श्लोक
विश्वं — उन्हें 'विश्व' कहकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-स्वरूप बताया गया है। विष्णुः — वे सबमें व्याप्त रहने वाले हैं। वषट्कारः — यज्ञों में वषट्कार मन्त्र से जिनका आवाहन किया जाता है। भूतभव्यभवत्प्रभुः — भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे स्वामी। भूतकृत् — सम्पूर्ण सृष्टि के समस्त प्राणियों के रचयिता तथा संहारक। भूतभृत् — जो सम्पूर्ण विश्व को धारण करते, पालते और नियंत्रित करते हैं। भावः — शुद्ध सत्-स्वरूप। भूतात्मा — सब प्राणियों का आत्मभूत सार। भूतभावनः — समस्त तत्वों को उत्पन्न और विकसित करने वाले।
श्लोक 1
पूतात्मा — जिनका स्वरूप सर्वथा शुद्ध है। परमात्मा — परम आत्मा। मुक्तानां परमा गतिः — मुक्त पुरुषों का सर्वोच्च गन्तव्य। अव्ययः — जिनका कभी क्षय नहीं होता। पुरुषः — जो देह (पुर) में निवास करते हैं। साक्षी — सबके साक्षी-द्रष्टा। क्षेत्रज्ञः — देहरूपी क्षेत्र के ज्ञाता। अक्षरः — जो अविनाशी हैं।
श्लोक 2
योगः — योग के द्वारा प्राप्त होने वाले। योगविदां नेता — योगनिष्ठ साधकों के नायक। प्रधानपुरुषेश्वरः — प्रकृति (प्रधान) और पुरुष (जीव) दोनों के ईश्वर। नारसिंहवपुः — नर और सिंह दोनों के शरीर को धारण करने वाला नृसिंह रूप। श्रीमान् — जिनके वक्षस्थल पर देवी श्री का सदा निवास है। केशवः — जिनके केश (बाल) सुंदर हैं। पुरुषोत्तमः — सब पुरुषों में श्रेष्ठ।
श्लोक 3
सर्वः — सर्वज्ञ और सबके मूल स्रोत। शर्वः — संहारक। शिवः — परम शुद्ध। स्थाणुः — स्थिर, अचल और अपरिवर्तनीय। भूतादिः — समस्त तत्वों के आदि स्रोत। निधिरव्ययः — प्रलयकाल में सम्पूर्ण विश्व जिनमें विलीन हो जाता है, वह अक्षय निधि-स्वरूप। संभवः — अपनी इच्छा से अवतार लेने वाले। भावनः — समस्त जीवों के कर्मफल का सृजन करने वाले। भर्ता — सम्पूर्ण विश्व के आधारभूत पालक। प्रभवः — जिनसे सब महाभूतों का जन्म होता है। प्रभुः — सब कर्मकांडों में निपुण। ईश्वरः — सब वस्तुओं पर असीम प्रभुत्व व शक्ति रखने वाले।
श्लोक 4
स्वयंभूः — स्वयं ही, निष्कारण विद्यमान। शम्भुः — भक्तों को सुख प्रदान करने वाले। आदित्यः — सूर्यमण्डल में स्वर्णिम पुरुष-रूप। पुष्करक्षः — कमल-दल सदृश नेत्रों वाले। महास्वनः — जिनसे वेद-रूपी महान् ध्वनि उत्पन्न होती है। अनादिनिधनः — जिस सत्ता का न आदि है न अंत। धाता — विश्व के आधार। विधाता — कर्मों तथा उनके फलों के विधायक। धातुरुत्तमः — सबके परम आश्रय।
श्लोक 5
अप्रमेयः — जो किसी भी प्रमाण से मापे नहीं जा सकते। हृषीकेशः — इन्द्रियों के स्वामी। पद्मनाभः — जिनकी नाभि में सृष्टि का मूल कमल स्थित है। अमरप्रभुः — अमर देवताओं के स्वामी। विश्वकर्मा — जिनके कर्मों से यह सम्पूर्ण सृष्टि बनी है। मनुः — मनन करने वाले। त्वष्टा — जो प्रलयकाल में सब प्राणियों को संकुचित कर देते हैं। स्थविष्ठः — स्थूलता और सारभूतता में सर्वोत्तम। स्थविरो ध्रुवः — सनातन, अति प्राचीन और अपरिवर्तनीय।
श्लोक 6
अग्राह्यः — ज्ञानेन्द्रियों से जो ग्राह्य नहीं। शाश्वतः — सर्वकाल में विद्यमान। कृष्णः — सत्-चित्-आनन्द स्वरूप। लोहिताक्षः — रक्ताभ नेत्रों वाले। प्रतर्दनः — प्रलयकाल में सबका संहार करने वाले। प्रभूतः — सर्वशक्तिमत्ता व सर्वज्ञता जैसे अनुपम गुणों से महान्। त्रिककुद्धाम — ऊर्ध्व, अधः और मध्य — तीनों लोकों के आधार। पवित्रं — सबको पवित्र करने वाला तत्व। मंगलं परम् — परम मंगलकारी।
श्लोक 7
ईशानः — सबका नियंत्रण और नियमन करने वाले। प्राणदः — प्राण-शक्ति प्रदान करने और सक्रिय करने वाले। प्राणः — परम सत्ता। ज्येष्ठः — सबसे वृद्ध, क्योंकि उनसे पूर्व कुछ नहीं। श्रेष्ठः — सर्वोच्च स्तुति के योग्य। प्रजापतिः — समस्त प्राणियों के स्वामी। हिरण्यगर्भः — स्वयं ब्रह्मा के भी आत्मस्वरूप। भूगर्भः — जिनके भीतर सम्पूर्ण विश्व निहित है। माधवः — माँ लक्ष्मी के पति, अथवा मधु-विद्या से जाने जाने वाले। मधुसूदनः — मधु नामक दानव के संहारक।
श्लोक 8
ईश्वरः — सर्वशक्तिमान सत्ता। विक्रमी — पराक्रमी। धन्वी — धनुषधारी। मेधावी — समस्त शास्त्रों को ग्रहण करने में समर्थ महान् बुद्धि वाले। विक्रमः — संसार से परे जाने वाले, अथवा गरुड़-वाहन। क्रमः — भक्तों के लिए संसार-सागर पार करने के कारण। अनुत्तमः — जिनसे बढ़कर कोई नहीं। दुराधर्षः — जिनको कोई पराजित नहीं कर सकता। कृतज्ञः — जीवों के सब कर्मों को जानने वाले, साधारण अर्पण से भी संतुष्ट होने वाले। कृतिः — समस्त मानवीय प्रयासों से प्राप्त फल-स्वरूप। आत्मवान् — अपनी ही महिमा में स्थित, किसी अन्य आधार की आवश्यकता न रखने वाले।
श्लोक 9
सुरेशः — देवताओं के स्वामी। शरणं — दुःखी जनों के दुःख दूर करने वाले। शर्म — परम आनन्द-स्वरूप। विश्वरेताः — सृष्टि के बीज-स्वरूप। प्रजाभवः — जिनसे समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। अहः — प्रकाशमान स्वरूप। संवत्सरः — काल भी विष्णु का ही रूप है, अतः वे संवत्सर (वर्ष) कहलाते हैं। व्यालः — सर्प के समान अग्राह्य। प्रत्ययः — प्रज्ञा (चेतना) स्वरूप। सर्वदर्शनः — सर्वत्र नेत्रों वाले।
श्लोक 10
अजः — जिनका जन्म नहीं होता। सर्वेश्वरः — सब ईश्वरों के परम ईश्वर। सिद्धः — सदा अपने स्वरूप में स्थित। सिद्धिः — सबमें चेतना-स्वरूप। सर्वादिः — समस्त तत्वों के प्रथम कारण। अच्युतः — जो अपनी प्रकृति और शक्तियों से कभी गिरते नहीं। वृषाकपिः — सब वांछित वस्तुओं की वर्षा करने वाले। अमेयात्मा — जिनका स्वरूप मापा नहीं जा सकता। सर्वयोगविनिःसृतः — सम्पूर्ण बंधनों से पूर्णतः मुक्त।
श्लोक 11
वसुः — जिनमें सब प्राणी निवास करते हैं और जो सब प्राणियों में निवास करते हैं। वसुमनाः — विशाल, अनासक्त मन वाले। सत्यः — सत्य-स्वरूप। समात्मा — सब प्राणियों के प्रति समान भाव रखने वाले। सम्मितः — अमेय, अप्रमित। समः — सदा अविचलित। अमोघः — जिनकी पूजा कभी निष्फल नहीं जाती। पुण्डरीकाक्षः — कमल-दल सदृश नेत्रों वाले। वृषकर्मा — धर्मानुकूल कर्म करने वाले। वृषाकृतिः — धर्म की रक्षा हेतु रूप धारण करने वाले।
श्लोक 12
रुद्रः — प्रलयकाल में सबको रुलाने वाले। बहुशिराः — अनेक मस्तकों वाले। बभ्रुः — जगत् का शासन करने वाले। विश्वयोनिः — जगत् के कारणरूप। शुचिश्रवाः — जिनके नाम व यश सुनना पवित्र और पावन है। अमृतः — मृत्युरहित। शाश्वतस्थाणुः — नित्य और दृढ़तापूर्वक स्थित, अपरिवर्तनीय। वरारोहः — जिनकी गोद परम कल्याण प्रदान करती है। महातपाः — महान् तप और ज्ञान से युक्त।
श्लोक 13
सर्वगः — उपादान-कारण रूप में सर्वत्र व्याप्त। सर्ववित्भानुः — सर्वज्ञ और सबको प्रकाशित करने वाले। विष्वक्सेनः — जिनके सम्मुख समस्त असुर-सेनाएँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। जनार्दनः — दुष्टों को पीड़ा देने वाले। वेदः — वेद-स्वरूप। वेदवित् — वेद और उसके अर्थ के ज्ञाता। अव्यंगः — स्वयं पूर्ण और सब दोषों से रहित। वेदांगः — जिनके लिए वेद अंग के समान हैं। वेदवित् — समस्त वेदों के ज्ञाता। कविः — सब कुछ देखने वाले द्रष्टा।
श्लोक 14
लोकाध्यक्षः — सम्पूर्ण विश्व के साक्षी। सुराध्यक्षः — सब दिशाओं की रक्षक देवताओं के अधिष्ठाता। धर्माध्यक्षः — प्राणियों के पुण्य-पाप को सीधे देखने वाले। कृताकृतः — कार्य (जगत्) और अकार्य (उसका कारण) दोनों स्वरूप। चतुरात्मा — सृष्टि, पालन और संहार हेतु चार रूप धारण करने वाले। चतुर्व्यूहः — चतुर्विध व्यूह-रूप अपनाने वाले। चतुर्दंष्ट्रः — नृसिंह अवतार में चार दाढ़ों वाले। चतुर्भुजः — चार भुजाओं वाले।
श्लोक 15
भ्राजिष्णुः — शुद्ध तेजोमय स्वरूप। भोजनं — प्रकृति अथवा माया, जिसका भगवान उपभोग करते हैं। भोक्ता — प्रकृति का भोग करने वाले। सहिष्णुः — हिरण्याक्ष जैसे असुरों का दमन करने वाले। जगदादिजः — सृष्टि के आरम्भ में हिरण्यगर्भ रूप में प्रकट होने वाले। अनघः — निष्पाप। विजयः — सम्पूर्ण विश्व पर प्रभुत्व रखने वाले। जेता — स्वभाव से ही सबपर विजयी। विश्वयोनिः — विश्व के उद्गम-स्रोत। पुनर्वसुः — जीवों के रूप में पुनः-पुनः देहों में निवास करने वाले।
श्लोक 16
उपेन्द्रः — इन्द्र के छोटे भाई के रूप में जन्म लेने वाले। वामनः — बलि से भिक्षा माँगने गए वामन-रूपधारी। प्रांशुः — महान् ऊँचाई वाले। अमोघः — जिनके कर्म कभी निष्फल नहीं होते। शुचिः — अपनी स्तुति व आराधना करने वालों को पवित्र करने वाले। ऊर्जितः — अनन्त बल वाले। अतीन्द्रः — इन्द्र से भी श्रेष्ठ। संग्रहः — सृज्य जगत् के सूक्ष्म-रूप स्वरूप। सर्गः — स्वयं की सृष्टि करने वाले। धृतात्मा — सदा अपने ही स्वरूप में स्थित, किसी परिवर्तन से रहित। नियमः — प्राणियों को उनके-उनके स्थान पर नियुक्त करने वाले। यमः — सबके भीतर रहकर सबका नियमन करने वाले।
श्लोक 17
वेद्यः — मोक्षेच्छुओं द्वारा जाने जाने योग्य। वैद्यः — समस्त ज्ञान-शाखाओं के ज्ञाता। सदायोगी — सदा अनुभव किए जाने योग्य, क्योंकि वे नित्य विद्यमान हैं। वीरहा — धर्म-रक्षा हेतु वीर असुरों का संहार करने वाले। माधवः — मा (ज्ञान) के स्वामी अथवा लक्ष्मीपति। मधुः — मधु के समान, क्योंकि भगवान मधु के समान आनन्द देते हैं। अतीन्द्रियः — इन्द्रियों से जो ज्ञात नहीं होते। महामायः — महान् मायावियों पर भी माया करने में सक्षम। महोत्साहः — सृष्टि, पालन और संहार के कार्य में सदा तत्पर। महाबलः — समस्त बलवानों में सर्वाधिक बलशाली।
श्लोक 18
महाबुद्धिः नाम से वे ज्ञानियों में सबसे बड़े ज्ञानी कहे गए हैं। महावीर्यः नाम उन्हें सबसे बलशाली सिद्ध करता है। महाशक्तिः नाम से वे शक्ति और कौशल के महान भण्डार के रूप में प्रशंसित हैं। महाद्युतिः नाम उन्हें भीतर और बाहर दोनों ओर तीव्र तेज से दीप्त बताता है। अनिर्देश्यवपुः नाम कहता है कि उनका स्वरूप ऐसा है जिसे 'यह वही है' कहकर निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता। श्रीमान् नाम उन्हें हर प्रकार की महानता से सम्पन्न स्मरण करता है। अमेयात्मा नाम उस चेतन तत्त्व को कहता है जिसकी बुद्धि को मापा नहीं जा सकता। महाद्रिधृक् नाम से वे वही हैं जिन्होंने विशाल मंदराचल पर्वत और गोवर्धन पर्वत को धारण किया।
श्लोक 19
महेष्वासः नाम उन्हें महान धनुष (शार्ंग) धारण करने वाले के रूप में प्रशंसित करता है। महीभर्ता नाम उन्हें प्रलय जल में डूबी पृथ्वी को धारण करने वाला बताता है। श्रीनिवासः नाम से वे वही हैं जिनके वक्षस्थल पर देवी श्री का निवास है। सतांगतिः नाम उन्हें समस्त साधु पुरुषों को परम गति देने वाला कहकर सम्मानित करता है। अनिरुद्धः नाम कहता है कि अनेक रूपों में प्रकट होने में उन्हें कभी कोई बाधा नहीं हुई। सुरानन्दः नाम उन्हें समस्त देवताओं को आनन्द देने वाला स्मरण करता है। गोविन्दः नाम में 'गौ' का अर्थ वाणी है; वे ही वे हैं जो समस्त शब्दों में व्याप्त होकर उन्हें शक्ति देते हैं। गोविदां पतिः नाम से वे समस्त वाणी और वाणी के ज्ञाताओं के स्वामी कहे गए हैं।
श्लोक 20
मरीचिः नाम उन्हें सत्पुरुषों में विद्यमान परम तेज और प्रभाव के रूप में प्रशंसित करता है। दमनः नाम उन्हें यमरूप में अधर्मियों को दण्ड देने वाला कहता है। हंसः नाम से वे वही हैं जो अपना ध्यान करने वालों के संसार-भय को दूर करते हैं। सुपर्णः नाम उन्हें धर्म और अधर्म रूपी दो पंखों वाला बताकर सम्मानित करता है। भुजगोत्तमः नाम कहता है कि भुजाओं से चलने वाले प्राणियों (सर्पों) में वे सर्वश्रेष्ठ हैं। हिरण्यनाभः नाम उन्हें स्मरण करता है जिनकी सुवर्ण नाभि से सृष्टिकर्ता ब्रह्मा उत्पन्न हुए। सुतपाः नाम से वे बदरिकाश्रम में कठोर तप करने वाले कहलाते हैं। पद्मनाभः नाम से वे वही हैं जिनकी नाभि कमल के समान सुन्दर है। प्रजापतिः नाम उन्हें समस्त प्राणियों के पिता के रूप में महिमामंडित करता है, क्योंकि सभी प्राणी उनकी ही संतान हैं।
श्लोक 21
