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Embroidered artwork for षड्गोस्वाम्यष्टकम्: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

षड्गोस्वाम्यष्टकम्

अष्टकम्गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदायश्री कृष्णराधा

षड्गोस्वाम्यष्टकम्

श्रीनिवास आचार्य द्वारा रचित आठ श्लोक, जो वृन्दावन के षड्गोस्वामियों की भक्ति और तपस्या की स्तुति करते हैं।

श्लोक

कृष्णोत्कीर्तनगाननर्तनपरौ प्रेमामृताम्भोनिधी धीराधीरजनप्रियौ प्रियकरौ निर्मत्सरौ पूजितौ श्रीचैतन्यकृपाभरैर्भुवि भुवि व्याकीर्तवन्तौ परं वन्दे रूपसनातनौ रघुपती श्रीजीवगोपालकौ
Krishnotkirtanagananartanaparau Premamritambhonidhi Dhiradhirajanapriyau Priyakarau Nirmatsarau Pujitau Shri Chaitanyakripabharair Bhuvi Bhuvi Vyaktikrivantau Param Vande Rupa-Sanatanau Raghupati Shri-Jiva-Gopalakau

श्लोक 1

नानाशास्त्रविचारणैकनिपुणौ सद्धर्मसंस्थापकौ लोकानां हितकारिणौ त्रिभुवने मान्यौ शरण्याकरौ राधाकृष्णपदारविन्दभजनानन्देन मत्तालिकौ वन्दे रूपसनातनौ रघुपती श्रीजीवगोपालकौ
Nana-Shastra-Vicharanaika-Nipunau Sad-Dharma-Samsthapaku Lokanam Hitakarinau Tribhuvane Manyau Sharanyakarau Radha-Krishna-Padaravinda-Bhajananandena Mattalikau Vande Rupa-Sanatanau Raghupati Shri-Jiva-Gopalakau

श्लोक 2

श्रीगौरागुरुपादपद्ममधुपौ श्रीचैतन्यभावप्रियौ संसाराम्बुधिमज्जनान्मुनिगणान् सद्यः समुत्तारकौ सद्गोपीगणभावलीनहृदयौ श्रीराधिकावल्लभौ वन्दे रूपसनातनौ रघुपती श्रीजीवगोपालकौ
Shri Gauragurupada-Padma-Madhupau Shri-Chaitanya-Bhavapriyau Samsarambhudhi-Majjanam Muni-Ganan Sadyah Samuttarakau Sad-Gopi-Gana-Bhava-Lina-Hridayau Shri-Radhikavallabhau Vande Rupa-Sanatanau Raghupati Shri-Jiva-Gopalakau

श्लोक 3

त्यक्त्वा तूर्णं मशेषमण्डलपतिश्रेणीं सदा तुच्छवत् भूत्वा दीनगणेशकौ करुण्या कौपीनकन्थाश्रितौ गोपीभावसुधामृताब्धिलहरीकल्लोलमग्नौ मुदा वन्दे रूपसनातनौ रघुपती श्रीजीवगोपालकौ
Tyaktva Turnam Ashesha-Mandala-Pati-Shrenim Sada Tuchchhavat Bhutva Dina-Ganeshaku Karunya Kaupina-Kanthashritau Gopi-Bhava-Sudhamritabdhi-Lahari-Kallola-Magnau Muda Vande Rupa-Sanatanau Raghupati Shri-Jiva-Gopalakau

श्लोक 4

कूजत्कोकिलहंससारसगणाकीर्णे मयूराकुले नानावर्णसुगन्धिशीतलजले श्रीगोवर्धनाद्रितटे राधाकृष्णरहःप्रमोदविभवं संस्मारयन्तौ मुदा वन्दे रूपसनातनौ रघुपती श्रीजीवगोपालकौ
Kujat-Kokila-Hamsa-Sarasa-Ganakhirne Mayurakule Nana-Varna-Sugandhi-Shitala-Jale Shri-Govardhanadri-Tate Radha-Krishna-Rahah-Pramoda-Vibhavam Samsmarayantau Muda Vande Rupa-Sanatanau Raghupati Shri-Jiva-Gopalakau

श्लोक 5

सङ्ख्यापूर्वकनामगाननतिभिः कालावसानीकृतौ निद्राहारविहारकादिविजयौ चात्यन्तदीनौ च यौ राधाकृष्णगुणस्मृतेर्मधुरिमानन्दे विलीनौ मुदा वन्दे रूपसनातनौ रघुपती श्रीजीवगोपालकौ
Sankhya-Purvaka-Nama-Gana-Natibhih Kalavasanikhritau Nidrahara-Viharakadi-Vijayau Chatydanta-Dinau Cha Yau Radha-Krishna-Guna-Smriter Madhurimanande Vilinau Muda Vande Rupa-Sanatanau Raghupati Shri-Jiva-Gopalakau

