पंचरंग क्षेत्रम्
पवित्र कावेरी तट पर स्थित भगवान विष्णु के पाँच दिव्य शयन क्षेत्र
पंचरंग क्षेत्रम् पवित्र कावेरी नदी के द्वीपों और पावन तटों पर स्थित पाँच दिव्य तीर्थों की एक अनुपम शृंखला है, जहाँ भगवान महाविष्णु शेषनाग की शैय्या पर अपनी दिव्य योगनिद्रा (अनंत शयन) में विराजमान हैं। इस पवित्र यात्रा का अनुष्ठान जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय कर मोक्ष, अगाध मानसिक शांति और आध्यात्मिक उत्कर्ष प्रदान करता है।
त्वरित मार्गदर्शिका (Quick Devotional Guide)
- •स्वरूप और महत्ता: 'पंचरंग क्षेत्रम्' पवित्र कावेरी नदी के पावन प्रवाह और उसके द्वीपों पर स्थित भगवान महाविष्णु के पाँच अत्यंत प्राचीन और दिव्य शयन-क्षेत्र हैं। यहाँ प्रभु आदिशेष नाग की शैय्या पर अपनी दिव्य योगनिद्रा (अनंत शयन) में विराजमान हैं।
- •दर्शन एवं जप का फल: इन पाँचों पावन रंगनाथ मंदिरों की यात्रा करने से जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का नाश होता है, चित्त को अपार शांति मिलती है, कुंडली के ग्रह-दोष शांत होते हैं और अंत में श्री वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।
- •उत्तम समय: तीर्थयात्रा के लिए सबसे अनुकूल समय अक्टूबर से मार्च का है। धनुर्मास (मार्गशीर्ष / मार्गऴि - मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी) में आयोजित 'वैकुंठ एकादशी' उत्सव यहाँ का परम आध्यात्मिक पर्व है।
- •भौगोलिक स्थिति: यह तीर्थमाला कर्नाटक (श्रीरंगपट्टण में आदि रंग, शिवनसमुद्र में मध्य रंग) और तमिलनाडु (कोविलाडी में कस्तूरी/अप्पकुडत्थान रंग, मयिलादुतुरै में वट रंग/परिमल रंगनाथ, तथा तिरुचिरापल्ली स्थित श्रीरंगम में अंत्य रंग) में विस्तृत है।
- •पूजा विधि और तीर्थ नियम:
- 1.परिक्रमा क्रम: आदि रंग (श्रीरंगपट्टण) से यात्रा आरंभ कर मध्य रंग (शिवनसमुद्र), अप्पकुडत्थान (कोविलाडी), वट रंग (मयिलादुतुरै) होते हुए अंत्य रंग (श्रीरंगम) में यात्रा का समापन करें।
- 2.पवित्र स्नान: कावेरी नदी में श्रद्धापूर्वक स्नान कर 'गङ्गे च यमुने चैव...' मंत्र का जप करें।
- 3.वेशभूषा: पारंपरिक वैदिक वेशभूषा—पुरुषों के लिए धोती व उत्तरीय, महिलाओं के लिए साड़ी अथवा मर्यादित भारतीय परिधान।
- 4.भोग एवं अर्पण: तुलसी दल, कमल पुष्प, अप्पम भोग (कोविलाडी में), शुद्ध गाय के घी के दीप और शर्करा पोंगल।
पौराणिक उद्भव एवं शास्त्रीय इतिहास
'ब्रह्मांड पुराण' तथा 'पद्म पुराण' के अनुसार, जब भगवती कावेरी महर्षि अगस्त्य के कमंडलु से प्रकट होकर भूतल पर प्रवाहित हुईं, तब उन्होंने भगवान महाविष्णु की घोर तपस्या की। कावेरी माता ने वरदान माँगा: "हे जगदीश्वर! मेरा जल गंगा के समान ही पावन हो और आपका नित्य सान्निध्य मेरे तटों को प्राप्त हो।" भगवान नारायण ने उनकी इस निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर कावेरी को अपनी दिव्य सहचरी का मान दिया और उसके प्रवाह मार्ग में पाँच विभिन्न स्थानों पर शेषशायी रूप में स्थित होने का वरदान दिया।
इन पाँचों क्षेत्रों में भगवान की विविध लीलाएं प्रतिष्ठित हैं। आदि रंग में महर्षि गौतम और राजा मुचुकुंद ने भगवान के दर्शन किए। मध्य रंग में भगवान ने देवताओं को ज्ञान और विजय का आशीर्वाद दिया। कोविलाडी (अप्पकुडत्थान) में राजा उपमन्यु को दुर्वासा मुनि के शाप से मुक्ति दिलाने के लिए प्रभु ने उनके हाथ से मीठे 'अप्पम' से भरे पात्र को स्वीकार किया।
