श्लोक
नाम 1–5: श्रीमाता — मंगलमयी जगत्माता; श्रीमहाराज्ञी — सम्पूर्ण विश्व की साम्राज्ञी; श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी — परम वैभवशाली सिंहासन की अधीश्वरी; चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता — शुद्ध चैतन्य के अग्निकुण्ड से प्रकट हुईं; देवकार्य-समुद्यता — देवताओं के कार्य को सिद्ध करने के लिए सदा तत्पर।
श्लोक 1
नाम 6–9: उद्यद्भानुसहस्राभा — उगते हुए सहस्र सूर्यों के समान कान्तिमयी; चतुर्बाहुसमन्विता — चार भुजाओं से युक्त; रागस्वरूपपाशाढ्या — हाथ में प्रेम-रूपी पाश (रस्सी) धारण करनेवाली; क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला — क्रोध-रूपी अंकुश से देदीप्यमान।
श्लोक 2
नाम 10–12: मनोरूपेक्षुकोदण्डा — मन के प्रतीक इक्षु (गन्ने) के धनुष को हाथ में धारण करनेवाली; पञ्चतन्मात्रसायका — पाँच सूक्ष्म तन्मात्राओं को बाण के रूप में धारण करनेवाली; निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला — अपनी लाल आभा की बाढ़ में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को डुबा देनेवाली।
श्लोक 3
नाम 13–14: चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा — जिनके केश चम्पक, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिक फूलों से सुशोभित हैं; कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता — कुरुविन्द मणियों की पंक्तियों से जड़े मुकुट से देदीप्यमान।
श्लोक 4
नाम 15–16: अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता — जिनका ललाट अष्टमी के अर्धचन्द्र के समान शोभायमान है; मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका — जिनके मुखचन्द्र पर कस्तूरी का तिलक चन्द्रमा के कलंक-चिह्न समान शोभा देता है।
श्लोक 5
नाम 17–18: वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका — जिनकी भौंहें, मुखरूपी कामदेव के मंगल-गृह के तोरण-द्वार समान शोभित हैं; वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना — जिनके नेत्र, मुख की शोभा-धारा में तैरती मछलियों के समान कान्तिमान हैं।
श्लोक 6
नाम 19–20: नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता — नवपुष्पित चम्पक फूल के समान सुन्दर नासिका से शोभायमान; ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा — तारे की कान्ति को भी पराजित करनेवाले नासाभूषण से देदीप्यमान।
श्लोक 7
नाम 21–22: कदम्बमञ्जरीक्लृप्तकर्णपूरमनोहरा — कदम्ब की मंजरियों के कर्णफूल पहने अत्यन्त मनोहर; ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला — सूर्य और चन्द्र को ही अपने युगल कर्णाभूषण (ताटंक) के रूप में धारण करनेवाली।
श्लोक 8
नाम 23–24: पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः — जिनके कपोल पद्मराग मणि के दर्पण की शोभा को भी लज्जित करते हैं; नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा — जिनके अधर नवीन मूँगे और बिम्बफल की शोभा को भी तिरस्कृत करते हैं।
श्लोक 9
नाम 25–26: शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला — जिनकी दन्त-पंक्तियाँ शुद्ध विद्या के अंकुर के समान उज्ज्वल हैं; कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा — जो कर्पूर-युक्त पान के सुगन्ध से दिशाओं को भी आकर्षित कर लेती हैं।
श्लोक 10
नाम 27–28: निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी — जिनकी वाणी की मधुरता सरस्वती की वीणा 'कच्छपी' को भी लज्जित कर देती है; मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा — जिनकी मन्द मुस्कान की आभा में कामेश्वर (शिव) का मन भी डूब जाता है।
श्लोक 11
नाम 29–30: अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिता — जिनकी चिबुक (ठोड़ी) की शोभा किसी से भी तुलनीय नहीं, अतुलनीय सौन्दर्य से शोभित; कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा — जिनकी गर्दन कामेश्वर द्वारा बाँधे गए मंगलसूत्र से सुशोभित है।
श्लोक 12
नाम 31–32: कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता — जिनकी भुजाएँ सुवर्ण के बाजूबन्द और केयूर आभूषणों से सुन्दर हैं; रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता — जिनकी गर्दन रत्नजटित हार और मुक्ताफल के लोलक से शोभायमान है।
श्लोक 13
नाम 33–34: कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी — जो कामेश्वर द्वारा दिए प्रेमरूपी रत्न के प्रतिफल में अपने स्तन अर्पित करती हैं; नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयी — जिनकी नाभि के गड्ढे से उठी रोमलता पर उगे फल के समान उनके दोनों स्तन हैं।
श्लोक 14
नाम 35–36: लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा — जिनकी कटि इतनी सूक्ष्म है कि उसका अस्तित्व केवल रोमलता के आधार से ही अनुमान किया जा सकता है; स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया — जिनके उदर पर तीन रेखाएँ, स्तनों के भार से कटि को टूटने से बचाने वाली पेटी के समान हैं।
श्लोक 15
नाम 37–38: अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी — जिनकी कटि कुसुम्भ (कुसुम) के रंग से रँगे उगते सूर्य-सम लाल वस्त्र से देदीप्यमान है; रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता — जो रत्नजटित घुँघरुओं वाली करधनी से सुशोभित हैं।
श्लोक 16
नाम 39–40: कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता — जिनकी जंघाओं का सौन्दर्य और कोमलता केवल उनके पति कामेश्वर को ही ज्ञात है; माणिक्यमकुटाकारजानुद्वयविराजिता — जिनके दोनों घुटने माणिक्य-मुकुट के समान शोभायमान हैं।
श्लोक 17
नाम 41–43: इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका — जिनकी पिंडलियाँ इन्द्रगोप (बीरबहूटी) कीटों से आवृत कामदेव के तरकश समान चमकती हैं; गूढगुल्फा — जिनके टखने छिपे हुए (सुगठित) हैं; कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता — जिनके चरणों का ऊपरी भाग कछुए की पीठ की कोमलता व सुन्दरता को भी जीतनेवाला है।
श्लोक 18
नाम 44–45: नखदीधितिसंछन्ननमज्जनतमोगुणा — जिनके नखों की किरणें, चरणों में नमन करनेवाले भक्तों के अज्ञानरूपी अंधकार को सम्पूर्णतः दूर कर देती हैं; पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा — जिनके दोनों चरणों की कान्ति कमल के फूलों को भी पराजित कर देती है।
श्लोक 19
नाम 46–48: शिञ्जानमणिमञ्जिरमण्डितश्रीपदाम्बुजा — जिनके मंगलमय चरणकमल मधुर झंकार करते रत्नजटित स्वर्ण-नूपुरों से सुशोभित हैं; मरालीमन्दगमना — जिनकी चाल हंसिनी के समान मन्द और सौम्य है; महालावण्यशेवधिः — जो सौन्दर्य की महान निधि हैं।
श्लोक 20
नाम 49–54: सर्वारुणा — जिनका सम्पूर्ण शरीर अरुण (लाल) वर्ण का है; अनवद्याङ्गी — जिनका अंग-अंग पूजनीय व दोषरहित है; सर्वाभरणभूषिता — जो सभी प्रकार के आभूषणों से सुशोभित हैं; शिवकामेश्वराङ्कस्था — जो शिव-कामेश्वर की गोद में विराजमान हैं; शिवा — जो समस्त मंगल प्रदान करनेवाली हैं; स्वाधीनवल्लभा — जो अपने पति को सदा अपने अधीन रखनेवाली हैं।
श्लोक 21
नाम 55–58: सुमेरुमध्यशृङ्गस्था — जो सुमेरु पर्वत के मध्य शिखर पर विराजमान हैं; श्रीमन्नगरनायिका — जो परम ऐश्वर्यशाली (श्रीनगर) की स्वामिनी हैं; चिन्तामणिगृहान्तस्था — जो चिन्तामणि से निर्मित भवन के भीतर निवास करती हैं; पञ्चब्रह्मासनस्थिता — जो पाँच ब्रह्माओं (सदाशिव आदि) के बने आसन पर विराजमान हैं।
श्लोक 22
नाम 59–63: महापद्माटवीसंस्था — जो महान पद्मवन में निवास करती हैं; कदम्बवनवासिनी — जो कदम्ब वन में निवास करती हैं; सुधासागरमध्यस्था — जो अमृत के सागर के मध्य में विराजमान हैं; कामाक्षी — जिनके नेत्र कामना को जगानेवाले अथवा जो स्वयं सुन्दर नेत्रों वाली हैं; कामदायिनी — जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं।
श्लोक 23
नाम 64–65: देवर्षिगणसङ्घातस्तूयमानात्मवैभवा — जिनके वैभव की स्तुति देवताओं और ऋषियों के समूह मिलकर करते हैं; भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता — जो भण्डासुर के वध हेतु तत्पर शक्तियों की सेना से युक्त हैं।
श्लोक 24
नाम 66–67: सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता — जिनकी सेवा सम्पत्करी शक्ति द्वारा संचालित गजसमूह करता है; अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता — जो अश्वारूढा शक्ति के अधीन करोड़ों-करोड़ घुड़सवारों की सेना से घिरी हैं।
श्लोक 25
नाम 68–69: चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता — जो सभी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित चक्रराज रथ पर आरूढ़ होकर शोभायमान हैं; गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता — जिनकी सेवा गेयचक्र रथ पर आरूढ़ मन्त्रिणी शक्ति करती हैं।
श्लोक 26
नाम 70–71: किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता — जिनके आगे किरिचक्र रथ पर आरूढ़ दण्डनाथा शक्ति चलती हैं; ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा — जो ज्वालामालिनी देवी द्वारा रचित अग्नि के परकोटे के मध्य में विराजमान हैं।
श्लोक 27
