है।

गणों का संरक्षण

शिवजी ने कुण्ड की रक्षा के लिए कुण्डधार आदि गणों को नियुक्त किया था। ये गण शूल और मुद्गर धारण करते हैं, और अत्यंत बलवान हैं।

इंद्र का पराजय

एक बार इंद्र अपनी पत्नी शची और अप्सराओं के साथ बिना अनुमति नर्मदा में क्रीड़ा करने आए। शिवगणों ने क्रोधित होकर इंद्र और सभी देवताओं को पराजित कर दिया, जिससे वे रक्तरंजित होकर भागे।

शरणागति

पराजित होने के बाद इंद्र और सभी देवता ओंकारेश्वर लिंग की शरण में गए। यह दर्शाता है कि ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की शरण में आने से सबसे बड़ा संकट भी टल सकता है।

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