आच्युतशतकम्
यह एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है जिसकी रचना श्री वेदान्तदेशिक ने की है। इसमें भगवान अच्युत (विष्णु) को सत्य और शरण के रूप में वर्णित किया गया है, तथा उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए विनम्र भाव से प्रार्थना की गई है।
श्लोक
वेदान्तदेशिक द्वारा रचित। तीस देवताओं के स्वामी, अपने सेवकों के लिए सत्य (विश्वसनीय), अच्युत, स्थिर ज्योति, गरुड़ नदी के तट पर तमाल वृक्ष के समान और अहिन्द्रनगर के औषधि पर्वत पर अद्वितीय गजराज भगवान को नमस्कार करें।
श्लोक 1
हे अपने सेवकों के प्रति सत्य रहने वाले भगवान! स्वयंभू ब्रह्मा की पत्नी (सरस्वती) की विलासपूर्ण वाणी स्वरूप यह स्तुति मुझ बालक द्वारा पिंजरे के तोते की बोली की तरह गाई गई है; इसे स्वीकार कर मुझ पर कृपा करें।
श्लोक 2
हे सेवकों के लिए सत्य स्वरूप भगवान! मेरी मलिन (अशुद्ध) वाणी भी आपकी कीर्ति रूपी चंद्रमा के प्रकाश में आकर उसी प्रकार पवित्र हो जाए, जैसे सामान्य जल गंगा के प्रवाह में मिलकर शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 3
हे देवराज! पूजनीय वेदों के मध्य स्थापित मेरी यह अज्ञानी अथवा बालसुलभ स्तुति, नियमपूर्वक आपकी सभा में सुशोभित हो।
श्लोक 4
हे अच्युत! हमारे गुरुओं की जिह्वारूपी सिंहासन पर विराजमान होकर परम सत्य का प्रतिपादन करते हुए आप हमारी अज्ञानता को दूर करते हैं।
श्लोक 5
हे अच्युत! गंगा की तरंगों पर पूर्ण चंद्रमा की भांति गुरुओं के हृदय में आप स्पष्ट रूप से चमकते हैं। परंतु राग और द्वेष से कलुषित मन में आप एक क्षण भी नहीं ठहरते, जैसे हंस गंदे जल में नहीं रहता।
श्लोक 6
हे शरण में आए हुए लोगों के लिए सत्य स्वरूप भगवान! यद्यपि आप केवल शास्त्रों द्वारा ही जाने जाते हैं, फिर भी गोपियों के समक्ष आपकी महिमा स्पष्ट रूप से प्रकट हुई। आप श्रद्धालु हृदय के लिए सुलभ हैं, परंतु दुविधा में पड़े लोगों से दूर रहते हैं।
श्लोक 7
हे शरणागतों के लिए सत्य स्वरूप भगवान! समस्त दोषों से मुक्त, सत्य-ज्ञान-आनंद स्वरूप और तीनों प्रकार की सीमाओं (देश, काल और वस्तु) से परे आपकी महिमा का गान सैकड़ों उपनिषद करते हैं।
श्लोक 8
हे अहिन्द्रनगर के स्वामी, निष्पाप ज्योति से दैदीप्यमान भगवान! आप समस्त कार्य करते हैं परंतु किसी के द्वारा रचित नहीं हैं; आप सभी को स्थापित करते हैं परंतु किसी के द्वारा स्थापित नहीं हैं; आप सभी का संहार करते हैं परंतु कभी संहृत नहीं होते।
श्लोक 9
हे अच्युत! अणु से भी सूक्ष्म होते हुए भी संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करने की आपकी शक्ति असीम है। इसीलिए आप प्रत्येक वस्तु में व्याप्त और सर्वत्र निर्वाध रूप से स्थित सुने जाते हैं।
श्लोक 10
हे अच्युत! सब कुछ धारण, नियंत्रित और स्वामित्व करने के नियम में स्थित आप सभी का शरीर (सर्वतनु) हैं। कार्य और कारण के विविध रूप में स्वयं को प्रकट करने वाले आप ही सर्वस्व हैं, ऐसा वेदों में सुना जाता है।
श्लोक 11
हे अद्भुत शक्ति वाले अच्युत! पुरुष (जीवात्मा) और प्रकृति को अपना शरीर बनाकर आप इस जगत का उपादान कारण बनते हैं। और अपने ही संकल्प से आप इसके निमित्त कारण भी बनते हैं।
श्लोक 12
हे अच्युत! विभिन्न गुणों वाले बीजों की वृद्धि के लिए जल जैसे सामान्य कारण है, वैसे ही सृष्टि के लिए आपकी लीला सामान्य कारण है। ब्रह्मा से लेकर स्थावर (अचल) तक के जीवों की भिन्नताएं उनके अपने कर्मों द्वारा निर्धारित होती हैं।
श्लोक 13
हे अच्युत! संपूर्ण पुरुष वर्ग आपकी विभूति है और संपूर्ण स्त्री वर्ग लक्ष्मी जी का स्वरूप है। आप दोनों से श्रेष्ठ कोई नहीं है। जब लक्ष्मी स्वयं आपकी हैं तो दूसरों की क्या बात करना!
