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आघनशक ग़यत्रि ष्तोत्रम्

आघनशक ग़यत्रि ष्तोत्रम्

यह देवी भागवत पुराण का एक स्तोत्र है, जो माँ संध्या (जिन्हें गायत्री, सावित्री और सरस्वती भी कहा जाता है) की महिमा का वर्णन करता है। इसमें माता के कई रूपों, उनकी शक्तियों और इस स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले लाभों का उल्लेख है।

श्लोक

नारद उवाच भक्तानुकम्पिन्सर्वज्ञ हृदयं पापनाशनम् गायत्र्याः कथितं तस्माद्गायत्र्याः स्तोत्रमीरय
naarada uvaaca bhaktaanukampinsarvajna hridayam paapanaashanam gaayatryaah kathitam tasmaadgaayatryaah stotrameeraya | 1 |

श्लोक 1

आदिशक्ते जगन्मातर्भक्तानुग्रहकारिणि सर्वत्र व्यापिकेऽनन्ते श्रीसन्ध्ये ते नमोऽस्तु ते
aadishakte jaganmaatarbhaktaanugrahakaarini sarvatra vyaapike'nante shreesandhye te namo'stu te | 2 |

श्लोक 2

त्वमेव सन्ध्या गायत्री सावित्री च सरस्वती ब्राह्मी च वैष्णवी रौद्री रक्ता श्वेता सितेतरा
tvameva sandhyaa gaayatree saavitree ca sarasvatee braahmee ca vaishnavee raudree raktaa shvetaa sitetaraa | 3 |

श्लोक 3

प्रातर्बाला च मध्याह्ने यौवनस्था भवेत्पुनः ब्रह्मा सायं भगवती चिन्त्यते मुनिभिः सदा ४ वृद्धा सायं हंसस्था गरुडारूढा तथा वृषभवाहिनी ऋग्वेदाध्यायिनी भूमौ दृश्यते या तपस्विभिः
praatarbaalaa ca madhyaahne yauvanasthaa bhavetpunah brahmaa saayam bhagavatee cintyate munibhih sadaa vriddhaa saayam hamsasthaa garudaaroodhaa tathaa vrishabhavaahinee rigvedaadhyaayinee bhoomau drishyate yaa tapasvibhih 5 | 4 |

श्लोक 4

यजुर्वेदं पठन्ती च अन्तरिक्षे विराजते सा सामगापि सर्वेषु भ्राम्यमाणा तथा भुवि
yajurvedam pathantee ca antarikshe viraajate saa saamagaapi sarveshu bhraamyamaanaa tathaa bhuvi | 5 |

श्लोक 5

रुद्रलोकं गता त्वं हि विष्णुलोकनिवासिनी त्वमेव ब्रह्मणो लोकेऽमर्त्यानुग्रहकारिणी
rudralokam gataa tvam hi vishnulokanivaasinee tvameva brahmano loke'martyaanugrahakaarinee | 6 |

श्लोक 6

सप्तर्षिप्रीतिजननी माया बहुवरप्रदा शिवयोः करनेत्रोत्था ह्यश्रुस्वेदसमुद्भवा
saptarshipreetijananee maayaa bahuvarapradaa shivayoh karanetrotthaa hyashrusvedasamudbhavaa | 7 |

श्लोक 7

आनन्दजननी दुर्गा दशधा परिपठ्यते वरेण्या वरदा चैव वरिष्ठा वरवर्णिनी
aanandajananee durgaa dashadhaa paripathyate varenyaa varadaa caiva varishthaa varavarninee | 8 |

श्लोक 8

गरिष्ठा च वरार्हा च वरारोहा च सप्तमी नीलगङ्गा तथा सन्ध्या सर्वदा भोगमोक्षदा
garishthaa ca varaarhaa ca varaarohaa ca saptamee neelagangaa tathaa sandhyaa sarvadaa bhogamokshadaa | 9 |

श्लोक 9

भागीरथी मर्त्यलोके पाताले भोगवत्यपि त्रिलोकवाहिनी देवी स्थानत्रयनिवासिनी
bhaageerathee martyaloke paataale bhogavatyapi trilokavaahinee devee sthaanatrayanivaasinee | 10 |