नाम 72–73: भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता — जो भण्डासुर की सेना का विनाश करने में तत्पर शक्तियों के शौर्य से प्रमुदित होती हैं; नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका — जो अपनी नित्या देवियों के पराक्रम और गर्व को देखने की उत्सुकता रखती हैं।
श्लोक 28
नाम 74–75: भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता — जो भण्डासुर के पुत्रों के वध में तत्पर बाला देवी के पराक्रम से आनन्दित होती हैं; मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषिता — जो मन्त्रिणी शक्ति द्वारा विषंग असुर के वध से संतुष्ट होती हैं।
श्लोक 29
नाम 76–77: विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता — जो वाराही शक्ति द्वारा विशुक्र का प्राणहरण करने के पराक्रम से प्रसन्न होती हैं; कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा — जो कामेश्वर के मुख की एक दृष्टि से श्री गणेश को उत्पन्न करती हैं।
श्लोक 30
नाम 78–79: महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता — जो महागणेश द्वारा विघ्न-यन्त्र को नष्ट करने पर आनन्दित होती हैं; भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणी — जो भण्डासुर द्वारा छोड़े गए प्रत्येक अस्त्र के प्रत्युत्तर में प्रति-अस्त्रों की वृष्टि करती हैं।
श्लोक 31
नाम 80–81: कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः — जिनकी अँगुलियों के नखों से नारायण के दस अवतार उत्पन्न हुए; महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका — जिनने महापाशुपत अस्त्र की अग्नि से असुरों की सेना को भस्म कर दिया।
श्लोक 32
नाम 82–83: कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका — जिनने कामेश्वर अस्त्र से भण्डासुर और उसकी राजधानी शून्यका को भस्म कर दिया; ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा — जिनके वैभव की स्तुति ब्रह्मा, विष्णु (उपेन्द्र), इन्द्र (महेन्द्र) आदि देवगण करते हैं।
श्लोक 33
नाम 84–85: हरनेत्राग्निसन्दग्धकामसञ्जीवनौषधिः — जो शिव के (तीसरे) नेत्र की अग्नि से भस्म हुए कामदेव के लिए संजीवनी औषधि बनीं; श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा — जिनका मुखकमल पंचदशी मन्त्र के वाग्भवकूट (प्रथम भाग) के स्वरूप ही है।
श्लोक 34
नाम 86–87: कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी — जिनका कण्ठ से कटि तक का भाग पंचदशी मन्त्र के मध्यकूट का स्वरूप है; शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी — जिनका कटि से नीचे का भाग शक्तिकूट (अन्तिम भाग) का स्वरूप धारण करता है।
श्लोक 35
नाम 88–91: मूलमन्त्रात्मिका — जो मूल (पंचदशाक्षरी) मन्त्र की साक्षात् स्वरूपा हैं; मूलकूटत्रयकलेवरा — जिनका सूक्ष्म शरीर मन्त्र के तीन कूटों से निर्मित है; कुलामृतैकरसिका — जो कुल नामक अमृत-रस का विशेष रसास्वादन करती हैं; कुलसङ्केतपालिनी — जो कुल-मार्ग की साधना-विधि की रक्षा करती हैं।
श्लोक 36
नाम 92–98: कुलाङ्गना — जो श्रेष्ठ कुल की कुलवती हैं; कुलान्तस्था — जो कुल-विद्या के भीतर निवास करती हैं; कौलिनी — जो कुल सम्प्रदाय से सम्बद्ध हैं; कुलयोगिनी — जो कुल-मार्ग की अधिष्ठात्री देवी हैं; अकुला — जो किसी कुल (परिवार) से बँधी नहीं हैं; समयान्तस्था — जो समय-मार्ग के भीतर निवास करती हैं; समयाचारतत्परा — जो समयाचार (वैदिक) पूजा-विधि में सदा संलग्न रहती हैं।
श्लोक 37
नाम 99–102: मूलाधारैकनिलया — जिनका मुख्य निवास मूलाधार चक्र है; ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी — जो ब्रह्मग्रन्थि को भेदन करती हैं; मणिपूरान्तरुदिता — जो मणिपूर चक्र में प्रकट होती हैं; विष्णुग्रन्थिविभेदिनी — जो विष्णुग्रन्थि को भेदन करती हैं।
श्लोक 38
नाम 103–106: आज्ञाचक्रान्तरालस्था — जो आज्ञा चक्र के मध्य में निवास करती हैं; रुद्रग्रन्थिविभेदिनी — जो रुद्रग्रन्थि को भेदन करती हैं; सहस्राराम्बुजारूढा — जो सहस्रदल कमल पर आरोहण करती हैं; सुधासाराभिवर्षिणी — जो अमृत की अजस्र धारा बहाती हैं।
श्लोक 39
नाम 107–111: तडिल्लतासमरुचिः — जो बिजली की लता के समान कान्तिमयी हैं; षट्चक्रोपरिसंस्थिता — जो षट्चक्रों से ऊपर विराजमान हैं; महासक्तिः — जो शिव-शक्ति के परम मिलन में अनुरक्त हैं; कुण्डलिनी — जो कुण्डल के आकार में विद्यमान हैं; बिसतन्तुतनीयसी — जो कमल-नाल के तन्तु से भी अधिक सूक्ष्म और कोमल हैं।
श्लोक 40
नाम 112–117: भवानी — जो भव (शिव) की पत्नी हैं; भावनागम्या — जो केवल भावना (ध्यान) से ही प्राप्त होती हैं; भवारण्यकुठारिका — जो संसार-रूपी वन को काटने के लिए कुठार समान हैं; भद्रप्रिया — जो मंगलकारी वस्तुओं को प्रिय मानती हैं (और प्रदान करती हैं); भद्रमूर्तिः — जो मंगल और कल्याण की साक्षात् मूर्ति हैं; भक्तसौभाग्यदायिनी — जो भक्तों को सौभाग्य प्रदान करती हैं।
श्लोक 41
नाम 118–125: भक्तिप्रिया — जिन्हें भक्ति प्रिय है; भक्तिगम्या — जो केवल भक्ति द्वारा ही प्राप्त होती हैं; भक्तिवश्या — जो भक्ति से वश में की जा सकती हैं; भयापहा — जो भय का नाश करती हैं; शाम्भवी — जो शम्भु (शिव) की पत्नी हैं; शारदाराध्या — जिनकी आराधना शारदा (सरस्वती) करती हैं; शर्वाणी — जो शर्व (शिव) की पत्नी हैं; शर्मदायिनी — जो सुख प्रदान करती हैं।
श्लोक 42
नाम 126–133: शाङ्करी — जो आनन्द प्रदान करती हैं; श्रीकरी — जो प्रचुर ऐश्वर्य प्रदान करती हैं; साध्वी — जो सती और पतिव्रता हैं; शरच्चन्द्रनिभानना — जिनका मुख शरद ऋतु के पूर्ण चन्द्रमा के समान शोभायमान है; शातोदरी — जिनकी कटि अत्यन्त कृश है; शान्तिमती — जो शान्तिमयी हैं; निराधारा — जिन्हें किसी के आधार की आवश्यकता नहीं; निरञ्जना — जो किसी से अनासक्त व निर्लिप्त रहती हैं।
श्लोक 43
नाम 134–143: निर्लेपा — जो कर्मों के दोष से सर्वथा मुक्त हैं; निर्मला — जो सभी मलों से रहित हैं; नित्या — जो सनातन व अविनाशी हैं; निराकरा — जो आकार-रहित हैं; निराकुला — जो किसी व्याकुलता से रहित हैं; निर्गुणा — जो सत्त्व, रज, तम तीनों गुणों से परे हैं; निष्कला — जो अंशहीन (अखण्ड) हैं; शान्ता — जो शान्त स्वरूपा हैं; निष्कामा — जो समस्त कामनाओं से रहित हैं; निरुपप्लवा — जो अविनाशी व अबाध्य हैं।
श्लोक 44
नाम 144–151: नित्यमुक्ता — जो सांसारिक बन्धनों से सदा मुक्त हैं; निर्विकारा — जो किसी विकार से रहित हैं; निष्प्रपञ्चा — जो इस दृश्य जगत् से परे हैं; निराश्रया — जो किसी के आश्रय की अपेक्षा नहीं रखती; नित्यशुद्धा — जो सदा शुद्ध हैं; नित्यबुद्धा — जो सदा बुद्धिमयी व जागृत हैं; निरवद्या — जो दोष-रहित व सर्वथा प्रशंसनीय हैं; निरन्तरा — जो सर्वव्यापी व अविच्छिन्न हैं।
श्लोक 45
नाम 152–159: निष्कारणा — जो किसी कारण से उत्पन्न नहीं; निष्कलङ्का — जो सर्वथा निर्दोष हैं; निरुपाधिः — जो किसी उपाधि (सीमा) से बँधी नहीं; निरीश्वरा — जिनका कोई स्वामी या रक्षक नहीं (स्वयं ही सर्वोच्च हैं); नीरागा — जो राग (आसक्ति) से रहित हैं; रागमथनी — जो भक्तों की आसक्तियों का विनाश करती हैं; निर्मदा — जो अहंकार से रहित हैं; मदनाशिनी — जो (भक्तों के) अहंकार व मद का नाश करती हैं।
श्लोक 46
नाम 160–167: निश्चिन्ता — जो किसी भी चिन्ता से मुक्त हैं; निरहङ्कारा — जो अहंकार (मैं और मेरा के भाव) से रहित हैं; निर्मोहा — जो मोह से रहित हैं; मोहनाशिनी — जो भक्तों के मोह का नाश करती हैं; निर्ममा — जो ममत्व से रहित हैं; ममताहन्त्री — जो भक्तों की ममता का नाश करती हैं; निष्पापा — जो पाप से रहित हैं; पापनाशिनी — जो भक्तों के समस्त पापों का नाश करती हैं।
श्लोक 47
नाम 168–175: निष्क्रोधा — जो क्रोध से रहित हैं; क्रोधशमनी — जो भक्तों के क्रोध का शमन करती हैं; निर्लोभा — जो लोभ से रहित हैं; लोभनाशिनी — जो भक्तों के लोभ का नाश करती हैं; निःसंशया — जो संदेह से रहित हैं; संशयघ्नी — जो समस्त संशयों का नाश करती हैं; निर्भवा — जो उत्पत्तिरहित हैं; भवनाशिनी — जो संसार-चक्र के दुःख का नाश करती हैं।
श्लोक 48
नाम 176–183: निर्विकल्पा — जो मिथ्या कल्पनाओं से रहित हैं; निराबाधा — जो किसी बाधा से विचलित नहीं होती; निर्भेदा — जो भेद-भाव से परे हैं; भेदनाशिनी — जो भक्तों के वासना-जनित भेद-भाव का नाश करती हैं; निर्नाशा — जो अविनाशी हैं; मृत्युमथनी — जो मृत्यु का नाश करती हैं; निष्क्रिया — जो क्रिया-रहित (निष्क्रिय नहीं, बल्कि कर्म-बन्धन से परे) हैं; निष्परिग्रहा — जो किसी वस्तु का संग्रह या स्वीकार नहीं करती।
श्लोक 49
नाम 184–192: निस्तुला — जो अनुपम व अतुलनीय हैं; नीलचिकुरा — जिनके केश श्याम और चमकीले हैं; निरपाया — जो अविनाशी हैं; निरत्यया — जिनका उल्लंघन सम्भव नहीं; दुर्लभा — जो अत्यन्त कठिनता से प्राप्त होती हैं; दुर्गमा — जो केवल कठोर प्रयास से ही सुलभ हैं; दुर्गा — जो देवी दुर्गा स्वरूपा हैं; दुःखहन्त्री — जो दुःख का नाश करती हैं; सुखप्रदा — जो सुख प्रदान करती हैं।
श्लोक 50
नाम 193–198: दुष्टदूरा — जो दुष्टों के लिए अगम्य हैं; दुराचारशमनी — जो दुराचार का शमन करती हैं; दोषवर्जिता — जो सभी दोषों से रहित हैं; सर्वज्ञा — जो सर्वज्ञ हैं; सान्द्रकरुणा — जो गहन करुणा से युक्त हैं; समानाधिकवर्जिता — जिनके समान या उनसे बढ़कर कोई नहीं है।
श्लोक 51