अमृत्युः नाम उन्हें मृत्यु और उसके कारण से रहित बताता है। सर्वदृक् नाम उन्हें अपनी अन्तर्निहित सर्वज्ञता से समस्त जीवों के कर्मों को देखने वाला कहकर प्रशंसित करता है। सिंहः नाम से वे वही हैं जो हिंसा (संहार) करते हैं। संधाता नाम उन्हें जीवों को उनके कर्मों के फल से जोड़ने वाला सम्मानित करता है। संधिमान् नाम कहता है कि वे स्वयं ही कर्मफलों के भोक्ता हैं। स्थिरः नाम उन्हें सदा एक समान स्वभाव वाला स्मरण करता है। अजः नाम उन्हें भक्तों के हृदय में प्रवेश करने वाला या असुरों का नाश करने वाला कहता है। दुर्मर्षणः नाम से वे वही हैं जिनके पराक्रम को असुर सहन नहीं कर सकते। शास्ता नाम उन्हें शास्त्रों द्वारा सबका उपदेश और मार्गदर्शन करने वाला महिमामंडित करता है। विश्रुतात्मा नाम उन्हें सत्य, ज्ञान आदि संकेतक शब्दों से विशेष रूप से ज्ञात होने के कारण आदर देता है। सुरारिहा नाम उन्हें देवों के शत्रुओं का विनाश करने वाला कहता है।
श्लोक 22
गुरुः नाम उन्हें सबसे बड़ा गुरु बताता है। गुरुतमः नाम उन्हें समस्त विद्याओं का आचार्य कहकर प्रशंसित करता है। धामा नाम से वे परम ज्योति कहलाते हैं। सत्यः नाम उन्हें सत्य-गुण के साक्षात् रूप के रूप में सम्मानित करता है। सत्यपराक्रमः नाम उन्हें अमोघ पराक्रम वाला कहता है। निमिषः नाम उन्हें योगनिद्रा में पलकें मूँदे हुए स्मरण करता है। अनिमिषः नाम से वे सदा जागृत रहने वाले कहलाते हैं। स्रग्वी नाम से वे पाँच तत्त्वों से गुँथी वैजयन्ती माला धारण करने वाले कहे गए हैं। वाचस्पतिरुदारधीः नाम उन्हें वाणी (ज्ञान) के स्वामी और विशाल बुद्धि वाले के रूप में महिमामंडित करता है।
श्लोक 23
अग्रणीः नाम उन्हें मुमुक्षुओं को परम पद तक ले जाने वाला बताता है। ग्रामणीः नाम उन्हें समस्त प्राणी-समूह पर अधिकार रखने वाला कहकर प्रशंसित करता है। श्रीमान् नाम से वे सबसे अधिक तेजस्वी कहलाते हैं। न्यायः नाम उन्हें समस्त ज्ञान-साधनों में व्याप्त संगति (तर्कसंगति) के रूप में सम्मानित करता है। नेता नाम उन्हें इस जगत् को गतिशील रखने वाला कहता है। सहस्रमूर्धा नाम उन्हें सहस्र (अनन्त) मस्तकों वाला स्मरण करता है। समीरणः नाम से वे प्राणवायु के रूप में समस्त जीवों को सक्रिय रखने वाले कहे गए हैं। विश्वात्मा नाम से वे सृष्टि की आत्मा कहलाते हैं। सहस्राक्षः नाम उन्हें सहस्र (अनन्त) नेत्रों वाला महिमामंडित करता है। सहस्रपात् नाम उन्हें सहस्र (अनन्त) चरणों वाला कहकर आदर देता है।
श्लोक 24
आवर्तनः नाम उन्हें संसार-चक्र को निरन्तर घुमाने वाला बताता है। निवृत्तात्मा नाम उन्हें संसार-बन्धन से मुक्त अथवा अस्पृष्ट सत्ता कहकर प्रशंसित करता है। संवृतः नाम से वे सर्वव्यापी अविद्या से आवृत कहलाते हैं। संप्रमर्दनः नाम उन्हें रुद्र, यम आदि अपनी विभूतियों के द्वारा समस्त प्राणियों पर संहारक प्रहार करने वाला सम्मानित करता है। अहःसंवर्तकः नाम उन्हें सूर्यरूप में दिन-रात्रि के क्रम को नियमित करने वाला कहता है। वह्निः नाम उन्हें अग्निरूप में देवताओं को यज्ञ-हविष्य पहुँचाने वाला स्मरण करता है। अनिलः नाम से वे किसी स्थिर निवास से रहित (वायु-तुल्य) कहलाते हैं। धरणीधरः नाम से वे वही हैं जो पृथ्वी, शेषनाग, दिग्गज आदि को धारण करते हैं।
श्लोक 25
सुप्रसादः नाम उन्हें ऐसा बताता है जिनकी कृपा अद्भुत है, क्योंकि वे शिशुपाल जैसे अपने शत्रुओं को भी मुक्ति देते हैं। प्रसन्नात्मा नाम उन्हें रज-तम से कभी कलुषित न होने वाला मन कहकर प्रशंसित करता है। विश्वधृग् नाम से वे अपनी शक्ति से सृष्टि को धारण करने वाले कहलाते हैं। विश्वभुग् नाम उन्हें सृष्टि का भोग, उपभोग या रक्षण करने वाला सम्मानित करता है। विभुः नाम उन्हें अनेक रूप धारण करने वाला कहता है। सत्कर्ता नाम उन्हें कल्याण प्रदान करने वाला स्मरण करता है। सत्कृतः नाम से वे वही हैं जो आराध्य पुरुषों द्वारा भी आराधित होते हैं। साधुः नाम से वे न्यायपूर्वक आचरण करने वाले कहलाते हैं। जह्नुः नाम उन्हें प्रलयकाल में समस्त प्राणियों को अपने में विलीन करने वाला महिमामंडित करता है। नारायणः — नर का अर्थ आत्मा है; जो समस्त प्राणियों में निवास करता है, वह नारायण है। नरः नाम उन्हें सबका निर्देशक बताता है; नित्य परमात्मा को ही नर कहा गया है।
श्लोक 26
असंख्येयः नाम उन्हें नाम-रूप के भेद से रहित बताता है। अप्रमेयात्मा नाम उन्हें ऐसी सत्ता कहकर प्रशंसित करता है जिसे किसी प्रमाण से ग्रहण नहीं किया जा सकता। विशिष्टः नाम से वे सबसे श्रेष्ठ कहलाते हैं। शिष्टकृत् नाम — जो सबका नियमन करता है, या जो साधु पुरुषों की रक्षा करता है। शुचिः नाम उन्हें पवित्र कहता है। सिद्धार्थः नाम उन्हें स्मरण करता है जिनका प्रत्येक प्रयोजन सदा सिद्ध होता है। सिद्धसंकल्पः नाम से वे वही हैं जिनके संकल्प सदा फलीभूत होते हैं। सिद्धिदः नाम से वे अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार साधना करने वालों को सिद्धि प्रदान करते हैं। सिद्धिसाधनः नाम उन्हें योग्य कर्मों को सफलता तक पहुँचाने वाला महिमामंडित करता है।
श्लोक 27
वृषाही नाम उन्हें धर्म के स्वामी के रूप में बताता है। वृषभः नाम उन्हें भक्तों की सब कामनाओं की वर्षा करने वाला कहकर प्रशंसित करता है। विष्णुः नाम से वे सर्वव्यापी कहलाते हैं। वृषपर्वा नाम उन्हें परम पद चाहने वालों के लिए धर्मरूपी सोपान (पर्व) देने वाला सम्मानित करता है। वृषोदरः नाम उन्हें वह बताता है जिनका उदर संतति की वर्षा करता है। वर्धनः नाम उन्हें भक्तों के आनन्द को बढ़ाने वाला स्मरण करता है। वर्धमानः नाम से वे सृष्टि-रूप में निरन्तर विस्तार पाने वाले कहलाते हैं। विविक्तः नाम से वे सबसे असंस्पृष्ट और अप्रभावित कहे गए हैं। श्रुतिसागरः नाम उन्हें महिमामंडित करता है, क्योंकि समस्त वैदिक वचन और वाक्य उन्हीं में प्रवाहित होते हैं।
श्लोक 28
सुभुजः नाम उन्हें सृष्टि की रक्षा करने वाली उत्तम भुजाओं से युक्त बताता है। दुर्धरः नाम उन्हें इस सृष्टि को धारण करने वाला कहकर प्रशंसित करता है, जो कार्य और कोई नहीं कर सकता। वाग्मी — जिनसे वेद के रूप में वाणी प्रकट होती है। महेन्द्रः नाम उन्हें परम पुरुष कहकर सम्मानित करता है, जो सभी देवताओं के भी देव हैं। वसुदः नाम उन्हें धन देने वाला कहता है। वसुः नाम उन्हें स्वयं वसु-स्वरूप स्मरण करता है। नैकरूपः नाम से वे किसी एक ही रूप तक सीमित नहीं कहलाते। बृहद्रूपः नाम से वे वराह आदि रहस्यमय रूपों को धारण करने वाले कहे गए हैं। शिपिविष्टः — शिपि का अर्थ गौ है; जो यज्ञ-रूप में गौओं में निवास करते हैं। प्रकाशनः नाम उन्हें सबको प्रकाशित करने वाला आदर देता है।
श्लोक 29
ओजस्तेजोद्युतिधरः नाम उन्हें बल, वीर्य और तेज से सम्पन्न बताता है। प्रकाशात्मा नाम उन्हें प्रकाशमय स्वरूप वाला कहकर प्रशंसित करता है। प्रतापनः नाम से वे सूर्य आदि विभूतियों के माध्यम से जगत् को तपाने वाले कहलाते हैं। ज्ञानं नाम उन्हें धर्म, ज्ञान, वैराग्य आदि गुणों से सम्पन्न सम्मानित करता है। स्पष्टाक्षरः नाम से वे ऐसे कहलाते हैं क्योंकि उनका प्रकट करने वाला शब्द ओंकार उच्च और स्पष्ट उच्चारण वाला है। मन्त्रः नाम उन्हें ऋक्, साम, यजुः आदि मन्त्रों के रूप में या मन्त्रों से ज्ञात होने वाला स्मरण करता है। चन्द्रांशुः नाम से वे वही हैं जो चन्द्रमा की किरणों के समान हैं — जैसे चन्द्रकिरण सूर्य के ताप से जले हुओं को शान्ति देती है, वैसे ही वे संसार-ताप से पीड़ितों को शान्ति और शरण देते हैं। भास्करद्युतिः नाम उन्हें सूर्य के समान तेज वाला आदर देता है।
श्लोक 30
अमृतांशूद्भवः नाम उन्हें वह परमात्मा बताता है जिनसे क्षीरसागर-मंथन के समय अमृतांशु (चन्द्रमा) उत्पन्न हुआ। भानुः नाम उन्हें प्रकाशमान कहकर प्रशंसित करता है। शशबिन्दुः — इस शब्द का अर्थ है जिनके ऊपर हरिण (शश) का चिह्न है, अर्थात् चन्द्रमा। सुरेश्वरः नाम उन्हें समस्त देवताओं और सत्पुरुषों के स्वामी के रूप में सम्मानित करता है। औषधम् नाम उन्हें संसार के महान रोग की औषधि कहता है। जगतः सेतुः नाम उन्हें संसार-सागर को पार करने के साधन के रूप में स्मरण करता है। सत्यधर्मपराक्रमः नाम उन्हें वह बताता है जिनके धर्म, सर्वज्ञता, पराक्रम आदि समस्त गुण सत्य ही हैं।
श्लोक 31
भूतभव्यभवन्नाथः नाम उन्हें भूत, भविष्य और वर्तमान के समस्त प्राणियों का स्वामी बताता है। पवनः नाम उन्हें पवित्र करने वाला कहकर प्रशंसित करता है। पावनः नाम से वे गति देने वाले कहलाते हैं। अनलः नाम उन्हें वह बताता है, क्योंकि जीवात्मा प्राण को ही अपना स्वरूप मानकर 'अनल' कहलाता है। कामहा नाम उन्हें मुमुक्षुओं की कामना-वृत्ति को नष्ट करने वाला कहता है। कामकृत् नाम उन्हें शुद्ध-चित्त भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाला स्मरण करता है। कान्तः नाम से वे अत्यन्त सुन्दर कहलाते हैं। कामः नाम से वे वही हैं जिन्हें जीवन के चार परम पुरुषार्थ चाहने वाले खोजते हैं। कामप्रदः नाम उन्हें भक्तों की कामनाओं को उदारता से पूर्ण करने वाला महिमामंडित करता है। प्रभुः नाम उन्हें सबसे श्रेष्ठ और सर्वोपरि कहकर आदर देता है।
श्लोक 32
युगादिकृद् नाम उन्हें युग जैसे कालखण्डों का कारण बताता है। युगावर्तः नाम उन्हें काल-रूप में सत्य आदि चार युगों के आवर्तन का कारण कहकर प्रशंसित करता है। नैकमायः नाम से वे अनेक प्रकार की माया धारण करने वाले कहलाते हैं, केवल एक नहीं। महाशनः नाम उन्हें कल्प के अन्त में सब कुछ भक्षण करने वाला सम्मानित करता है। अदृश्यः नाम उन्हें किसी भी ज्ञानेन्द्रिय द्वारा ग्रहण न किए जाने वाला कहता है। व्यक्तरूपः नाम उन्हें इसलिए कहा जाता है क्योंकि सृष्टि-रूप में उनका स्थूल स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सहस्रजित् नाम उन्हें देवताओं के अनन्त शत्रुओं पर युद्ध में विजयी होने वाला स्मरण करता है। अनन्तजित् नाम से वे समस्त शक्तियों से सम्पन्न होकर सर्वदा सर्वत्र विजयी कहे गए हैं।
श्लोक 33
इष्टः नाम उन्हें सबका प्रिय बताता है, क्योंकि वे परम आनन्द-स्वरूप हैं। अविशिष्टः नाम उन्हें समस्त प्राणियों के भीतर निवास करने वाला कहकर प्रशंसित करता है। शिष्टेष्टः नाम से वे शिष्ट (ज्ञानी) पुरुषों के प्रिय कहलाते हैं। शिखण्डी — शिखण्ड का अर्थ मयूर-पिच्छ है; गोपरूप में उन्होंने इसे अपने मुकुट की शोभा बनाया। नहुषः नाम उन्हें माया के द्वारा समस्त प्राणियों को बाँधने वाला कहता है, क्योंकि 'नह्' धातु का अर्थ बन्धन है। वृषः नाम उन्हें धर्म-स्वरूप स्मरण करता है। क्रोधहा नाम से वे सज्जनों के क्रोध का नाश करने वाले कहलाते हैं। क्रोधकृत्कर्ता नाम से वे वही हैं जो दुष्टों में क्रोध उत्पन्न करते हैं। विश्वबाहुः नाम उन्हें सबका आधार महिमामंडित करता है, अथवा जिनकी भुजाएँ ही समस्त प्राणी हैं। महीधरः नाम — महि का अर्थ पृथ्वी और पूजा दोनों है; अतः वे पृथ्वी को धारण करने वाले और सब प्रकार की पूजा स्वीकार करने वाले कहे गए हैं।
श्लोक 34
अच्युतः नाम उन्हें जन्म आदि छह विकारों से रहित बताता है। प्रथितः नाम उन्हें सृष्टि-रचना जैसे कर्मों के कारण विख्यात कहकर प्रशंसित करता है। प्राणः नाम से वे हिरण्यगर्भ रूप में समस्त प्राणियों को प्राण देने वाले कहलाते हैं। प्राणदः नाम उन्हें देवताओं और असुरों को प्राण (बल) देने वाला और उसे वापस लेकर उनका नाश करने वाला सम्मानित करता है। वासवानुजः नाम उन्हें वामन अवतार में इन्द्र (वासव) के छोटे भाई के रूप में जन्म लेने वाला कहता है। अपां निधिः — इस शब्द का अर्थ है जलों का समूह अथवा समुद्र। अधिष्ठानम् नाम उन्हें सबके आधार और आश्रय कहता है। अप्रमत्तः नाम से वे वही हैं जो अधिकारी प्राणियों को उनके कर्मफल देने में सदा जागरूक और सावधान रहते हैं। प्रतिष्ठितः नाम उन्हें महिमामंडित करता है, क्योंकि वे स्वयं अपनी महिमा में प्रतिष्ठित और स्थिर हैं।