श्लोक 10

भूर्लोकस्था त्वमेवासि धरित्री लोकधारिणी भुवो लोके वायुशक्तिः स्वर्लोके तेजसां निधिः
bhoorlokasthaa tvamevaasi dharitree lokadhaarinee bhuvo loke vaayushaktih svarloke tejasaam nidhih | 11 |

श्लोक 11

महर्लोके महासिद्धिर्जनलोके जनेत्यपि तपस्विनी तपोलोके सत्यलोके तु सत्यवाक्
maharloke mahaasiddhirjanaloke janetyapi tapasvinee tapoloke satyaloke tu satyavaak | 12 |

श्लोक 12

कमला विष्णुलोके च गायत्री ब्रह्मलोकगा ब्रह्मलोकदा रुद्रलोके स्थिता गौरी हरार्धाङ्गनिवासिनी
kamalaa vishnuloke ca gaayatree brahmalokagaa brahmalokadaa rudraloke sthitaa gauree haraardhaanganivaasinee | 13 |

श्लोक 13

अहमो महतश्चैव प्रकृतिस्त्वं हि गीयसे साम्यावस्थात्मिका त्वं हि शबलब्रह्मरूपिणी
ahamo mahatashcaiva prakritistvam hi geeyase saamyaavasthaatmikaa tvam hi shabalabrahmaroopinee | 14 |

श्लोक 14

ततः परापरा शक्तिः परमा त्वं हि गीयसे इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिस्त्रिशक्तिदा
tatah paraaparaa shaktih paramaa tvam hi geeyase icchaashaktih kriyaashaktirjnaanashaktistrishaktidaa | 15 |

श्लोक 15

गङ्गा च यमुना चैव विपाशा च सरस्वती सरयूर्देविका सिन्धुर्नर्मदेरावती तथा
gangaa ca yamunaa caiva vipaashaa ca sarasvatee sarayoordevikaa sindhurnarmaderaavatee tathaa | 16 |

श्लोक 16

गोदावरी शतद्रुश्च कावेरी देवलोकगा कौशिकी चन्द्रभागा च वितस्ता च सरस्वती
godaavaree shatadrushca kaaveree devalokagaa kaushikee candrabhaagaa ca vitastaa ca sarasvatee | 17 |

श्लोक 17

गण्डकी तापिनी तोया गोमती वेत्रवत्यपि इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका
gandakee taapinee toyaa gomatee vetravatyapi idaa ca pingalaa caiva sushumnaa ca triteeyakaa | 18 |

श्लोक 18

गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषापूषा तथैव च अलम्बुषा कुहूश्चैव शङ्खिनी प्राणवाहिनी
gaandhaaree hastijihvaa ca pooshaapooshaa tathaiva ca alambushaa kuhooshcaiva shankhinee praanavaahinee | 19 |

श्लोक 19

नाडी च त्वं शरीरस्था गीयसे प्राक्तनैर्बुधैः हृतपद्मस्था प्राणशक्तिः कण्ठस्था स्वप्ननायिका
naadee ca tvam shareerasthaa geeyase praaktanairbudhaih hritapadmasthaa praanashaktih kanthasthaa svapnanaayikaa | 20 |

श्लोक 20

तालुस्था त्वं सदाधारा बिन्दुस्था बिन्दुमालिनी मूले तु कुण्डली शक्तिर्व्यापिनी केशमूलगा
taalusthaa tvam sadaadhaaraa bindusthaa bindumaalinee moole tu kundalee shaktirvyaapinee keshamoolagaa | 21 |

श्लोक 21

शिखामध्यासना त्वं हि शिखाग्रे तु मनोन्मनी किमन्यद् बहुनोक्तेन यत्किञ्चिज्जगतीत्रये
shikhaamadhyaasanaa tvam hi shikhaagre tu manonmanee kimanyad bahunoktena yatkincijjagateetraye | 22 |

श्लोक 22

तत्सर्वं त्वं महादेवि श्रिये सन्ध्ये नमोऽस्तु ते इतीदं कीर्तितं स्तोत्रं सन्ध्यायां बहुपुण्यदम्
tatsarvam tvam mahaadevi shriye sandhye namo'stu te iteedam keertitam stotram sandhyaayaam bahupunyadam | 23 |