नाम 199–204: सर्वशक्तिमयी — जो समस्त दिव्य शक्तियों से युक्त (सर्वशक्तिमान) हैं; सर्वमङ्गला — जो समस्त मंगल का मूल स्रोत हैं; सद्गतिप्रदा — जो सत्पथ पर ले जाती हैं; सर्वेश्वरी — जो समस्त चर-अचर पर शासन करती हैं; सर्वमयी — जो समस्त चर-अचर में व्याप्त हैं; सर्वमन्त्रस्वरूपिणी — जो समस्त मन्त्रों का सार-स्वरूप हैं।
श्लोक 52
नाम 205–211: सर्वयन्त्रात्मिका — जो समस्त यन्त्रों की आत्मा हैं; सर्वतन्त्ररूपा — जो समस्त तन्त्रों का साक्षात् स्वरूप हैं; मनोन्मनी — जो शिव की उन्मनी शक्ति हैं; माहेश्वरी — जो महेश्वर की पत्नी हैं; महादेवी — जिनका शरीर अपरिमेय है; महालक्ष्मी — जो महान लक्ष्मी देवी स्वरूपा हैं; मृडप्रिया — जो मृड (शिव) की प्रियतमा हैं।
श्लोक 53
नाम 212–218: महारूपा — जो महान स्वरूपवाली हैं; महापूज्या — जो पूजनीयों में सर्वोच्च हैं; महापातकनाशिनी — जो महान पातकों का भी नाश कर देती हैं; महामाया — जो महान माया-स्वरूपा हैं; महासत्त्वा — जो महान सत्त्वगुण से युक्त हैं; महाशक्तिः — जो महान शक्ति से सम्पन्न हैं; महारतिः — जो असीम आनन्द-स्वरूपा हैं।
श्लोक 54
नाम 219–225: महाभोगा — जो अपरिमित ऐश्वर्य की स्वामिनी हैं; महैश्वर्या — जो परम सार्वभौम शक्ति से युक्त हैं; महावीर्या — जो परम पराक्रमी हैं; महाबला — जो परम बलशाली हैं; महाबुद्धिः — जो परम बुद्धिमती हैं; महासिद्धिः — जो उच्चतम सिद्धियों से सम्पन्न हैं; महायोगेश्वरेश्वरी — जो महान योगियों द्वारा भी पूज्य हैं।
श्लोक 55
नाम 226–231: महातन्त्रा — जिनकी पूजा महान तन्त्रों (कुलार्णव, ज्ञानार्णव आदि) में की जाती है; महामन्त्रा — जो महानतम मन्त्र-स्वरूपा हैं; महायन्त्रा — जो महान यन्त्रों के रूप में विद्यमान हैं; महासना — जो महान आसनों पर विराजमान हैं; महायागक्रमाराध्या — जिनकी आराधना महायाग की विधि से की जाती है; महाभैरवपूजिता — जिनकी पूजा महाभैरव (शिव) भी करते हैं।
श्लोक 56
नाम 232–234: महेश्वरमहाकल्पमहाताण्डवसाक्षिणी — जो महाकल्प के अन्त में महेश्वर (शिव) के महान ताण्डव नृत्य की साक्षी हैं; महाकामेशमहिषी — जो महाकामेश्वर (शिव) की महान पट्टमहिषी हैं; महात्रिपुरसुन्दरी — जो महान त्रिपुरसुन्दरी हैं।
श्लोक 57
नाम 235–237: चतुष्षष्ट्युपचाराढ्या — जिनकी चौंसठ उपचारों द्वारा पूजा होती है; चतुष्षष्टिकलामयी — जो चौंसठ कलाओं की साक्षात् स्वरूपा हैं; महाचतुष्षष्टिकोटियोगिनीगणसेविता — जिनकी सेवा चौंसठ करोड़ योगिनियों के समूह करते हैं।
श्लोक 58
नाम 238–243: मनुविद्या — जो मनुविद्या-स्वरूपा हैं; चन्द्रविद्या — जो चन्द्रविद्या-स्वरूपा हैं; चन्द्रमण्डलमध्यगा — जो चन्द्रमण्डल के मध्य में विराजमान हैं; चारुरूपा — जिनका सौन्दर्य न घटता न बढ़ता; चारुहासा — जिनकी मुस्कान अत्यन्त सुन्दर है; चारुचन्द्रकलाधरा — जो अक्षय सौन्दर्यमयी चन्द्र-कला को धारण करती हैं।
श्लोक 59
नाम 244–248: चराचरजगन्नाथा — जो चर-अचर सम्पूर्ण जगत् की स्वामिनी हैं; चक्रराजनिकेतना — जो श्रीचक्र में निवास करती हैं; पार्वती — जो पर्वतराज हिमालय की कन्या हैं; पद्मनयना — जिनके नेत्र कमल-दल के समान दीर्घ व सुन्दर हैं; पद्मरागसमप्रभा — जिनकी कान्ति पद्मराग मणि के समान लाल है।
श्लोक 60
नाम 249–253: पञ्चप्रेतासनासीना — जो पाँच प्रेतों से बने आसन पर विराजमान हैं; पञ्चब्रह्मस्वरुपिणी — जिनका स्वरूप पाँच ब्रह्माओं से निर्मित है; चिन्मयी — जो साक्षात् चेतना-स्वरूपा हैं; परमानन्दा — जो परम आनन्द-स्वरूपा हैं; विज्ञानघनरूपिणी — जो सर्वव्यापी सघन ज्ञान की मूर्ति हैं।
श्लोक 61
नाम 254–259: ध्यानध्यातृध्येयरूपा — जो ध्यान, ध्याता और ध्येय — तीनों के रूप में प्रकट होती हैं; धर्माधर्मविवर्जिता — जो धर्म और अधर्म दोनों से परे हैं; विश्वरुपा — जिनका स्वरूप सम्पूर्ण विश्व है; जागरिणी — जो जाग्रत अवस्था की जीव-स्वरूपा हैं; स्वपन्ती — जो स्वप्न अवस्था की जीव-स्वरूपा हैं; तैजसात्मिका — जो तैजस (स्वप्नावस्था के सूक्ष्म-शरीरी जीव) की आत्मा हैं।
श्लोक 62
नाम 260–267: सुप्ता — जो सुषुप्ति (गहन निद्रा) अवस्था के जीव-स्वरूपा हैं; प्राज्ञात्मिका — जो प्राज्ञ (सुषुप्ति का अनुभव करनेवाला) से अभिन्न हैं; तुर्या — जो तुरीय (चौथी, आत्मा के साक्षात्कार की अवस्था) हैं; सर्वावस्थाविवर्जिता — जो चारों अवस्थाओं से परे हैं; सृष्टिकर्त्री — जो सृष्टि की कर्ता हैं; ब्रह्मरूपा — जो ब्रह्मा के रूप में हैं; गोप्त्री — जो रक्षा करती हैं; गोविन्दरूपिणी — जो विश्व के पालन हेतु गोविन्द (विष्णु) का स्वरूप धारण करती हैं।
श्लोक 63
नाम 268–274: संहारिणी — जो सृष्टि का संहार करनेवाली हैं; रुद्ररूपा — जो विश्व के विलय हेतु रुद्र (शिव) का स्वरूप धारण करती हैं; तिरोधानकरी — जो सब वस्तुओं का तिरोधान (अदृश्य) करती हैं; ईश्वरी — जो सबकी रक्षा और शासन करती हैं; सदाशिवा — जो सदा मंगल प्रदान करनेवाली सदाशिव-स्वरूपा हैं; अनुग्रहदा — जो अनुग्रह प्रदान करती हैं; पञ्चकृत्यपरायणा — जो पाँच कृत्यों (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान तथा अनुग्रह) में सदा संलग्न रहती हैं।
श्लोक 64
नाम 275–280: भानुमण्डलमध्यस्था — जो सूर्यमण्डल के मध्य में निवास करती हैं; भैरवी — जो भैरव (शिव) की पत्नी हैं; भगमालिनी — जो (मंगल, ऐश्वर्य, यश, शौर्य, वैराग्य व ज्ञान) छह भगों की माला धारण करती हैं; पद्मासना — जो कमल के आसन पर विराजमान हैं; भगवती — जो अपने आराधकों की रक्षा करती हैं; पद्मनाभसहोदरी — जो विष्णु (पद्मनाभ) की भगिनी हैं।
श्लोक 65
नाम 281–284: उन्मेषनिमिषोत्पन्नविपन्नभुवनावली — जिनके नेत्रों के खुलने व बन्द होने से असंख्य लोकों की सृष्टि व संहार होता है; सहस्रशीर्षवदना — जो सहस्र सिर व मुखों वाली हैं; सहस्राक्षी — जो सहस्र नेत्रों वाली हैं; सहस्रपात् — जो सहस्र चरणों वाली हैं।
श्लोक 66
नाम 285–288: आब्रह्मकीटजननी — जो ब्रह्मा से लेकर तुच्छतम कीट तक सभी की जननी हैं; वर्णाश्रमविधायिनि — जिन्होंने वर्ण और आश्रम की सामाजिक व्यवस्था स्थापित की; निजाज्ञारूपनिगमा — जिनकी आज्ञा ही वेदों का रूप है; पुण्यापुण्यफलप्रदा — जो शुभ और अशुभ दोनों कर्मों के फल प्रदान करती हैं।
श्लोक 67
नाम 289–290: श्रुतिसीमन्तसिन्दूरीकृतपादाब्जधूलिका — जिनके चरणकमलों की रज, श्रुति-देवियों (वेद-देवताओं) की माँग का सिन्दूर बनती है; सकलागमसन्दोहशुक्तिसम्पुटमौक्तिका — जो समस्त आगम-शास्त्रों के समूह-रूपी सीप में छिपे मुक्ता (मोती) समान हैं।
श्लोक 68
नाम 291–297: पुरुषार्थप्रदा — जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — चार पुरुषार्थ प्रदान करती हैं; पूर्णा — जो सदा पूर्ण, अविकारी हैं; भोगिनी — जो भोगों की भोक्ता हैं; भुवनेश्वरी — जो सम्पूर्ण लोकों की स्वामिनी हैं; अम्बिका — जो विश्व की जननी हैं; अनादिनिधना — जिनका न आदि है न अन्त; हरिब्रह्मेन्द्रसेविता — जिनकी सेवा विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र करते हैं।
श्लोक 69
नाम 298–304: नारायणी — जो नारायण की शक्ति-स्वरूपा हैं; नादरूपा — जो नाद (ध्वनि) के रूप में विद्यमान हैं; नामरूपविवर्जिता — जो नाम और रूप दोनों से परे हैं; ह्रीङ्कारी — जो 'ह्रीं' बीज-मन्त्र के रूप में हैं; ह्रीमती — जो लज्जा (विनयशीलता) से युक्त हैं; हृद्या — जो हृदय में निवास करती हैं; हेयोपादेयवर्जिता — जिनके लिए कुछ भी त्यागने या ग्रहण करने योग्य नहीं बचा।
श्लोक 70
नाम 305–312: राजराजार्चिता — जिनकी पूजा राजाओं के राजा (कुबेर) करते हैं; राज्ञी — जो राजराज शिव की महारानी हैं; रम्या — जो आनन्द प्रदान करनेवाली व सुन्दर हैं; राजीवलोचना — जिनके नेत्र कमल (राजीव) समान हैं; रञ्जनी — जो मन को रंजित (प्रमुदित) करती हैं; रमणी — जो आनन्द देती हैं; रस्या — जो रस-स्वरूपा व रसास्वादिनी हैं; रणत्किङ्किणिमेखला — जो झंकृत घुँघरुओं की मेखला धारण करती हैं।
श्लोक 71
नाम 313–320: रमा — जो लक्ष्मी और सरस्वती का रूप धारण करती हैं; राकेन्दुवदना — जिनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा समान मनभावन है; रतिरूपा — जो रति (कामदेव की पत्नी) के रूप में हैं; रतिप्रिया — जिन्हें रति प्रिय है (अथवा जिनकी सेवा रति करती है); रक्षाकरी — जो रक्षा करती हैं; राक्षसघ्नी — जो राक्षसों के समूल वंश का नाश करती हैं; रामा — जो आनन्द प्रदायिनी हैं; रमणलम्पटा — जो अपने हृदय-स्वामी शिव के प्रति अनुरक्त हैं।
श्लोक 72
नाम 321–326: काम्या — जो समस्त की वाञ्छनीय हैं; कामकलारूपा — जो कामकला के स्वरूप में हैं; कदम्बकुसुमप्रिया — जिन्हें कदम्ब के फूल विशेष प्रिय हैं; कल्याणी — जो मंगल प्रदान करती हैं; जगतीकन्दा — जो सम्पूर्ण जगत् का मूल है; करुणारससागरा — जो करुणा-रस का सागर हैं।
श्लोक 73
नाम 327–333: कलावती — जो समस्त कलाओं की साक्षात् स्वरूपा हैं; कलालापा — जो मधुर व संगीतमय वचन बोलती हैं; कान्ता — जो सुन्दर हैं; कादम्बरीप्रिया — जिन्हें मधु (कादम्बरी) प्रिय है; वरदा — जो उदारता से वर प्रदान करती हैं; वामनयना — जिनके नेत्र अत्यन्त सुन्दर हैं; वारुणी मदविव्हला — जो वारुणी (अमृत-पान) के उन्माद से मग्न हैं।
श्लोक 74
नाम 334–340: विश्वाधिका — जो सम्पूर्ण विश्व से परे हैं; वेदवेद्या — जो वेदों द्वारा जानी जाती हैं; विन्ध्याचलनिवासिनी — जो विन्ध्य पर्वत में निवास करती हैं; विधात्री — जो इस जगत् की रचना और पालन करती हैं; वेदजननी — जो वेदों की जननी हैं; विष्णुमाया — जो विष्णु की माया-शक्ति हैं; विलासिनी — जो क्रीड़ाशील व विलासमयी हैं।