श्लोक 35
स्कन्दः नाम उन्हें वायु-रूप में सब कुछ संचालित करने वाला बताता है। स्कन्दधरः नाम उन्हें स्कन्द अथवा धर्म-मार्ग का समर्थन करने वाला कहकर प्रशंसित करता है। धुर्यः नाम से वे समस्त प्राणियों के जन्म आदि भार को वहन करने वाले कहलाते हैं। वरदः नाम उन्हें वर (वरदान) देने वाला सम्मानित करता है। वायुवाहनः नाम उन्हें आवह आदि सात प्रकार के वायु-मण्डलों को संचालित करने वाला कहता है। वासुदेवः नाम उन्हें स्मरण करता है जो वसु और देव दोनों रूपों में व्याप्त हैं। बृहद्भानुः नाम से वे महान तेज वाले कहलाते हैं। आदिदेवः नाम से वे समस्त देवताओं के मूल स्रोत कहे गए हैं। पुरन्दरः नाम उन्हें देवताओं के शत्रुओं की नगरियों का विनाश करने वाला महिमामंडित करता है।
श्लोक 36
अशोकः नाम से उन्हें शोक, मोह, भूख, प्यास, जन्म और मृत्यु — इन छह दोषों से रहित बताया गया है। तारणः कहकर उन्हें संसार-सागर से प्राणियों को पार उतारने वाला कहा गया है। तारः नाम उनकी इस महिमा का वर्णन करता है कि वे गर्भवास, जन्म, जरा और मृत्यु के भय से जीवों को मुक्त करते हैं। शूरः कहकर उन्हें महान पराक्रमी बताया गया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों को पूर्ण करने वाले हैं। शौरिः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे शूर के पुत्र वसुदेव के पुत्र, अर्थात् कृष्ण के रूप में अवतरित हुए। जनेश्वरः कहकर उन्हें समस्त प्राणियों के स्वामी के रूप में स्मरण किया जाता है। अनुकूलः नाम बताता है कि वे सबके आत्मा होने के कारण सभी के अनुकूल हैं, क्योंकि कोई भी अपने विरुद्ध कार्य नहीं करता। शतावर्तः कहकर उन्हें अनेक अवतार लेने वाला बताया गया है। पद्मी नाम से उन्हें हाथों में पद्म या कमल धारण करने वाला कहा गया है। पद्मनिभेक्षणः कहकर उनकी आँखों की तुलना कमल से की गई है।
श्लोक 37
पद्मनाभः नाम से उन्हें हृदय-कमल की नाभि में निवास करने वाला कहा गया है। अरविन्दाक्षः कहकर उनकी आँखों की तुलना अरविन्द या कमल से की गई है। पद्मगर्भः नाम बताता है कि वे हृदय-कमल के मध्य में पूजनीय हैं। शरीरभृत् कहकर उन्हें अन्न और प्राण के रूप में प्राणियों के शरीर को धारण और सशक्त करने वाला कहा गया है। महर्द्धिः नाम से उनकी अपार समृद्धि का वर्णन है। ऋद्धः कहकर उन्हें संसार के रूप में प्रकट खड़ा बताया गया है। वृद्धात्मा नाम बताता है कि उनका स्वरूप अनादि और सनातन है। महाक्षः कहकर उन्हें महान तेजस्वी नेत्रों वाला कहा गया है। गरुड़ध्वजः नाम से स्मरण किया जाता है कि गरुड़ उनकी ध्वजा पर विराजमान हैं।
श्लोक 38
अतुलः नाम से उन्हें किसी से भी अतुलनीय कहा गया है। शरभः कहकर बताया गया है कि शरीर को 'शर' कहते हैं क्योंकि वह नाशवान है, और वे उसके आश्रय हैं। भीमः नाम बताता है कि सभी उनसे भयभीत रहते हैं। समयज्ञः कहकर उन्हें सृष्टि, पालन और संहार के उचित काल को जानने वाला कहा गया है। हविर्हरिः नाम से स्मरण किया जाता है कि यज्ञों में दी गई हवि का भाग वे ही ग्रहण करते हैं। सर्वलक्षणलक्षण्यः कहकर उन्हें वह परमात्मा बताया गया है जो समस्त प्रमाणों द्वारा प्राप्त की जाने वाली सर्वोच्च ज्ञान-वस्तु हैं। लक्ष्मीवान नाम बताता है कि लक्ष्मी देवी सदा उनके वक्षस्थल पर निवास करती हैं। समितिञ्जयः कहकर उन्हें समर या संग्राम में सदा विजयी कहा गया है।
श्लोक 39
विक्षरः नाम से उन्हें क्षरण या विनाश से रहित कहा गया है। रोहितः कहकर स्मरण किया जाता है कि उन्होंने रोहित नामक मत्स्य का रूप धारण किया। मार्गः नाम बताता है कि मोक्ष चाहने वाले साधक उन्हीं को ढूँढते हैं। हेतुः कहकर उन्हें इस सृष्टि का निमित्त और उपादान — दोनों कारण कहा गया है। दामोदरः नाम से स्मरण किया जाता है कि आत्मसंयम जैसी साधनाओं के कारण उनका मन परम कल्याणकारी है। सहः कहकर उन्हें सबको अपने अधीन रखने वाला कहा गया है। महीधरः नाम बताता है कि वे पर्वत के रूप में पृथ्वी को धारण करते हैं। महाभागः कहकर उन्हें वह कहा गया है जो अपनी इच्छा से शरीर धारण करके सर्वोच्च आनंद का उपभोग करते हैं। वेगवान नाम से उनकी अत्यंत तीव्र गति का वर्णन है। अमिताशनः कहकर उन्हें प्रलयकाल में समस्त लोकों को निगल लेने वाला कहा गया है।
श्लोक 40
उद्भवः नाम से उन्हें सृष्टि का उपादान कारण कहा गया है। क्षोभणः कहकर स्मरण किया जाता है कि सृष्टि के समय वे प्रकृति के माध्यम से पुरुष में प्रविष्ट होकर क्षोभ उत्पन्न करते हैं। देवः नाम बताता है कि वे सृष्टि आदि लीलाओं द्वारा क्रीड़ा करते हैं। श्रीगर्भः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनके उदर में श्री अर्थात् संसार के रूप में उनका अनूठा प्राकट्य समाया है। परमेश्वरः नाम बताता है कि वे 'परम' अर्थात् सर्वोच्च हैं और समस्त प्राणियों पर अपना आधिपत्य रखते हैं। करणम् कहकर उन्हें इस सृष्टि की उत्पत्ति का सबसे प्रमुख साधन बताया गया है। कारणम् नाम से उन्हें वह कारण कहा गया है जो अन्यों को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। कर्ता कहकर उन्हें स्वतंत्र और स्वयं का स्वामी कहा गया है। विकर्ता नाम बताता है कि वे इस अद्भुत सृष्टि के रचयिता हैं। गहनः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनका स्वभाव, महिमा और कर्म किसी से भी नहीं जाने जा सकते। गुहः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे अपनी माया-शक्ति से अपने स्वरूप को छिपाए रखते हैं।
श्लोक 41
व्यवसायः नाम से उन्हें पूर्णतः ज्ञानस्वरूप कहा गया है। व्यवस्थानः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनमें सृष्टि की सुव्यवस्थित नियमितता आश्रित है। संस्थानः नाम बताता है कि प्रलयकाल में समस्त प्राणी उनमें ही निवास करते हैं। स्थानदः कहकर स्मरण किया जाता है कि वे ध्रुव जैसे भक्तों को उनके कर्मानुसार विशिष्ट पद प्रदान करते हैं। ध्रुवः नाम से उन्हें अविनाशी कहा गया है। परर्द्धिः कहकर उन्हें उस परम ऐश्वर्य का स्वामी बताया गया है। परमस्पष्टः नाम बताता है कि उनमें 'परा' अर्थात् परम तेजोमयी लक्ष्मी निवास करती हैं, या वे किसी अन्य की सहायता के बिना सबसे महान हैं। तुष्टः कहकर उन्हें सहज परम तृप्त स्वभाव वाला कहा गया है। पुष्टः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे सबको परिपूर्ण करते हैं। शुभेक्षणः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनकी दृष्टि सबका कल्याण करती है — मोक्षेच्छुओं को मुक्ति देती है, भोगेच्छुओं को भोग देती है, और हृदय की समस्त शंकाओं की ग्रंथियों को काट देती है।
श्लोक 42
रामः नाम से उन्हें नित्य आनंदस्वरूप कहा गया है, जिनमें योगीजन रमण करते हैं। विरामः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनमें समस्त प्राणियों का विराम या अंत होता है। विरजः नाम बताता है कि उनमें भोगों की कामना सर्वथा शांत हो गई है। मार्गः कहकर उन्हें स्वयं मार्ग कहा गया है। नेयः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे जीव को आध्यात्मिक साक्षात्कार द्वारा परमात्मा की ओर ले जाते और निर्देशित करते हैं। नयः कहकर उन्हें आध्यात्मिक प्रकाश के रूप में नेतृत्व करने वाला कहा गया है। अनयः नाम बताता है कि उनका स्वयं कोई नेता नहीं है। वीरः कहकर उन्हें पराक्रमी कहा गया है। शक्तिमतां श्रेष्ठः नाम से उन्हें ब्रह्मा आदि समस्त शक्तिशाली प्राणियों में सबसे शक्तिशाली बताया गया है। धर्मः कहकर उन्हें समस्त प्राणियों का आधार कहा गया है। धर्मविदुत्तमः नाम से उन्हें धर्म के ज्ञाताओं में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि श्रुति और स्मृति के समस्त शास्त्र उनकी ही आज्ञा हैं।
श्लोक 43
वैकुण्ठः नाम से उन्हें वह कहा गया है जो विविध भिन्न-भिन्न तत्वों को एकत्र करने वाले हैं। पुरुषः कहकर उन्हें सबसे पहले विद्यमान कहा गया है। प्राणः नाम बताता है कि वे शरीर में क्षेत्रज्ञ के रूप में निवास करते हैं और प्राण-शक्ति के रूप में कार्य करते हैं। प्राणदः कहकर उन्हें जीवन देने वाला कहा गया है। प्रणवः नाम से स्मरण किया जाता है कि ओम् द्वारा ही उनकी स्तुति और प्रणाम किया जाता है। पृथुः कहकर उन्हें वह कहा गया है जो विश्व के रूप में स्वयं को विस्तृत किए हुए हैं। हिरण्यगर्भः नाम बताता है कि वे उस सुवर्ण अंडे के कारण हैं जिससे ब्रह्मा का जन्म हुआ। शत्रुघ्नः कहकर उन्हें देवताओं के शत्रुओं का विनाशक कहा गया है। व्याप्तः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे कारण-रूप में समस्त कार्यों में व्याप्त हैं। वायुः कहकर उन्हें अपने भक्तों की ओर गति करने वाला कहा गया है। अधोक्षजः नाम बताता है कि वे अपने मूल स्वभाव से कभी च्युत या क्षीण नहीं होते।
श्लोक 44
ऋतुः नाम से उन्हें काल-स्वरूप कहा गया है, जो ऋतु शब्द द्वारा सूचित होता है। सुदर्शनः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनका दर्शन अर्थात् ज्ञान सबसे मंगलमय फल — मोक्ष — प्रदान करता है। कालः नाम बताता है कि वे ही सब कुछ का माप और सीमा निश्चित करते हैं। परमेष्ठी कहकर उन्हें हृदयाकाश में अपनी परम महिमा सहित निवास करने वाला कहा गया है। परिग्रहः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे सर्वत्र होने के कारण शरणागतों द्वारा सब ओर से ग्रहण किए जाते हैं, और भक्तों के अर्पण को भी ग्रहण करते हैं। उग्रः कहकर उन्हें सूर्य जैसे प्राणियों के लिए भी भय का कारण कहा गया है। संवत्सरः नाम बताता है कि समस्त प्राणी उन्हीं में निवास करते हैं। दक्षः कहकर उन्हें विश्व के रूप में सतत वृद्धि करने वाला कहा गया है। विश्रामः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे भूख-प्यास तथा अविद्या, अभिमान, मोह आदि क्लेशों की लहरों वाले संसार-सागर से मुक्ति चाहने वाले साधकों को विश्राम अर्थात् मोक्ष प्रदान करते हैं। विश्वदक्षिणः नाम बताता है कि वे सबसे अधिक दक्ष या प्रवीण हैं।
श्लोक 45
विस्तारः नाम से उन्हें वह कहा गया है जिनमें समस्त लोकों की अभिव्यक्ति हुई है। स्थावर-स्थाणुः कहकर बताया गया है कि जो स्वयं स्थिर है वह स्थावर है और जिसमें पृथ्वी जैसी स्थायी वस्तुएँ स्थित हैं वह स्थाणु है — भगवान दोनों ही हैं। प्रमाणम् नाम बताता है कि वे शुद्ध चेतना स्वरूप हैं। बीजमव्ययम् कहकर उन्हें संसार का बीज या कारण कहा गया है, जो स्वयं कभी परिवर्तन को प्राप्त नहीं होता। अर्थः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे आनंदस्वरूप होने के कारण सबके द्वारा चाहे जाते हैं। अनर्थः कहकर उन्हें वह कहा गया है जो स्वयं पूर्णकाम होने के कारण किसी अन्य प्रयोजन की खोज में नहीं रहते। महाकोशः नाम बताता है कि अन्नमय, प्राणमय आदि महान कोश उनके आवरण हैं। महाभोगः कहकर उन्हें आनंद को ही महान भोग-स्रोत के रूप में रखने वाला कहा गया है। महाधनः नाम से स्मरण किया जाता है कि समस्त ब्रह्मांड उनके उपभोग के लिए धन के रूप में है।
श्लोक 46
अनिर्विण्णः नाम से उन्हें वह कहा गया है जो कभी उदासीन या खिन्न नहीं होते, क्योंकि वे सदा स्वयं परितृप्त हैं। स्थविष्ठः कहकर उन्हें विराट शरीर वाला कहा गया है, क्योंकि वे ब्रह्मांडीय पुरुष के रूप में हैं। अभूः नाम बताता है कि वे जन्म-रहित हैं, या जिनकी स्वतंत्र सत्ता नहीं बल्कि सब कुछ उनमें ही है। धर्मयूपः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनसे धर्म के समस्त रूप — जो स्वयं उनकी पूजा के साधन हैं — उसी तरह बंधे हैं जैसे यज्ञ-पशु यूप या यज्ञ-स्तंभ से बंधा रहता है। महामखः नाम से स्मरण किया जाता है कि जिनको यज्ञ अर्पित किए जाने से वे यज्ञ महान बन जाते हैं, क्योंकि वे निर्वाण का फल देते हैं। नक्षत्रनेमिः कहकर उन्हें समस्त नक्षत्रों का हृदय कहा गया है। नक्षत्री नाम बताता है कि वे नक्षत्र अर्थात् चंद्रमा के रूप में हैं। क्षमः कहकर उन्हें सभी कार्यों में कुशल कहा गया है। क्षामः नाम से स्मरण किया जाता है कि मन की समस्त वृत्तियाँ शांत हो जाने पर वे शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित रहते हैं। समीहनः कहकर उन्हें सृष्टि आदि कार्यों के लिए भलीभाँति प्रयत्नशील कहा गया है।
