वैष्णव जन तो (सच्चे वैष्णव के लक्षण)
१५वीं शताब्दी के महान गुजराती संत-कवि नरसिंह मेहता द्वारा रचित अमर भजन, जो महात्मा गांधी का नित्य प्रिय भजन और विश्वभर में करुणा, सत्य और परोपकार का वैश्विक गान बन गया।
श्लोक
सच्चा वैष्णव (ईश्वर-भक्त) केवल उसे ही कहिए जो दूसरों की पीड़ा और दुःख-दर्द को अपना समझता है; जो संकट में पड़े लोगों का उपकार करता है, फिर भी अपने मन में तनिक भी अहंकार नहीं आने देता।
श्लोक 1
जो समस्त संसार में सभी का आदर-सत्कार करता है और किसी की भी निंदा नहीं करता। जिसकी वाणी, कर्म और मन सदा पवित्र एवं स्थिर रहते हैं—धन्य है वह माता जिसने ऐसे पुत्र को जन्म दिया!
श्लोक 2
जिसकी दृष्टि समभाव से युक्त है, जिसने सांसारिक तृष्णा का त्याग कर दिया है और जो परस्त्री को अपनी माता समान मानता है। जिसकी जिह्वा कभी असत्य नहीं बोलती और जिसके हाथ कभी पराए धन को नहीं छूते।
श्लोक 3
जिसे मोह और माया छू भी नहीं पाते, जिसके अंतःकरण में सुदृढ़ वैराग्य बसता है; जिसका मन प्रभु के नाम-स्मरण में पूर्णतः लीन हो चुका है—संसार के समस्त पावन तीर्थ उसके अपने शरीर के भीतर ही वास करते हैं!
श्लोक 4
जो लोभ से रहित और छल-कपट से शून्य है, जिसने काम और क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली है—कवि नरसिंह कहते हैं कि ऐसे पवित्र आत्मा के दर्शन मात्र से ही कुल की इकहत्तर पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है!
श्लोक 5
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
फलश्रुतिनित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
गुजराती साहित्य के आदि-कवि संत नरसिंह मेहता (१४१४-१४८१ ई.) द्वारा रचित 'वैष्णव जन तो' भक्ति को कर्मकांड और तिलक-माला से मुक्त कर विशुद्ध मानवीय करुणा पर प्रतिष्ठित करता है। नरसिंह मेहता के अनुसार सच्चा ईश्वर-भक्त वही है जो दूसरों के दुःख-दर्द को अपना समझे (पीड़ पराई जाणे रे), उपकार करके भी मन में अहंकार न लाए, वाणी और कर्म में निष्कपट रहे तथा परधन व परस्त्री का त्याग करे। २०वीं सदी में महात्मा गांधी ने इसे अपने साबरमती आश्रम की नित्य प्रार्थना बनाकर सत्य और अहिंसा का वैश्विक प्रतीक बना दिया। सच्चे भक्त का यह चित्र भगवद्गीता (12.13–19) के प्रिय भक्त के लक्षणों—द्वेषरहित, दयालु और सुख-दुःख में समभाव—से मेल खाता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Narsinh Mehta
स्रोत: wisdomlib.org
विशिष्टाद्वैत (श्री वैष्णव सम्प्रदाय) से और
क्या आप जानते हैं?
गांधीजी की प्रिय प्रार्थना
यह पद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आध्यात्मिक संबल बना, जिसे बापू के साबरमती और सेवाग्राम आश्रमों में प्रतिदिन प्रातःकालीन प्रार्थना में गाया जाता था।
सच्चे भक्त की परिभाषा
नरसिंह मेहता ने तिलक, माला या संप्रदाय के बजाय मनुष्य के आचरण, सत्यवादिता, विनम्रता और परोपकार को सच्ची भक्ति का मानदंड माना।
पीड़ पराई जाणे रे
भजन की पहली पंक्ति 'जो दूसरों के दुःख-दर्द को अपना समझे' भारतीय संस्कृति में करुणा और संवेदना का अमर सूत्र बन गई।
तन में सकल तीर्थ
चौथे पद में कहा गया है कि जो लोभ-मोह से मुक्त होकर प्रभु के नाम में लीन रहता है, उसके पवित्र शरीर में ही संसार के सारे तीर्थ निवास करते हैं।
इकहत्तर पीढ़ियों का उद्धार
अंतिम पंक्ति में कवि कहते हैं कि ऐसे निष्कपट और पुण्यात्मा मनुष्य के केवल दर्शन मात्र से ही कुल की इकहत्तर पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है।
Vishnu
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