श्लोक 75
नाम 341–345: क्षेत्रस्वरूपा — जिनका स्वरूप क्षेत्र (जड़ प्रकृति) है; क्षेत्रेशी — जो क्षेत्रेश (शिव) की पत्नी हैं; क्षेत्रक्षेत्रज्ञपालिनी — जो क्षेत्र (शरीर) व क्षेत्रज्ञ (आत्मा) दोनों की रक्षा करती हैं; क्षयवृद्धिविनिर्मुक्ता — जो वृद्धि व क्षय दोनों से मुक्त हैं; क्षेत्रपालसमर्चिता — जिनकी पूजा क्षेत्रपाल (बाल-रूप शिव) करते हैं।
श्लोक 76
नाम 346–352: विजया — जो सदा विजयी हैं; विमला — जो किसी भी मल से रहित हैं; वन्द्या — जो पूजनीय हैं; वन्दारुजनवत्सला — जो अपनी स्तुति करनेवालों पर मातृवत् स्नेह रखती हैं; वाग्वादिनी — जो वाणी-स्वरूपा और वक्ता हैं; वामकेशी — जिनके केश अत्यन्त सुन्दर हैं; वह्निमण्डलवासिनी — जो अग्निमण्डल में निवास करती हैं।
श्लोक 77
नाम 353–356: भक्तिमत्कल्पलतिका — जो भक्तों के लिए कल्पलता (इच्छापूरक लता) समान हैं; पशुपाशविमोचिनी — जो अज्ञानी जीवों को बन्धन से मुक्त करती हैं; संहृताशेषपाषण्डा — जो समस्त पाखण्डियों का नाश करती हैं; सदाचारप्रवर्तिका — जो सदाचार में स्वयं निमग्न रहकर दूसरों को भी उसकी ओर प्रवृत्त करती हैं।
श्लोक 78
नाम 357–361: तापत्रयाग्निसन्तप्तसमाह्लादनचन्द्रिका — जो त्रिविध ताप (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) की अग्नि से संतप्त जनों को शीतलता देनेवाली चन्द्रिका हैं; तरुणी — जो सदा युवावस्था में हैं; तापसाराध्या — जिनकी आराधना तपस्वीजन करते हैं; तनुमध्या — जो कृशकटि हैं; तमोऽपहा — जो तमोगुण से उत्पन्न अज्ञान को दूर करती हैं।
श्लोक 79
नाम 362–365: चित् (चितिः) — जो शुद्ध चैतन्य-स्वरूपा हैं; तत्पदलक्ष्यार्था — जो 'तत्' शब्द से संकेतित परम सत्य (ब्रह्म) की साक्षात् अर्थ-स्वरूपा हैं; चिदेकरसरूपिणी — जो शुद्ध चैतन्य के एकमात्र रस-स्वरूपा हैं; स्वात्मानन्दलवीभूतब्रह्माद्यानन्दसन्ततिः — जिनके स्वयं के आनन्द के अंशमात्र के सामने ब्रह्मा आदि का आनन्द भी तुच्छ हो जाता है।
श्लोक 80
नाम 366–372: परा — जो परम, सबसे परे हैं; प्रत्यक्चितीरूपा — जो अन्तर्मुखी शुद्ध चेतना के स्वरूप में हैं; पश्यन्ती — जो वाणी की द्वितीय अवस्था 'पश्यन्ती' स्वरूपा हैं; परदेवता — जो परम देवता (परा शक्ति) हैं; मध्यमा — जो वाणी की मध्यमा अवस्था में स्थित हैं; वैखरीरूपा — जो वाणी की प्रकट, श्रवणीय 'वैखरी' अवस्था में हैं; भक्तमानसहंसिका — जो भक्तों के मानस-सरोवर में विहार करनेवाली हंसिनी हैं।
श्लोक 81
नाम 373–378: कामेश्वरप्राणनाडी — जो कामेश्वर (अपने पति) के प्राणों की नाड़ी ही हैं; कृतज्ञा — जो हमारे प्रत्येक कर्म को जानती हैं; कामपूजिता — जिनकी पूजा कामदेव करते हैं; शृङ्गाररससम्पूर्णा — जो शृंगार-रस से परिपूर्ण हैं; जया — जो सर्वत्र व सदा विजयशील हैं; जालन्धरस्थिता — जो जालन्धर पीठ (कण्ठ-क्षेत्र) में निवास करती हैं।
श्लोक 82
नाम 379–382: ओड्याणपीठनिलया — जिनका निवास ओड्याण पीठ (आज्ञा चक्र के मध्य) है; बिन्दुमण्डलवासिनी — जो श्रीचक्र के बिन्दुमण्डल में निवास करती हैं; रहोयागक्रमाराध्या — जिनकी आराधना गुप्त यज्ञ-विधि से की जाती है; रहस्तर्पणतर्पिता — जो गुप्त तर्पण-विधियों से संतुष्ट होती हैं।
श्लोक 83
नाम 383–387: सद्यःप्रसादिनी — जो तत्काल अपनी कृपा प्रदान करती हैं; विश्वसाक्षिणी — जो सम्पूर्ण विश्व की साक्षी हैं; साक्षिवर्जिता — जिनका स्वयं कोई अन्य साक्षी नहीं; षडङ्गदेवतायुक्ता — जो षड्-अंग देवताओं (हृदय, शिर, केश, नेत्र, कवच, अस्त्र) से युक्त हैं; षाड्गुण्यपरिपूरिता — जो छह गुणों (ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान, वैराग्य) से पूर्ण हैं।
श्लोक 84
नाम 388–392: नित्यक्लिन्ना — जो सदा करुणा से द्रवित रहती हैं; निरुपमा — जो अनुपम हैं; निर्वाण सुखदायिनी — जो मोक्ष का आनन्द प्रदान करती हैं; नित्या-षोडशिकारूपा — जो सोलह नित्या देवियों (कामेश्वरी आदि) के स्वरूप में हैं; श्रीकण्ठार्धशरीरिणी — जो श्रीकण्ठ (शिव) के शरीर का आधा भाग धारण करती हैं, अर्द्धनारीश्वर-स्वरूपा।
श्लोक 85
नाम 393–399: प्रभावती — जो तेजोमयी हैं; प्रभारूपा — जो स्वयं प्रभा (प्रकाश) का रूप हैं; प्रसिद्धा — जो सर्वत्र विख्यात हैं; परमेश्वरी — जो परम स्वामिनी हैं; मूलप्रकृतिः — जो सम्पूर्ण जगत् का आदि कारण (मूल प्रकृति) हैं; अव्यक्ता — जो अव्यक्त स्वरूपा हैं; व्यक्ताव्यक्तस्वरूपीणि — जो व्यक्त और अव्यक्त दोनों रूपों में विद्यमान हैं।
श्लोक 86
नाम 400–403: व्यापिनी — जो सर्वव्यापी हैं; विविधाकारा — जो अनेकानेक रूपों में विद्यमान हैं; विद्याऽविद्यास्वरूपिणी — जो विद्या और अविद्या दोनों का स्वरूप धारण करती हैं; महाकामेशनयनकुमुदाह्लादकौमुदी — जो महाकामेश (शिव) के नेत्र-रूपी कुमुदों को आनन्दित करनेवाली चन्द्रिका हैं।
श्लोक 87
नाम 404–408: भक्तहार्दतमोभेदभानुमद्भानुसन्ततिः — जो भक्तों के हृदय के अन्धकार को दूर करनेवाली सूर्य-किरण हैं; शिवदूती — जिनका दूत स्वयं शिव हैं; शिवाराध्या — जिनकी आराधना शिव करते हैं; शिवमूर्तिः — जिनका स्वरूप साक्षात् शिव ही है; शिवङ्करी — जो मंगल और सुख प्रदान करती हैं, अपने भक्तों को शिव-तुल्य बना देती हैं।
श्लोक 88
नाम 409–415: शिवप्रिया — जिन्हें शिव प्रिय हैं; शिवपरा — जो केवल शिव के प्रति समर्पित हैं; शिष्टेष्टा — जो सज्जनों की अभीष्ट देवता हैं; शिष्टपूजिता — जिनकी पूजा सदा सज्जन करते हैं; अप्रमेया — जो इन्द्रियों द्वारा मापी नहीं जा सकती; स्वप्रकाशा — जो स्वयंप्रकाशित हैं; मनोवाचामगोचरा — जो मन और वाणी की सीमा से परे हैं।
श्लोक 89
नाम 416–423: चिच्छक्तिः — जो चेतना की शक्ति हैं; चेतनारूपा — जो शुद्ध चेतना-स्वरूपा हैं; जडशक्तिः — जो माया के रूप में सृष्टि-शक्ति बनी हैं; जडात्मिका — जो जड़ जगत् के रूप में विद्यमान हैं; गायत्री — जो गायत्री मन्त्र-स्वरूपा हैं; व्याहृतिः — जो वाक्-शक्ति की अधिष्ठात्री उच्चारण-स्वरूपा हैं; सन्ध्या — जो सन्ध्या (प्रातः-सायं की उपासना) के रूप में हैं; द्विजवृन्दनिषेविता — जिनकी पूजा ब्राह्मण-समूह करता है।
श्लोक 90
नाम 424–431: तत्त्वासना — जिनका आसन तत्त्व है; तत् — 'तत्' शब्द से संकेतित परब्रह्म; त्वं — 'त्वम्' शब्द से संकेतित जीवात्मा; अयी — हे माता! (ऐसा सम्बोधन); पञ्चकोशान्तरस्थिता — जो पाँच कोशों (अन्नमय आदि) के भीतर निवास करती हैं; निःसीममहिमा — जिनकी महिमा असीम है; नित्ययौवना — जो सदा युवावस्था में रहती हैं; मदशालिनी — जो आनन्दमय उन्माद से सुशोभित हैं।
श्लोक 91
नाम 432–435: मदघूर्णितरक्ताक्षी — जिनके नेत्र आनन्द-उन्माद से रक्तवर्ण होकर घूमते हैं; मदपाटलगण्डभूः — जिनके कपोल आनन्द-उन्माद से गुलाबी हो गए हैं; चन्दनद्रवदिग्धाङ्गी — जिनका शरीर चन्दन के लेप से सुगन्धित है; चाम्पेयकुसुमप्रिया — जिन्हें चम्पा के फूल विशेष प्रिय हैं।
श्लोक 92
नाम 436–441: कुशला — जो सभी कार्यों में कुशल हैं; कोमलाकारा — जो कोमल व सुन्दर स्वरूप धारण करती हैं; कुरुकुल्ला — जो कुरुकुल्ला शक्ति-स्वरूपा हैं (कुरुविन्द मणि में निवासिनी); कुलेश्वरी — जो कुल (ज्ञाता, ज्ञान व ज्ञेय की त्रिपुटी) की स्वामिनी हैं; कुलकुण्डालया — जो मूलाधार चक्र के कुलकुण्ड (बिन्दु) में निवास करती हैं; कौलमार्गतत्परसेविता — जिनकी सेवा कौल-मार्ग के साधक करते हैं।
श्लोक 93
नाम 442–451: कुमारगणनाथाम्बा — जो कुमार (कार्तिकेय) और गणनाथ (गणेश) की जननी हैं; तुष्टिः — जो सदा सन्तुष्टि-स्वरूपा हैं; पुष्टिः — जो पोषण-शक्ति हैं; मतिः — जो बुद्धि के रूप में प्रकट होती हैं; धृतिः — जो धैर्य-स्वरूपा हैं; शान्तिः — जो शान्ति-स्वरूपा हैं; स्वस्तिमती — जो परम सत्य व कल्याण-स्वरूपा हैं; कान्तिः — जो तेज व कान्ति-स्वरूपा हैं; नन्दिनी — जो आनन्द प्रदान करती हैं; विघ्ननाशिनी — जो समस्त बाधाओं का नाश करती हैं।
श्लोक 94
नाम 452–458: तेजोवती — जो तेजोमयी हैं; त्रिनयना — जिनके सूर्य, चन्द्र और अग्नि तीन नेत्र हैं; लोलाक्षी — जिनके नेत्र चंचल हैं; कामरूपिणी — जो स्त्रियों में प्रेम-भाव के रूप में विद्यमान हैं; मालिनी — जो माला धारण करती हैं; हंसिनी — जो उच्च आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त योगियों (हंसों) से अभिन्न हैं; माता — जो विश्व की जननी हैं; मलयाचलवासिनी — जो मलय पर्वत में निवास करती हैं।
श्लोक 95
नाम 459–467: सुमुखी — जिनका मुख अत्यन्त सुन्दर है; नलिनी — जिनका शरीर कमल-दल समान कोमल व सुन्दर है; सुभ्रूः — जिनकी भौंहें सुन्दर हैं; शोभना — जो सदा उज्ज्वल व शोभायमान हैं; सुरनायिका — जो देवताओं की अधिनायिका हैं; कालकण्ठी — जो शिव की पत्नी हैं; कान्तिमती — जो तेजोमयी हैं; क्षोभिणी — जो मन में उद्वेलन उत्पन्न करती हैं; सूक्ष्मरूपिणी — जिनका स्वरूप इन्द्रियों से परे अत्यन्त सूक्ष्म है।
श्लोक 96
नाम 468–474: वज्रेश्वरी — जो छठी नित्या देवी, वज्रेश्वरी-स्वरूपा हैं; वामदेवी — जो वामदेव (शिव) की पत्नी हैं; वयोऽवस्थाविवर्जिता — जो आयु (काल) के परिवर्तनों से मुक्त हैं; सिद्धेश्वरि — जिनकी पूजा सिद्ध पुरुष करते हैं; सिद्धविद्या — जो सिद्धविद्या (पंचदशाक्षरी मन्त्र) के रूप में हैं; सिद्धमाता — जो सिद्धों की जननी हैं; यशस्विनी — जो अप्रतिम यशस्विनी हैं।
श्लोक 97