श्लोक 47
यज्ञः नाम से उन्हें सर्वज्ञ कहा गया है। इज्यः कहकर उन्हें यज्ञों में पूजनीय कहा गया है। महेज्यः नाम बताता है कि समस्त पूजित देवताओं में केवल वे ही मोक्ष का वरदान देने में सक्षम हैं। क्रतुः कहकर उन्हें वह यज्ञ कहा गया है जिसमें यज्ञ-स्तंभ भी होता है। सत्रम् नाम से स्मरण किया जाता है कि वे विहित धर्म के स्वरूप हैं। सतांगतिः कहकर उन्हें मोक्ष के इच्छुक साधु-पुरुषों का एकमात्र आश्रय कहा गया है। सर्वदर्शी नाम बताता है कि अपनी सहज अंतर्दृष्टि से वे समस्त जीवों के शुभ और अशुभ कर्मों को देखने में सक्षम हैं। विमुक्तात्मा कहकर उन्हें स्वभाव से ही मुक्त कहा गया है। सर्वज्ञः नाम से उन्हें सर्वस्वरूप और सबका ज्ञाता कहा गया है। ज्ञानमुत्तमम् कहकर उन्हें वह चेतना कहा गया है जो सबसे श्रेष्ठ, जन्म-रहित, काल और स्थान से असीमित तथा समस्त सिद्धियों का कारण है।
श्लोक 48
सुव्रतः नाम से उन्हें वह कहा गया है जिन्होंने समस्त शरणागतों की रक्षा का महान व्रत लिया है। सुमुखः कहकर उन्हें मनभावन मुखमंडल वाला कहा गया है। सूक्ष्मः नाम बताता है कि वे शब्द आदि स्थूल कारणों से रहित होने के कारण सूक्ष्म हैं। सुघोषः कहकर बताया गया है कि वेद ही उनका मंगल घोष है, या वे मेघ के समान गंभीर और सुमधुर ध्वनि वाले हैं। सुखदः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे सज्जनों को सुख प्रदान करते हैं। सुहृत् कहकर उन्हें वह कहा गया है जो किसी प्रतिफल की आशा बिना सहायता करते हैं। मनोहरः नाम बताता है कि वे अपने अनुपम आनंदमय स्वभाव से मन को आकर्षित करते हैं। जितक्रोधः कहकर उन्हें क्रोध पर विजय प्राप्त किए हुए कहा गया है। वीरबाहुः नाम से स्मरण किया जाता है कि वैदिक धर्म की स्थापना हेतु असुरों के विनाश में प्रकट हुए उनके भुजबल वीरतापूर्ण कार्यों में सक्षम हैं। विदारणः कहकर उन्हें धर्म के विरुद्ध आचरण करने वालों का विनाशक कहा गया है।
श्लोक 49
स्वापनः नाम से उन्हें वह कहा गया है जो जीवों को अज्ञान की निद्रा में लपेट देते हैं। स्ववशः कहकर उन्हें वह कहा गया है जो किसी अन्य के नहीं, अपने ही वश में हैं, क्योंकि वे संपूर्ण सृष्टि-प्रक्रिया के कारण हैं। व्यापी नाम बताता है कि वे आकाश के समान सब में व्याप्त हैं। नैकात्मा कहकर उन्हें विविध सृष्टि-प्रक्रियाओं के कारणरूप विभिन्न अधीनस्थ शक्तियों के रूप में प्रकट होने वाला कहा गया है। नैककर्मकृत् नाम से स्मरण किया जाता है कि सृष्टि, पालन आदि प्रक्रियाओं में वे अनंत कार्यों में संलग्न रहते हैं। वत्सरः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिसमें सब कुछ निवास करता है। वत्सलः नाम बताता है कि उन्हें अपने भक्तों से प्रेम है। वत्सी कहकर उन्हें अपने प्रियजनों की रक्षा करने वाला कहा गया है। रत्नगर्भः नाम से स्मरण किया जाता है — समुद्र को इसलिए रत्नगर्भ कहते हैं क्योंकि उसकी गहराई में रत्न पाए जाते हैं; भगवान ने समुद्र का रूप धारण किया है, इस कारण उन्हें इस नाम से पुकारा जाता है। धनेश्वरः कहकर उन्हें समस्त धन का स्वामी कहा गया है।
श्लोक 50
धर्मगुप् नाम से उन्हें धर्म का रक्षक कहा गया है। धर्मकृत् कहकर बताया गया है कि धर्म और अधर्म से परे होते हुए भी वे परंपरा बनाए रखने हेतु धर्म का आचरण करते हैं। धर्मी नाम बताता है कि वे धर्म को धारण करने वाले हैं। सत् कहकर उन्हें परब्रह्म कहा गया है, जो सत्यस्वरूप है। असत् नाम से स्मरण किया जाता है कि अपरब्रह्म के रूप में संसार बनकर प्रकट होने के कारण उन्हें असत् (अवास्तविक-सा) भी कहा जाता है। क्षरम् कहकर उन्हें वह कहा गया है जो परिवर्तनशील समस्त प्राणियों के रूप में हैं। अक्षरम् नाम बताता है कि वे स्वयं अपरिवर्तनीय हैं। अविज्ञाता कहकर उन्हें वह कहा गया है जो कर्तापन के अभिमान जैसे जीव के लक्षणों से रहित हैं। सहस्रांशुः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे अनंत किरणों वाले सूर्य हैं। विधाता कहकर उन्हें अनंत जैसी समस्त शक्तियों का अनूठा आधार कहा गया है जो पूरे ब्रह्मांड को धारण करती हैं। कृतलक्षणः नाम बताता है कि वे चेतनास्वरूप हैं।
श्लोक 51
गभस्तिनेमिः नाम से उन्हें सूर्य के रूप में किरणों के मध्य निवास करने वाला कहा गया है। सत्त्वस्थः कहकर उन्हें विशेष रूप से सत्त्वगुण में स्थित कहा गया है, जो स्वभाव से तेजोमय है। सिंहः नाम बताता है कि वे सिंह के समान अप्रतिरोध्य शक्ति वाले हैं। भूतमहेश्वरः कहकर उन्हें समस्त प्राणियों के परम स्वामी कहा गया है। आदिदेवः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे समस्त प्राणियों में सबसे प्रथम हैं। महादेवः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनकी महानता उनके परम आत्मज्ञान में निहित है। देवेशः नाम बताता है कि वे समस्त देवों में सबसे प्रमुख होने के कारण उनके ईश्वर हैं। देवभृद्गुरुः कहकर बताया गया है — इंद्र, जो देवों का शासन करते हैं, देवभृत् कहलाते हैं; भगवान उस इंद्र के भी नियंत्रक अर्थात् गुरु हैं।
श्लोक 52
उत्तरः नाम से उन्हें संसार से उत्तीर्ण अर्थात् मुक्त कहा गया है। गोपतिः कहकर बताया गया है कि कृष्ण के रूप में वे गोपालक गायों के पालनकर्ता हैं, और पृथ्वी के भी स्वामी हैं। गोप्ता नाम बताता है कि वे समस्त प्राणियों के रक्षक हैं। ज्ञानगम्यः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिन्हें केवल कर्म से, या कर्म और ज्ञान के मिश्रण से नहीं जाना जा सकता। पुरातनः नाम से स्मरण किया जाता है कि वे काल से सीमित नहीं हैं और सबसे पहले विद्यमान थे। शरीरभूतभृत् कहकर उन्हें शरीर की रचना करने वाले पंच भूतों के स्वामी कहा गया है। भोक्ता नाम बताता है कि वे रक्षक हैं, या अनंत आनंद के भोक्ता हैं। कपीन्द्रः कहकर बताया गया है — कपि का अर्थ वराह भी होता है, इसलिए यह नाम उस भगवान को दर्शाता है जो इंद्र भी हैं और वराह अवतार में भी प्रकट हुए; अथवा यह उनके राम अवतार की ओर संकेत करता है जिसमें वे वानरों के स्वामी बने। भूरिदक्षिणः नाम से स्मरण किया जाता है कि यज्ञों में उन्हें अनेकानेक दक्षिणाएँ अर्पित की जाती हैं।
श्लोक 53
सोमपः नाम से उन्हें वह कहा गया है जो देवता-रूप में समस्त यज्ञों में सोम-पान करते हैं। अमृतपः कहकर उन्हें अपने स्वभाव के अमृत-आनंद का पान करने वाला कहा गया है। सोमः नाम बताता है कि वे चंद्रमा के रूप में औषधियों और वनस्पतियों को पुष्ट करते हैं। पुरुजित् कहकर उन्हें अनेक जनों पर विजय प्राप्त करने वाला कहा गया है। पुरुषोत्तमः नाम से स्मरण किया जाता है कि उनका स्वरूप विराट होने से वे 'पुरु' अर्थात् महान हैं, और सबमें सर्वप्रमुख होने से 'सत्तम' हैं। विनयः कहकर उन्हें दुष्टों को दंड या विनय देने वाला कहा गया है। जयः नाम बताता है कि वे समस्त प्राणियों पर विजयी हैं। सत्यसंधः कहकर उन्हें वह कहा गया है जिनका संकल्प या प्रतिज्ञा सदा सत्य होती है। दाशार्हः नाम से स्मरण किया जाता है — 'दश' का अर्थ दान है, अतः वे वही हैं जिन्हें दान अर्पित करना उचित है। सात्वतांपतिः कहकर बताया गया है — 'सात्वत' एक तंत्र का नाम है, इसलिए यह नाम उस भगवान को दर्शाता है जिन्होंने इसका उपदेश दिया या उसकी व्याख्या की।
श्लोक 54
जीवः — वे क्षेत्रज्ञ अर्थात् शरीर-रूपी क्षेत्र को जानने वाले हैं, जो प्राणों से संयुक्त हैं। विनयितासाक्षी — वे समस्त भक्तों की विनय और श्रद्धा-भावना के साक्षी हैं। मुकुन्दः — वे मुक्ति प्रदान करने वाले हैं। अमितविक्रमः — वे हैं जिनके तीन चरण असीम थे (वामन अवतार)। अम्भोनिधिः — वे हैं जिनमें 'अम्बा' अर्थात् देवताओं से लेकर समस्त प्राणी निवास करते हैं। अनन्तात्मा — वे देश, काल और कारण से सीमित नहीं किए जा सकते। महोदधिशयः — वे प्रलय-काल के जल में शयन करते हैं, जिसमें संसार के समस्त पदार्थ विलीन हो जाते हैं। अन्तकः — वे ही सबका अन्त करने वाले हैं।
श्लोक 55
अजः — यहाँ 'अ' महाविष्णु का सूचक है, अतः यह नाम विष्णु से उत्पन्न कामदेव का भी द्योतक है। महार्हः — वे पूजा के सर्वथा योग्य हैं। स्वाभाव्यः — वे नित्य-सिद्ध हैं, स्वभाव से ही अनादि हैं। जितामित्रः — उन्होंने आसक्ति, क्रोध आदि भीतरी शत्रुओं तथा रावण-कुम्भकर्ण जैसे बाहरी शत्रुओं को जीत लिया है। प्रमोदनः — वे सदा आनन्दमय हैं, नित्य आनन्द में तल्लीन रहते हैं। आनन्दः — उनका स्वरूप ही आनन्द है। नन्दनः — वे आनन्द देने वाले हैं। नन्दः — वे समस्त सिद्धियों से सम्पन्न हैं। सत्यधर्मा — उनका ज्ञान और उनके गुण सत्य हैं। त्रिविक्रमः — उन्होंने अपने तीन चरणों से सम्पूर्ण विश्व को माप लिया।
श्लोक 56
महर्षिः कपिलाचार्यः — कपिल को महर्षि कहा जाता है क्योंकि वे समस्त वेदों के ज्ञाता थे। कृतज्ञः — 'कृत' का अर्थ संसार है, क्योंकि वह कार्य-रूप है, और वे उसके ज्ञाता हैं। मेदिनीपतिः — वे पृथ्वी के स्वामी हैं। त्रिपदः — उनके तीन चरण हैं। त्रिदशाध्यक्षः — वे गुणों के प्रभाव से उत्पन्न जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति — इन तीन अवस्थाओं के साक्षी हैं। महाशृङ्गः — उनका एक महान् शृंग (सींग) है। कृतान्तकृत् — वे 'कृत' अर्थात् व्यक्त जगत् के विनाश को लाने वाले हैं।
श्लोक 57
महावराहः — वे विशाल कॉस्मिक वराह (शूकर) रूप हैं। गोविन्दः — 'गो' का अर्थ वेद-वाणी है; जो उन वाक्यों से जाना जाता है, वह गोविन्द है। सुषेणः — उनकी एक दिव्य सेना है, जो उनके नित्य सहचरों से बनी है। कनकाङ्गदी — वे स्वर्ण के अंगदों (बाजूबन्दों) से सुशोभित हैं। गुह्यः — वे उपनिषदों के गुह्य (रहस्यमय) ज्ञान से जाने जाते हैं, या वे हृदय-गुहा में छिपे हुए हैं। गभीरः — सर्वज्ञता, ऐश्वर्य, शक्ति, पराक्रम आदि गुणों के कारण वे अत्यन्त गम्भीर हैं। गहनः — उनमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है; वे जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा इनके अभाव के भी साक्षी हैं। गुप्तः — वे वाणी और विचार के विषय नहीं बनते। चक्रगदाधरः — वे हाथों में चक्र और गदा धारण करते हैं।
श्लोक 58
वेधाः — वे विधान अर्थात् नियमन करने वाले हैं। स्वाङ्गः — वे स्वयं अपने कार्यों को सिद्ध करने वाले हैं। अजितः — अपने विविध अवतारों में उन्हें किसी ने नहीं जीता। कृष्णः — वे कृष्ण-द्वैपायन (वेदव्यास) के रूप में प्रसिद्ध हैं। दृढ़ः — उनका स्वभाव और सामर्थ्य कभी क्षीण नहीं होता। संकर्षणोऽच्युतः — संकर्षण वे हैं जो प्रलयकाल में सब प्राणियों को अपनी ओर खींच लेते हैं, और अच्युत वे हैं जो अपने स्वरूप से कभी गिरते नहीं — दोनों मिलकर एक नाम बनता है, 'अच्युत जो संकर्षण है'। वरुणः — सन्ध्या का सूर्य वरुण कहलाता है, क्योंकि वह अपनी किरणों को अपने में समेट लेता है। वारुणः — वे मित्र-वरुण के पुत्र वसिष्ठ या अगस्त्य के रूप में प्रकट प्रभु हैं। वृक्षः — वे वृक्ष के समान अविचल और अटल हैं। पुष्करक्षः — हृदय-कमल में ध्यान करने पर वे चेतना के प्रकाश के रूप में प्रकट होते हैं, या उनके नेत्र कमल के समान हैं। महामनाः — वे केवल मन-संकल्प से ही सृष्टि, पालन और संहार के तीन कार्य सम्पन्न करते हैं।
श्लोक 59
