नवतुरुपति
भगवान विष्णु के नौ पावन नवग्रह दिव्य देशम
तमिलनाडु में पावन ताम्रपर्णी नदी के सुरम्य तटों पर स्थित नव तिरुपति, भगवान महाविष्णु के नौ परम पावन दिव्य देशम मंदिरों का समूह है, जिनमें से प्रत्येक एक नवग्रह की दिव्य ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। श्रद्धालु अपने नवग्रह दोषों के निवारण, मोक्ष प्राप्ति और अगाध भक्ति के लिए इस पवित्र परिक्रमा को करते हैं, जिसका स्तवन नम्मालवार ने नालायिर दिव्य प्रबन्धम में किया है।
त्वरित आध्यात्मिक मार्गदर्शिका
- •यह क्या है: दक्षिण तमिलनाडु में पवित्र ताम्रपर्णी नदी के कछार में स्थित नौ परम पावन वैष्णव दिव्य देशम मंदिरों की एक दिव्य तीर्थ श्रृंखला। इस पावन भूगोल में, भगवान महाविष्णु नवग्रहों के अधिष्ठाता देव के रूप में विराजते हैं, जो प्रपत्ति नामक शरणागति के माध्यम से सभी ग्रह बाधाओं का निवारण करते हैं।
- •दर्शन एवं जप का फल: इस परिक्रमा को करने से गंभीर नवग्रह दोष, पितृ ऋण और प्रारब्ध कर्मों के दुष्प्रभाव शांत होते हैं, तथा भगवान लक्ष्मीनारायण की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- •यात्रा का उत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक का समय सुखद और भक्तिमय रहता है। सबसे पावन अवसर वैकासी विशाखम है, जो मई या जून में पड़ता है, जब सभी नौ मंदिरों के उत्सव विग्रह गरुड़ वाहन पर आरूढ़ होकर आलवारतिरुनागरी में संत नम्मालवार के समक्ष एकत्र होते हैं।
- •स्थान: तूतुकुड़ी एवं तिरुनेलवेली जिले, तमिलनाडु, भारत, पवित्र ताम्रपर्णी नदी के तट पर। निकटतम केंद्र तिरुनेलवेली रेलवे जंक्शन तथा मदुरै एवं तूतीकोरिन के हवाई अड्डे हैं।
- •विधि एवं नियम:
- •परिक्रमा क्रम: परंपरा अनुसार यात्रा का शुभारंभ श्रीवैकुंठम, जो सूर्य क्षेत्र है, से होकर समापन आलवारतिरुनागरी, जो गुरु क्षेत्र है, में होता है।
- •वेशभूषा: पारंपरिक हिंदू पोशाक अनिवार्य है। पुरुषों के लिए धोती या वेष्टि, जिसमें ऊपरी भाग खुला रहता है या उत्तरीय से ढका होता है, तथा महिलाओं के लिए साड़ी, पावड़ा अथवा सादगीपूर्ण सलवार-कमीज।
- •पवित्र स्नान: परिक्रमा आरंभ करने से पूर्व ताम्रपर्णी नदी में पवित्र स्नान करें।
- •अर्पण सामग्री: तुलसी माला, शुद्ध घी का दीप, और प्रत्येक मंदिर में विष्णु सहस्रनाम एवं नम्मालवार के तिरुवाय्मोऴि का पाठ।
पावन उद्गम एवं पौराणिक / शास्त्रीय परंपरा
नव तिरुपति का इतिहास पुराणों और श्रीवैष्णव संप्रदाय की स्वर्णिम परंपरा में रचा-बसा है। जब नवग्रहों को अपने ब्रह्मांडीय दायित्वों के निर्वहन के दौरान विभिन्न शापों और कर्म बंधनों का सामना करना पड़ा, तब उन्होंने महर्षि अगस्त्य के कमंडल से प्रकट हुई दक्षिण की गंगा, पावन ताम्रपर्णी नदी के तट पर घोर तपस्या की। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान महाविष्णु ने प्रत्येक ग्रह के समक्ष अपने विभिन्न विग्रह रूपों में दर्शन दिए — खड़े रूप में निन्द्र, बैठे रूप में इरुन्ध, तथा शयन मुद्रा में किडन्ध — और वरदान दिया कि वे स्वयं इन ग्रहों के प्रभाव को नियंत्रित कर भक्तों को अभय प्रदान करेंगे।
सामान्य नवग्रह मंदिरों के विपरीत जहाँ ग्रहों की स्वतंत्र पूजा होती है, नव तिरुपति में स्वयं पूर्णब्रह्म भगवान नारायण ही नवग्रहों के स्वामियों के रूप में पूजित हैं। अतः श्रीवैकुंठम में श्री वैकुंठनाथन के दर्शन से इस प्रकार प्राप्त होने वाली शांति सीधे सूर्य ग्रह को शांत करती है, तो आलवारतिरुनागरी में श्री आदिनाथ के सम्मुख नतमस्तक होने से देवगुरु बृहस्पति की कृपा प्राप्त होती है। यह तीर्थयात्रा अनन्य वैष्णव भक्ति को खंडित किए बिना संपूर्ण ग्रहदोषों का समूल नाश करती है।
