ब्रह्ममॊक्कटे (परब्रह्म एक ही है)
१५वीं शताब्दी के महान तेलुगु संत-कवि ताल्लपाक अन्नमाचार्य द्वारा रचित अमर संकीर्तन, जो समस्त प्राणियों में भगवान श्रीहरि की अंतर्यामी उपस्थिति और सामाजिक समानता का उद्घोष करता है।
श्लोक
तंदनाना! जय हो इस सत्य की! परब्रह्म एक ही है, वही सर्वोच्च परमात्मा समस्त सृष्टि में केवल एक ही है!
श्लोक 1
इस प्रभु के विधान में ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं है। समस्त प्राणियों के भीतर श्रीहरि ही अंतरात्मा बनकर विराजमान हैं। समस्त जीव-जगत एक समान है, क्योंकि सबके भीतर वही एक प्रभु वास करते हैं।
श्लोक 2
राजा जिस गहरी नींद में सोता है, वह नींद और पास के सेवक की नींद एक ही जैसी होती है। उच्च कुलीन ब्राह्मण जिस धरती पर पैर रखता है, वंचित व्यक्ति भी उसी धरती पर निवास करता है।
श्लोक 3
श्रेष्ठ देवताओं को मिलने वाला सुख और पशुओं व सूक्ष्म कीटों को मिलने वाला सुख मूलतः एक जैसा है। दिन और रात का चक्र जितना धनवान के लिए बीतता है, उतना ही निर्धन के लिए भी बीतता है।
श्लोक 4
स्वादिष्ट और उत्तम पकवान खाने वाले की भूख भी वही है, जो रूखा-सूखा भोजन करने वाले की भूख होती है। दुर्गंध के ऊपर से बहने वाली हवा भी वही है, जो सुगंधित फूलों के ऊपर से बहती है।
श्लोक 5
विशाल हाथी पर चमकने वाली धूप और गली के श्वान पर पड़ने वाली धूप एक ही है। परम पुण्यात्माओं की रक्षा करने और पापियों का उद्धार करने के लिए श्रीवेकंटेश्वर का पावन नाम ही एक सहारा है!
श्लोक 6
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
फलश्रुतिनित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
राग बौळी में निबद्ध 'ब्रह्ममॊक्कटे' तिरुमला के आराध्य भगवान वेंकटेश्वर के परम भक्त ताल्लपाक अन्नमाचार्य (१४०८-१५०३ ई.) की अत्यंत प्रसिद्ध दार्शनिक रचना है। मध्यकाल में जब समाज वर्ण-व्यवस्था से बँटा हुआ था, तब अन्नमय्या ने निडरता से उद्घोष किया कि भूख, नींद, धूप और वायु राजा और सेवक, विद्वान और वंचित सभी के लिए एक समान हैं। समस्त सृष्टि का अंतरात्मा केवल एक परब्रह्म श्रीहरि ही है। इस पल्लवी की समदृष्टि भगवद्गीता (5.18) की उस दृष्टि से मेल खाती है, जिसमें ज्ञानी ब्राह्मण और चांडाल को ज्ञानी समान देखता है। अन्नमय्या के संकीर्तन तिरुमला में ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण किए गए थे, और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् ने उन्हें 1998 में 'ताल्लपाक पद साहित्यम्' के रूप में प्रकाशित किया।
इस पाठ के विषय में
विशिष्टाद्वैत (श्री वैष्णव सम्प्रदाय) से और
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रचयिता
१५वीं शताब्दी के महान तेलुगु संत ताल्लपाक अन्नमाचार्य, जिन्हें 'पद-कविता पितामह' कहा जाता है। उन्होंने तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर को ३२,००० से अधिक पद समर्पित किए।
समानता का संदेश
आधुनिक युग से सदियों पूर्व १४०० के दशक में अन्नमय्या ने सामाजिक भेदभाव का खंडन करते हुए कहा कि ईश्वर की दृष्टि में कोई छोटा या बड़ा नहीं है।
स्वाभाविक आवश्यकताओं का दृष्टांत
उन्होंने राजा और सेवक की नींद, भूख, पैरों तले की धरती और सूर्य की धूप का उदाहरण देकर समझाया कि प्रकृति सबके साथ एक समान व्यवहार करती है।
अंतर्यामी नारायण
गीत का मूल तत्व यह है कि ब्रह्मा से लेकर चींटी तक समस्त चराचर जगत में एक ही परमात्मा श्रीहरि अंतरात्मा के रूप में विद्यमान हैं।
शास्त्रीय संगीत में स्थान
प्रातःकालीन राग 'बौळी' में निबद्ध यह संकीर्तन भारत रत्न एम. एस. सुब्बालक्ष्मी के गायन से संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध हुआ।
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