भगवान् — उत्पत्ति, विनाश, बन्धन, मोक्ष, ज्ञान और अज्ञान — इन सबको जानने वाले को भगवान् कहा जाता है। भगहा — प्रलयकाल में वे छह दिव्य ऐश्वर्यों (भग) को अपने में समेट लेते हैं। आनन्दी — उनका स्वभाव आनन्द-स्वरूप है। वनमाली — वे पञ्चतत्त्वों से बनी वैजयन्ती नामक वनमाला धारण करते हैं। हलायुधः — बलभद्र के अवतार में उनका अस्त्र हल (हरिस) था। आदित्यः — वामन अवतार में वे अदिति से उत्पन्न हुए। ज्योतिरादित्यः — वे सूर्य-मण्डल के तेज में निवास करते हैं। सहिष्णुः — वे शीत-उष्ण जैसे विपरीत भावों को सहन करते हैं। गतिसत्तमः — वे सबका परम आश्रय और सहारा हैं, तथा समस्त प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ हैं।
श्लोक 60
सुधन्वा — उनके पास 'शारंग' नामक अत्यन्त श्रेष्ठ धनुष है। खण्डपरशुः — वे शत्रुओं का नाश करने वाले परशु (फरसा) हैं। दारुणः — दुष्ट मार्ग पर चलने वालों के प्रति वे कठोर और निर्दय हैं। द्रविणप्रदः — वे भक्तों को इच्छित धन प्रदान करते हैं। दिवःस्पृक् — वे आकाश को स्पर्श करते हैं। सर्वदृग्व्यासः — उनका बोध सब कुछ अपने भीतर समाहित कर लेता है। वाचस्पतिरयोनिजः — वे समस्त विद्याओं के स्वामी होने से वाचस्पति कहलाते हैं, और वे माता के गर्भ से जन्म न लेने के कारण अयोनिज हैं — यह विशेषण और नाम मिलकर एक पद बनते हैं।
श्लोक 61
त्रिसामा — साम-गान के गायक उन्हें 'देवव्रत' नामक तीन सामों से स्तुति करते हैं। सामगः — वे स्वयं साम-गान गाने वाले हैं। साम — वेदों में 'मैं साम वेद हूँ', ऐसा वे स्वयं कहते हैं। निर्वाणम् — वे वह अवस्था हैं जिसमें समस्त दुःख समाप्त हो जाते हैं और जो परम आनन्द-स्वरूप है। भेषजम् — वे संसार-रोग के औषध हैं। भिषक् — वे चिकित्सक कहलाते हैं। संन्यासकृत् — उन्होंने मोक्ष-प्राप्ति के लिए संन्यास नामक चौथे आश्रम की स्थापना की। समः — उन्होंने संन्यासियों के लिए मन की शान्ति को सर्वोपरि अनुशासन बताया है। शान्तः — वे शान्त हैं, क्योंकि उनकी सांसारिक भोगों में कोई रुचि नहीं। निष्ठा — प्रलयकाल में समस्त प्राणी उन्हीं में विलीन होकर रहते हैं। शान्तिः — वे ब्रह्म हैं जिनमें अविद्या का पूर्ण नाश हो जाता है। परायणम् — वे वह परम अवस्था हैं जिससे फिर निम्न अवस्था में लौटना नहीं होता।
श्लोक 62
शुभाङ्गः — उनका स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है। शान्तिदः — वे आसक्ति-द्वेष आदि से मुक्ति रूप शान्ति प्रदान करते हैं। स्रष्टा — सृष्टि-चक्र के प्रारम्भ में उन्होंने ही सब कुछ उत्पन्न किया। कुमुदः — 'कु' का अर्थ पृथ्वी है; वे पृथ्वी में आनन्द लेने वाले हैं। कुवलेशयः — 'कु' पृथ्वी और उसे घेरने वाला जल 'कुवल' कहलाता है, अतः वे जल में शयन करने वाले हैं; अथवा 'कुवल' सर्प के निचले भाग को भी कहते हैं, अतः वे आदिशेष सर्प पर शयन करने वाले हैं। गोहितः — कृष्णावतार में उन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाकर गौओं की रक्षा की। गोपतिः — वे पृथ्वी के स्वामी हैं। गोप्ता — वे पृथ्वी के रक्षक हैं, अथवा अपनी माया से स्वयं को छिपाने वाले हैं। वृषभाक्षः — उनकी दृष्टि भक्तों पर समस्त वांछित वस्तुओं की वृष्टि करती है; उनकी दृष्टि धर्म से पूर्ण है। वृषप्रियः — उन्हें वृष अर्थात् धर्म प्रिय है।
श्लोक 63
अनिवर्ती — असुरों से युद्ध में वे कभी पीछे नहीं हटते, अथवा धर्म का पालन करते हुए वे उसे कभी नहीं छोड़ते। निवृत्तात्मा — उनका मन स्वभाव से ही इन्द्रिय-विषयों से विरक्त है। संक्षेप्ता — प्रलयकाल में वे विस्तृत ब्रह्माण्ड को सूक्ष्म रूप में संकुचित कर लेते हैं। क्षेमकृत् — वे अपने शरणागतों को क्षेम (रक्षा) प्रदान करते हैं। शिवः — उनके नाम-स्मरण मात्र से सब पवित्र हो जाते हैं। श्रीवत्सवक्षाः — उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स नामक चिह्न है। श्रीवासः — उनके वक्षस्थल पर सदा श्रीदेवी निवास करती हैं। श्रीपतिः — क्षीर-सागर मन्थन के समय श्रीदेवी ने सब देवों और असुरों को छोड़कर उन्हें ही अपना पति चुना; अथवा 'श्री' परम ऐश्वर्य-शक्ति है, और वे उसके स्वामी हैं। श्रीमतांवरः — वे ब्रह्मा आदि वेद-ऐश्वर्य-सम्पन्न देवताओं में भी सर्वोपरि हैं।
श्लोक 64
श्रीदः — वे भक्तों को ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। श्रीशः — वे देवी श्री के स्वामी हैं। श्रीनिवासः — यहाँ 'श्री' का अर्थ गुण और शक्ति से सम्पन्न पुरुष है; वे ऐसे पुरुषों में निवास करते हैं। श्रीनिधिः — वे समस्त 'श्री' अर्थात् गुणों और शक्तियों के आधार हैं। श्रीविभावनः — वे भक्तों के कर्मानुसार उन्हें हर प्रकार का ऐश्वर्य और गुण प्रदान करते हैं। श्रीधरः — वे अपने वक्षस्थल पर समस्त जननी श्री को धारण करते हैं। श्रीकरः — वे अपने भक्तों को — जो उनकी स्तुति, चिन्तन और पूजा करते हैं — गुण और ऐश्वर्य से सम्पन्न बनाते हैं। श्रेयः — 'श्रेयस्' अविनाशी कल्याण और सुख की प्राप्ति है; वही उनका स्वरूप है। श्रीमान् — उनमें शक्ति, गुण, सौन्दर्य आदि समस्त 'श्री' विद्यमान हैं। लोकत्रयाश्रयः — वे तीनों लोकों के आधार हैं।
श्लोक 65
स्वक्षः — उनके नेत्र कमल के समान सुन्दर हैं। स्वाङ्गः — उनके अंग अत्यन्त सुन्दर हैं। शतानन्दः — वे अद्वैत और परम आनन्द-स्वरूप हैं। नन्दिः — वे परम आनन्द-स्वरूप हैं। ज्योतिर्गणेश्वरः — वे नक्षत्र-गणों के स्वामी हैं। विजितात्मा — उन्होंने मन को पूर्णतः जीत लिया है। विधेयात्मा — उनका स्वरूप पूर्णतः अनुशासित है। सत्कीर्तिः — उनकी यश-कीर्ति सत्य-स्वरूप है। छिन्नसंशयः — उन्हें किसी विषय में कोई संदेह नहीं, सब कुछ हस्तामलक की भाँति स्पष्ट है।
श्लोक 66
उदीर्णः — वे समस्त प्राणियों से श्रेष्ठ हैं। सर्वतःचक्षुः — शुद्ध चेतना-स्वरूप होने से वे सभी दिशाओं में सब कुछ देख सकते हैं। अनीशः — उनके ऊपर कोई शासक नहीं हो सकता। शाश्वतस्थिरः — वे नित्य होते हुए भी अपरिवर्तनशील हैं। भूशयः — लंका जाने का मार्ग खोजते हुए उन्हें समुद्र-तट पर भूमि पर सोना पड़ा। भूषणः — उन्होंने विविध अवतारों में प्रकट होकर पृथ्वी को अलंकृत किया। भूतिः — वे सब कुछ का आश्रय और सार हैं, अथवा समस्त गौरवशाली विभूतियों के मूल स्रोत हैं। विशोकः — आनन्द-स्वरूप होने से वे सब शोक से मुक्त हैं। शोकनाशनः — उनके स्मरण मात्र से भक्तों के शोक मिट जाते हैं।
श्लोक 67
अर्चिष्मान् — सूर्य, चन्द्र और अन्य ज्योतियाँ उनकी किरणों (अर्चिस्) से ही प्रकाशमान होती हैं। अर्चितः — ब्रह्मा आदि देवता, जो स्वयं समस्त लोकों में पूजनीय हैं, वे भी उनकी पूजा करते हैं। कुम्भः — वे घट के समान सब कुछ अपने भीतर समाए हुए हैं। विशुद्धात्मा — सत्त्व, रज, तम तीनों गुणों से परे वे शुद्ध चैतन्य-स्वरूप हैं और समस्त दोषों से मुक्त हैं। विशोधनः — उनके स्मरण मात्र से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। अनिरुद्धः — वे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — इन चार व्यूहों में अन्तिम हैं, अथवा उन्हें कोई शत्रु रोक नहीं सकता। अप्रतिरथः — उनके समान कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं। प्रद्युम्नः — उनका द्युम्न (ऐश्वर्य) श्रेष्ठ और पवित्र है, अथवा वे चार व्यूहों में से एक हैं। अमितविक्रमः — उनका पराक्रम असीम है, जिसे कोई रोक नहीं सकता।
श्लोक 68
कालनेमिनिहा — उन्होंने कालनेमि नामक असुर का विनाश किया। वीरः — वे पराक्रमी और शूरवीर हैं। शौरिः — वे शूर-वंश में कृष्ण के रूप में जन्मे। शूरजनेश्वरः — वे अपने अतुल पराक्रम से इन्द्र आदि महाशक्तियों को भी नियन्त्रित करते हैं। त्रिलोकात्मा — अन्तर्यामी रूप में वे तीनों लोकों की आत्मा हैं। त्रिलोकेशः — उनके मार्गदर्शन और आदेश से ही तीनों लोकों का कार्य चलता है। केशवः — 'केश' का अर्थ सूर्य-मण्डल में फैलने वाली किरणें हैं; वे उनके स्रोत हैं। केशिहा — उन्होंने केशी नामक असुर का वध किया। हरिः — वे अज्ञान के साथ संसार-बन्धन का भी नाश करते हैं।
श्लोक 69
कामदेवः — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों के इच्छुक जनों द्वारा वे ही वांछित हैं। कामपालः — वे धर्ममय इच्छाओं से युक्त जनों की इच्छाओं की रक्षा और पूर्ति करते हैं। कामी — स्वभाव से उनकी सभी इच्छाएँ सदा पूर्ण रहती हैं। कान्तः — उनका स्वरूप परम सुन्दर है, अथवा वे द्विपरार्ध के अन्त में ब्रह्मा का भी विलय करते हैं। कृतागमः — उन्होंने श्रुति, स्मृति और आगम — इन शास्त्रों की रचना की। अनिर्देश्यवपुः — गुणों से परे होने के कारण उनके स्वरूप का निर्धारण नहीं किया जा सकता। विष्णुः — उनका तेज आकाश और पृथ्वी में व्याप्त है। वीरः — उनमें गति और वीरतापूर्ण कर्म करने की शक्ति है। अनन्तः — वे सर्वव्यापी, नित्य, सबकी आत्मा हैं, और देश-काल से सीमित नहीं किए जा सकते। धनञ्जयः — अर्जुन ने चारों दिशाओं के राज्य जीतकर महान धन प्राप्त किया, अतः वे धनञ्जय कहलाए; अर्जुन प्रभु की ही एक विभूति हैं।
श्लोक 70
ब्रह्मण्यः — वेद, ब्राह्मण और ज्ञान को 'ब्रह्म' शब्द से इंगित किया जाता है; इनकी वृद्धि करने वाले होने से वे ब्रह्मण्य कहलाते हैं। ब्रह्मकृत् — वे ब्रह्म अर्थात् तपस्या करने वाले हैं। ब्रह्मा — वे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के रूप में सब कुछ रचते हैं। ब्रह्म — विशाल और सर्वव्यापी होने तथा सत्य जैसे संकेतकों से जाने जाने के कारण वे ब्रह्म कहलाते हैं; ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त-स्वरूप है। ब्रह्मविवर्धनः — वे तपस्या और साधना की वृद्धि करते हैं। ब्रह्मविद् — वे वेदों और उनके वास्तविक अर्थ के ज्ञाता हैं। ब्राह्मणः — वे ब्राह्मण-रूप में सम्पूर्ण जगत् को वैदिक आदेशों की शिक्षा देते हैं। ब्रह्मी — तप, वेद, मन और प्राण — जिन्हें 'ब्रह्म' कहा जाता है, वे सब उन्हीं में स्थित हैं। ब्रह्मज्ञः — वे ब्रह्म के स्वरूप को जानते हैं। ब्राह्मणप्रियः — पवित्र ब्राह्मणजन उनके भक्त हैं और वे भी उन्हें प्रिय हैं।
श्लोक 71
महाक्रमः — उनके चरण अत्यन्त विशाल हैं; ऐसे महाक्रम विष्णु हमें सुख प्रदान करें। महाकर्मा — वे सृष्टि-रचना जैसे महान कार्य करने वाले हैं। महातेजाः — सूर्य आदि ज्योतियाँ उनके ही तेज से प्रकाशमान होती हैं। महोरगः — वे आदिशेष नामक महान सर्प भी स्वयं हैं। महाक्रतुः — वे महान यज्ञ (क्रतु) स्वरूप हैं। महायज्वा — वे विश्व के कल्याण हेतु महान यज्ञ करने वाले हैं। महायज्ञः — वे स्वयं महान यज्ञ-स्वरूप हैं। महाहविः — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म-रूप आत्मा की अग्नि में समर्पित हवि (आहुति) के रूप में उन्हीं का स्वरूप है।
श्लोक 72
स्तव्यः नाम से वे सबके द्वारा स्तुति किए जाने योग्य कहे जाते हैं, परन्तु स्वयं किसी अन्य की स्तुति नहीं करते। स्तवप्रियः उन्हें स्तुतियों से प्रसन्न होने वाले के रूप में सराहते हैं। स्तोत्रं उन्हें स्वयं वह स्तोत्र कहकर नमन करता है जो उनकी महिमा, गुण और नामों का बखान करता है। स्तुतिः उन्हें स्वयं स्तुति अर्थात् महिमागान का स्वरूप मानकर वंदन करता है। स्तोता कहता है कि सर्वरूप होने के कारण वे स्वयं ही वह व्यक्ति भी हैं जो उनका स्तुतिगान करता है। रणप्रियः उन्हें जगत् की रक्षा हेतु युद्ध के प्रिय स्मरण करता है, जो सदा सुदर्शन चक्र, कौमोदकी गदा, शार्ङ्ग धनुष, नन्दक खड्ग और पाञ्चजन्य शंख धारण करते हैं। पूर्णः उन्हें स्वयं परिपूर्ण और समस्त शक्तियों तथा उत्कृष्टताओं का स्रोत कहता है। पूरयिता के रूप में वे केवल स्वयं परिपूर्ण ही नहीं, अन्यों को भी पूर्णता प्रदान करते हैं। पुण्यः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि जिनके विषय में सुनने मात्र से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। पुण्यकीर्तिः उन्हें पवित्र कीर्ति वाला मानता है, जिनके गुण दूसरों को भी पुण्य प्रदान करते हैं। अनामयः नाम से वे किसी भी आंतरिक या बाह्य कारण से उत्पन्न रोग से रहित कहे जाते हैं।
श्लोक 73
