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ऋणमुक्ति श्री गणेश स्तोत्रम्

ऋणमुक्ति श्री गणेश स्तोत्रम्

ऋणमुक्ति के लिए महागणपति का स्तोत्र, जिसमें तीनों सन्ध्याओं में छह मास के पाठ से ऋण-मुक्ति का वचन है।

श्लोक

ऋणमुक्ति श्री गणेश स्तोत्रम् विनियोग ॐ अस्य श्रीऋणविमोचन महागणपति-स्तोत्रमन्त्रस्य शुक्राचार्य ऋषिः ऋणविमोचन महागणपतिर्देवता अनुष्टुप् छन्दः ऋणविमोचन महागणपतिप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः
viniyoga om asya shreerinavimocana mahaaganapati-stotramantrasya shukraacaarya rishih rinavimocana mahaaganapatirdevataa anushtup chandah rinavimocana mahaaganapatipreetyarthe jape viniyogah | 1 |

श्लोक 1

स्तोत्र पाठ ॐ स्मरामि देवदेवेशं वक्रतुण्डं महाबलम् षडक्षरं कृपासिन्धुं नमामि ऋणमुक्तये
om smaraami devadevesham vakratundam mahaabalam shadaksharam kripaasindhum namaami rinamuktaye1 | 2 |

श्लोक 2

महागणपतिं वन्दे महासेतुं महाबलम् एकमेवाद्वितीयं तु नमामि ऋणमुक्तये
mahaaganapatim vande mahaasetum mahaabalam ekamevaadviteeyam tu namaami rinamuktaye | 3 |

श्लोक 3

एकाक्षरं त्वेकदन्तमेकं ब्रह्म सनातनम् महाविघ्नहरं देवं नमामि ऋणमुक्तये
ekaaksharam tvekadantamekam brahma sanaatanam mahaavighnaharam devam namaami rinamuktaye | 4 |

श्लोक 4

शुक्लाम्बरं शुक्लवर्णं शुक्‍लगन्धानुलेपनम् सर्वशुक्लमयं देवं नमामि ऋणमुक्तये
shuklaambaram shuklavarnam shuk‍lagandhaanulepanam sarvashuklamayam devam namaami rinamuktaye | 5 |

श्लोक 5

रक्ताम्बरं रक्तवर्णं रक्तगन्धानुलेपनम् रक्तपुष्पैः पूज्यमानं नमामि ऋणमुक्तये
raktaambaram raktavarnam raktagandhaanulepanam raktapushpaih poojyamaanam namaami rinamuktaye | 6 |

श्लोक 6

कृष्णाम्बरं कृष्णवर्णं कृष्णगन्धानुलेपनम् कृष्णयज्ञोपवीतं च नमामि ऋणमुक्तये
krishnaambaram krishnavarnam krishnagandhaanulepanam krishnayajnopaveetam ca namaami rinamuktaye | 7 |

श्लोक 7

पीताम्बरं पीतवर्ण पीतगन्धानुलेपनम् पीतपुष्पैः पूज्यमानं नमामि ऋणमुक्तये
peetaambaram peetavarna peetagandhaanulepanam peetapushpaih poojyamaanam namaami rinamuktaye | 8 |

श्लोक 8

सर्वात्मकं सर्ववर्णं सर्वगन्धानुलेपनम् सर्वपुष्पैः पूज्यमानं नमामि ऋणमुक्तये
sarvaatmakam sarvavarnam sarvagandhaanulepanam sarvapushpaih poojyamaanam namaami rinamuktaye | 9 |

श्लोक 9

एतद् ऋणहरं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः षण्मासाभ्यन्तरे तस्य ऋणच्छेदो न संशयः
etad rinaharam stotram trisandhyam yah pathennarah shanmaasaabhyantare tasya rinacchedo na samshayah | 10 |

श्लोक 10

सहस्रदशकं कृत्वा ऋणमुक्तो धनी भवेत् इति रुद्रयामले ऋणमुक्ति श्री गणेशस्तोत्रम् सम्पूर्णम्
sahasradashakam kritvaa rinamukto dhanee bhavet | 11 |

श्लोक 11

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह स्तोत्र एक विनियोग से आरम्भ होता है, जिसमें ऋषि शुक्राचार्य, छन्द अनुष्टुप् और देवता ऋणविमोचन महागणपति बताए गए हैं। इसका मूल ग्रन्थ दृढ़ता से स्थापित नहीं है: यहाँ प्रयुक्त पाठ की अन्तिम पंक्ति रुद्रयामल तन्त्र का नाम लेती है, जबकि संस्कृत डॉक्यूमेंट्स पर (नटराज स्तव मंजरी से) छपा पाठ ब्रह्माण्डपुराण का नाम देता है, और सदाशिव ऋषि वाला ऋणहर गणेश का एक भिन्न स्तोत्र कृष्णयामल से उद्धृत किया जाता है। किसी का भी अध्याय या श्लोक-निर्देश नहीं मिला। विधान है कि तीनों सन्ध्याओं में छह मास तक पाठ किया जाए, जिससे भक्त ऋण-छेद की आशा रखते हैं। स्तोत्र में गणेश का वर्णन श्वेत, रक्त, कृष्ण, पीत और अन्त में सभी वर्णों में किया गया है।

क्या आप जानते हैं?

उद्गम

इस पाठ की अन्तिम पंक्ति तान्त्रिक ग्रन्थ 'रुद्रयामल' का नाम लेती है, जबकि एक अन्य मुद्रित पाठ 'ब्रह्माण्डपुराण' का, इसलिए मूल दृढ़ता से निश्चित नहीं है। विनियोग में नामित ऋषि दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य हैं और स्तोत्र ऋणमुक्ति के लिए है।

विनियोग और विधि

स्तोत्र एक विनियोग से आरम्भ होता है, जिसमें ऋषि, देवता, छन्द और प्रयोजन बताए जाते हैं। इसका पाठ तीनों सन्ध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में छह मास तक करने का विधान है, जिसके बाद ऋण-छेद निश्चित बताया गया है। छन्द अनुष्टुप् है।

रंगों का प्रतीकात्मक वर्णन

श्लोक ४–८ में गणेश का ध्यान श्वेत, रक्त, कृष्ण, पीत और सर्व वर्णों में किया गया है। भक्त इन रंगों को उनके भिन्न रूपों का संकेत मानते हैं और अन्तिम 'सर्ववर्ण' को उनके सर्वव्यापी स्वरूप का।

दार्शनिक गहराई

श्लोक २ गणेश को 'एकमेवाद्वितीयम्' कहता है, जो छान्दोग्य उपनिषद् (६.२.१) का वाक्यांश है और उन्हें अद्वैत ब्रह्म से जोड़ता है। इससे स्तोत्र प्रार्थना से बढ़कर परम तत्त्व का ध्यान बन जाता है।

फल का वचन

श्लोक ९ कहता है कि तीनों सन्ध्याओं में छह मास तक पाठ से ऋण निःसंदेह कटते हैं। अन्तिम पंक्ति जोड़ती है कि दस हज़ार बार (सहस्रदशक) जप करने से व्यक्ति ऋणमुक्त और धनी होता है।

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