नाम 475–479: विशुद्धिचक्रनिलया — जो विशुद्धि चक्र में निवास करती हैं; आरक्तवर्णा — जिनका वर्ण हल्का लाल है; त्रिलोचना — जिनके तीन नेत्र हैं; खट्वाङ्गादिप्रहरणा — जो खट्वांग (गदा) आदि अस्त्र धारण करती हैं; वदनैकसमन्विता — जो यहाँ केवल एक मुख धारण करती हैं।
श्लोक 98
नाम 480–484: पायसान्नप्रिया — जिन्हें खीर विशेष प्रिय है; त्वक्स्था — जो त्वचा की अधिष्ठात्री देवी हैं; पशुलोकभयङ्करी — जो संसार में बंधे जीवों को भय से आक्रान्त करती हैं; अमृतादिमहाशक्तिसंवृता — जो अमृता आदि महाशक्तियों से घिरी हैं; डाकिनीश्वरी — जो डाकिनी देवी-स्वरूपा हैं।
श्लोक 99
नाम 485–490: अनाहताब्जनिलया — जो हृदय के अनाहत-कमल में निवास करती हैं; श्यामाभा — जिनका वर्ण श्याम है; वदनद्वया — जिनके दो मुख हैं; दंष्ट्रोज्ज्वला — जिनकी दाढ़ें देदीप्यमान हैं; अक्षमालादिधरा — जो रुद्राक्ष की माला आदि धारण करती हैं; रुधिरसंस्थिता — जो जीवों के शरीर में रक्त की अधिष्ठात्री हैं।
श्लोक 100
नाम 491–494: कालरात्र्यादिशक्त्यौघवृता — जो कालरात्रि आदि शक्तियों के समूह से घिरी हैं; स्निग्धौदनप्रिया — जिन्हें घी-तेल युक्त भोजन प्रिय है; महावीरेन्द्रवरदा — जो महान वीरों को वर प्रदान करती हैं; राकिण्यम्बास्वरूपिणी — जो राकिणी देवी-स्वरूपा हैं।
श्लोक 101
नाम 495–498: मणिपूराब्जनिलया — जो मणिपूर चक्र के दस-दल कमल में निवास करती हैं; वदनत्रयसंयुता — जिनके तीन मुख हैं; वज्रादिकायुधोपेता — जो वज्र आदि अस्त्र धारण करती हैं; डामर्यादिभिरावृता — जो डामरी आदि देवियों से घिरी हैं।
श्लोक 102
नाम 499–503: रक्तवर्णा — जो रक्त (लाल) वर्ण की हैं; मांसनिष्ठा — जो जीवों के मांस की अधिष्ठात्री हैं; गुडान्नप्रीतमानसा — जिनका मन गुड़ से बनी खीर में प्रीत होता है; समस्तभक्तसुखदा — जो समस्त भक्तों को सुख प्रदान करती हैं; लाकिन्यम्बास्वरूपिणी — जो लाकिनी योगिनी-स्वरूपा हैं।
श्लोक 103
नाम 504–508: स्वाधिष्ठानाम्बुजगता — जो स्वाधिष्ठान चक्र के छह-दल कमल में विराजमान काकिनी योगिनी हैं; चतुर्वक्त्रमनोहरा — जिनके चार सुन्दर मुख हैं; शूलाद्यायुधसम्पन्ना — जो त्रिशूल आदि अस्त्र धारण करती हैं; पीतवर्णा — जिनका वर्ण पीला है; अतिगर्विता — जो अत्यन्त गर्वशील हैं।
श्लोक 104
नाम 509–513: मेदोनिष्ठा — जो जीवों की मेदा (चर्बी) की अधिष्ठात्री हैं; मधुप्रीता — जिन्हें मधु से बने नैवेद्य प्रिय हैं; बन्धिन्यादिसमन्विता — जो बन्धिनी आदि शक्तियों से युक्त हैं; दध्यन्नासक्तहृदया — जिनका हृदय दही-भात के नैवेद्य में अनुरक्त है; काकिनीरूपधारिणी — जो काकिनी योगिनी का स्वरूप धारण करती हैं।
श्लोक 105
नाम 514–518: मूलाधाराम्बुजारूढा — जो मूलाधार चक्र के कमल पर आरूढ़ हैं; पञ्चवक्त्रा — जिनके पाँच मुख हैं; अस्थिसंस्थिता — जो अस्थियों में निवास करती हैं; अङ्कुशादिप्रहरणा — जो अंकुश आदि अस्त्र धारण करती हैं; वरदादिनिषेविता — जिनकी सेवा वरदा आदि शक्तियाँ करती हैं।
श्लोक 106
नाम 519–523: मुद्गौदनासक्तचित्ता — जिनका चित्त मूँग की दाल-भात के नैवेद्य में अनुरक्त है; साकिन्यम्बास्वरूपिणी — जो साकिनी योगिनी-स्वरूपा हैं; आज्ञाचक्राब्जनिलया — जो आज्ञा चक्र के द्विदल कमल में निवास करती हैं; शुक्लवर्णा — जिनका वर्ण श्वेत है; षडानना — जिनके छह मुख हैं।
श्लोक 107
नाम 524–527: मज्जासंस्था — जो अस्थि-मज्जा की अधिष्ठात्री देवी हैं; हंसवतीमुख्यशक्तिसमन्विता — जो हंसवती आदि प्रमुख शक्तियों से युक्त हैं; हरिद्रान्नैकरसिका — जिन्हें हल्दी-मिश्रित भोजन विशेष प्रिय है; हाकिनीरूपधारिणी — जो हाकिनी देवी का स्वरूप धारण करती हैं।
श्लोक 108
नाम 528–532: सहस्रदलपद्मस्था — जो सहस्रदल कमल में निवास करती हैं; सर्ववर्णोपशोभिता — जो अनेक वर्णों से शोभायमान हैं; सर्वायुधधरा — जो समस्त ज्ञात अस्त्र धारण करती हैं; शुक्लसंस्थिता — जो वीर्य में निवास करती हैं; सर्वतोमुखी — जिनके मुख समस्त दिशाओं की ओर हैं।
श्लोक 109
नाम 533–541: सर्वौदनप्रीतचित्ता — जिनका चित्त सभी प्रकार के भोजन के नैवेद्य से प्रसन्न होता है; याकिन्यम्बास्वरूपिणी — जो याकिनी योगिनी-स्वरूपा हैं; स्वाहा — जो यज्ञ में आहुति के समय उच्चारित 'स्वाहा' की अधिष्ठात्री हैं; स्वधा — जो 'स्वधा' की अधिष्ठात्री हैं; अमतिः — जो अज्ञान के रूप में भी विद्यमान हैं; मेधा — जो प्रज्ञा (बुद्धि) के रूप में हैं; श्रुतिः — जो वेद-स्वरूपा हैं; स्मृतिः — जो स्मृति-ग्रन्थों के रूप में हैं; अनुत्तमा — जो सबसे श्रेष्ठ व अप्रतिम हैं।
श्लोक 110
नाम 542–547: पुण्यकीर्तिः — जिनकी कीर्ति पावन है; पुण्यलभ्या — जो केवल पुण्यात्माओं को ही प्राप्त होती हैं; पुण्यश्रवणकीर्तना — जो अपने विषय में श्रवण व कीर्तन करनेवाले को पुण्य प्रदान करती हैं; पुलोमजार्चिता — जिनकी पूजा पुलोमजा (इन्द्राणी) करती हैं; बन्धमोचनी — जो बन्धन से मुक्ति प्रदान करती हैं; बर्बरालका — जिनके केश लहरदार व सुन्दर हैं।
श्लोक 111
नाम 548–552: विमर्शरूपिणी — जो विमर्श (आत्म-प्रतिबिम्ब, ज्ञान) के रूप में हैं; विद्या — जो ज्ञान-स्वरूपा हैं; वियदादि जगत्प्रसूः — जो आकाश आदि पंचतत्त्वों से बने सम्पूर्ण विश्व की जननी हैं; सर्वव्याधिप्रशमनी — जो समस्त रोगों व दुःखों का शमन करती हैं; सर्वमृत्युनिवारिणी — जो अपने भक्तों को समस्त मृत्युओं से बचाती हैं।
श्लोक 112
नाम 553–558: अग्रगण्या — जिन्हें सर्वप्रथम माना जाता है; अचिन्त्यरूपा — जिनका स्वरूप विचार-शक्ति से परे है; कलिकल्मषनाशिनी — जो कलियुग के पापों का नाश करती हैं; कात्यायनी — जो कत ऋषि की कन्या हैं; कालहन्त्री — जो काल (मृत्यु) का नाश करती हैं; कमलाक्षनिषेविता — जिनकी शरण में विष्णु (कमलाक्ष) जाते हैं।
श्लोक 113
नाम 559–565: ताम्बूलपूरितमुखी — जिनका मुख पान खाने से भरा है; दाडिमीकुसुमप्रभा — जो अनार के फूल समान कान्तिमान हैं; मृगाक्षी — जिनके नेत्र मृगनयनी-सुन्दर हैं; मोहिनी — जो मन को मोहित करती हैं; मुख्या — जो सबसे प्रमुख हैं; मृडानी — जो मृड (शिव) की पत्नी हैं; मित्ररूपिणी — जो समस्त विश्व की सखी हैं।
श्लोक 114
नाम 566–571: नित्यतृप्ता — जो सदा तृप्त व सन्तुष्ट हैं; भक्तनिधिः — जो भक्तों की निधि (खजाना) हैं; नियन्त्री — जो सभी जीवों को सत्पथ पर नियंत्रित व निर्देशित करती हैं; निखिलेश्वरी — जो सबकी स्वामिनी हैं; मैत्र्यादिवासनालभ्या — जो मित्रता आदि शुभ-भावों द्वारा प्राप्त होती हैं; महाप्रलयसाक्षिणी — जो महाप्रलय की साक्षी हैं।
श्लोक 115
नाम 572–577: पराशक्तिः — जो आदि-परम शक्ति हैं; परानिष्ठा — जो परम लक्ष्य व परम निष्ठा हैं; प्रज्ञानघनरुपिणी — जो शुद्ध, सघन प्रज्ञा का स्वरूप हैं; माध्वीपानालसा — जो मधुर मद्य-पान से किंचित् शिथिल हैं (किसी वस्तु की लालसा से रहित); मत्ता — जो आनन्द-उन्माद में मग्न हैं; मातृकावर्णरूपिणी — जो वर्णमाला के अक्षरों के रूप में विद्यमान हैं।
श्लोक 116
नाम 578–582: महाकैलासनिलया — जो महान कैलास में निवास करती हैं; मृणालमृदुदोर्लता — जिनकी भुजाएँ कमल-नाल समान कोमल व शीतल हैं; महनीया — जो पूजनीय व आदरणीय हैं; दयामूर्तिः — जो करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं; महासाम्राज्यशालिनी — जो त्रिलोक के महान साम्राज्य पर शासन करती हैं।
श्लोक 117
नाम 583–589: आत्मविद्या — जो आत्म-ज्ञान स्वरूपा हैं; महाविद्या — जो उच्चतम ज्ञान (आत्म-ज्ञान) की आसन हैं; श्रीविद्या — जो पवित्र ज्ञान (पंचदशी मन्त्र) स्वरूपा हैं; कामसेविता — जिनकी पूजा कामदेव करते हैं; श्रीषोडशाक्षरीविद्या — जो षोडशाक्षरी मन्त्र-स्वरूपा हैं; त्रिकूटा — जो मन्त्र के तीन भागों (कूटों) में विभक्त हैं; कामकोटिका — जिनमें शिव अंश-रूप में सन्निहित हैं।
श्लोक 118
नाम 590–594: कटाक्षकिङ्करीभुतकमलाकोटिसेविता — जिनकी सेवा उनकी एक दृष्टि-मात्र से वशीभूत करोड़ों लक्ष्मी करती हैं; शिरःस्थिता — जो मस्तक में निवास करती हैं; चन्द्रनिभा — जो चन्द्रमा समान कान्तिमान हैं; भालस्था — जो ललाट (भौंहों के मध्य) में निवास करती हैं; इन्द्रधनुःप्रभा — जो इन्द्रधनुष समान रंग-बिरंगी कान्तिमान हैं।
श्लोक 119
नाम 595–600: हृदयस्था — जो हृदय में निवास करती हैं; रविप्रख्या — जो सूर्य के समान विशिष्ट तेज से चमकती हैं; त्रिकोणान्तरदीपिका — जो त्रिकोण के भीतर दीपक समान प्रकाशमान हैं; दाक्षायणी — जो दक्ष प्रजापति की कन्या सती-देवी हैं; दैत्यहन्त्री — जो दैत्यों का नाश करती हैं; दक्षयज्ञविनाशिनी — जो दक्ष के यज्ञ का विनाश करनेवाली हैं।
श्लोक 120
नाम 601–606: दरान्दोलितदीर्घाक्षी — जिनके दीर्घ नेत्र किंचित् चंचल हैं; दरहासोज्ज्वलन्मुखी — जिनका मुख मधुर मुस्कान से देदीप्यमान है; गुरुमूर्तिः — जो गुरु का गम्भीर स्वरूप धारण करती हैं; गुणनिधिः — जो समस्त सद्गुणों की निधि हैं; गोमाता — जो कामधेनु सुरभि के रूप में प्रकट हुईं; गुहजन्मभूः — जो गुह (कार्तिकेय) की जननी हैं।
श्लोक 121
नाम 607–610: देवेशी — जो देवताओं की रक्षिका हैं; दण्डनीतिस्था — जो न्याय-व्यवस्था को निर्दोष रूप से बनाए रखती हैं; दहराकाशरूपिणी — जो हृदय-गुहा के भीतर सूक्ष्म आकाश-स्वरूपा हैं; प्रतिपन्मुख्यराकान्ततिथिमण्डलपूजिता — जिनकी पूजा प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक प्रतिदिन की जाती है।
श्लोक 122