श्लोक 14
हे नाथ! वास्तव में आपके समान या आपसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। आप ही संपूर्ण लोकों के शरणदाता हैं। यही ज्ञान का सार है। इसे समझने के बाद देवराज (भगवान) के अलावा अन्य देवताओं की चिंता व्यर्थ है।
श्लोक 15
हे फणीन्द्रपुर के स्वामी (भगवान देवनाथ)! आपकी आज्ञा ब्रह्मा आदि प्रमुख देवताओं के लिए भी अनुल्लंघनीय प्रभाव वाली है। आपकी रक्षा पाने वालों में इसका फल स्पष्ट और प्रचुर मात्रा में प्रकट होता है।
श्लोक 16
हे दाससत्य (भक्तवत्सल)! सभी नियमों और विधियों का पालन आप ही को उद्देश्य बनाकर किया जाता है। श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मणों के ध्यान द्वारा सिद्ध भोजन देवता आपके ही माध्यम से प्राप्त करते हैं।
श्लोक 17
हे अच्युत! यदि आप इस प्रकार पूजित होकर स्वर्गलोक में सदैव विराजमान न रहें, तो विभिन्न कल्पों में किए गए कर्मों का फल कौन प्रदान करेगा?
श्लोक 18
हे नतसत्य (शरण में आए लोगों के लिए सत्य स्वरूप)! स्वर्णमयी लता स्वरूपा श्रीलक्ष्मी जी के साथ रहकर आप कल्पवृक्ष की भांति सभी मनोवांछित फल प्रदान करते हैं, और अपनी शीतल छाया से तीनों लोकों के तीनों प्रकार के तापों को नष्ट करते हैं।
श्लोक 19
हे नतसत्य! आप ही समस्त आगमों (शास्त्रों) के परम लक्ष्य, सभी देवताओं के अंतरात्मा, संपूर्ण फलों के दाता और समस्त मानव जाति के लिए निश्चय ही समभाव रखने वाले हैं।
श्लोक 20
इस प्रकार सभी के लिए सम, सत्य में प्रतिष्ठित और सदैव परिपूर्ण रहने वाले हे दाससत्य...
श्लोक 21
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह स्तोत्र श्री वैष्णव परंपरा का एक महत्वपूर्ण भक्ति ग्रंथ है, जिसकी रचना तेरहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध आचार्य श्री वेदान्तदेशिक ने की थी। पारंपरिक रूप से भक्तजन भगवान विष्णु की स्तुति और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इसका पाठ करते हैं। इसमें भक्ति, ज्ञान और दार्शनिक गहराई का समन्वय है।
क्या आप जानते हैं?
रचयिता
यह स्तोत्र तेरहवीं शताब्दी के महान वैष्णव आचार्य एवं कवि श्री वेदान्तदेशिक (1268-1369) द्वारा रचित 'अच्युतशतकम्' है। पूरा ग्रंथ सौ श्लोकों का है और यहाँ प्रारंभिक 20 श्लोक दिए गए हैं।
स्थानिक संदर्भ
प्रथम श्लोक में 'गरुडनदीतटतमालं' और 'अहीन्द्रनगर' का उल्लेख है, जो तमिलनाडु के तिरुवहींद्रपुरम (देवनाथ मंदिर) की ओर संकेत करता है, जहाँ भगवान देवनाथ (अच्युत) विराजमान हैं।
स्तोत्र का स्वरूप
इसमें भगवान अच्युत (जो कभी नष्ट नहीं होते) की स्तुति की गई है। उन्हें सृष्टि का कारण, सबके अंतर्यामी, और भक्तों के प्रति सत्यनिष्ठ ('नतसत्य', 'दाससत्य') बताया गया है।
दार्शनिक गहराई
बारहवें श्लोक में कहा गया है कि भगवान उपादान कारण (material cause) और निमित्त कारण (efficient cause) दोनों हैं; यह श्री वैष्णव वेदांत का मूल सिद्धांत है।
पाठ और लोकप्रियता
यह स्तोत्र श्री वैष्णवों में अत्यधिक प्रिय है और प्रायः नियमित रूप से पाठ किया जाता है। प्रत्येक श्लोक में भाव और काव्य का सुंदर समन्वय है।
Vishnu
हिन्दू धर्म से और
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एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