श्लोक 23

महापापप्रशमनं महासिद्धिविधायकम् य इदं कीर्तयेत् स्तोत्रं सन्ध्याकाले समाहितः
mahaapaapaprashamanam mahaasiddhividhaayakam ya idam keertayet stotram sandhyaakaale samaahitah | 24 |

श्लोक 24

अपुत्रः प्राप्नुयात् पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् सर्वतीर्थतपोदानयज्ञयोगफलं लभेत्
aputrah praapnuyaat putram dhanaarthee dhanamaapnuyaat sarvateerthatapodaanayajnayogaphalam labhet | 25 |

श्लोक 25

भोगान् भुक्त्वा चिरं कालमन्ते मोक्षमवाप्नुयात् तपस्विभिः कृतं स्तोत्रं स्नानकाले तु यः पठेत्
bhogaan bhuktvaa ciram kaalamante mokshamavaapnuyaat tapasvibhih kritam stotram snaanakaale tu yah pathet | 26 |

श्लोक 26

यत्र कुत्र जले मग्नः सन्ध्यामज्जनजं फलम् लभते नात्र सन्देहः सत्यं च नारद
yatra kutra jale magnah sandhyaamajjanajam phalam labhate naatra sandehah satyam ca naarada | 27 |

श्लोक 27

शृणुयाद्योऽपि तद्भक्त्या स तु पापात् प्रमुच्यते पीयूषसदृशं वाक्यं सन्ध्योक्तं नारदेरितम्
shrinuyaadyo'pi tadbhaktyaa sa tu paapaat pramucyate peeyooshasadrisham vaakyam sandhyoktam naaraderitam | 28 |

श्लोक 28

इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे द्वादशस्कन्धे पञ्चमोऽध्याये श्रीअघनाशकगायत्रीस्तोत्रं सम्पूर्णम्
iti shreedeveebhaagavate mahaapuraane dvaadashaskandhe pancamo'dhyaaye shreeaghanaashakagaayatreestotram sampoornam | 29 |

श्लोक 29

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

पृष्ठभूमि

यह स्तोत्र देवी भागवत पुराण के बारहवें स्कंध के पाँचवें अध्याय में आता है। इसे प्रातः, मध्याह्न और सायं संध्या के समय पढ़ने की परंपरा है, विशेषकर स्नान या ध्यान के दौरान। ऐसा माना जाता है कि इसके पाठ से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, समृद्धि व अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

क्या आप जानते हैं?

स्त्रोत का स्रोत

यह स्तोत्र देवीभागवत महापुराण के द्वादश स्कंध, पाँचवें अध्याय में आता है। इसे 'अघनाशक गायत्री स्तोत्र' कहा जाता है, जिसका अर्थ है पापों का नाश करने वाला गायत्री स्तोत्र। यह नारद जी की प्रार्थना से आरंभ होता है।

प्रमुख देवी

इस स्तोत्र में सन्ध्या देवी की स्तुति है, जो गायत्री, सावित्री और सरस्वती के रूप में पूजी जाती हैं। उन्हें तीनों कालों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में अलग-अलग रूपों में ध्यान किया जाता है - बाला, यौवनस्था और वृद्धा।

विविध स्वरूप

सन्ध्या देवी का वर्णन विभिन्न लोकों में (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य), विभिन्न वेदों की पाठिका के रूप में, तथा गंगा, यमुना आदि अनेक पवित्र नदियों के रूप में किया गया है।

योगिक दृष्टिकोण

स्तोत्र में देवी को शरीर की नाड़ियों (इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा, गांधारी, हस्तिजिह्वा, आदि) और कुंडलिनी शक्ति के रूप में भी वर्णित किया गया है। यह दर्शाता है कि वे सूक्ष्म शरीर में भी विद्यमान हैं।

तीन शक्तियाँ

देवी को इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति - इन तीन शक्तियों की दाता बताया गया है। उन्हें प्रकृति और परा-अपरा शक्ति भी कहा गया है।

पाठ के लाभ

इस स्तोत्र के पाठ से निःसंतान को पुत्र, धन की इच्छा वाले को धन, तथा सभी तीर्थों, तप, दान, यज्ञ और योग का फल प्राप्त होता है। अंत में मोक्ष भी मिलता है।

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