नाम 611–614: कलात्मिका — जो (चन्द्रमा की) कलाओं के रूप में विद्यमान हैं; कलानाथा — जो समस्त कलाओं की स्वामिनी हैं; काव्यालापविनोदिनी — जो काव्य-श्रवण में आनन्दित होती हैं; सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेविता — जिनकी सेवा बाईं ओर लक्ष्मी और दाईं ओर सरस्वती चामर लिए करती हैं।
श्लोक 123
नाम 615–621: आदिशक्तिः — जो आदि, परम शक्ति — विश्व की कारण-भूता हैं; अमेया — जो किसी भी माप से मापी नहीं जा सकती; आत्मा — जो सबकी आत्मा हैं; परमा — जो परम सत्ता हैं; पावनाकृतिः — जिनका स्वरूप पावन (पवित्र) है; अनेककोटिब्रह्माण्डजननी — जो करोड़ों ब्रह्माण्डों की जननी हैं; दिव्यविग्रहा — जिनका शरीर दिव्य है।
श्लोक 124
नाम 622–629: क्लीङ्कारी — जो 'क्लीं' बीज-मन्त्र की सृष्टिकर्ता हैं; केवला — जो पूर्ण, स्वतन्त्र व निर्गुण (अद्वैत) हैं; गुह्या — जो गुप्त रूप से ही जानी जाती हैं; कैवल्यपददायिनी — जो मोक्ष-पद प्रदान करती हैं; त्रिपुरा — जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव तीनों से भी पूर्ववर्ती हैं; त्रिजगद्वन्द्या — जो तीनों लोकों के निवासियों द्वारा पूजनीय हैं; त्रिमूर्तिः — जो त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) का सम्मिलित स्वरूप हैं; त्रिदशेश्वरी — जो देवताओं की स्वामिनी हैं।
श्लोक 125
नाम 630–636: त्र्यक्षरि — जिनका स्वरूप तीन अक्षरों (अ-उ-म् अर्थात् ओम्) से निर्मित है; दिव्यगन्धाढ्या — जो दिव्य सुगन्ध से परिपूर्ण हैं; सिन्दूरतिलकाञ्चिता — जो ललाट पर सिन्दूर के तिलक से शोभायमान हैं; उमा — जो उमा (पार्वती देवी) हैं; शैलेन्द्रतनया — जो पर्वतराज हिमालय की कन्या हैं; गौरी — जिनका वर्ण गौर है; गन्धर्वसेविता — जिनकी सेवा गन्धर्व (विश्ववसु आदि) करते हैं।
श्लोक 126
नाम 637–644: विश्वगर्भा — जिनके गर्भ में सम्पूर्ण विश्व समाहित है; स्वर्णगर्भा — जो विश्व की कारण-भूता हैं; अवरदा — जो अधर्मियों का विनाश करती हैं; वागधीश्वरी — जो वाणी की अधिष्ठात्री हैं; ध्यानगम्या — जो केवल ध्यान से प्राप्त होती हैं; अपरिच्छेद्या — जिनकी सीमा निश्चित नहीं की जा सकती; ज्ञानदा — जो आत्म-ज्ञान प्रदान करती हैं; ज्ञानविग्रहा — जो स्वयं ज्ञान की साक्षात् मूर्ति हैं।
श्लोक 127
नाम 645–648: सर्ववेदान्तसंवेद्या — जो सम्पूर्ण वेदान्त द्वारा जानी जाती हैं; सत्यानन्दस्वरूपिणी — जिनका स्वरूप सत्य और आनन्द है; लोपामुद्रार्चिता — जिनकी पूजा लोपामुद्रा (अगस्त्य ऋषि की पत्नी) करती हैं; लीलाकॢप्तब्रह्माण्डमण्डला — जिनने केवल क्रीड़ा के रूप में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है।
श्लोक 128
नाम 649–657: अदृश्या — जो सामान्य इन्द्रियों से दिखाई नहीं देती; दृश्यरहिता — जिनके लिए देखने योग्य कुछ शेष नहीं; विज्ञात्री — जो भौतिक जगत् के सत्य को जानती हैं; वेद्यवर्जिता — जिनके लिए जानने योग्य कुछ शेष नहीं; योगिनी — जो परमशिव से सदा संयुक्त हैं, योग-शक्ति से युक्त; योगदा — जो योग-सिद्धि प्रदान करती हैं; योग्या — जो सभी प्रकार के योग की अधिकारिणी हैं; योगानन्दा — जो योग से प्राप्त आनन्द की स्वरूपा हैं; युगन्धरा — जो युगों की धारण-शक्ति हैं।
श्लोक 129
नाम 658–661: इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिस्वरूपिणी — जो इच्छा, ज्ञान और क्रिया — तीनों शक्तियों के रूप में विद्यमान हैं; सर्वाधारा — जो सबका आधार हैं; सुप्रतीष्ठा — जो दृढ़तापूर्वक स्थापित हैं; सदसद्रूपधारिणी — जो सत् और असत् दोनों रूप धारण करती हैं।
श्लोक 130
नाम 662–668: अष्टमूर्तिः — जो आठ रूपों में विद्यमान हैं; अजाजेत्री — जो अज्ञान पर विजय प्राप्त करती हैं; लोकयात्रविधायिनी — जो लोकों की यात्रा (संचालन) को दिशा देती हैं; एकाकिनी — जो अकेली, अद्वितीय हैं; भूमरूपा — जो समस्त विद्यमान वस्तुओं का समुच्चय-स्वरूप हैं; निर्द्वैता — जो द्वैत-भाव से रहित हैं; द्वैतवर्जिता — जो द्वैत से परे हैं।
श्लोक 131
नाम 669–677: अन्नदा — जो समस्त जीवों को अन्न प्रदान करती हैं; वसुदा — जो धन प्रदान करती हैं; वृद्धा — जो अत्यन्त प्राचीन हैं; ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणी — जिनका स्वरूप ब्रह्म और आत्मा के ऐक्य का है; बृहती — जो विशाल हैं; ब्राह्मणी — जो सत्त्वगुण-प्रधान हैं; ब्राह्मी — जो वाणी की अधिष्ठात्री हैं; ब्रह्मानन्दा — जो सदा ब्रह्मानन्द में मग्न हैं; बलिप्रिया — जिन्हें यज्ञ-बलि (नैवेद्य) विशेष प्रिय है।
श्लोक 132
नाम 678–683: भाषारूपा — जो भाषा के रूप में विद्यमान हैं; बृहत्सेना — जिनकी विशाल सेना है; भावाभावविवर्जिता — जो भाव और अभाव दोनों से परे हैं; सुखाराध्या — जिनकी आराधना सरलता से की जा सकती है; शुभकरी — जो शुभ (कल्याण) करती हैं; शोभनासुलभागतिः — जो उज्ज्वल और सरल मार्ग से प्राप्त होती हैं।
श्लोक 133
नाम 684–688: राजराजेश्वरी — जो राजाओं और सम्राटों की भी स्वामिनी हैं; राज्यदायिनी — जो राज्य प्रदान करती हैं; राज्यवल्लभा — जो समस्त राज्यों की रक्षा करती हैं; राजत्कृपा — जिनकी कृपा सबको आकर्षित करती है; राजपीठनिवेशितनिजाश्रिता — जो अपने शरणागतों को राजसिंहासन पर स्थापित करती हैं।
श्लोक 134
नाम 689–694: राज्यलक्ष्मी — जो विश्व की ऐश्वर्य-स्वरूपा हैं; कोशनाथा — जो राजकोश की स्वामिनी हैं; चतुरङ्गबलेश्वरी — जो चार प्रकार की सेनाओं की स्वामिनी हैं; साम्राज्यदायिनी — जो साम्राज्य प्रदान करती हैं; सत्यसन्धा — जो सत्य के प्रति समर्पित हैं; सागरमेखला — जिनकी मेखला समुद्र है।
श्लोक 135
नाम 695–700: दीक्षिता — जो (सृष्टि-कार्य हेतु) व्रतबद्ध हैं; दैत्यशमनी — जो दैत्यों और दुष्ट शक्तियों का नाश करती हैं; सर्वलोकवशङ्करी — जो समस्त लोकों को अपने वश में रखती हैं; सर्वार्थदात्री — जो समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करती हैं; सावित्री — जो विश्व की सृजन-शक्ति हैं; सच्चिदानन्दरूपिणी — जिनका स्वरूप सत्, चित् और आनन्द है।
श्लोक 136
नाम 701–707: देशकालापरिच्छिन्ना — जो देश और काल की सीमाओं से बँधी नहीं; सर्वगा — जो सर्वत्र, समस्त चर-अचर में व्याप्त हैं; सर्वमोहिनी — जो सबको मोहित करती हैं; सरस्वती — जो ज्ञान-स्वरूपा हैं; शास्त्रमयी — जो शास्त्रों के रूप में विद्यमान हैं; गुहाम्बा — जो गुह (कार्तिकेय) की माता हैं व हृदय-गुहा में निवास करती हैं; गुह्यरूपिणी — जिनका स्वरूप गुप्त व रहस्यमय है।
श्लोक 137
नाम 708–713: सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता — जो समस्त सीमाओं व उपाधियों से मुक्त हैं; सदाशिवपतिव्रता — जो सदाशिव की पतिव्रता पत्नी हैं; सम्प्रदायेश्वरी — जो पवित्र परम्पराओं की संरक्षिका हैं; साधु — जो समभाव व साधुता से युक्त हैं; गुरूमण्डलरूपिणी — जो गुरु-परम्परा को अपने में समाहित करती हैं।
श्लोक 138
नाम 714–722: कुलोत्तीर्णा — जो इन्द्रियों से परे हैं; भगाराध्या — जिनकी आराधना सूर्य-मण्डल में की जाती है; माया — जो माया-स्वरूपा हैं; मधुमती — जिनका स्वभाव मधु समान मधुर है; मही — जो पृथ्वी-देवी हैं; गणाम्बा — जो शिव के गणों की माता हैं; गुह्यकाराध्या — जिनकी आराधना गुह्यक (एक देव-जाति) करते हैं; कोमलाङ्गी — जिनके अंग अत्यन्त कोमल हैं; गुरुप्रिया — जिन्हें गुरुजन प्रिय हैं।
श्लोक 139
नाम 723–727: स्वतन्त्रा — जो समस्त सीमाओं से मुक्त व स्वतन्त्र हैं; सर्वतन्त्रेशी — जो समस्त तन्त्रों की स्वामिनी हैं; दक्षिणामूर्तिरूपिणी — जो दक्षिणामूर्ति (गुरु-रूप शिव) का स्वरूप धारण करती हैं; सनकादिसमाराध्या — जिनकी आराधना सनक आदि ऋषि करते हैं; शिवज्ञानप्रदायिनी — जो शिव-ज्ञान (आत्म-ज्ञान) प्रदान करती हैं।
श्लोक 140
नाम 728–734: चित्कला — जो ब्रह्म में निहित चैतन्य हैं; आनन्दकलिका — जो आनन्द की कली हैं; प्रेमरूपा — जो शुद्ध प्रेम-स्वरूपा हैं; प्रियङ्करी — जो अपने भक्तों की प्रिय इच्छाएँ पूर्ण करती हैं; नामपारायणप्रीता — जो अपने नामों के पारायण (पाठ) से प्रसन्न होती हैं; नन्दिविद्या — जो नन्दि-मन्त्र की अधिष्ठात्री देवी हैं; नटेश्वरी — जो नटेश (नटराज शिव) की पत्नी हैं।
श्लोक 141
नाम 735–741: मिथ्याजगदधिष्ठाना — जो इस मिथ्या (भ्रमात्मक) जगत् का आधार हैं; मुक्तिदा — जो मुक्ति प्रदान करती हैं; मुक्तिरूपिणी — जो मुक्ति का साक्षात् स्वरूप हैं; लास्यप्रिया — जिन्हें लास्य नृत्य प्रिय है; लयकरी — जो (अन्त में सबको) अपने में समाहित कर लेती हैं; लज्जा — जो जीवों में लज्जा (विनय) के रूप में विद्यमान हैं; रम्भादिवन्दिता — जो रम्भा आदि अप्सराओं द्वारा पूजनीय हैं।
श्लोक 142
नाम 742–745: भवदावसुधावृष्टिः — जो संसार-रूपी दावाग्नि पर अमृत की वर्षा हैं; पापारण्यदवानला — जो पापों के वन के लिए दावाग्नि समान हैं; दौर्भाग्यतूलवातूला — जो दुर्भाग्य-रूपी रूई को उड़ा देनेवाला तीव्र झंझावात हैं; जराध्वान्तरविप्रभा — जो वृद्धावस्था के अन्धकार को दूर करनेवाली सूर्य-किरण हैं।
श्लोक 143
नाम 746–749: भाग्याब्धिचन्द्रिका — जो सौभाग्य-रूपी सागर के लिए पूर्ण चन्द्रमा हैं; भक्तचित्तकेकिघनाघना — जो भक्तों के हृदयरूपी मयूरों को आनन्दित करनेवाला मेघ हैं; रोगपर्वतदम्भोलिः — जो रोग-रूपी पर्वत को चूर करनेवाला वज्र हैं; मृत्युदारुकुठारिका — जो मृत्यु-रूपी वृक्ष को काटनेवाला कुठार हैं।
श्लोक 144