मयिलादुतुरै (परिमल रंगनाथ) में भगवान ने चंद्र देव तथा चारों वेदों को उनके खोए हुए दिव्य सुगंध और तेज को पुनः प्रदान किया। अंत में श्रीरंगम (अंत्य रंग) में स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा पूजित और इक्ष्वाकु वंश के राजाओं द्वारा संपूजित 'प्रणवाकार विमान' भगवान श्री राम द्वारा विभीषण को उपहार स्वरूप दिया गया, जो लंका जाते समय कावेरी के इस पावन द्वीप पर चिरकाल के लिए स्थापित हो गया और 'भूलोक वैकुंठ' कहलाया।
पंचरंग तीर्थ विवरण तालिका
संत परंपरा एवं ऐतिहासिक धरोहर
पंचरंग क्षेत्रों की पावन भूमि १२ वैष्णव आळ्वार संतों की दिव्य स्तुतियों (नालयिर दिव्य प्रबंधम) से गुंजायमान रही है। तिरुमंगै आळ्वार, नम्माळ्वार और कुलशेखर आळ्वार ने कावेरी तट पर लेटे प्रभु रंगनाथ के अनुपम सौंदर्य का गान किया है।
११वीं-१२वीं शताब्दी में विशिष्टाद्वैत वेदांत के प्रवर्तक जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य ने श्रीरंगम को अपना प्रधान केंद्र बनाकर यहाँ की पंचरात्र पूजा पद्धति को व्यवस्थित किया। संत वेदांत देशिक, मणवाल मामुनिगल, और कर्नाटक संगीत के पितामह संत पुरंदर दास ने यहाँ प्रभु के चरणों में अमर पदों की रचना की। गंग, होयसल, चोल, पांड्य, विजयनगर साम्राज्य तथा मैसूर के वोडेयार राजाओं ने इन मंदिरों के गगनचुंबी गोपुरमों और भव्य नक्काशीदार मंडपों का निर्माण व जीर्णोद्धार कराया।
पावन श्लोक एवं ध्यान
पंचरंग यात्रा के समय भक्त भगवान रंगनाथ के इस कल्याणकारी श्लोक का स्मरण करते हैं:
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
भावार्थ: "जिनका स्वरूप परम शांत है, जो शेषनाग की शैय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के भी ईश हैं, जो संपूर्ण विश्व के आधार हैं, आकाश के समान सर्वव्यापी हैं, मेघ के समान जिनका श्यामल वर्ण है, जिनके सभी अंग मंगलमय हैं, जो माता लक्ष्मी के प्रियकांत हैं, जिनके नेत्र कमल के समान हैं, योगीजन ध्यान द्वारा जिन्हें प्राप्त करते हैं, जो संसार के समस्त भयों का नाश करने वाले हैं—उन सर्वलोकेश्वर भगवान श्री विष्णु की मैं वंदना करता हूँ।"
क्या आप जानते हैं?
श्रीरंगम (अंत्य रंग) का मंदिर परिसर 156 एकड़ में फैला हुआ है और इसमें 21 भव्य गोपुरम हैं, जो इसे विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय हिंदू मंदिर परिसर बनाता है।
कोविलाडी के अप्पकुडत्थान मंदिर में सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार प्रतिदिन रात्रि की अंतिम शयन आरती में भगवान को शुद्ध घी में बने गरमा-गरम मीठे 'अप्पम' का भोग लगाया जाता है।
कावेरी नदी द्वारा निर्मित तीनों द्वीप—श्रीरंगपट्टण (आदि रंग), शिवनसमुद्र (मध्य रंग) और श्रीरंगम (अंत्य रंग)—कावेरी के दो धाराओं में बंटने और पुनः मिलने से बने हैं, जो ओंकार (ॐ) की प्राकृतिक आकृति का निर्माण करते हैं।
धार्मिक मान्यता है कि तुला मास (कार्तिक) में साक्षात गंगा माता भी अपने संचित पापों को धोने और कावेरी के पावन जल में विलीन होने मयिलादुतुरै (वट रंग) पधारती हैं, जिसे 'तुला स्नान' कहा जाता है।
विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रणेता जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य का पावन पार्थिव शरीर (कलेवर) लगभग 1,000 वर्षों से श्रीरंगम मंदिर के भीतर पद्मासन मुद्रा में चंदन, कपूर और केसर के लेप से सुरक्षित रखा गया है।
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संबंधित शिक्षाएं
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