संतकृपा झाली इमारत फळा आली — संत बहिणाबाई अभंग
संत बहिणाबाई का यह अभंग वारकरी भक्ति आंदोलन का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक परिचय है। इसमें भक्ति के भव्य देवालय के निर्माण का अनुपम रूपक प्रस्तुत किया गया है: संत ज्ञानेश्वर ने इसकी नींव रखी, संत नामदेव ने इसका विस्तार किया, संत एकनाथ ने इसमें दृढ़ स्तंभ लगाया, और संत तुकाराम इस देवालय के स्वर्ण-कलश बने।
श्लोक
परम संतों की असीम कृपा हुई, जिसके फलस्वरूप भक्ति एवं भागवत धर्म की यह भव्य इमारत पूर्ण होकर फलवती हुई।
श्लोक 1
संत ज्ञानेश्वर जी ने इस भागवत धर्म की सुदृढ़ नींव रखी और इस अनुपम भक्ति-देवालय की स्थापना की।
श्लोक 2
संत नामदेव उनके विनम्र सेवक और सहयोगी बने; और उन्होंने कीर्तन-प्रचार द्वारा इस भक्ति-आंदोलन का चतुर्दिक विस्तार किया।
श्लोक 3
संत एकनाथ जी ने (जनार्दन स्वामी के आशीर्वाद से) इस मंदिर में दृढ़ स्तंभ लगाया और इसे सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
श्लोक 4
संत तुकाराम जी इस भक्ति-देवालय के स्वर्ण-कलश बने; अब सभी भक्तजन पूर्ण शांति, प्रेम और सहज भाव से भगवान का भजन-कीर्तन करें।
श्लोक 5
संत बहिणाबाई कहती हैं: देखो, उस मंदिर के शिखर पर पावन भगवा ध्वज लहरा रहा है; और संतों ने भक्ति-दर्शन का निरूपण अत्यंत सहज और सुंदर रूप में सबके लिए सुलभ कर दिया है।
श्लोक 6
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
संत बहिणाबाई (1628–1700 ई.) संत तुकाराम जी की अनन्य शिष्या और उच्च कोटि की आत्मज्ञानी संत थीं। उन्होंने 'संतकृपा झाली' अभंग में वारकरी संप्रदाय के चार सौ वर्षों के इतिहास और उसके चारों युगपुरुषों (ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम) के ऐतिहासिक अवदान को एक दिव्य मंदिर के रूपक में पिरोकर अमर कर दिया।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Sant Bahinabai
क्या आप जानते हैं?
भक्ति के मंदिर का रूपक
संत बहिणाबाई का यह रूपक महाराष्ट्र के विश्वविद्यालयों और साहित्य में वारकरी आंदोलन के चार सौ वर्षों के विकास को समझने का सर्वमान्य आधार है।
वारकरी परंपरा के चार युगपुरुष
ज्ञानेश्वर (दर्शन की नींव), नामदेव (भक्ति का प्रसार), एकनाथ (आचार का स्तंभ), और तुकाराम (भक्ति का स्वर्ण-कलश)।
फड़कती हुई भगवा पताका
पद के अंतिम चरण में जिस ध्वजा का उल्लेख है, वह आज भी पंढरपुर वारी में लाखों वारकरियों के हाथों में लहराती हुई दिखाई देती है।
Vitthal
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