नाम 750–756: महेश्वरी — जो परम देवी हैं; महाकाली — जो महान काली-स्वरूपा हैं; महाग्रासा — जो महान वस्तुओं को भी निगलनेवाली हैं; महाशना — जो महान को भी भक्षण करनेवाली हैं; अपर्णा — जो किसी के ऋण में बँधी नहीं; चण्डिका — जो दुष्टों पर क्रोधित होती हैं; चण्डमुण्डासुरनिषूदिनी — जिनने चण्ड और मुण्ड असुरों का वध किया।
श्लोक 145
नाम 757–763: क्षराक्षरात्मिका — जो नाशवान (क्षर) और अविनाशी (अक्षर) आत्मा दोनों के रूप में हैं; सर्वलोकेशी — जो समस्त लोकों की स्वामिनी हैं; विश्वधारिणी — जो सम्पूर्ण विश्व को धारण करती हैं; त्रिवर्गदात्री — जो जीवन के तीन लक्ष्य (धर्म, अर्थ, काम) प्रदान करती हैं; सुभगा — जो समस्त सौभाग्य का आधार हैं; त्र्यम्बका — जिनके तीन नेत्र हैं; त्रिगुणात्मिका — जो तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) का सार हैं।
श्लोक 146
नाम 764–770: स्वर्गापवर्गदा — जो स्वर्ग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं; शुद्धा — जो परम शुद्ध हैं; जपापुष्पनिभाकृतिः — जिनका शरीर जापा (हिबिस्कस) के फूल समान है; ओजोवती — जो ओज (जीवनी-शक्ति) से परिपूर्ण हैं; द्युतिधरा — जो तेज और कान्ति से युक्त हैं; यज्ञरूपा — जो यज्ञ-स्वरूपा हैं; प्रियव्रता — जिन्हें व्रत-पालन प्रिय है।
श्लोक 147
नाम 771–776: दुराराध्या — जिन्हें आराधना करना कठिन है; दुराधर्षा — जो वश में लाना कठिन हैं; पाटलीकुसुमप्रिया — जिन्हें पाटली (हल्के लाल) फूल प्रिय हैं; महती — जो महान हैं, नारद की वीणा के रूप में भी विद्यमान; मेरुनिलया — जो मेरु पर्वत में निवास करती हैं; मन्दारकुसुमप्रिया — जिन्हें मन्दार के फूल प्रिय हैं।
श्लोक 148
नाम 777–784: वीराराध्या — जिनकी आराधना वीरजन करते हैं; विराड्रूपा — जिनका स्वरूप विराट् (ब्रह्माण्डीय सम्पूर्णता) है; विरजा — जो रज (वासना व क्रोध) से रहित हैं; विश्वतोमुखी — जिनके मुख सभी दिशाओं की ओर हैं; प्रत्यग्रूपा — जो अन्तरस्थ आत्मा-स्वरूपा हैं; पराकाशा — जो परम आकाश (ब्रह्माण्ड व शरीर का मूल कारण) हैं; प्राणदा — जो जीवन प्रदान करती हैं; प्राणरूपिणी — जो जीवन का स्वरूप ही हैं।
श्लोक 149
नाम 785–790: मार्ताण्डभैरवाराध्या — जिनकी आराधना मार्तण्डभैरव करते हैं; मन्त्रिणीन्यस्तराज्यधूः — जिनने अपना राजकीय दायित्व मन्त्रिणी शक्ति को सौंप दिया है; त्रिपुरेशी — जो त्रिपुरा की स्वामिनी हैं; जयत्सेना — जिनकी सेना केवल विजय की ही अभ्यस्त है; निस्त्रैगुण्या — जो तीन गुणों से रहित हैं; परापरा — जो परा और अपरा दोनों हैं।
श्लोक 150
नाम 791–796: सत्यज्ञानानन्दरूपा — जिनका स्वरूप सत्य, ज्ञान और आनन्द है; सामरस्यपरायणा — जो स्थिर समरस-ज्ञान (ब्रह्म-एकत्व) में निमग्न हैं; कपर्दिनी — जो कपर्दी (जटाधारी शिव) की पत्नी हैं; कलामाला — जो चौंसठ कलाओं की माला धारण करती हैं; कामधुक् — जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं; कामरूपिणी — जो मनोहर रूप धारण करती हैं।
श्लोक 151
नाम 797–805: कलानिधिः — जो समस्त कलाओं की निधि हैं; काव्यकला — जो काव्य-कला की स्वरूपा हैं; रसज्ञा — जो समस्त रसों को जानती हैं; रसशेवधिः — जो रस की निधि हैं; पुष्टा — जो सदा पुष्टि व ओज से युक्त हैं; पुरातना — जो अत्यन्त प्राचीन हैं; पूज्या — जो सबकी पूजनीय हैं; पुष्करा — जो पूर्ण हैं और सबका पोषण करती हैं; पुष्करेक्षणा — जिनके नेत्र कमल-दल समान हैं।
श्लोक 152
नाम 806–812: परञ्ज्योतिः — जो परम ज्योति हैं; परन्धाम — जो परम धाम (आश्रय) हैं; परमाणुः — जो सूक्ष्मतम कण-स्वरूपा हैं; परात्परा — जो समस्त परम तत्त्वों में भी सर्वश्रेष्ठ हैं; पाशहस्ता — जो हाथ में पाश (रस्सी) धारण करती हैं; पाशहन्त्री — जो बन्धनों का नाश करती हैं; परमन्त्रविभेदिनी — जो शत्रुओं के दुष्ट मन्त्रों के प्रभाव को तोड़ देती हैं।
श्लोक 153
नाम 813–820: मूर्ता — जो आकार (रूप) धारण करती हैं; अमूर्ता — जो निराकार भी हैं; अनित्यतृप्ता — जो हमारे अनित्य (क्षणभंगुर) अर्पणों से भी संतुष्ट हो जाती हैं; मुनिमानसहंसिका — जो ऋषियों के मानस-सरोवर में विहार करनेवाली हंसिनी हैं; सत्यव्रता — जो सत्य-व्रत में दृढ़ हैं; सत्यरूपा — जो सत्य-स्वरूपा हैं; सर्वान्तर्यामिनी — जो सबके भीतर निवास करती हैं; सती — जो सनातन सत्य-स्वरूपा हैं।
श्लोक 154
नाम 821–830: ब्रह्माणी — जो ब्रह्म का आधार हैं; जननी — जो जननी (माता) हैं; बहुरूपा — जो अनेकानेक रूप धारण करती हैं; बुधार्चिता — जिनकी पूजा ज्ञानीजन करते हैं; प्रसवित्री — जो विश्व की जननी हैं; प्रचण्डा — जो अत्यन्त तेजस्वी व प्रचण्ड हैं; आज्ञा — जो स्वयं दिव्य आज्ञा हैं; प्रतिष्ठा — जो सबका आधार हैं; प्रकटाकृतिः — जो इस सम्पूर्ण विश्व के रूप में प्रकट हैं।
श्लोक 155
नाम 831–837: प्राणेश्वरी — जो पंच-प्राणों व इन्द्रियों की स्वामिनी हैं; प्राणदात्री — जो जीवन देती हैं; पञ्चाशत्पीठरूपिणी — जो पचास शक्तिपीठों के रूप में विराजमान हैं; विशृङ्खला — जो सर्वथा बन्धन-मुक्त हैं; विविक्तस्था — जो एकान्त स्थलों में निवास करती हैं; वीरमाता — जो वीरों की माता हैं; वियत्प्रसूः — जो आकाश की जननी हैं।
श्लोक 156
नाम 838–843: मुकुन्दा — जो मुक्ति प्रदान करती हैं; मुक्तिनिलया — जो मुक्ति का आश्रय हैं; मूलविग्रहरूपिणी — जो समस्त वस्तुओं का मूल स्वरूप हैं; भावज्ञा — जो सबके भावों को जानती हैं; भवरोगघ्नी — जो जन्म-मृत्यु के रोग का नाश करती हैं; भवचक्रप्रवर्तिनी — जो जन्म-मृत्यु के चक्र को गतिमान रखती हैं।
श्लोक 157
नाम 844–850: छन्दःसारा — जो समस्त वेदों का सार हैं; शास्त्रसारा — जो समस्त शास्त्रों का सार हैं; मन्त्रसारा — जो समस्त मन्त्रों का सार हैं; तलोदरी — जिनकी कटि अत्यन्त कृश है; उदारकीर्तिः — जिनकी कीर्ति उदार व विशाल है; उद्दामवैभवा — जिनका पराक्रम असीम है; वर्णरूपिणी — जो वर्णमाला के अक्षरों के रूप में विद्यमान हैं।
श्लोक 158
नाम 851–853: जन्ममृत्युजरातप्तजनविश्रान्तिदायिनी — जो जन्म, मृत्यु और जरा से संतप्त जनों को विश्राम व शान्ति प्रदान करती हैं; सर्वोपनिषदुद्घुष्टा — जिनका गुणगान समस्त उपनिषदों में घोषित है; शान्त्यतीतकलात्मिका — जो शान्ति की अवस्था से भी परे हैं।
श्लोक 159
नाम 854–861: गम्भीरा — जो अथाह व गहन हैं; गगनान्तस्था — जो आकाश के भीतर निवास करती हैं; गर्विता — जो गर्वशील हैं; गानलोलुपा — जिन्हें संगीत में आनन्द मिलता है; कल्पनारहिता — जो काल्पनिक गुणों से रहित हैं; काष्ठा — जो सर्वोच्च अवस्था (जिससे परे कुछ नहीं) में स्थित हैं; अकान्ता — जो समस्त पाप व दुःख का नाश करती हैं; कान्तार्धविग्रहा — जो अपने पति (शिव) के शरीर का आधा अंश हैं।
श्लोक 160
नाम 862–865: कार्यकारणनिर्मुक्ता — जो कार्य-कारण के बन्धन से मुक्त हैं; कामकेलितरङ्गिता — जो कामेश्वर के साथ क्रीड़ा-आनन्द से लहराती रहती हैं; कनत्कनकताटङ्का — जो चमकीले स्वर्ण-कर्णाभूषण धारण करती हैं; लीलाविग्रहधारिणी — जो क्रीड़ा के रूप में अनेक दिव्य रूप धारण करती हैं।
श्लोक 161
नाम 866–871: अजा — जो जन्म-रहित हैं; क्षयविनिर्मुक्ता — जो क्षय (नाश) से मुक्त हैं; मुग्धा — जो अपने सौन्दर्य से मोहित करनेवाली हैं; क्षिप्रप्रसादिनी — जो शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं; अन्तर्मुखसमाराध्या — जिनकी आराधना अन्तर्मुखी (ध्यानस्थ) भाव से की जाती है; बहिर्मुखसुदुर्लभा — जो बहिर्मुखी (बाह्य विषयों में रत) लोगों को अत्यन्त कठिनता से प्राप्त होती हैं।
श्लोक 162
नाम 872–879: त्रयी — जो तीनों वेदों का स्वरूप हैं; त्रिवर्गनिलया — जो तीन पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम) का आश्रय हैं; त्रिस्था — जो तीनों लोकों में निवास करती हैं; त्रिपुरमालिनी — जो श्रीचक्र के अन्तर्दशार चक्र की अधिष्ठात्री हैं; निरामया — जो समस्त रोगों से मुक्त हैं; निरालम्बा — जो किसी के आधार पर निर्भर नहीं; स्वात्मारामा — जो अपनी आत्मा में ही आनन्दित रहती हैं; सुधास्रुतिः — जो अमृत की स्रोत-भूता हैं।
श्लोक 163
नाम 880–883: संसारपङ्कनिर्मग्नसमुद्धरणपण्डिता — जो संसार-रूपी कर्दम में डूबे हुए जीवों को उबारने में कुशल हैं; यज्ञप्रिया — जिन्हें यज्ञादि अनुष्ठान प्रिय हैं; यज्ञकर्त्री — जो यज्ञों की कर्ता हैं; यजमानस्वरूपिणी — जो यज्ञ का निर्देशन करनेवाले यजमान का स्वरूप भी धारण करती हैं।
श्लोक 164
नाम 884–889: धर्माधारा — जो धार्मिक जीवन-पद्धति का आधार हैं; धनाध्यक्षा — जो धन-सम्पत्ति की अध्यक्षा हैं; धनधान्यविवर्धिनी — जो धन और अन्न की वृद्धि करती हैं; विप्रप्रिया — जिन्हें विद्वान जन प्रिय हैं; विप्ररूपा — जो आत्मज्ञानी ब्राह्मण के रूप में हैं; विश्वभ्रमणकारिणी — जो अपनी माया-शक्ति से सम्पूर्ण विश्व को गतिमान रखती हैं।
श्लोक 165
नाम 890–897: विश्वग्रासा — जो सम्पूर्ण विश्व को निगल लेती हैं (प्रलयकाल में); विद्रुमाभा — जो मूँगे के समान लाल कान्तिमान हैं; वैष्णवी — जो विष्णु-शक्ति के रूप में हैं; विष्णुरूपिणी — जिनका स्वरूप सम्पूर्ण विश्व में व्यापत विष्णु समान है; अयोनिः — जो उत्पत्ति-रहित हैं; योनिनिलया — जो समस्त उत्पत्तियों का आश्रय हैं; कूटस्था — जो निहाई समान अपरिवर्तनीय हैं; कुलरूपिणी — जो कौल-मार्ग की अधिष्ठात्री देवी हैं।
श्लोक 166