श्लोक 6

राधाकुण्डतटे कलविहगसङ्गेऽथ भाण्डीरके वृन्दारण्यवने वनेषु सततं गोवर्धनस्थावरम् गोविन्दप्रियभक्तवृन्दसहितौ प्रेमाश्रुधाराकुलौ वन्दे रूपसनातनौ रघुपती श्रीजीवगोपालकौ
Radha-Kunda-Tate Kala-Vihaga-Sange Tha Bhandirake Vrindaranya-Vane Vaneshu Satatam Govardhana-Sthavaram Govinda-Priya-Bhakta-Vrinda-Sahitau Premashru-Dharakulau Vande Rupa-Sanatanau Raghupati Shri-Jiva-Gopalakau

श्लोक 7

हे राधे व्रजदेविके च ललिते हे नन्दसूनो कुतः श्रीगोवर्धनकल्पपादपतले कालिन्दीकूले कुतः घोषन्ताविति सर्वतो व्रजपुरे खेदैर्महाविह्वलौ वन्दे रूपसनातनौ रघुपती श्रीजीवगोपालकौ
He Radhe Vraja-Devike Cha Lalite He Nanda-Suno Kutah Shri-Govardhana-Kalpa-Padapa-Tale Kalindi-Kule Kutah Ghoshantav Iti Sarvato Vraja-Pure Khedair Mahavihvalau Vande Rupa-Sanatanau Raghupati Shri-Jiva-Gopalakau

श्लोक 8

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

बुधवार, गुरुवार एवं एकादशी तिथि

उत्तम मुहूर्त / समय

प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) अथवा संध्या वेला

पूजन सामग्री व अर्पण

तुलसी दल, माखन-मिश्री का भोग, पीले पुष्प एवं चंदन

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • परम भक्ति, मानसिक आनंद, भय-चिंता से मुक्ति एवं आत्मिक शांति

पृष्ठभूमि

यह संस्कृत अष्टक श्रीनिवास आचार्य की रचना माना जाता है, जो गौड़ीय वैष्णव परंपरा के आचार्य थे और परंपरा के अनुसार गोपाल भट्ट गोस्वामी के शिष्य थे, जिन्होंने वृन्दावन से गोस्वामियों के ग्रंथ बंगाल पहुँचाए। इसमें श्रीचैतन्य महाप्रभु के शिष्य षड्गोस्वामियों की वंदना है: श्रीरूप, सनातन, रघुनाथ भट्ट, रघुनाथ दास, जीव और गोपाल भट्ट। प्रत्येक श्लोक एक ही वंदना-पंक्ति पर समाप्त होता है।

इस पाठ के विषय में

रचयिता: Srinivasa Acharya

क्या आप जानते हैं?

रचयिता

यह अष्टक श्रीनिवास आचार्य की रचना माना जाता है, जो गौड़ीय वैष्णव परंपरा के प्रमुख आचार्य थे। चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी इसे षड्गोस्वामियों की स्तुति में गाते हैं।

छह गोस्वामी

श्रीरूप, सनातन, रघुनाथ भट्ट, रघुनाथ दास, जीव और गोपाल भट्ट वृन्दावन के आसपास रहे, उन्होंने परंपरा का भक्ति-साहित्य रचा और श्रीकृष्ण की लीलास्थलियों को पुनः प्रकट किया। जीव गोस्वामी के संदर्भ ग्रंथ भागवत की शिक्षाओं को क्रमबद्ध करते हैं।

कीर्तन और नृत्य

पहले श्लोक में कहा गया है कि वे सदा कृष्ण-नाम के उच्च कीर्तन, गान और नर्तन में लीन रहते थे और प्रेमामृत के सागर में डूबे थे।

वैराग्य

चौथे श्लोक में उनकी स्तुति है कि उन्होंने राजाओं के सान्निध्य और धन को तिनके के समान त्यागकर कौपीन और कंथा धारण की, और गोपी-भाव के अमृत की लहरों में मग्न रहे।

व्रज के स्थल

पाँचवें और सातवें श्लोक में गोवर्धन, राधाकुण्ड, भाण्डीरवन और वृन्दावन के वनों का उल्लेख है, और आठवें श्लोक में वे 'हे राधे, हे ललिते, हे नन्दसूनो, कहाँ हो?' पुकारते दिखते हैं।

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