मनोजवः नाम से वे सर्वव्यापी होने के कारण मन के समान वेगवान कहे जाते हैं। तीर्थकरः — यहाँ तीर्थ का अर्थ विद्या अथवा ज्ञान की शाखा है — वे समस्त पवित्र ज्ञान के स्रोत हैं। वसुरेताः उन्हें इस रूप में सराहता है कि जिनका रेतस् (सृजनात्मक तत्व) सुवर्ण (वसु) के स्वभाव वाला है। वसुप्रदः उन्हें वसु अर्थात् ऐश्वर्य प्रदान करने वाला कहकर नमन करता है।
श्लोक 74
सद्गतिः नाम से वे सज्जनों द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य, अथवा श्रेष्ठ बुद्धि से संपन्न कहे जाते हैं। सत्कृतिः उन्हें इस रूप में सराहता है कि जिनके कर्म सदा जगत् की रक्षा के लिए होते हैं। सत्ता उन्हें आंतरिक-बाह्य भेद से रहित शुद्ध सत्स्वरूप अनुभूति कहकर नमन करता है। सद्भूतिः उन्हें शुद्ध सत् और चित् स्वरूप परमात्मा के रूप में सम्मानित करता है, जो अबाधित हैं और अनेक रूपों में प्रकट होते हैं। सत्परायणः उन्हें सत्य का साक्षात्कार कर लेने वाले साधु पुरुषों की परम गति के रूप में स्मरण करता है। शूरसेनः उन्हें हनुमान जैसे वीर योद्धाओं की सेना रखने वाला याद करता है। यदुश्रेष्ठः उन्हें यदुवंशियों में सर्वश्रेष्ठ कहता है। सन्निवासः के रूप में वे साधु और ज्ञानी जनों के आश्रयस्थान हैं। सुयामुनः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि वे देवकी, वसुदेव, नन्दगोप, यशोदा, बलराम, सुभद्रा आदि यमुना-तटवासी महापुरुषों से घिरे रहते हैं।
श्लोक 75
भूतावासः नाम से वे वह हैं जिनमें समस्त प्राणी निवास करते हैं। वासुदेवः उन्हें उस देवत्व के रूप में सराहता है जो अपनी माया द्वारा सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। सर्वासुनिलयः उन्हें इस रूप में नमन करता है कि जीव-रूप में उन्हीं में समस्त प्राणियों के प्राण (असु) विलीन होते हैं। अनलः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि जिनका धन या सामर्थ्य असीम है। दर्पहा उन्हें अधर्म के मार्ग पर चलने वालों के अभिमान को नष्ट करने वाला स्मरण करता है। दर्पदः उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने वालों को गौरवपूर्ण आत्मसम्मान देने वाला कहता है। दृप्तः के रूप में वे अपने ही आनंद के भोग से सदा संतुष्ट रहते हैं। दुर्धरः उन्हें इस रूप में सराहता है कि ध्यान में हृदय में उन्हें धारण करना अत्यंत कठिन है। अपराजितः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि आसक्ति जैसे आंतरिक शत्रुओं से और असुरों जैसे बाह्य शत्रुओं से वे कभी पराजित नहीं होते।
श्लोक 76
विश्वमूर्तिः नाम से वे सबकी आत्मा होने के कारण वह हैं जिनका शरीर सम्पूर्ण विश्व है। महामूर्तिः उन्हें आदिशेष की शेष-शय्या पर विराजमान विशाल स्वरूप के रूप में सराहता है। दीप्तमूर्तिः उन्हें ज्ञान से प्रकाशमान स्वरूप कहकर नमन करता है। अमूर्तिमान् उन्हें कर्मजन्य शरीर से रहित सम्मानित करता है। अनेकमूर्तिः उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि जगत् के कल्याण हेतु वे अपने अवतारों में अनेक रूप धारण करते हैं। अव्यक्तः उन्हें याद करता है कि अनेक रूप होते हुए भी उन्हें स्पष्टतः 'यह है' कहकर निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता। शतमूर्तिः उन्हें इस रूप में कहता है कि शुद्ध चैतन्य स्वरूप होते हुए भी वे अस्थायी प्रयोजनों के लिए भिन्न-भिन्न रूप धारण करते हैं। शताननः के रूप में वे सैकड़ों मुख वाले हैं — जो उनके असंख्य रूपों का सूचक है।
श्लोक 77
एकः नाम से वे किसी भी प्रकार के आंतरिक, बाह्य या सजातीय भेद से रहित, पूर्णतः अद्वैत कहे जाते हैं। अनेकः उन्हें माया से उत्पन्न अनेक शरीरों वाला सराहता है। सवः उन्हें उस यज्ञ के रूप में नमन करता है जिसमें सोम तैयार किया और उपयोग में लाया जाता है। कः — 'क' शब्द आनंद या सुख का सूचक है; अतः वे आनंदस्वरूप होने से इस नाम से स्तुत होते हैं। किम् उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि वे समस्त मूल्यों के सार होने के कारण ध्यान करने योग्य हैं। यत् उन्हें याद करता है कि वे स्वभाव से स्वयंसिद्ध हैं; 'यत्' शब्द स्वतः विद्यमान तत्व का सूचक है। तत् कहता है कि ब्रह्म इसलिए 'तत्' कहा जाता है क्योंकि वह 'विस्तृत होता है' (तनोति)। पदमनुत्तमम् — ब्रह्म समस्त मोक्षार्थियों का चरम लक्ष्य रूप 'पद' है, और वह अनुत्तम है क्योंकि उससे परे प्राप्त करने योग्य कुछ और नहीं है। लोकबन्धुः उन्हें समस्त लोकों का मित्र कहकर सराहता है। लोकनाथः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि जिनसे समस्त लोक प्रार्थना करते हैं। माधवः नाम से वे मधु वंश में जन्मे कहे जाते हैं। भक्तवत्सलः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि वे अपने भक्तों के प्रति असीम प्रेम रखते हैं।
श्लोक 78
सुवर्णवर्णः नाम से वे सुवर्ण के समान वर्ण वाले कहे जाते हैं। हेमाङ्गः उन्हें सोने के समान स्वरूप वाला सराहता है। वराङ्गः उन्हें इस रूप में नमन करता है कि जिनके सभी अंग अत्यंत सुंदर और तेजस्वी हैं। चन्दनाङ्गदी उन्हें सुगंधित चन्दन के लेप और आनंददायक बाजूबंदों से सुशोभित सम्मानित करता है। वीरहा उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि धर्म की रक्षा हेतु उन्होंने हिरण्यकशिपु जैसे वीरों का नाश किया। विषमः उन्हें याद करता है कि उनकी किसी से तुलना नहीं हो सकती, क्योंकि कोई भी गुण उनसे तुलनीय नहीं है। शून्यः कहता है कि किसी सीमित गुण से रहित होने के कारण वे उन्हें परिभाषित करने की चेष्टा करने वालों को शून्य-सा प्रतीत होते हैं। घृताशीः उन्हें इस रूप में सराहता है कि जिनका आशीर्वाद कभी विफल नहीं होता। अचलः उन्हें सम्मानित करता है कि सत्य, चित् और अनंत के रूप में अपने वास्तविक स्वभाव से वे कभी विचलित नहीं होते। चलः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि वायु के रूप में वे गतिमान भी हैं।
श्लोक 79
अमानी नाम से वे शुद्ध चैतन्य स्वरूप होने के कारण अनात्म वस्तुओं से तनिक भी अहंभाव न रखने वाले कहे जाते हैं। मानदः उन्हें इस रूप में सराहता है कि वे अपनी माया से अनात्म में आत्मभाव उत्पन्न कराते हैं, अथवा भक्तों को सम्मान और कृपा प्रदान करते हैं। मान्यः उन्हें सबके आराध्य कहकर नमन करता है, क्योंकि वे सबके ईश्वर हैं। लोकस्वामी उन्हें समस्त चौदह लोकों का स्वामी सम्मानित करता है। त्रिलोकधृत् उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि वे तीनों लोकों को धारण करते हैं। सुमेधाः उन्हें उत्तम और कल्याणकारी बुद्धि वाला याद करता है। मेधजः उन्हें यज्ञ (याग) से उत्पन्न कहता है। धन्यः के रूप में वे अपने सभी प्रयोजन सिद्ध कर लेने के कारण पूर्णतः संतुष्ट हैं। सत्यमेधाः उन्हें इस रूप में सराहता है कि जिनकी बुद्धि सदा फलदायी होती है। धराधरः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि आदिशेष जैसे अपने अंशों के द्वारा वे लोकों को धारण करते हैं।
श्लोक 80
तेजोवृषः नाम से वे सूर्यरूप में सदा वर्षा कराने वाले कहे जाते हैं। द्युतिधरः उन्हें सदा तेजोमय स्वरूप धारण करने वाला सराहता है। सर्वशस्त्रभृतां वरः उन्हें समस्त शस्त्रधारियों में सर्वश्रेष्ठ कहकर नमन करता है। प्रग्रहः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि वे भक्तों के अर्पण को अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करते हैं। निग्रहः उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि वे सबका नियंत्रण करते हैं और अंततः सबका विलय भी करते हैं। व्यग्रः उन्हें याद करता है कि जिनका अंत (अग्र) नहीं है, अथवा जो भक्तों की प्रार्थना पूर्ण करने में सदा तत्पर रहते हैं। नैकशृङ्गः उन्हें कॉस्मिक वराह के रूप में चार सींगों वाला कहता है। गदाग्रजः — मंत्र (निगद) द्वारा सर्वप्रथम प्रकट होने वाले, अथवा गद के ज्येष्ठ भ्राता के रूप में उन्हें नमन किया जाता है।
श्लोक 81
चतुर्मूर्तिः नाम से वे विराट्, सूत्रात्मा, अव्याकृत और तुरीय — इन चार स्वरूपों वाले कहे जाते हैं, अथवा श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण चार सींगों वाले। चतुर्बाहुः उन्हें इस रूप में सराहता है कि वासुदेव के रूप में वे सदा चार भुजाओं वाले वर्णित किए जाते हैं। चतुर्व्यूहः उन्हें वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — इन चार व्यूहों वाला कहकर नमन करता है। चतुर्गतिः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि शास्त्र-विहित चार आश्रमों और चार वर्णों द्वारा वे परम गति के रूप में खोजे जाते हैं। चतुरात्मा उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि उनका आत्मा आसक्ति, वैर और सीमा से रहित विशेष सामर्थ्य से संपन्न है। चतुर्भावः उन्हें याद करता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — ये चार मानव-मूल्य उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं। चतुर्वेदवित् उन्हें चार वेदों के यथार्थ अर्थ को जानने वाला कहता है। एकपात् के रूप में वे एक ही पाद (चरण अथवा स्वरूप) वाले हैं, जो उनकी अलौकिक एकता का सूचक है।
श्लोक 82
समावर्तः नाम से वे संसार के चक्र को प्रभावी रूप से घुमाने वाले कहे जाते हैं। अनिवृत्तात्मा उन्हें इस रूप में सराहता है कि सर्वव्यापी होने के कारण वे किसी भी वस्तु या स्थान से पृथक् नहीं हैं। दुर्जयः उन्हें वह कहकर नमन करता है जिन्हें जीता नहीं जा सकता। दुरतिक्रमः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि जिनकी आज्ञा का उल्लंघन करने में सूर्य जैसे देवता भी भयभीत रहते हैं। दुर्लभः उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि भक्ति द्वारा प्राप्त किए जाने वाले वे हैं, जबकि भक्ति स्वयं कठिनता से साध्य है। दुर्गमः उन्हें याद करता है कि जिन तक पहुँचना कठिन है। दुर्गः उन्हें इस रूप में कहता है कि अनेक बाधाओं के कारण जिनकी प्राप्ति कठिन हो जाती है। दुरावासः के रूप में योगीजन उन्हें अत्यंत कठिनता से समाधि में अपने हृदय में निवास करा पाते हैं। दुरारिहा उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि वे असुरों जैसे शत्रुभूत प्राणियों का नाश करते हैं।
श्लोक 83
शुभाङ्गः नाम से वे वह कहे जाते हैं जिनका स्वरूप ध्यान के लिए अत्यंत मंगलकारी है। लोकसारङ्गः उन्हें इस रूप में सराहता है कि वे सारंग (भ्रमर) के समान जगत् से सार तत्व खींचते हैं। सुतन्तुः उन्हें इस रूप में नमन करता है कि यह अनंत विस्तार वाला विश्व उन्हीं का सुंदर जाल (तंतु) है। तन्तुवर्धनः उन्हें इस जगत्-जाल का विस्तार या संकुचन करने वाला सम्मानित करता है। इन्द्रकर्मा उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि उनके कर्म इन्द्र के समान अत्यंत श्रेष्ठ और प्रशंसनीय हैं। महाकर्मा उन्हें याद करता है कि आकाश जैसे महाभूत उनसे कार्यरूप में उत्पन्न होते हैं। कृतकर्मा उन्हें इस रूप में कहता है कि उन्होंने सब कुछ सिद्ध कर लिया है और उन्हें अब कुछ और करना शेष नहीं है। कृतागमः के रूप में उन्होंने वेद के रूप में आगम (शास्त्र) प्रदान किया है।
श्लोक 84
उद्भवः नाम से वे अपनी ही इच्छा से महान और उत्तम शरीर धारण करने वाले कहे जाते हैं। सुन्दरः उन्हें इस रूप में सराहता है कि जिनकी सौम्य सुंदरता सबको मोहित करती है। सुन्दः उन्हें अत्यंत कोमलता (उन्दन) के लिए प्रसिद्ध कहकर नमन करता है। रत्ननाभः — रत्न सौंदर्य का सूचक है; इसी से वे वह कहे जाते हैं जिनकी नाभि अत्यंत सुंदर है। सुलोचनः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि जिनके नेत्र तेजस्वी हैं — जो सबके ज्ञान के सूचक हैं। अर्कः उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि ब्रह्मा जैसे स्वयं पूज्य देवता भी उनकी पूजा करते हैं। वाजसनः उन्हें याद करता है कि वे याचना करने वालों को वाज (अन्न) प्रदान करते हैं। शृङ्गी के रूप में प्रलय काल में उन्होंने प्रमुख सींग वाले मत्स्य रूप धारण किया। जयन्तः उन्हें इस रूप में कहता है कि वे शत्रुओं को सहज ही जीत लेते हैं। सर्वविज्जयी उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि वे 'सर्ववित्' (सर्वज्ञ) और 'जयी' हैं — आसक्ति-क्रोध जैसे आंतरिक शत्रुओं तथा हिरण्याक्ष जैसे बाह्य शत्रुओं के विजेता।
