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कौन है वैष्णव?

भजनगौड़ीय वैष्णव सम्प्रदायश्री कृष्ण

कौन है वैष्णव?

यह एक भक्ति गीत है जिसमें पूछा गया है कि सच्चा वैष्णव कौन है, और भक्तिविनोद ठाकुर अपनी विनम्रता तथा श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण समर्पण को व्यक्त करते हैं।

श्लोक

के वैष्णव? हाॅय, हाॅय, ए कथा शेइबा कय़, संसारे छड़िया ताँर भाङ्गिला संशय
Ke Vaishnav? Hay, hay, e katha sheiba kay, Sansare chhadiya tanr bhangila sanshay.

श्लोक 1

कामे लोभे माते याइ, कामे हाड़ि चाण्डाल गाइ, प्रपञ्चे विलीन यार मन आमि वैष्णव-अभिमाने, डुविआछि ए संसारे, छाड़िते न पारि विषय-धन
Kame lobhe mate yai, kame hadi chandal gai, Prapanche vilin yar man. Ami Vaishnav-abhimane, dubiachi e sansare, Chhadite na pari vishay-dhan.

श्लोक 2

कृष्ण-पद-छाया-आशा, छोड़ि' विषय-अभिलाषा, भजे सदा श्री-कृष्ण-चरण ताँर दासे दासे हइ, एवे एइ वाञ्छा करइ, तृणाधम करह चरण
Krishna-pada-chhaya-asha, chhodi' vishay-abhilasha, Bhaje sada Shri-Krishna-charan. Tanr dase dase hai, eve ei vanchha karai, Trinadham karaha charan.

श्लोक 3

अभिमान शून्य हइ, बन्धुहीन, दीन हइ, सबे दया करह आमाय एवे एइ दीन-हीन, भकतिविनोद क्षीण, चरणे शरण माँगे भाय
Abhiman shunya hai, bandhuhin, din hai, Sabe daya karaha amay. Eve ei din-hin, Bhakativinod kshin, Charane sharan mange bhay.

श्लोक 4

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति

पृष्ठभूमि

यह गीत गौड़ीय वैष्णव परंपरा के महान संत भक्तिविनोद ठाकुर (1838–1914) द्वारा रचित है। इसे प्रायः व्यक्तिगत भजन या सामूहिक कीर्तन (भक्ति-गीत) के रूप में गाया जाता है। इसमें सच्चे वैष्णव के लक्षणों और भौतिक आसक्ति से मुक्ति पर बल दिया गया है। इसके अंतिम पद में 'भक्तिविनोद' की छाप मिलती है। तृणादपि सुनीचेन की इसकी शिक्षा चैतन्य महाप्रभु से जुड़े शिक्षाष्टक के तीसरे श्लोक की प्रतिध्वनि है। यह नरसिंह मेहता के गुजराती भजन 'वैष्णव जन तो' से भिन्न है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Bhaktivinoda Thakur

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क्या आप जानते हैं?

रचयिता

यह भजन श्री भक्तिविनोद ठाकुर (1838–1914) द्वारा रचित है, जो गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख आचार्य और भजन-रचयिता थे। उन्होंने सैकड़ों भजनों की रचना की, जिनमें से यह 'के वैष्णव?' शीर्षक से प्रसिद्ध है।

भजन का केंद्रीय प्रश्न

पहली पंक्ति 'के वैष्णव?' (वैष्णव कौन है?) से शुरू होती है। इसके उत्तर में बताया गया है कि सच्चा वैष्णव वह है जो कृष्ण के चरणों की छाया की आशा रखते हुए सांसारिक इच्छाओं को त्याग देता है और निरंतर भगवान का भजन करता है।

आत्म-निंदा और विनम्रता

भक्तिविनोद ठाकुर स्वयं को 'वैष्णव-अभिमानी' (वैष्णव होने का दंभ रखने वाला) कहते हैं, पर वास्तव में वे काम और लोभ में फँसे हैं। यह आत्म-निंदा गौड़ीय वैष्णव परंपरा की 'तृणादपि सुनीचेन' (घास से भी नीचे) की शिक्षा को दर्शाती है।

शरणागति का भाव

अंतिम पंक्ति में भक्तिविनोद ठाकुर स्वयं को 'दीन-हीन' और 'क्षीण' (दुर्बल) बताते हुए कृष्ण के चरणों में शरण माँगते हैं। यह पूर्ण समर्पण (शरणागति) का आदर्श उदाहरण है, जो वैष्णव भक्ति का मूल सिद्धांत है।

भाषा और शैली

यह भजन बांग्ला भाषा में लिखा गया है, जिसमें सरल और लयबद्ध पदावली है। इसमें संस्कृत और ब्रजभाषा के शब्द भी मिलते हैं, जो इसे पूर्वी भारत के भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाते हैं।

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