नाम 898–905: वीरगोष्ठीप्रिया — जिन्हें वीरों की सभा प्रिय है; वीरा — जो वीरता की साक्षात् मूर्ति हैं; नैष्कर्म्या — जो कर्म-बन्धन से परे हैं; नादरूपिणी — जो आदिनाद (प्रथम ध्वनि) का स्वरूप हैं; विज्ञानकलना — जो ब्रह्म-ज्ञान का साक्षात्कार कराती हैं; कल्या — जो सृजन-क्षम हैं; विदग्धा — जो सभी विषयों में निपुण हैं; बैन्दवासना — जो बिन्दु (भ्रूमध्य) चक्र में आसीन हैं।
श्लोक 167
नाम 906–911: तत्त्वाधिका — जो समस्त तत्त्वों (कॉस्मिक श्रेणियों) से परे हैं; तत्त्वमयी — जो स्वयं यथार्थ-तत्त्व (शिव) ही हैं; तत्त्वमर्थस्वरूपिणी — जो 'तत्' और 'त्वम्' के अर्थ (ऐक्य) का स्वरूप हैं; सामगानप्रिया — जिन्हें सामवेद का गान प्रिय है; सौम्या — जो शान्त व कोमल स्वभाव की हैं, चन्द्रमा समान शीतल; सदाशिवकुटुम्बिनी — जो सदाशिव की गृहिणी (पत्नी) हैं।
श्लोक 168
नाम 912–917: सव्यापसव्यमार्गस्था — जो दक्षिण और वाम दोनों उपासना-मार्गों द्वारा प्राप्य हैं; सर्वापद्विनिवारिणी — जो समस्त आपदाओं को दूर करती हैं; स्वस्था — जो स्वयं में स्थित, समस्त कष्टों से मुक्त हैं; स्वभावमधुरा — जो स्वभाव से अत्यन्त मधुर हैं; धीरा — जो धीर व बुद्धिदात्री हैं; धीरसमर्चिता — जिनकी पूजा ज्ञानीजन करते हैं।
श्लोक 169
नाम 918–922: चैतन्यार्घ्यसमाराध्या — जिनकी आराधना चेतना को ही अर्घ्य बनाकर की जाती है; चैतन्यकुसुमप्रिया — जिन्हें चेतना-रूपी फूल प्रिय है; सदोदिता — जो सदा प्रकाशमान रहती हैं; सदातुष्टा — जो सदा प्रसन्न रहती हैं; तरुणादित्यपाटला — जो प्रातःकालीन उगते सूर्य समान गुलाबी कान्तिमान हैं।
श्लोक 170
नाम 923–926: दक्षिणादक्षिणाराध्या — जिनकी आराधना दक्षिण और वाम दोनों मार्गों के उपासक करते हैं; दरस्मेरमुखाम्बुजा — जिनका मुखकमल मधुर मुस्कान से युक्त है; कौलिनी केवला — जिनकी कौल-मार्गी साधक शुद्ध चैतन्य के रूप में आराधना करते हैं; अनर्घ्यकैवल्यपददायिनी — जो अमूल्य मोक्ष-पद प्रदान करती हैं।
श्लोक 171
नाम 927–933: स्तोत्रप्रिया — जिन्हें अपनी स्तुति प्रिय है; स्तुतिमती — जो समस्त स्तुतियों का सार-लक्ष्य हैं; श्रुतिसंस्तुतवैभवा — जिनके वैभव का गुणगान श्रुतियों (वेदों) में हुआ है; मनस्विनी — जो उच्च मन व विचारों से युक्त हैं; मानवती — जो महान यशस्विनी हैं; महेशी — जो महेश (शिव) की पत्नी हैं; मङ्गलाकृतिः — जिनका स्वरूप मंगलमय है।
श्लोक 172
नाम 934–941: विश्वमाता — जो सम्पूर्ण विश्व की माता हैं; जगद्धात्री — जो जगत् का पालन और रक्षण करती हैं; विशालाक्षी — जिनके नेत्र विशाल हैं; विरागिणी — जो वैराग्यवती हैं; प्रगल्भा — जो कुशल व आत्मविश्वासी हैं; परमोदारा — जो परम उदार हैं; परामोदा — जो परम आनन्दमयी हैं; मनोमयी — जो मन के रूप में विद्यमान हैं।
श्लोक 173
नाम 942–947: व्योमकेशी — जिनके केश आकाश समान हैं; विमानस्था — जो अपने दिव्य विमान में विराजमान हैं; वज्रिणी — जो वज्र अस्त्र धारण करती हैं; वामकेश्वरी — जो वामकेश्वर तन्त्र की अधिष्ठात्री देवी हैं; पञ्चयज्ञप्रिया — जिन्हें पाँच प्रकार के यज्ञ प्रिय हैं; पञ्चप्रेतमञ्चाधिशायिनी — जो पाँच प्रेतों से बनी शय्या पर अवस्थित हैं।
श्लोक 174
नाम 948–954: पञ्चमी — जो (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर के पश्चात्) पाँचवीं हैं; पञ्चभूतेशी — जो पाँच तत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) की स्वामिनी हैं; पञ्चसङ्ख्योपचारिणी — जिनकी पूजा पाँच उपचारों (गन्ध, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य) से की जाती है; शाश्वती — जो सनातन हैं; शाश्वतैश्वर्या — जो अनन्त ऐश्वर्य की स्वामिनी हैं; शर्मदा — जो सुख प्रदान करती हैं; शम्भुमोहिनी — जो स्वयं शिव को भी मोहित करती हैं।
श्लोक 175
नाम 955–963: धरा — जो पृथ्वी-माता हैं; धरसुता — जो धरा (हिमालय) की कन्या हैं; धन्या — जो अपार ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं; धर्मिणी — जो धर्मपरायण हैं; धर्मवर्धिनी — जो धर्म की वृद्धि करती हैं; लोकातीता — जो समस्त लोकों से परे हैं; गुणातीता — जो तीनों गुणों से परे हैं; सर्वातीता — जो समस्त वस्तुओं से परे हैं; शमात्मिका — जिनका स्वरूप शान्ति और आनन्द है।
श्लोक 176
नाम 964–970: बन्धूककुसुमप्रख्या — जो बन्धूक फूल समान रक्तवर्ण व सुन्दर हैं; बाला — जो सदा बालिका-रूप में रहती हैं; लीलाविनोदिनी — जो अपनी लीलाओं में आनन्दित होती हैं; सुमङ्गली — जो सदा सौभाग्यवती (कभी विधवा न होनेवाली) हैं; सुखकरी — जो सुख प्रदान करती हैं; सुवेषाढ्या — जो सुन्दर वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित हैं; सुवासिनी — जो सदा सुहागिन (सौभाग्यवती) हैं।
श्लोक 177
नाम 971–976: सुवासिन्यर्चनप्रीता — जो सुहागिन स्त्रियों की पूजा से प्रसन्न होती हैं; आशोभना — जो सदा उज्ज्वल व शोभायमान हैं; शुद्धमानसा — जो पवित्र मन की स्वामिनी हैं, जो भक्तों के मन को शुद्ध करती हैं; बिन्दुतर्पणसन्तुष्टा — जो श्रीचक्र के बिन्दु को तर्पण करने से संतुष्ट होती हैं; पूर्वजा — जो सबसे पहले प्रकट हुईं; त्रिपुराम्बिका — जो तीनों पुरों (त्रिपुर) की माता हैं।
श्लोक 178
नाम 977–981: दशमुद्रासमाराध्या — जिनकी आराधना दस मुद्राओं द्वारा की जाती है; त्रिपुराश्रीवशङ्करी — जो त्रिपुराश्री को भी वश में रखती हैं; ज्ञानमुद्रा — जो ज्ञान-मुद्रा के रूप में हैं; ज्ञानगम्या — जो ज्ञान-योग से प्राप्त होती हैं; ज्ञानज्ञेयस्वरूपिणी — जो ज्ञान और ज्ञेय दोनों की स्वरूपा हैं।
श्लोक 179
नाम 982–989: योनिमुद्रा — जो योनि-मुद्रा के रूप में हैं; त्रिखण्डेशी — जो दसवीं मुद्रा, त्रिखण्ड की स्वामिनी हैं; त्रिगुणा — जो सत्त्व, रज, तम तीन गुणों से युक्त हैं; अम्बा — जो समस्त जीवों व विश्व की माता हैं; त्रिकोणगा — जो त्रिकोण में निवास करती हैं; अनघा — जो पाप-रहित हैं; अद्भुतचारित्रा — जिनके कार्य अद्भुत हैं; वाञ्छितार्थप्रदायिनी — जो समस्त वाञ्छित फल प्रदान करती हैं।
श्लोक 180
नाम 990–993: अभ्यासातिशयज्ञाता — जो केवल कठिन आध्यात्मिक अभ्यास से ही जानी जाती हैं; षडध्वातीतरूपिणी — जिनका स्वरूप छह मार्गों (अध्वाओं) से भी परे है; अव्याजकरुणामूर्तिः — जो निष्कपट करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं; अज्ञानध्वान्तदीपिका — जो अज्ञान के अन्धकार को दूर करनेवाला उज्ज्वल दीपक हैं।
श्लोक 181
नाम 994–1000: आबालगोपविदिता — जो बालकों और गोपों तक सभी द्वारा भलीभाँति जानी जाती हैं; सर्वानुल्लङ्घ्यशासना — जिनके आदेशों का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता; श्रीचक्रराजनिलया — जो चक्रों के राजा श्रीचक्र में निवास करती हैं; श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी — जो दिव्य त्रिपुरसुन्दरी देवी हैं; श्रीशिवा — जो मंगलमयी व दिव्य शिवा-स्वरूपा हैं; शिवशक्तैक्यरूपिणी — जो शिव और शक्ति के ऐक्य का स्वरूप हैं; ललिताम्बिका — जो दिव्य जगत्माता ललिता हैं।
श्लोक 182
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
फलश्रुतिनित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
स्तोत्र की पृष्ठभूमि: यह स्तोत्र ब्रह्माण्ड पुराण (उत्तरखण्ड) के हयग्रीव-अगस्त्य संवाद में आता है, और इसकी समापन-पुष्पिका इसे 'श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रकथन' कहती है। कांचीपुरम में भगवान हयग्रीव ने महर्षि अगस्त्य को इसका उपदेश दिया। उन्होंने बताया कि स्वयं भगवती ललिता ने वशिनी आदि आठ वाग्देवियों को अपने सहस्र नामों का स्तोत्र रचने की आज्ञा दी थी। यहाँ श्लोक 1-182 तक स्तोत्र का मूल पाठ है और नाम 1 से 1000 तक गिने जाते हैं। टीकाकार इसे कुण्डलिनी योग (मूलाधार से सहस्रार), अद्वैत वेदान्त तथा श्रीचक्र-उपासना, इन कई स्तरों पर पढ़ते हैं। सावधानी: संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के संस्करण में उल्लेख है कि यह सहस्रनाम उसके द्वारा देखे गए मुद्रित ब्रह्माण्ड पुराण में सहज उपलब्ध नहीं है और पुराण के परवर्ती परिशिष्ट (खिल) का अंग हो सकता है।
क्या आप जानते हैं?
आठ वाग्देवियों द्वारा रचना
अन्य स्तोत्रों के विपरीत, ललिता सहस्रनाम की रचना स्वयं भगवती ललिता के आदेश पर आठ वाग्देवियों (वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयिनी, सर्वेश्वरी और कौलिनी) ने की थी।
एक सहस्र नामों में पुनरुक्ति का अभाव
परम्परा मानती है कि इन १००० नामों में कोई नाम दोहराया नहीं गया; प्रत्येक नाम माँ के एक विशिष्ट दार्शनिक या यौगिक स्वरूप को प्रकट करता है।
कुण्डलिनी जागरण का पूर्ण मार्ग
स्तोत्र में कुण्डलिनी के मूलाधार से सहस्रार तक आरोहण का क्रमबद्ध निरूपण है—'मूलाधारैकनिलया' से लेकर 'सहस्राराम्बुजारूढा' तक के नाम षट्चक्र-भेद की साधना हैं।
भास्करराय जी का सौभाग्यभास्कर भाष्य
१८वीं शताब्दी में प्रकांड विद्वान भास्करराय मखी ने 'सौभाग्यभास्कर' नामक अमर भाष्य लिखकर प्रत्येक नाम के व्याकरणिक, तान्त्रिक और वेदान्तिक अर्थों को आलोकित किया।
शिव और शक्ति की अद्वैत एकता
स्तोत्र का चरम उत्कर्ष ९९९वें नाम 'शिव-शक्त्यैक्य-रूपिणी' में प्रकट होता है, जो शांत चेतना (शिव) और उसकी सक्रिय शक्ति (ललिता) की पूर्ण अभिन्नता का प्रतिपादन करता है।
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Devi
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