श्लोक 85
सुवर्णबिन्दुः नाम से वे इस रूप में कहे जाते हैं कि जिनके अंग (बिन्दु) सुवर्ण के समान तेजस्वी हैं। अक्षोभ्यः उन्हें इस रूप में सराहता है कि आसक्ति-द्वेष जैसी भावनाओं से, इन्द्रिय-विषयों से, अथवा असुरों से वे कभी विचलित नहीं होते। सर्ववागीश्वरेश्वरः उन्हें ब्रह्मा सहित समस्त विद्वानों के स्वामियों के भी स्वामी कहकर नमन करता है। महाह्रदः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि आनंदस्वरूप परमात्मा होने से वे महान सरोवर (ह्रद) कहलाते हैं, जिसमें योगीजन डुबकी लगाकर महान आनंद प्राप्त करते हैं। महागर्तः उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि उनकी माया महान गर्त के समान पार करना कठिन है। महाभूतः उन्हें याद करता है कि वे भूत, वर्तमान और भविष्य — तीनों कालों से अविभाजित हैं। महानिधिः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि समस्त महाभूत उन्हीं में आश्रय पाते हैं — वे महान् और परम मूल्यवान निधि हैं।
श्लोक 86
कुमुदः नाम से — 'कु' का अर्थ पृथ्वी है — वे पृथ्वी को उसके भार से मुक्त कर उसे आनंद (मुद) प्रदान करने वाले कहे जाते हैं। कुन्दरः उन्हें इस रूप में सराहता है कि वे कुन्द (चमेली के फूल) के समान शुद्ध आशीर्वाद प्रदान करते हैं। कुन्दः उन्हें इस रूप में नमन करता है कि जिनके अंग कुन्द फूल के समान सुंदर हैं। पर्जन्यः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि वे मेघ के समान मानसिक, भौतिक और आध्यात्मिक — तीनों तापों को शांत करते हुए इच्छित वस्तुओं की वर्षा करते हैं। पावनः उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि उनका स्मरण मात्र भक्त को पवित्रता प्रदान करता है। अनिलः उन्हें याद करता है कि वे किसी प्रेरणा या बंधन से रहित हैं, अथवा सदा जागृत, कभी न सोने वाले हैं। अमृताशः उन्हें इस रूप में कहता है कि वे अमृत (अमर आनंद) का सेवन करते हैं, जो स्वयं उनका ही स्वभाव है। अमृतवपुः के रूप में उनका स्वरूप अमर और अक्षय है। सर्वज्ञः उन्हें सर्वज्ञ कहकर सराहता है। सर्वतोमुखः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि उनके मुख सब दिशाओं में हैं।
श्लोक 87
सुलभः नाम से वे वह कहे जाते हैं जो पत्र, पुष्प, फल जैसी तुच्छ भेंट भक्तिपूर्वक अर्पित करने से भी सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। सुव्रतः उन्हें इस रूप में सराहता है कि वे शुद्ध अर्पण का भोग करते हैं, अथवा केवल साक्षी (अभोक्ता) हैं। सिद्धः उन्हें इस रूप में नमन करता है कि जिनके प्रयोजन सदा सिद्ध होते हैं — वे सर्वशक्तिमान और किसी अन्य इच्छा से अबाधित हैं। शत्रुजित् उन्हें समस्त दुष्ट शक्तियों का विजेता सम्मानित करता है। शत्रुतापनः उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि वे देवताओं के शत्रुओं का नाश करते हैं। न्यग्रोधः उन्हें याद करता है कि जो सबसे ऊपर रहते हुए भी नीचे की ओर बढ़ता है — वे प्रकट जगत् के स्रोत हैं। उदुम्बरः उन्हें इस रूप में कहता है कि परम कारण होने से वे 'आकाश से ऊपर' — सबसे श्रेष्ठ हैं। अश्वत्थः के रूप में, जो कल तक भी नहीं टिकता उसी निरंतर बदलते जगत् के रूप में उनका स्वरूप है। चाणूरान्ध्रनिषूदनः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि उन्होंने आंध्र जाति के पराक्रमी योद्धा चाणूर का नाश किया।
श्लोक 88
सहस्रार्चिः नाम से वे असंख्य किरणों (अर्चि) वाले कहे जाते हैं। सप्तजिह्वः उन्हें इस रूप में सराहता है कि अग्निरूप में उनकी सात ज्वाला-जिह्वाएँ मानी जाती हैं। सप्तैधाः उन्हें इस रूप में नमन करता है कि अग्निस्वरूप प्रभु के सात एधा (तेज के रूप) हैं। सप्तवाहनः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि सूर्यरूप में उनके वाहन सात अश्व हैं। अमूर्तिः उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि स्थूल शारीरिक रूप से रहित, वे निराकार शुद्ध चैतन्य हैं। अनघः उन्हें याद करता है कि वे पाप या दुःख से रहित हैं। अचिन्त्यः उन्हें इस रूप में कहता है कि किसी भी ज्ञान के मानदंड से वे निश्चित नहीं किए जा सकते, क्योंकि वे स्वयं समस्त ज्ञान के साक्षी हैं। भयकृत् के रूप में वे दुष्ट मार्ग पर चलने वालों में भय उत्पन्न करते हैं, अथवा समस्त भय की जड़ को काटते हैं। भयनाशनः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि वे सज्जनों के भय का नाश करते हैं।
श्लोक 89
अणुः नाम से वे अत्यंत सूक्ष्म कहे जाते हैं। बृहत् उन्हें विशाल और महान सराहता है। कृशः उन्हें इस रूप में नमन करता है कि वे अभौतिक हैं, प्रकृति के किसी भी तत्व से परे। स्थूलः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि सबके अंतर्यामी होने के कारण वे रूपक रूप में स्थूल (विशाल) कहे जाते हैं। गुणभृत् उन्हें इस रूप में स्मरण करता है कि वे सत्व, रज और तम — इन गुणों के आधार हैं, जिनसे सृष्टि, स्थिति और प्रलय संपन्न होते हैं। निर्गुणः उन्हें याद करता है कि वे प्रकृति के गुणों से रहित हैं। महान् उन्हें महान कहकर सराहता है। अधृतः के रूप में, पृथ्वी जैसी समस्त धारण करने वाली शक्तियों के आधार होते हुए भी वे स्वयं किसी बाह्य वस्तु से अधारित हैं। स्वधृतः उन्हें इस रूप में कहता है कि वे केवल स्वयं द्वारा धारित हैं। स्वास्यः उन्हें इस रूप में सम्मानित करता है कि जिनका मुख कमल की भीतरी पंखुड़ी के समान सुंदर और हल्के लाल रंग का है। प्राग्वंशः उन्हें इस रूप में नमन करता है कि प्रभु का 'वंश' (विश्व-व्यवस्था) किसी पूर्व कारण से उत्पन्न नहीं है — वे स्वयं ही अंतिम हैं। वंशवर्धनः उनकी महिमा इस रूप में गाता है कि वे अपनी संतान रूपी इस विश्व-व्यवस्था का विस्तार अथवा विलय करते हैं।
श्लोक 90
भारभृत् - जो आदिशेष (अनंत) का रूप धारण करके पृथ्वी का भार वहन करते हैं। कथितः - वेद जिन्हें सर्वोच्च रूप में वर्णित करते हैं, सभी वेद जिनका ही कथन करते हैं। योगी - योग का अर्थ ज्ञान है; जो इस ज्ञान द्वारा प्राप्त होते हैं वे योगी हैं, अथवा जो सदा अपने परमात्म-स्वरूप में स्थित रहते हैं। योगीशः - जो योग अथवा आत्मज्ञान से कभी विचलित नहीं होते, जबकि सामान्य योगी बाधाओं के कारण भटक जाते हैं। सर्वकामदः - जो समस्त इच्छित फलों के दाता हैं। आश्रमः - जो संसार-रूपी वन में भटकते प्राणियों को विश्राम देने वाले हैं। श्रमणः - जो विवेकहीन जीवन जीने वालों के लिए कष्टों के कारण बनते हैं। क्षामः - जो समस्त प्राणियों के क्षय और विलय के कारण हैं। सुपर्णः - जो संसार-वृक्ष के रूप में वैदिक वचनों (छन्दों) रूपी उत्तम पत्तों से सुशोभित हैं। वायुवाहनः - जिनके भय से वायु समस्त प्राणियों को धारण करते हुए गति करती है।
श्लोक 91
धनुर्धरः - जो राम के रूप में महान धनुष धारण करने वाले थे। धनुर्वेदः - जो दशरथ-पुत्र राम के रूप में धनुर्विद्या के आचार्य थे। दण्डः - जो समस्त दण्डदाताओं में अनुशासन का साकार रूप हैं। दमयिता - जो यम और राजा के रूप में दुष्टों को दण्ड देने वाले हैं। दमः - जो धर्म के पालन से उत्पन्न आत्मसंयम के रूप में मनुष्यों में विद्यमान हैं। अपराजितः - जो किसी भी शत्रु से कभी पराजित नहीं होते। सर्वसहः - जो समस्त कर्मों में कुशल हैं और समभाव से सब कुछ सहन करते हैं। नियन्ता - जो प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्तव्य पर नियुक्त करते हैं। अनियमः - जिन पर कोई बाहरी नियम लागू नहीं होता, क्योंकि वे स्वयं सबके नियंता हैं। अयमः - जिन पर यम का कोई नियंत्रण नहीं, जिनकी कभी मृत्यु नहीं होती।
श्लोक 92
सत्त्ववान् - जिनमें वीरता, पराक्रम, धैर्य आदि बलवर्धक गुण विद्यमान हैं। सात्त्विकः - जो सत्त्वगुण में मूल रूप से स्थित हैं। सत्यः - जो सज्जनों में सत्यरूप से विद्यमान और स्थित हैं। सत्यधर्मपरायणः - जो सत्य और धर्म के सभी रूपों के मूल आधार हैं। अभिप्रायः - जिन्हें पुरुषार्थ के अभिलाषी खोजते हैं। प्रियार्हः - जिनके प्रति जो कुछ भी सबसे प्रिय हो, वही अर्पित करना उचित है। अर्हः - जो समस्त सामग्री और विधियों से पूजा के योग्य हैं। प्रियकृत् - जो न केवल प्रिय हैं, अपितु अपने भक्तों के लिए जो प्रिय और कल्याणकारी है, वह स्वयं करते हैं। प्रीतिवर्धनः - जो अपने भक्तों के आनंद और भक्ति को बढ़ाने वाले हैं।
श्लोक 93
विहायसगतिः - जो विष्णुपद नामक परम लोक में गति करने वाले अथवा उसके आधार हैं। ज्योतिः - जो स्वयंप्रकाश चेतना के रूप में स्वयं को और समस्त वस्तुओं को प्रकट करते हैं। सुरुचिः - जिनकी रुचि (तेज अथवा इच्छा) अत्यंत आकर्षक स्वभाव की है। हुतभुक् - जो किसी भी देवता को किए गए हवन में अर्पित हविष्य को ग्रहण करते हैं। विभुः - जो सर्वत्र निवास करते हैं, अथवा तीनों लोकों के स्वामी हैं। रविः - जो सूर्यरूप में समस्त रसों का अवशोषण करते हैं। विरोचनः - जो अनेक रूपों में प्रकाशमान होते हैं। सूर्यः - जो सूर्य में श्री (तेज) उत्पन्न करते हैं, अथवा जिन्हें अग्नि भी सूर्य कहा जाता है। सविता - जो समस्त लोकों को उत्पन्न करते हैं। रविलोचनः - जिनकी आँख सूर्य है।
श्लोक 94
अनन्तः - जो नित्य, सर्वव्यापी और देश-काल से अनिर्धारणीय हैं। हुतभुक् - जो यज्ञों में अर्पित हविष्य का भोग करते हैं। भोक्ता - जिनके लिए जड़ प्रकृति भोग की वस्तु है। सुखदः - जो भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। नैकजः - जो धर्म की रक्षा के लिए बार-बार जन्म लेते हैं। अग्रजः - जो सबसे पहले उत्पन्न हुए — हिरण्यगर्भ। अनिर्विण्णः - जो अपनी समस्त इच्छाओं को निर्बाध रूप से प्राप्त कर लेने के कारण सर्वथा शोकरहित हैं। सदामर्षी - जो सदा सज्जनों के प्रति सहनशील और क्षमाशील रहते हैं। लोकाधिष्ठानम् - जो स्वयं किसी आधार के बिना भी तीनों लोकों के आधार हैं। अद्भुतः - जो अद्भुत और आश्चर्यजनक सत्ता हैं।
श्लोक 95
सनात् - 'सनात्' शब्द दीर्घ काल का संकेत करता है; काल भी परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है। सनातनतमः - जो सबके कारण होने के कारण ब्रह्मा आदि नित्य माने जाने वाले देवताओं से भी अधिक प्राचीन हैं। कपिलः - जो समुद्र की तलहटी में हल्के लाल वर्ण की अग्नि के रूप में, तथा दिव्य ज्ञानी ऋषि कपिल के रूप में जाने जाते हैं। कपिः - 'क' का अर्थ जल है; जो सूर्यरूप में समस्त जल का पान या अवशोषण करते हैं। अव्ययः - जिनमें प्रलयकाल में समस्त लोक बिना किसी हानि के विलीन हो जाते हैं। स्वस्तिदः - जो भक्तों को मंगल प्रदान करते हैं। स्वस्तिकृत् - जो कल्याण के संपादन हेतु कार्य करते हैं। स्वस्ति - जिनका मंगलमय स्वरूप परम आनंद से युक्त है। स्वस्तिभुक् - जो उस उच्चतम मंगल का उपभोग करते हैं, अथवा भक्तों के कल्याण का संरक्षण करते हैं। स्वस्तिदक्षिणः - जो अपनी कृपा से मंगल को और बढ़ाते हैं।
श्लोक 96
अरौद्रः - इच्छा, आसक्ति और क्रोध ही रौद्र हैं; भगवान, जिनकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण हैं, आसक्ति और क्रोध से मुक्त हैं। कुण्डली - जो आदिशेष के कुण्डलाकार रूप में विद्यमान हैं। चक्री - जो समस्त लोकों की रक्षा हेतु मन के प्रतीक सुदर्शन चक्र धारण करते हैं। विक्रमी - 'विक्रम' का अर्थ विशाल पग उठाना भी है और महान पराक्रम व शौर्य भी। ऊर्जितशासनः - जिनके श्रुति और स्मृति रूपी आदेश अत्यंत उदात्त स्वभाव के हैं। शब्दातिगः - जो किसी भी शब्द से निर्दिष्ट नहीं किए जा सकते, क्योंकि उनमें ऐसा कोई लक्षण नहीं जो शब्दों से ग्रहण हो सके। शब्दसहः - जो समस्त वेदों का अंतिम तात्पर्य हैं। शिशिरः - जो भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक — तीन प्रकार के संसार-ताप से जलते हुए प्राणियों के लिए शीतल आश्रय हैं। शर्वरीकरः - बंधन में पड़े जीवों के लिए आत्मा रात्रि (शर्वरी) के समान प्रतीत होता है, और ज्ञानियों के लिए संसार रात्रि के समान है; भगवान दोनों के लिए यह 'रात्रि' रचते हैं।