इस पावन मंदिर समूह को बारह आलवार संतों में शिरोमणि संत नम्मालवार द्वारा गाए गए नालायिर दिव्य प्रबन्धम के दिव्य पासुरों में सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त है। मान्यता है कि नम्मालवार ने आलवारतिरुनागरी के पवित्र इमली वृक्ष (तिरुप्पुळि आलवार) के कोटर में सोलह वर्षों तक समाधिस्थ रहकर एक ही स्थान से इन सभी नौ विग्रहों के साक्षात दर्शन किए थे।
पावन मंदिर एवं तीर्थ स्थल
संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा
नव तिरुपति का आध्यात्मिक वैभव श्रीवैष्णव संप्रदाय के आचार्यों से अभिन्न है। आलवारों के मुकुटमणि संत नम्मालवार ने इसी पुण्य भूमि पर बैठकर तिरुवाय्मोऴि जैसे अमर वेदान्त ग्रंथों की रचना की। कालान्तर में आचार्य श्रीमन् नाथमौलि (नाथमुनि) ने आलवारतिरुनागरी में योग समाधि के बल पर संत नम्मालवार से विलुप्त हो चुके चार सहस्त्र दिव्य पासुरों (नालायिर दिव्य प्रबन्धम) को पुनः प्राप्त कर वैष्णव धर्म का पुनरुद्धार किया।
जगद्गुरु स्वामी रामानुजाचार्य, मणवाल मामुनिगल और पिल्लै लोकाचार्य जैसे महान आचार्यों ने इन सभी नौ मंदिरों की पावन पदयात्रा की और वैखानस तथा पांचरात्र आगमों के अनुसार नित्य सेवा-पूजा की मर्यादाएं स्थापित कीं। मंदिर के शिलापट्टों पर उत्कीर्ण चोल, पांड्य और विजयनगर साम्राज्य के अभिलेख यह प्रमाणित करते हैं कि राजाओं ने इन पावन धामों के गोपुरमों, मण्डपों और सेवा-कार्यों के लिए विपुल भूमि और स्वर्ण दान दिया था।
पावन श्लोक एवं ध्यान
भगवान नारायण के नवग्रह-अधिष्ठाता स्वरूप का ध्यान करते हुए इस पावन श्लोक का नित्य पाठ करना चाहिए:
नमोऽस्तु ते विष्णवे सर्वलोकाधिपाय च।
नवग्रहस्वरूपाय सर्वदोषहराय च॥
अनाथबन्धवे तुभ्यं श्रीनिवास नमो नमः।
भावार्थ: "समस्त लोकों के स्वामी, नवग्रहों के मूल अधिष्ठाता और भक्तों के समस्त ग्रह-दोषों को हरने वाले भगवान श्रीविष्णु को हमारा बारंबार नमस्कार है। हे अनाथों के परम सखा, हे माता लक्ष्मी के निवास-स्थान प्रभु श्रीनिवास, आपके श्रीचरणों में पुनः-पुनः वंदन है।"
क्या आप जानते हैं?
आलवारतिरुनागरी मंदिर में स्थित पावन इमली का वृक्ष (तिरुप्पुळि आलवार) सहस्रों वर्ष प्राचीन है; इसके पत्ते रात्रि में कभी बंद नहीं होते, इसलिए इसे उरंगा पुळि (अनिद्रा वृक्ष) कहा जाता है।
प्रतिवर्ष वैकासी विशाखम ब्रह्मोत्सव के दौरान, सभी नौ नव तिरुपति मंदिरों के उत्सव विग्रह अपने-अपने गरुड़ वाहनों पर आरूढ़ होकर संत नम्मालवार को दर्शन देने आलवारतिरुनागरी पहुँचते हैं।
श्रीवैकुंठम मंदिर का गर्भगृह इस खगोलीय दक्षता से निर्मित है कि वर्ष में दो बार (चित्तिरै और ऐप्पसी मास में) उदित होते सूर्य की पहली किरणें सीधे भगवान वैकुंठनाथन के श्रीचरणों को स्पर्श करती हैं।
तिरुक्कोलूर में भगवान वैथमानिधि पेरुमाल अपने सिर के नीचे अनाज नापने वाले पारंपरिक पात्र (मरक्काल) को तकिए के रूप में रखकर शयन करते हैं, जो कुबेर को उनकी नव निधियां लौटाए जाने का प्रतीक है।
पारंपरिक नवग्रह मंदिरों के विपरीत जहाँ ग्रहों की स्वतंत्र वेदियां होती हैं, नव तिरुपति में केवल भगवान नारायण की शरणागति (प्रपत्ति) से ही समस्त नवग्रह दोषों की पूर्ण शांति हो जाती है।
