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आच्युतश्तकम् ब्य् ष्रिधरवेन्कतेश

आच्युतश्तकम् ब्य् ष्रिधरवेन्कतेश

यह आठ श्लोकों का एक स्तोत्र है जिसे श्रीधर वेंकटेश ने लिखा है। इसमें भगवान के नाम की शक्ति का वर्णन है, जो पापों को नष्ट करती है और संकट में सहायता करती है।

श्लोक

अभिलपननिसर्गादच्युताख्ये भजे त्वां हरसि मदघवृन्दं त्वद्भुबुक्षावशात् त्वम् अघहृदिति तवांब प्रत्युत ख्यातिदोऽहं त्वयि मम वद का वा संगतिर्दैन्यवाचाम्
Abhilapana-nisargad-achyutakhye bhaje tvam Harasi madagha-vrindam tvad-bhubuksha-vashat tvam Aghahrid-iti tavamba pratyuta khyatido-ham Tvayi mama vada ka va sangatir-danya-vacham

श्लोक 1

चिरातीता सान्दीपनितनुभुवः कालभवनप्रपत्तिस्तं पित्रोः पुनरगमयत् सन्निधिमिति यशः कृष्णस्येदं कथमहह न त्वां रसनया यदि श्रीकृष्णाख्ये भजति स तादनीं मुनिसुतः
Chiratita sandipani-tanubhuvah kala-bhavana- Prapattis-tam pitroh punar-agamayat sannidhim-iti Yashah krishnasyedam katham-ahaha na tvam rasanaya Yadi shri-krishnakhye bhajati sa tadanim muni-sutah

श्लोक 2

हरेर्यच्चोरत्वं यदपि च तथा जारचरितं तदेतत् सर्वांहस्ततिकृते संकथनतः इतीदं माहात्म्यं मधुमथन ते दीपितमिदं वदन्त्याः कृष्णाख्ये तवहि विचरन्त्या विलसितम्
Harer-yach-choratvam yad-api cha tatha jara-charitam Tad-etat sarvamhas-tati-krite sankathanatah Itidam mahatmyam madhumathana te dipitam-idam Vadantyah krishnakhye tava hi vicharantya vilasitam

श्लोक 3

सभायां द्रौपत्याऽंशुकसृतिभिया तद्रसनया धृता तस्याश्चेलं प्रतनु तदवस्थं विदधती व्यतानीश्शैलाभं वसनविसरं चांब हरतामियान् गोविन्दाख्ये वद वसनराशिस्तव कुतः
Sabhayam draupatyam-shuka-sriti-bhiya tad-rasanaya Dhrita tasyash-chelam pratanu tad-avastham vidadhati Vyatanish-shailabham vasana-visaram chamba haratam Iyan govindakhye vada vasana-rashis-tava kutah

श्लोक 4

अधिरसनमयि त्वामच्युताख्ये दधानं वनजभवमुखानां वन्द्यमाहुर्महान्तः सतु विनमति मातश्चाश्वगोश्वादनादीन् भवति ननु विचित्रा पद्धतिस्तावकानाम्
Adhi-rasanam-ayi tvam-achyutakhye dadhanam Vanaja-bhava-mukhanaam vandyam-ahur-mahantah Sa tu vinamati matash-chashva-goshvadana-deen Bhavati nanu vichitra paddhatis-tavakanam

श्लोक 5

जननि मुरभिदाख्ये जाह्नवीनिम्नगैका समजनि पदपद्माच्चक्रिणस्त्वाश्रितानाम् परिणमति समस्ताः पादवार्घिन्दुरेको जगति ननु तटिन्यो जाह्नवीसह्यजाद्याः
Janani murabhidakhye jahnavi-nimnagaika Samajani pada-padmach-chakrinas-tvashritanam Parinamati samastah padavar-ghindur-eko Jagati nanu tatinhyo jahnavi-sahya-jadyah

श्लोक 6

समवहितमपश्यन् सन्निधौ वैनतेयं प्रसभविधुतपद्मापाणिरीशोऽच्युताख्ये समवितुमुपनीतः सागजेन्द्रं त्वया द्राक् वद जननि विना त्वां केन वा किं तदाभूत्
Samavahitam-apashyan sannidhau vainateyam Prasabha-vidhuta-padma-panir-isho-chyutakhye Samavitum-upanitah sagajendram tvaya drak Vada janani vina tvam kena va kim tadabhut

श्लोक 7

यदेष स्तौमि त्वां त्रियुगचरणत्रायिणि ततो महिम्नः का हानिस्तवतु मम संपन्निरवधिः शुना लीलाकामं भवति सुरसिन्धुर्भगवती तदेषा किंभूता सतु सपदि सन्तापभरितः
Yad-esha staumi tvam triyuga-charana-trayini tato Mahimnah ka hanis-tavatu mama sampan-niravadhih Shuna leela-kamam bhavati sura-sindhur-bhagavati Tadesha kim-bhuta sa tu sapadi santapa-bharitah

श्लोक 8

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति

पृष्ठभूमि

यह स्तोत्र हिंदू परंपरा के स्तोत्र साहित्य का एक भाग है, जिसमें ईश्वर के नाम की महिमा का वर्णन है। इसे पारंपरिक रूप से श्रीधर वेंकटेश द्वारा रचित माना जाता है, जो शिव के भक्त थे लेकिन विष्णु के प्रति भी श्रद्धा रखते थे। इस स्तोत्र का प्रयोग अक्सर दैनिक प्रार्थना के रूप में या विशेष अवसरों पर भगवान की सुरक्षा पाने के लिए किया जाता है। इसमें द्रौपदी के चीरहरण और गजेंद्र के उद्धार की कहानियों का उल्लेख है, जो भगवान के नाम की शक्ति को दर्शाती हैं।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Shridhara Venkatesha Ayyaval

क्या आप जानते हैं?

लेखक

श्रीधर वेंकटेश आर्य शिवभक्त थे, लेकिन विष्णु के प्रति उनका प्रेम अटूट था। उन्होंने 'अच्युत अष्टकम्' की रचना इस विश्वास से की कि कलियुग में भगवान के नाम का जप ही सबसे सशक्त साधन है।

रचना की विशेषता

यह आठ श्लोकों का स्तोत्र है, जिसमें सीधे भगवान को नहीं, बल्कि उनके 'अच्युत' नाम को संबोधित किया गया है। कवि का मानना है कि नाम में स्वयं भगवान के समान शक्ति है।

पहले श्लोक का संदेश

कवि कहते हैं कि 'अच्युत' नाम के उच्चारण से समस्त पापों का नाश हो जाता है। भगवान का नाम ही पापों को हरने वाला है।

द्रौपदी का उद्धार

चौथे श्लोक में द्रौपदी की कथा आती है। जब वह सभा में निर्वस्त्र की जा रही थीं, तो उन्होंने भगवान का नाम पुकारा। उसी क्षण उनके शरीर पर अंतहीन वस्त्रों का भंडार प्रकट हुआ।

गजेन्द्र का उद्धार

सातवें श्लोक में हाथी गजेन्द्र की कहानी है, जो मगरमच्छ से संघर्ष करते-करते थक गया था। उसने भगवान का नाम पुकारा, जिसके बाद भगवान तुरंत उसे बचाने आए।

नाम की महिमा

कवि के अनुसार, भगवान का नाम ही सबसे बड़ा आश्रय है। यह नाम उनके भक्तों को हर संकट से तुरंत उबारता है, जैसा कि द्रौपदी और गजेन्द्र की कहानियों से सिद्ध हुआ।

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