श्लोक 97
अक्रूरः - जो क्रूरतारहित हैं। पेशलः - जो कर्म, मन, वचन और शरीर में सुंदर और सुग्राह्य हैं। दक्षः - जो पूर्ण विकसित, सशक्त और प्रत्येक कार्य को प्रभावी ढंग से करने वाले, अत्यंत सक्षम हैं। दक्षिणः - जो कुशल और निपुण हैं; यही भाव दूसरे दृष्टिकोण से। क्षमिणां वरः - जो धैर्य में प्रसिद्ध समस्त योगियों से भी अधिक क्षमाशील और श्रेष्ठ हैं। विद्वत्तमः - जो सबके संपूर्ण और अप्रतिम ज्ञान से युक्त हैं। वीतभयः - जो नित्य मुक्त और सबके स्वामी होने के कारण संसार के किसी भय से रहित हैं। पुण्यश्रवणकीर्तनः - जिनके विषय में सुनना और जिनका गुणगान करना अत्यंत पुण्यदायक है।
श्लोक 98
उत्तारणः - जो प्राणियों को संसार-सागर के उस पार ले जाने वाले हैं। दुष्कृतिहा - जो दुष्कर्मों के दुष्परिणामों का नाश करते हैं, अथवा दुष्कर्म करने वालों का नाश करते हैं। पुण्यः - जो अपना स्मरण और आराधना करने वालों को पवित्रता प्रदान करते हैं। दुःस्वप्ननाशनः - जिनकी आराधना और ध्यान करने से अशुभ स्वप्नों से रक्षा होती है। वीरहा - जो जीवों को बंधन से मुक्त करते हैं, मोक्ष देकर संसार-मार्ग से बचाते हैं। रक्षणः - जो सत्त्वगुण से संपन्न होकर तीनों लोकों की रक्षा करते हैं। सन्तः - सन्मार्ग पर चलने वाले सन्त कहलाते हैं; भगवान उनकी आत्मा ही हैं। जीवनः - जो प्राणरूप में समस्त प्राणियों के जीवन को धारण करते हैं। पर्यवस्थितः - जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड में सर्वत्र व्याप्त रहते हैं।
श्लोक 99
अनन्तरूपः - जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड में निवास करने के कारण अनगिनत रूपों वाले हैं। अनन्तश्रीः - जिनकी श्री (महिमा) अनंत है। जितमन्युः - जिन्होंने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली है। भयापहः - जो प्राणियों के संसार-जन्य भय का नाश करते हैं। चतुरस्रः - जो न्यायपूर्वक जीवों को उनके कर्मों का फल प्रदान करते हैं। गभीरात्मा - जिनका स्वभाव अथाह और अगम्य है। विदिशः - जो योग्यता के अनुसार विभिन्न रूपों वाले जीवों को कर्मों के विविध फल वितरित करते हैं। व्यादिशः - जो इन्द्र आदि देवताओं को उनके विविध कार्यों के लिए आदेश देते हैं। दिशः - जो वेदरूप में विभिन्न प्राणियों को यज्ञादि कर्मों के फल प्रदान करते हैं।
श्लोक 100
अनादिः - जो समस्त का परम कारण होने के कारण अनादि हैं, जिनका कोई आरंभ नहीं। भूर्भुवः - 'भु' का अर्थ आधार है; जो स्वयं पृथ्वी के भी आधार हैं, जो स्वयं सब कुछ धारण करती है। लक्ष्मीः - जो पृथ्वी के आधार होने के साथ-साथ उसके लिए समस्त मंगल के दाता हैं। सुवीरः - जिनकी अभिव्यक्ति के अनेक तेजस्वी रूप हैं। रुचिराङ्गदः - जो अत्यंत आकर्षक बाजूबंद धारण करते हैं। जननः - जो समस्त जीवों को जन्म देने वाले हैं। जनजन्मादिः - जो देहधारी जीवों की उत्पत्ति का मूल कारण हैं। भीमः - जो विस्मय और भय के कारण हैं। भीमपराक्रमः - जिनका पराक्रम और शौर्य अवतारों में असुरों के लिए भय का कारण बना।
श्लोक 101
आधारनिलयः - जो समस्त मूल आधारभूत तत्वों — आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी — के भी आधार हैं। अधाता - जो स्वयं अपने लिए आधार हैं, अतः जिन्हें किसी बाह्य आधार की आवश्यकता नहीं। पुष्पहासः - जिनकी सृष्टि के रूप में अभिव्यक्ति कलियों के फूल में खिलने (हास) के समान है। प्रजागरः - जो विशेष रूप से जागृत हैं — स्वयं नित्य चैतन्य स्वरूप। ऊर्ध्वगः - जो सबसे ऊपर हैं। सत्पथाचारः - जो सदा सज्जनों के आचरण का अनुसरण करते हैं। प्राणदः - जो परीक्षित के समान मृतकों को पुनः प्राण प्रदान करते हैं। प्रणवः - प्रणव (ॐ) ब्रह्म का अभिव्यक्तिकारी शब्द-प्रतीक है; चूँकि वे प्रणव से अविभाज्य रूप से संबद्ध हैं, वे प्रणव कहलाते हैं। पणः - 'व्यवहार' मूल से व्युत्पन्न; जो सभी को उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।
श्लोक 102
प्रमाणं - जो शुद्ध चैतन्य होने के कारण स्वयं-सिद्ध प्रमाण हैं। प्राणनिलयः - जो प्राणों का आश्रय और विलयस्थान हैं। प्राणभृत् - जो अन्न की भाँति प्राणों को पोषित करते हैं। प्राणजीवनः - जो प्राण, अपान आदि वायुओं के रूप में मनुष्यों को जीवित रखते हैं। तत्त्वं - जो ब्रह्म को इंगित करते हैं, जैसे अमृत, सत्य, परमार्थ आदि शब्द। तत्त्ववित् - जो अपने सच्चे स्वरूप को जानते हैं। एकात्मा - जो समस्त में एकमात्र सत्ता और आत्मा हैं। जन्ममृत्युजरातिगः - जो जन्म, स्थिति, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और मृत्यु — इन छह प्रकार के विकारों से परे विद्यमान रहते हैं।
श्लोक 103
भूर्भुवःस्वस्तरुः - भूः, भुवः, स्वः — ये तीन व्याहृतियाँ वेद का सार हैं; वे ही वह वृक्ष (तरु) हैं जिससे ये उत्पन्न होती हैं। तारः - जो जीवों को संसार-सागर के पार ले जाने में सहायक हैं। सविता - जो समस्त लोकों को उत्पन्न करते हैं। प्रपितामहः - जो ब्रह्मा के भी पिता और इस प्रकार सबके प्रपितामह हैं। यज्ञः - जो यज्ञ-स्वरूप हैं। यज्ञपतिः - जो समस्त यज्ञों के संरक्षक और स्वामी हैं। यज्वा - जो यज्ञकर्ता के रूप में प्रकट होते हैं। यज्ञाङ्गः - जिनके कॉस्मिक वराह रूप के शरीर के अंग यज्ञ के अंगों के साथ अभिन्न हैं। यज्ञवाहनः - जो विविध फल देने वाले यज्ञों के संचालक हैं।
श्लोक 104
यज्ञभृद् - जो समस्त यज्ञों के संरक्षक और समर्थक हैं। यज्ञकृद् - जो सृष्टि के आदि और अंत में यज्ञ संपन्न करते हैं। यज्ञी - जो यज्ञ के प्रमुख स्वामी हैं। यज्ञभुग् - जो यज्ञ का भोक्ता और रक्षक हैं। यज्ञसाधनः - जिनके लिए यज्ञ ही साधन है — वे स्वयं साधन और साध्य दोनों हैं। यज्ञान्तकृद् - जो यज्ञ का अंत और फल हैं। यज्ञगुह्यम् - जो ज्ञानयज्ञ के रूप में समस्त यज्ञों का गूढ़ सार हैं। अन्नम् - जो प्राणियों द्वारा खाए जाते हैं, अथवा जो सबके भोजन के रूप में सबमें व्याप्त हैं। अन्नादः - जो संपूर्ण जगत् को अन्न रूप में ग्रहण करते हैं; 'एव' शब्द यह दर्शाने के लिए जोड़ा गया है कि वे स्वयं अन्न भी हैं।
श्लोक 105
आत्मयोनिः - जो सबके उद्गम हैं — ब्रह्मांड का उनके अतिरिक्त कोई अन्य उपादान कारण नहीं। स्वयंजातः - जो निमित्त कारण भी स्वयं ही हैं — स्वयंभू, किसी अन्य के द्वारा उत्पन्न नहीं। वैखानसः - जिन्होंने वराह (कॉस्मिक वराह) के अद्वितीय रूप में पृथ्वी को खोद निकाला। सामगायनः - जो साम गान द्वारा गाए जाते हैं और स्वयं गायक भी हैं। देवकीनन्दनः - जो कृष्ण अवतार में देवकी के पुत्र हैं। स्रष्टा - जो समस्त लोकों के सृष्टिकर्ता हैं। क्षितीशः - जगत् के स्वामी, यहाँ राम के रूप में निर्दिष्ट। पापनाशनः - जो अपनी आराधना, ध्यान, स्मरण और स्तुति करने वालों के पापों का नाश करते हैं।
श्लोक 106
शङ्खभृत् - जो पाञ्चजन्य शंख धारण करते हैं, जो तामसाहंकार का प्रतीक है, जिससे पंचमहाभूत उत्पन्न हुए। नन्दकी - जो नन्दक नामक खड्ग धारण करते हैं, जो विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) का प्रतीक है। चक्री - जो सुदर्शन चक्र धारण करते हैं, जो राजसाहंकार का प्रतीक है, जिससे इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई हैं। शार्ङ्गधन्वा - जो शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करते हैं। गदाधरः - जो कौमोदकी नामक गदा धारण करते हैं, जो बुद्धि-तत्व का प्रतीक है। रथाङ्गपाणिः - जिनके हाथ में चक्र (रथ का अंग) है। अक्षोभ्यः - जो इन समस्त अस्त्रों को धारण करते हुए भी किसी से विचलित नहीं होते। सर्वप्रहरणायुधः - जिनके लिए संपर्क या आघात में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक वस्तु अस्त्र बन जाती है; उनका शस्त्रागार असीम है।
श्लोक 107
यह श्लोक सहस्रनामों को पूर्ण करता है और स्तोत्र को अंतिम आवाहन के साथ समाप्त करता है। इसमें पुनः 'सर्वप्रहरणायुधः' नाम का उल्लेख है — जिनके लिए प्रत्येक वस्तु धर्म की रक्षा हेतु अस्त्र बन जाती है — और इसे पवित्र नमस्कार 'ॐ नमः' के साथ सम्पन्न किया जाता है, जिससे सहस्रनामों का पाठ पूर्ण होता है। समापन श्लोक में प्रार्थना की गई है: वनमाला से सुशोभित तथा गदा, शार्ङ्ग धनुष, शंख, चक्र और नन्दक खड्ग धारण करने वाले भगवान नारायण — जो विष्णु और वासुदेव के नाम से जाने जाते हैं — हमारी रक्षा करें।
श्लोक 108
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
फलश्रुतिनित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
स्तोत्र की पृष्ठभूमि: कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के पश्चात धर्मराज युधिष्ठिर स्वजनों के संहार से अत्यंत व्यथित होकर शरशय्या पर स्थित पितामह भीष्म के समीप गए। उन्होंने भीष्म जी से ६ गूढ़ प्रश्न पूछे: संसार का एकमात्र देव कौन है? परम गति क्या है? किसकी स्तुति करने से मानव का कल्याण होता है? किसका ध्यान करने से जीव जन्म-मरण से मुक्त होता है? समस्त धर्मों में सर्वश्रेष्ठ धर्म कौन सा है? तथा किसका जप करने से संसार-बंधन कट जाते हैं? पितामह भीष्म ने उत्तर दिया कि सर्वव्यापी, कमलनयन भगवान श्रीविष्णु के दिव्य एक सहस्र नामों का अनन्य भक्ति से संकीर्तन ही सर्वश्रेष्ठ धर्म और मोक्ष का परम साधन है। स्थान-निर्देश: महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय १४९; स्तोत्रनिधि के पाठ की पुष्पिका इसे भीष्म-युधिष्ठिर संवाद में अनुशासन पर्व का १४९वाँ अध्याय बताती है। यहाँ दिए १०८ श्लोकों में सहस्र नाम समाए हैं।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Maharishi Vedavyasa · प्राचीन वैदिक ऋषि · पौराणिक प्राचीन काल
परंपरागत रूप से चारों वेदों के संकलनकर्ता तथा महाभारत (जिसके अंतर्गत भगवद्गीता आती है) एवं पुराणों के रचयिता माने जाते हैं — जिससे वे संपूर्ण हिंदू ग्रंथ-परंपरा में सर्वाधिक उद्धृत रचनाकारों में से एक हैं, जो दर्शन, महाकाव्य कथा, एवं भक्ति साहित्य तक विस्तृत है।
क्या आप जानते हैं?
शरशय्या से उद्भूत दिव्य वाणी
पितामह भीष्म ने यह दिव्य स्तोत्र बाणों की शय्या पर लेटे हुए मृत्युंजय भाव से उच्चारित किया था, जब वे उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे।
युधिष्ठिर के ६ दार्शनिक प्रश्न
यह स्तोत्र धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा पूछे गए छह मूलभूत प्रश्नों—एकमेव देव, परम गति, सर्वश्रेष्ठ स्तुति, सर्वोत्कृष्ट धर्म और मोक्ष-साधन—का सर्वांगीण समाधान है।
१०८ श्लोकों का अनुष्टुप् छन्द
स्तोत्र का मुख्य भाग यथार्थतः १०८ अनुष्टुप् श्लोकों में निबद्ध है, जो जपमाला के १०८ मणियों और नक्षत्रों के १०८ चरणों का आध्यात्मिक प्रतीक है।
भाष्यकारों की सर्वसम्मत प्रतिष्ठा
आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य (अद्वैत) तथा पराशर भट्टर (विशिष्टाद्वैत) जैसे परस्पर विरोधी दर्शनों के आचार्यों ने भी इस स्तोत्र पर प्रामाणिक भाष्य लिखकर इसकी सार्वभौम महत्ता सिद्ध की।
एकश्लोकी विष्णु सहस्रनाम
मुद्रित संस्करणों में स्तोत्र के अन्त में एक श्लोक जुड़ा मिलता है, जिसमें शिव पार्वती से कहते हैं: 'श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे / सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने'—अर्थात् 'राम' नाम का तीन बार स्मरण सम्पूर्ण सहस्रनाम के तुल्य है। यह परम्परागत परिशिष्ट है, भीष्म के १०८ श्लोकों का अंग नहीं।
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एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
